शबरी की नवधा-भक्ति

शबरी का वास्तविक नाम श्रमणा था। श्रमणा भील समुदाय की “शबरी” जाति से सम्बंधित थी। संभवतः इसी कारण श्रमणा को शबरी नाम दिया गया था। पौराणिक संदर्भों के अनुसार श्रमणा एक कुलीन ह्रदय की प्रभु राम की एक अनन्य भक्त थी लेकिन उसका विवाह एक दुराचारी और अत्याचारी व्यक्ति से हुआ था।

प्रारम्भ में श्रमणा ने अपने पति के आचार-विचार बदलने की बहुत चेष्टा की, लेकिन उसके पति के पशु संस्कार इतने प्रबल थे की श्रमणा को उसमें सफलता नहीं मिली। कालांतर में अपने पति के कुसंस्कारों और अत्याचारों से तंग आकर श्रमणा ने गृहत्याग दिया तथा मतंग ऋषि के आश्रम में जा पहुँची। अछूत होने के कारण वह आश्रम में जाने का साहस न जुटा सकी और आश्रम के द्वार पर ही बैठ गयी। जब मतंग ऋषि आये तो उन्होंने श्रमणा को द्वार पर बैठे देख उसके आने का कारण पूछा श्रमणा ने बहुत ही विनम्र स्वर में अपने आने का कारण स्पष्ट किया।बहुत सोच-विचार के बाद मतंग ऋषि ने श्रमणा को अपनी शिष्या के रूप में स्वीकार कर लिया। अपने व्यवहार और कार्यकुशलता के कारण वह कुछ ही समय में सभी आश्रम वासियों की प्रिय बन गई।
ऋषि मतंग जब परम धाम को जाने लगे तब उन्होंने शबरी को उपदेश किया कि वह परमात्मा मैं अपना ध्यान और विश्वास बनाये रखें। उन्होंने कहा कि परमात्मा सबसे प्रेम करते हैं। उनके लिए कोई इंसान उच्च या निम्न जाति का नहीं है। उनके लिए सब समान हैं। फिर उन्होंने शबरी को बताया कि एक दिन प्रभु राम उनके द्वार पर आयेंगे। अतः उन्हें इस आश्रम से कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं है।
ऋषि मतंग के स्वर्गवास के बाद शबरी ईश्वर भजन में लगी रही और प्रभु राम के आने की प्रतीक्षा करती रहीं। लोग उन्हें भला बुरा कहते, उनकी हँसी उड़ाते पर वह परवाह नहीं करती। उनकी आँखें बस प्रभु राम का ही रास्ता देखती रहतीं थीं।

स्थूलशिरा नामक महर्षि के अभिशाप से राक्षस बने कबन्ध को श्रीराम ने उसका वध करके मुक्ति दी और उससे सीता की खोज में मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया। तब कबन्ध ने श्रीराम को मतंग ऋषि के आश्रम का रास्ता बताया और राक्षस योनि से मुक्त होकर गन्धर्व रूप में परमधाम पधार गया। श्रीराम व लक्ष्मण मतंग ऋषि के आश्रम पहुँचे। वहाँ आश्रम में वृद्धा शबरी भक्ति में लीन थी। मतंग ऋषि अपने तप व योग के बल पर अन्य ऋषियों सहित दिव्यलोक पहुँच चुके थे। जब शबरी को पता चला कि भगवान श्रीराम स्वयं उसके आश्रम आए हैं तो वह एकदम भाव विभोर हो उठी और ऋषि मतंग के दिए आशीर्वाद को स्मरण करके गद्गद हो गईं। वह दौड़कर अपने प्रभु श्रीराम के चरणों से लिपट गईं।
इसके बाद शबरी जल्दी से जंगली कंद-मूल और बेर लेकर आईं और अपने परमेश्वर को सादर अर्पित किए। पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार, बेर कहीं खट्टे न हों, इसलिए अपने इष्ट की भक्ति की मदहोशी से ग्रसित शबरी ने बेरों को चख-चखकर श्रीराम व लक्ष्मण को भेंट करने शुरू कर दिए। श्रीराम शबरी की अगाध श्रद्धा व अनन्य भक्ति के वशीभूत होकर सहज भाव एवं प्रेम के साथ झूठे बेर अनवरत रूप से खाते रहे, लेकिन लक्ष्मण ने झूठे बेर खाने में संकोच किया। उन्होंने नजर बचाते हुए वे झूठे बेर पीछे फेंक दिए। (माना जाता है कि लक्ष्मण द्वारा फेंके गए यही झूठे बेर, बाद में जड़ी-बूटी बनकर उग आए। समय बीतने पर यही जड़ी-बूटी लक्ष्मण के लिए संजीवनी साबित हुई। श्रीराम-रावण युद्ध के दौरान रावण के पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाथ) के ब्रह्मास्त्र से लक्ष्मण मुर्छित हो गए और मरणासन्न हो गए। विभीषण के सुझाव पर लंका से वैद्यराज सुषेण को लाया गया। वैद्यराज सुषेण के कहने पर बजरंग बली हनुमान संजीवनी लेकर आए। श्रीराम की अनन्य भक्त शबरी के झूठे बेर ही लक्ष्मण के लिए जीवनदायक साबित हुए)। प्रभु को तृप्त करने के बाद शबरी हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गईं। प्रभु को देखकर उनका प्रेम अत्यंत बढ़ गया। उन्होंने कहा- “मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ ? मैं नीच जाति की और अत्यंत मूढ़ बुद्धि हूँ।”

श्री रघुनाथजी ने कहा- “हे भामिनि ! मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर।

01. पहली भक्ति है संतों का सत्संग।
02. दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम।
03. तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा।
04. चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें।
05. मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास। यह वेदों में प्रसिद्ध है।
06. छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना।
07. सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना।
08. आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना।
09. नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना।

इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो। हे भामिनि ! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है।”

इसके बाद श्रीराम ने शबरी की भक्ति से खुश होकर कहा, ‘‘भद्रे ! तुमने मेरा बड़ा सत्कार किया। अब तुम अपनी इच्छा के अनुसार आनन्दपूर्वक अभीष्ट लोक की यात्रा करो।’’
इस पर शबरी ने स्वयं को अग्नि के अर्पण करके दिव्य शरीर धारण किया और अपने प्रभु की आज्ञा से स्वर्गलोक पधार गईं।

चन्द्र प्रकाश शर्मा