शबरी की नवधा-भक्ति

शबरी का वास्तविक नाम श्रमणा था। श्रमणा भील समुदाय की “शबरी” जाति से सम्बंधित थी। संभवतः इसी कारण श्रमणा को शबरी नाम दिया गया था। पौराणिक संदर्भों के अनुसार श्रमणा एक कुलीन ह्रदय की प्रभु राम की एक अनन्य भक्त थी लेकिन उसका विवाह एक दुराचारी और अत्याचारी व्यक्ति से हुआ था।

प्रारम्भ में श्रमणा ने अपने पति के आचार-विचार बदलने की बहुत चेष्टा की, लेकिन उसके पति के पशु संस्कार इतने प्रबल थे की श्रमणा को उसमें सफलता नहीं मिली। कालांतर में अपने पति के कुसंस्कारों और अत्याचारों से तंग आकर श्रमणा ने गृहत्याग दिया तथा मतंग ऋषि के आश्रम में जा पहुँची। अछूत होने के कारण वह आश्रम में जाने का साहस न जुटा सकी और आश्रम के द्वार पर ही बैठ गयी। जब मतंग ऋषि आये तो उन्होंने श्रमणा को द्वार पर बैठे देख उसके आने का कारण पूछा श्रमणा ने बहुत ही विनम्र स्वर में अपने आने का कारण स्पष्ट किया।बहुत सोच-विचार के बाद मतंग ऋषि ने श्रमणा को अपनी शिष्या के रूप में स्वीकार कर लिया। अपने व्यवहार और कार्यकुशलता के कारण वह कुछ ही समय में सभी आश्रम वासियों की प्रिय बन गई।
ऋषि मतंग जब परम धाम को जाने लगे तब उन्होंने शबरी को उपदेश किया कि वह परमात्मा मैं अपना ध्यान और विश्वास बनाये रखें। उन्होंने कहा कि परमात्मा सबसे प्रेम करते हैं। उनके लिए कोई इंसान उच्च या निम्न जाति का नहीं है। उनके लिए सब समान हैं। फिर उन्होंने शबरी को बताया कि एक दिन प्रभु राम उनके द्वार पर आयेंगे। अतः उन्हें इस आश्रम से कहीं और जाने की आवश्यकता नहीं है।
ऋषि मतंग के स्वर्गवास के बाद शबरी ईश्वर भजन में लगी रही और प्रभु राम के आने की प्रतीक्षा करती रहीं। लोग उन्हें भला बुरा कहते, उनकी हँसी उड़ाते पर वह परवाह नहीं करती। उनकी आँखें बस प्रभु राम का ही रास्ता देखती रहतीं थीं।

स्थूलशिरा नामक महर्षि के अभिशाप से राक्षस बने कबन्ध को श्रीराम ने उसका वध करके मुक्ति दी और उससे सीता की खोज में मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया। तब कबन्ध ने श्रीराम को मतंग ऋषि के आश्रम का रास्ता बताया और राक्षस योनि से मुक्त होकर गन्धर्व रूप में परमधाम पधार गया। श्रीराम व लक्ष्मण मतंग ऋषि के आश्रम पहुँचे। वहाँ आश्रम में वृद्धा शबरी भक्ति में लीन थी। मतंग ऋषि अपने तप व योग के बल पर अन्य ऋषियों सहित दिव्यलोक पहुँच चुके थे। जब शबरी को पता चला कि भगवान श्रीराम स्वयं उसके आश्रम आए हैं तो वह एकदम भाव विभोर हो उठी और ऋषि मतंग के दिए आशीर्वाद को स्मरण करके गद्गद हो गईं। वह दौड़कर अपने प्रभु श्रीराम के चरणों से लिपट गईं।
इसके बाद शबरी जल्दी से जंगली कंद-मूल और बेर लेकर आईं और अपने परमेश्वर को सादर अर्पित किए। पौराणिक सन्दर्भों के अनुसार, बेर कहीं खट्टे न हों, इसलिए अपने इष्ट की भक्ति की मदहोशी से ग्रसित शबरी ने बेरों को चख-चखकर श्रीराम व लक्ष्मण को भेंट करने शुरू कर दिए। श्रीराम शबरी की अगाध श्रद्धा व अनन्य भक्ति के वशीभूत होकर सहज भाव एवं प्रेम के साथ झूठे बेर अनवरत रूप से खाते रहे, लेकिन लक्ष्मण ने झूठे बेर खाने में संकोच किया। उन्होंने नजर बचाते हुए वे झूठे बेर पीछे फेंक दिए। (माना जाता है कि लक्ष्मण द्वारा फेंके गए यही झूठे बेर, बाद में जड़ी-बूटी बनकर उग आए। समय बीतने पर यही जड़ी-बूटी लक्ष्मण के लिए संजीवनी साबित हुई। श्रीराम-रावण युद्ध के दौरान रावण के पुत्र इन्द्रजीत (मेघनाथ) के ब्रह्मास्त्र से लक्ष्मण मुर्छित हो गए और मरणासन्न हो गए। विभीषण के सुझाव पर लंका से वैद्यराज सुषेण को लाया गया। वैद्यराज सुषेण के कहने पर बजरंग बली हनुमान संजीवनी लेकर आए। श्रीराम की अनन्य भक्त शबरी के झूठे बेर ही लक्ष्मण के लिए जीवनदायक साबित हुए)। प्रभु को तृप्त करने के बाद शबरी हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गईं। प्रभु को देखकर उनका प्रेम अत्यंत बढ़ गया। उन्होंने कहा- “मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ ? मैं नीच जाति की और अत्यंत मूढ़ बुद्धि हूँ।”

श्री रघुनाथजी ने कहा- “हे भामिनि ! मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर।

01. पहली भक्ति है संतों का सत्संग।
02. दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम।
03. तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा।
04. चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें।
05. मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास। यह वेदों में प्रसिद्ध है।
06. छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना।
07. सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना।
08. आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना।
09. नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना।

इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो। हे भामिनि ! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है।”

इसके बाद श्रीराम ने शबरी की भक्ति से खुश होकर कहा, ‘‘भद्रे ! तुमने मेरा बड़ा सत्कार किया। अब तुम अपनी इच्छा के अनुसार आनन्दपूर्वक अभीष्ट लोक की यात्रा करो।’’
इस पर शबरी ने स्वयं को अग्नि के अर्पण करके दिव्य शरीर धारण किया और अपने प्रभु की आज्ञा से स्वर्गलोक पधार गईं।

चन्द्र प्रकाश शर्मा

 

सर्वश्रेष्ठ राजा राम

भारत भूमि पर पृथु से लेकर हरिश्चंद्र, मान्धाता और रघु से लेकर धर्मराज कृष्ण और युधिष्ठिर तक जितने राजा हुये उनकी संख्या सूची बनाना जितना कठिन है, उनमें “सबसे श्रेष्ठ कौन हैं” इसका उत्तर उतना ही आसान है। सबने एक स्वर में यही कहा है कि भारत- भूमि पर जन्में समस्त राजाओं में सबसे श्रेष्ठ “श्रीराम” थे। शुक्र-नीति में कहा गया है:-

“न राम सदृशो राजा भूमौ नीति मानभूत”

शुक्र-नीति में जो कहा गया है उसका दर्शन पूरे रामायण में कई बार होता है। वहां राम कई जगहों पर राजा के रूप में भी प्रस्तुत हैं और कई जगहों पर औरों को राज-काज की शिक्षा देते हुये भी प्रस्तुत हैं।

राम जब राजा बने तो “उन्होंने राजा और आदर्श राज्य कैसा हो” इसका आदर्श प्रस्तुत किया जिसे तुलसी बाबा ने लिखा है:-

“दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज नहीं कहहूँ व्यापा”

और जब वो राजा नहीं थे तब भी उन्होंनें इसी राज्य-मर्यादा की शिक्षा अपने अनुजों और मित्रों को दी थी।

भरत चित्रकूट में जब राम से मिलने जातें हैं तो तत्कालीन अयोध्या नरेश भरत को राम राज-काल की जो शिक्षा देतें हैं वो आज के शासकों के लिये भी पाथेय है।

राम भरत से पूछ्तें हैं:-

● भरत ! तुम असमय में ही निद्रा के वशीभूत तो नहीं होते? समय पर जाग तो जाते हो न?

● सैनिकों को देने के लिये नियत किया हुआ समुचित वेतन और भत्ता तुम समय पर तो देते हो न? इसे देने में कोई विलंब तो नहीं करते? क्योंकि अगर सैनिकों को नियत समय पर वेतन, भत्ता न दिया जाये तो वो अपने स्वामी पर अत्यंत कुपित हो जातें हैं और इसके कारण बड़ा भारी अनर्थ हो जाता है।

● क्या तुम नीतिशास्त्र की आज्ञा के अनुसार चार या तीन मंत्रियों के साथ-सबको एकत्र करके अथवा सबसे अलग-अलग मिलकर सलाह करते हो?

● तुम राजकार्यों के विषय पर अकेले ही तो विचार नहीं करते?

● क्या तुम्हारी आय अधिक और व्यय बहुत कम है न? तुम्हारे खजाने के धन अपात्रों के हाथ में तो नहीं चला जाता?

● काम-काज में लगे हुये सारे मनुष्य तुम्हारे पास निडर होकर तो आतें हैं न?

● जंगल तुम्हारे राज्य में सुरक्षित तो हैं न?

● तुम्हारे राज्य में दूध देने वाली गौएँ तो अधिक संख्या में है न?

● क्या तुम्हारे राज्य में स्त्रियाँ भलीभांति सुरक्षित तो रहतीं हैं न?

● कृषि और गोरक्षा से आजीविका चलानेवाले सभी वैश्य तुम्हारे प्रीतिपात्र तो हैं न?

● तुम्हारे राज्य में सिंचाई व्यवस्था तो उत्तम है न?

● तुम नास्तिक ब्राह्मणों का तो संग नहीं करते? क्योंकि वो अज्ञानी होते हुये भी अपने को बहुत बड़ा ज्ञानी मानतें हैं।

● तुमने जिसे राजदूत के पद पर नियुक्त किया है, वह पुरुष अपने ही देश का निवासी, विद्वान, कुशल और प्रतिभाशाली तो है न? उसे जैसा निर्देश दिया गया हो वैसा ही वो दूसरे (राष्ट्राध्यक्ष) के सामने कहता है न?

● क्या तुम्हारे सारे अधिकारी और मंत्रीमंडल के लोग तुमसे प्रीति रखतें हैं? क्या वो तुम्हारे लिए एकचित्त होकर अपने प्राणों का उत्सर्ग करने के लिये तैयार रहतें हैं?

● क्या तुम अपने सेनानायकों को यथोचित सम्मान देते हो?

● वो लोग जो राजा के राज्य को हड़प लेने की इच्छा रखतें हो वैसे दुष्टों को अगर राजा नहीं मार डाता, वह स्वयम उसके हाथ से मारा जाता है।

● भरत ! जैसे पवित्र याजक पतित यजमान का तथा स्त्रियाँ कामचोर पुरुष का तिरस्कार कर देतीं हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरता पूर्वक अधिक कर लेने के कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती.

● क्या तुमने अपने ही समान सुयोग्य व्यक्तियों को ही मंत्री बनाया है?

● क्या तुम अर्थशास्त्री सुधन्वा का सम्मान करते हो?

राम ने राजनीति संबंधी ये उपदेश सुग्रीव से लेकर लक्ष्मण तक सबको दिये थे। प्रभु कहतें हैं:-

● सामनीति के द्वारा न तो इस लोक में ही कीर्ति प्राप्त ही जा सकती है और न ही संग्राम में विजय हासिल होता है.

● यदि राजा दंड देने में प्रमाद कर जाये तो उन्हें दूसरे के किये हुए पाप भी भोगने पड़ते हैं.

● राजा को अपने सु-हृदयों की पहचान अवश्य होनी चहिये.

● सेवकों को कम वेतन देने वाला राजा नष्ट हो जाता है.

● जो राजा बड़ा अभिमानी हो, स्वयं को ही सर्वोपरि माने ऐसे राजा को संकटकाल में उसके अपने लोग ही मार डालतें हैं इसलिये राजा को इन दुर्गुणों से बचना चाहिये।

● जो राजा अपने उपकारी मित्रों के सामने की गई अपनी प्रतिज्ञा (वादा/ घोषणा) को झूठी कर देता है , उससे बढ़कर कोई क्रूर नहीं होता।

ऊपर प्रभु के जितने भी उपदेश हैं क्या उनमें से किसी एक के बारे में भी कोई कह सकता है कि अब वो प्रासंगिक नहीं रहा जबकि राजनीति विषयके ये उपदेश भगवान ने लाखों साल पहले दिये थे।

रामलला के राजनीति-विषयक उपदेशों का ये सार-संक्षेपण मात्र है। आज के समय में जो प्रासंगिक है उसी को आधार बनाकर और राम के उपदेशों से कुछ का चयन कर आपके सामने रखा है। हमारी वर्तमान पीढ़ी इस बात को समझे कि राम भारत के लिये क्या हैं।

रामराज्य का वर्णन करते हुए तुलसी कहतें हैं,

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

यानि, ‘रामराज्य’ में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।

ऐसा नहीं है कि रामराज्य में हर कोई धनपति हो गया था पर इसके बाबजूद जिस रामराज्य का वर्णन तुलसी ने किया है वहां वर्ग-संघर्ष जैसी कोई अवधारणा नहीं पनप सकती थी इसकी वजह थी कि वहां के मनुष्यों के बीच परस्पर प्रेम था, एक-दूसरे के प्रति आदर का भाव था, मालिक और मजदूर में भेद नहीं था, हर कार्य की सफलता का श्रेय स्वयं को नहीं सबको देने का भाव था।

संघ के द्वितीय सरसंघचालक पू० माधव सदाशिव गोलवलकर ने भी कहा था कि रिक्शे या ठेले वाले को ‘ऐ रिक्शावाले’ कहने की जगह अगर समाज उसे उसका नाम लेकर बुलायें तो उसमें कभी कम्युनिज्म और वर्ग-संघर्ष का भाव नहीं पनप सकता। ये सत्य कथन है कि प्रेम, आदर और मानवीय मूल्यों का सम्मान आर्थिक विषमता को गौण कर देता है, आर्थिक विषमता सामजिक विषमता नहीं बन पाती।

कोई मजदूर है, श्रम करता है तो उसके मन में इसके लिये कोई हीनताबोध नहीं हो, श्रम सम्माननीय है, गौरव-बोध कराती है रामकथा का एक बड़ा सन्देश ये भी है और राम ने इसे जीवन और अपने कर्मों से हमेशा सिद्ध किया।

राजकुल में जन्मे अवश्य पर इसे उन्होंने कभी भी श्रम से भागने का आधार नहीं बनाया। जब गुरुओं के साथ थे तो आश्रम की तमाम व्यवस्थाओं के साथ अपने गुरु के चरण दबाने जैसे कार्यों में राम हमेशा आगे रहे, जब वनवास काल में थे तब कुटिया बनाने से लेकर अन्य दूसरे काम दोनों भाई स्वयं ही करते थे और जब वापस अयोध्या आये, राजसिंहासन मिला तब भी ये संस्कार न तो उनमें लुप्त हुआ था न उनके परिवारजनों में।

तुलसी आदर्श रामराज्य के वर्णन में लिखतें हैं :-

जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥
निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई॥
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ॥
कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं॥

यानि, यद्यपि घर में बहुत से दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवा की विधि में कुशल हैं, तथापि श्री सीताजी घर की सब सेवा अपने ही हाथों से करती हैं और श्री रामचंद्रजी की आज्ञा का अनुसरण करती हैं, कृपासागर श्री रामचंद्रजी जिस प्रकार से सुख मानते हैं, श्री सीता वही करती हैं, क्योंकि वे सेवा की विधि को जानने वाली हैं। घर में कौसल्या आदि सभी सासुओं की सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बात का अभिमान और मद नहीं है।

बिना श्रम अगर कुछ हासिल हो जाये तो वो महत्त्वहीन हो जाता है और जो श्रम के नतीजे में मिले उससे सुखकर कुछ नहीं होता, राम के जीवन-चरित में इसे सिखाता हुआ एक प्रसंग है:-

जब दशरथ ने प्रभु को वनवास की आज्ञा दी तो वो एक-एक कर सबसे मिले फिर जितनी धन-संपत्ति और वस्त्राभूषण उनके पास थे सब दान करने के लिए महल से बाहर निकल आये। दान करते समय एक अस्सी वर्षीय बूढ़ा लाठी टेकता हुआ उनके पास याचक रूप में आया। राम ने पूछा, क्या चाहिए? उस वृद्ध ने गौ की मांग की, राम ने सामने मैदान की तरह अंगुली से इशारा करते हुए उस वृद्ध से कहा, बाबा आपके हाथ में जो लाठी है, उसे जितनी जोर से फेंक सकते हो फेंको। जहाँ जाकर लाठी गिरेगी, उससे इधर की सारी गौएँ आपकी। उस बूढ़े को समझ नहीं आया कि ये क्या कह रहे हैं राम, वो नकारात्मकता में सर हिलाते हुए कहने लगा, राम, मेरी उम्र इतनी नहीं है कि मुझसे ये लाठी फेंकी जायेगी। राम ने उसे उत्साहित करते हुए कहा, देखो बाबा ! लाठी जितनी दूर फेंकोगे उतनी गौएँ आपकी। उत्साह में भरे बूढ़े ने पूरे ताकत से लाठी घुमाकर फेंकी और वहां से काफी दूर जा गिरी। राम ने लाठी की सीमा के भीतर की सारी गायें उसे देकर ससम्मान विदा कर दिया।

ये सारी घटना लक्ष्मण भी देख रहे थे, उन्हें कुछ समझ नही आया तो उन्होंने राम से पूछा :- भैया, आप उसे यूं भी तो गौएँ दे सकते थे तो उससे ये श्रम क्यों करवाया? तब राम ने लक्ष्मण को समझाते हुए कहा कि अगर उस बूढ़े को दान में गौएँ मिलती तो वो उसे मुफ्त का माल समझकर अकर्मण्य हो जाते पर चूँकि अब उन्होंने इसे अपने श्रम से पाया है तो वो इसकी महत्ता और कीमत समझेंगे।

जब लंका विजय हुई तो विजय के उपलक्ष्य में प्रभु ने सब वानर-भालुओं को बुलाया, उनसे प्रेम से बात की और कहा, ये विजय मेरी नहीं है, न ही रावण वध अकेले मेरे बल का परिणाम था बल्कि ये विजय आप सबके बल से प्राप्त हुआ है और आज तीनों लोक आप सबका यशोगान गा रहा है। अपने इन सहयोगियों के प्रति राम ने तब भी आभार प्रकट करते हुए उन्हें विजय का श्रेय दिया था जब वो चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, अपने कुल गुरु वशिष्ठ से सबका परिचय कराते हुए राम ने कहा था ,

“गुरुवर ! ये सब मेरे वो मित्र हैं जिन्होनें मेरे लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी, ये सब मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं”

लंकाकाण्ड में आता है कि जब विभीषण के राज्याभिषेक की बात हो रही थी तब राम ने विभीषण के लंका चलने के अनुरोध को ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि मैं पिता की आज्ञानुसार चौदह वर्ष पूर्व नगर में नहीं जा सकता पर आपके राज्याभिषेक के लिये मैं “अपने समान” सब वानरों को भेजता हूँ। राम ने वानरों को अपने समान बताया। राम की नज़र में हनुमान भी कोई सेवक नहीं थे, राम ने कई बार हनुमान को अपना पुत्र बताया है। वो हनुमान से कहतें हैं, “सुन सुत तोहि उरिन मैं नाहीं” यानि हे पुत्र ! सुन मैं तुझसे उरिन नहीं हो सकता।

इसलिये राम से अधिक समाजवादी, मजदूर-हितैषी और वर्ग-भेद को पाटने वाला कोई दुनिया के किसी किताब, किसी वृत से, किसी इतिहास ग्रन्थ से निकाल कर दिखा दे।

मालिक और मजदूर के संबंधों को समझना हो, श्रम के सम्मान को समझना हो, श्रम से आत्मगौरव का बोध जागरण करना हो, मजदूर यानि धर्मविरोध नहीं बल्कि धर्म के अनुपालन का भाव देखना हो, वर्ग-संघर्ष न जन्म ले इसके लिये भाषण और दर्शन देने की जगह स्वयं के जीवन को मिसाल बनाकर दिखाना हो तो रामचरित से सुंदर कुछ नहीं हो सकता।

देश के विकास और निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाने वाले लाखों मजदूरों के कठिन परिश्रम, दृढ़ निश्चय और निष्ठा का वास्तविक सम्मान तभी होगा जब हिंसा, वर्ग-संघर्ष, साम्राज्यवाद और नास्तिकता से मुक्त समाज बनेगा और ये व्यवहार में श्रीराम के अनुगमन के बिना संभव ही नहीं है।

माओवाद और मार्क्सवाद की आवश्यकता भ्रष्ट जार वाले रूस या महा-भ्रष्ट च्यांग काई शेक के चीन में रही होगी या है …अपने भारत में इनका स्थान केवल डस्टबिन में है।

अपने मामा के यहाँ से आने के बाद जब भरत को राम के वनवास की खबर मिलती है तो वो माता कौशल्या से मिलने जातें हैं। कौशल्या उनसे कहतीं हैं, “बेटा ! तुम राज्य चाहते थे न? सो यह निष्कंटक राज्य तुम्हें प्राप्त हो गया”।

यह सुनकर भरत को बड़ी पीड़ा हुई और वो खुद को अपराधी मानते हुये माँ कौशल्या के चरणों में गिर पड़े और माँ कौशल्या से कई बातें कहीं जिसमें भरत कहतें हैं:-

“अगर मेरी सम्मति से भैया श्रीराम ने वन को प्रस्थान किया है तो मैं आज ही सत्पुरुषों के लोक से, सत्पुरुषों की कीर्ति से और सत्पुरुषों द्वारा सेवित कर्म से शीघ्र ही नष्ट हो जाऊं”। इसके बाद भरत कहतें हैं:-

“अगर मेरी सम्मति से भैया श्रीराम ने वन को प्रस्थान किया है तो मुझे भी वही पाप लगे जो सेवक से भारी काम करवाकर उसे समुचित वेतन न देने वाले स्वामी को लगता है”

राम को वन भेजने के अपराध की सजा की तुलना भरत ने किससे की है अगर ये हमारे यहाँ के वामपंथी देख लेते तो मजदूरों की फ़िक्र में किसी मार्क्स और लेनिन की वाहियात किताबों की ओर देखने न जाते

हिन्दुओं से अधिक समाजवादी कौन है दुनिया में? हमें अपने मजदूरों और वंचितों के लिये किसी आयातित विचार की आवश्यकता नहीं है क्योंकि दुनिया में हिन्दू धर्म से अधिक समाजवाद किसी भी धर्म में नहीं है, किसी विचार में नहीं है और दुनिया में कोई भी व्यक्तित्व नहीं है जो हमारे पूर्वजों से अधिक समाजवादी हो।

अभिजीत सिंह

भगवान् श्रीराम की जन्म तिथि एवं प्रसार

यद्यपि पुराणों के अनुसार श्रीराम का जन्म ७वे मन्वतर के २४वे त्रेतायुग में हुआ है । फिर भी पाश्चात्यों ने अपनी अटकल से उनका जन्म ईसा पूर्व कुछ शताब्दियों या सहस्राब्दियों में ही माना है ।

वैन्थली ने ई पू ९५० में
कर्नल टाड ने ई पू ११०० में
विल्फ़र्ड ने ई पू १३६० में
और विलियम जोन्स ने २०२९ ई पू में माना है ।

पाश्चात्यों की तरह आधुनिक भारतीय विद्वान भी पाश्चात्यों के इस विचारधारा से बाहर नही निकल सके और वो भी अपनी अटकलों से ई पू के कुछ सहस्राब्दियों पू ही निर्धारित करते हैं ।

प्रो कानूनगो ने ई पू ४४३३ में
सरोज बाला ने ई पू ५११४ में और पी वी वर्तक ने ई पू ७३२३ में निर्धारित किया है ।

पाश्चात्य जिनके बाइबिल के अनुसार सृष्टि ही ४००४ ई पू में उत्पन्न हुई वो भगवान् श्रीराम का जन्म ईसा के आसपास ही सिद्ध करेंगे । जबकि भारतीय वैदिक परम्परा में सृष्टि की उत्पत्ति दो सौ करोड़ पर्व पहले हुई थी । सूर्य ,गुरु और शनि के विचार से पाँचो उच्चस्थ ग्रहों की गणना करने से श्रीराम का जन्म काल १८५११४ वर्ष पू हुआ था, किन्तु हम यहां अटकल नहीं लगाएंगे क्योकि शास्त्र ही प्रमाण हैं और शास्त्रों के अनुसार २४ वें त्रेतायुग की द्वापर की संध्यांश में हुआ था ।

“चतुर्विंशे युगे रामो वसिष्ठेन पुरोधसा ।
सप्तमो रावणस्यार्थे जज्ञे दशरथात्मजः ।। (वायुपु०१८/७२)
‘सन्ध्यंशे समनुप्राप्ते त्रेताया द्वापरस्य च ।
अहं दाशरथी रामो भविष्यामि जगत्पति: ।।’ (म०भा०१२/३३९)

इस शास्त्र वचन के अनुसार गणना करने पर भगवान् श्रीराम का जन्म १८१६०१५६ वर्ष पू २४ वे त्रेतायुग की द्वापरयुग की संध्यांश में हुआ था और श्रीराम-जानकीका विवाह १३ वर्ष की आयु में हुआ था और विवाह के १२ वर्ष बाद २५ वर्ष की आयु में वनवास हुआ था । १४ वर्ष वनमें रहकर ३९ वर्ष की आयु में ४०वें वर्ष में राजाधिराज बने । भगवान् श्रीराम ने ११००० वर्ष ११मास ११दिन तक अखण्ड भूमण्डल का राज्य किया था ।

मित्रो हमारे आराध्य देव पुरुषोत्तम राम की भी ध्वजा पूरे दुनिया मे है । दुनिया का शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो पुरुषोत्तम राम के बारे में नहीं जनता हो , सभी भारतीय धर्मग्रंथों में राम का नाम आदर से लया गया है , राम के बिना हिन्दू धर्म और संस्कृति अधूरी है , जैसे हिन्दू अभिवादन के लिए “राम राम ” शब्द का प्रयोग करते है, मृत्यु बाद भी राम नाम सत्य है कहते हैं ।

भारत के बाहर भी थाईलेंड में आज भी संवैधानिक रूप में राम राज्य है , यूनेस्को मे संरक्षित शहर की स्थापना 1351 मे राजा यू थोंग द्वारा हुई थी जिसे की 1767 मे बर्मा द्वारा तबाह करने के बाद खण्डहर रूप मे छोड दिया गया।

उसका नाम भी क्रुंग काओ था। इसका अयोध्या नामकरण 1919 मे तत्कालीन थाई राजा वजिरावुद्ध ने किया है।
ये नामकरण शाही गजट मे दिया है वहा ।

और वहां भगवान राम के छोटे पुत्र कुश के वंशज सम्राट ” भूमिबल अतुल्य तेज ” राज्य कर रहे हैं , जिन्हें नौवां राम ( Rama 9 th ) कहा जाता है ।

लोग थाईलैंड की राजधानी को अंगरेजी में बैंगकॉक ( Bangkok ) कहते हैं , क्योंकि इसका सरकारी नाम इतना बड़ा है , की इसे विश्व का सबसे बडा नाम माना जाता है ।

(1) थाई भाषा में इस पूरे नाम में कुल 163 अक्षरों
का प्रयोग किया गया है , इस नाम की एक और विशेषता है , इसे बोला नहीं बल्कि गाकर कहा जाता है . कुछ लोग आसानी के लिए इसे “महेंद्र अयोध्या ” भी कहते है , अर्थात इंद्र द्वारा निर्मित महान अयोध्या , थाई लैंड के जितने भी राम ( राजा ) हुए हैं सभी इसी अयोध्या में रहते आये हैं ।

यद्यपि थाईलैंड में थेरावाद बौद्ध के लोग बहुसंख्यक हैं , वहां का राष्ट्रीय ग्रन्थ रामायण है ,जिसे थाई भाषा में ” राम कियेन ” कहते हैं , जिसका अर्थ राम कीर्ति होता है , जो वाल्मीकि रामायण पर आधारित है , इस ग्रन्थ की मूल प्रति सन 1767 में नष्ट हो गयी थी , जिससे चक्री राजा प्रथम राम (1736–1809), ने अपनी स्मरण शक्ति से फिर से लिख लिया था ।

थाई लैंड में राम कियेन पर आधारित नाटक और कठपुतलियों का प्रदर्शन देखना धार्मिक कार्य माना जाता है ,

बौद्ध होने पर भी हिन्दू धर्म पर अटूट आस्था रखते हैं , इसलिए उन्होंने ” गरुड़ ” को राष्ट्रीय चिन्ह घोषित किया है , यहां तक कि थाई संसद के सामने गरुड़ बना हुआ है ।

(2) कंपूचिया नामक देश में राम कथा रामकेर्ति नाम से प्रसिद्ध है । मलयेशिया की राम कथा और हिकायत सेरी राम है । फिलिपींस की राम कथा महालादिया लावन है । नेपाल की राम कथा भानुभक्त कृत रामायण है ।

कंपूचिया की राजधानी फ्नाम-पेंह में एक बौद्ध संस्थान है जहाँ ख्मेर लिपि में दो हजार ताल पत्रों पर लिपिबद्ध पांडुलिपियाँ संकलित हैं। इस संकलन में कंपूचिया की रामायण की प्रति भी है। फ्नाम-पेंह बौद्ध संस्थान के तत्कालीन निदेशक एस. कार्पेल्स द्वारा रामकेर्ति के उपलब्ध सोलह सर्गों (१-१० तथा ७६-८०) का प्रकाशन अलग-अलग पुस्तिकाओं में हुआ था। इसकी प्रत्येक पुस्तिका पर रामायण के किसी न किसी आख्यान का चित्र है।१ कंपूचिया की रामायण को वहाँ के लोग ‘रिआमकेर’ के नाम से जानते हैं, किंतु साहित्य जगत में यह ‘रामकेर्ति’ के नाम से विख्यात है।

‘रामकेर्ति’ ख्मेर साहित्य की सर्वश्रेष्ठ कृति है। ‘ख्मेर’ कंपूचिया की भाषा का नाम है। इसके प्रथम खंड की कथा विश्वामित्र यज्ञ से आरंभ होती है और इंद्रजित वध पर आकर अंटक जाती है, दूसरे खंड में सीता त्याग से उनके पृथ्वी प्रवेश तक की कथा है। ‘रामकेर्ति’ का रचनाकार कोई बौद्ध भिक्षुक ज्ञात होता है, क्योंकि वह राम को नारायण का अवतार मानते हुए उनको ‘बोधिसत्व’ की उपाधि प्रदान करता है। इसके बावजूद ‘रामकेर्ति’ और वाल्मीकि रामायण में अत्यधिक साम्य है।

बर्मा में राम Rama (Yama) और Sita (Thida) को Yama Zatdaw नामक रामायण ग्रन्थ में लोप्रियता प्राप्त है ।

(3) इसके अतिरिक्त Java, Bali, Malaya, Burma, Thailand, Cambodia and Laos सहित कई बुद्धिस्ट देशो में रामायण अति लोकप्रिय है । दुनिया के सबसे ज्यादा मुस्लिमो वाले देश इंडोनेशिया में रामलीला मुस्लिम करते है और वह विश्व प्रसिद्ध है ।

नेपाल के राष्ट्रीय अभिलेखागार में वाल्मीकि रामायण की दो प्राचीन पांडुलिपियाँ सुरक्षित हैं। इनमें से एक पांडुलिपि के किष्किंधा कांड की पुष्पिका पर तत्कालीन नेपाल नरेश गांगेय देव और लिपिकार तीरमुक्ति निवासी कायस्थ पंडित गोपति का नाम अंकित है। इसकी तिथि सं. १०७६ तदनुसार १०१९ई. है। दूसरी पांडुलिपि की तिथि नेपाली संवत् ७९५ तदनुसार १६७४-७६ई. है।

नेपाली साहित्य में भानुभक्त कृत रामायण को सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। नेपाल के लोग इसे ही अपना आदि रामायण मानते हैं। यद्यपि भनुभक्त के पूर्व भी नेपाली राम काव्य परंपरा में गुमनी पंत और रघुनाथ भ का नाम उल्लेखनीय है। रघुनाथ भ कृत रामायण सुंदर कांड की रचना उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में हुआ था।

एशिया के पश्चिमोत्तर सीमा पर स्थित तुर्किस्तान के पूर्वी भाग को खोतान कहा जाता है जिसकी भाषा खोतानी है। एच.डब्लू. बेली ने पेरिस पांडुलिपि संग्रहालय से खोतानी रामायण को खोजकर प्रकाश में लाया। उनकी गणना के अनुसार इसकी तिथि नौवीं शताब्दी है।१ खोतानी रामायण अनेक स्थलों पर तिब्बीती रामायण के समान है, किंतु इसमें अनेक ऐसे वृत्तांत हैं जो तिब्बती रामायण में नहीं हैं।

(4) चीन के उत्तर-पश्चिम में स्थित मंगोलिया के लोगों को राम कथा की विस्तृत जानकारी है। वहाँ के लामाओं के निवास स्थल से वानर-पूजा की अनेक पुस्तकें और प्रतिमाएँ मिली हैं। वानर पूजा का संबंध राम के प्रिय पात्र हनुमान से स्थापित किया गया है।१ मंगोलिया में राम कथा से संबद्ध काष्ठचित्र और पांडुलिपियाँ भी उपलबध हुई हैं। ऐसा अनुमान किया जाता है कि बौद्ध साहित्य के साथ संस्कृत साहित्य की भी बहुत सारी रचनाएँ वहाँ पहुँची। इन्हीं रचनाओं के साथ रामकथा भी वहाँ पहुँच गयी। दम्दिन सुरेन ने मंगोलियाई भाषा में लिखित चार राम कथाओं की खोज की है। इनमें राजा जीवक की कथा विशेष रुप से उल्लेखनीय है जिसकी पांडुलिपि लेलिनगार्द में सुरक्षित है।
जीवक जातक की कथा का अठारहवीं शताब्दी में तिब्बती से मंगोलियाई भाषा में अनुवाद हुआ था जिसके मूल तिब्बती ग्रंथ की कोई जानकारी नहीं है। आठ अध्यायों में विभक्त जीवक जातक पर बौद्ध प्रभाव स्पष्ट रुप से दिखाई पड़ता है। इसमें सर्वप्रथम गुरु तथा बोधिसत्व मंजुश्री की प्रार्थना की गयी है। जीवक पूर्व जन्म में बौद्ध सम्राट थे। उन्होंने अपनी पत्नी तथा पुत्र का परित्याग कर दिया। इसी कारण उन्हें दोनों ने शाप दे दिया कि अगले जन्म में वे संतानहीन हो जायेंगे। जीवक की भेंट भगवान बुद्ध से हुई। उन्होंने श्रद्धा के साथ उनका प्रवचन सुना और उन्हें अपने निवास स्थान पर आमंत्रित किया। इस घटना के बाद जीवक की भेंट दस हज़ार मछुआरों से हुई। उन्होंने उन्हें अहिंसा का उपदेश दिया।

जीवक नामक राजा को तीन रानियाँ थीं। तीनों को कोई संतान नहीं थी। राजा वंशवृद्धि के लिए बहुत चिंतित थे। एक बार उन्होंने पुत्र का स्वप्न देखा। भविष्यवस्ताओं के कहने पर वे उंदुबरा नामक पुष्प की तलाश में समुद्र तट पर गये। वहाँ से पुष्प लाकर उन्होंने रानी को दिया। पुष्प भक्षण से रानी को एक पुत्र हुआ जिसका नाम राम रखा गया। कालांतर में राम राजा बने। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी। उन्होंने अपने राज्य में बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु कुकुचंद को आमंत्रित किया। बौद्ध धर्म ग्रंथ त्रिपिटक के चीनी संस्करण में रामायण से संबद्ध दो रचनाएँ मिलती हैं। ‘अनामकं जातकम्’ और ‘दशरथ कथानम्’। फादर कामिल लुल्के के अनुसार तीसरी शताब्दी ईस्वी में ‘अनामकं जातकम्’ का कांग-सेंग-हुई द्वारा चीनी भाषा में अनुवाद हुआ था जिसका मूल भारतीय पाठ अप्राप्य है। चीनी अनुवाद लियेऊ-तुत्सी-किंग नामक पुस्तक में सुरक्षित है।

‘अनामकं जातकम्’ में किसी पात्र का नामोल्लेख नहीं हुआ है, किंतु कथा के रचनात्मक स्वरुप से ज्ञात होता है कि यह रामायण पर आधारित है, क्योंकि इसमें राम वन गमन, सीता हरण, सुग्रीव मैत्री, सेतुबंधष लंका विजय आदि प्रमुख घटनाओं का स्पष्ट संकेत मिलता है। नायिका विहीन ‘अनामकं जातकम्’, जानकी हरण, वालि वध, लंका दहन, सेतुबंध, रावण वध आदि प्रमुख घटनाओं के अभाव के बावजूद वाल्मीकि रामायण के निकट जान पड़ता है। अहिंसा की प्रमुखता के कारण चीनी राम कथाओं पर बौद्ध धर्म का प्रभाव स्पष्ट रुप से परिलक्षित होता है।

(5) तिब्बती रामायण की छह प्रतियाँ तुन-हुआंग नामक स्थल से प्राप्त हुई है। उत्तर-पश्चिम चीन स्थित तुन-हुआंग पर ७८७ से ८४८ ई. तक तिब्बतियों का आधिपत्य था। ऐसा अनुमान किया जाता है कि उसी अवधि में इन गैर-बौद्ध परंपरावादी राम कथाओं का सृजन हुआ। तिब्बत की सबसे प्रामाणिक राम कथा किंरस-पुंस-पा की है जो ‘काव्यदर्श’ की श्लोक संख्या २९७ तथा २८९ के संदर्भ में व्याख्यायित हुई है।

किंरस-पुंस-पा की राम कथा के आरंभ में कहा गया है कि शिव को प्रसन्न करने के लिए रावण द्वारा दसों सिर अर्पित करने के बाद उसकी दस गर्दनें शेष रह जाती हैं। इसी कारण उसे दशग्रीव कहा जाता है। महेश्वर स्वयं उसके पास जाते हैं और उसे तब तक के लिए अमरता का वरदान देते हैं, जब तक कि उसका अश्वमुख मंजित नहीं हो जाता।

(6) इंडोनेशिया और मलयेशिया की तरह फिलिपींस के इस्लामीकरण के बाद वहाँ की राम कथा को नये रुप रंग में प्रस्तुत किया गया। ऐसी भी संभावना है कि इसे बौद्ध और जैनियों की तरह जानबूझ कर विकृत किया गया। डॉ. जॉन आर. फ्रुैंसिस्को ने फिलिपींस की मारनव भाषा में संकलित इक विकृत रामकथा की खोज की है जिसका नाम मसलादिया लाबन है। इसकी कथावस्तु पर सीता के स्वयंवर, विवाह, अपहरण, अन्वेषण और उद्धार की छाप स्पष्ट रुप से दृष्टिगत होता है।

(7) मलयेशिया का इस्लामीकरण तेरहवीं शताब्दी के आस-पास हुआ। मलय रामायण की प्राचीनतम पांडुलिपि बोडलियन पुस्तकालय में १६३३ई. में जमा की गयी थी।१ इससे ज्ञात होता है कि मलयवासियों पर रामायण का इतना प्रभाव था कि इस्लामीकरण के बाद भी लोग उसके परित्याग नहीं कर सके। मलयेशिया में रामकथा पर आधरित एक विस्तृत रचना है ‘हिकायत सेरीराम’। इसका लेखक अज्ञात है। इसकी रचना तेरहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच हुई थी। इसके अतिरिक्त यहाँ के लोकाख्यानों में उपलब्ध रामकथाएँ भी प्रकाशित हुई हैं। इस संदर्भ में मैक्सवेल द्वारा संपादित ‘सेरीराम‘, विंसटेड द्वारा प्रकाशित ‘पातानी रामकथा‘ और ओवरवेक द्वारा प्रस्तुत हिकायत महाराज रावण के नाम उल्लेखनीय हैं।

(8) हिकायत सेरीराम विचित्रताओं का अजायब घर है। इसका आरंभ रावण की जन्म कथा से हुआ है। किंद्रान (स्वर्गलोक) की सुंदरियों के साथ व्यभिचार करने वाले सिरानचक (हिरण्याक्ष) को पृथ्वी पर दस सिर और बीस भुजाओं वाले रावण के रुप में जन्म लेना पड़ा। वह चित्रवह का पुत्र और वोर्मराज (ब्रह्मराज) का पौत्र था। चित्रवह को रावण के अतिरिक्त कुंबकेर्न (कुंभकर्ण) और बिबुसनम (विभीषण) नामक दो पुत्र और सुरपंडकी (शूपंणखा) नामक एक पुत्री थी।

दुराचरण के कारण रावण को उसके पिता ने जहाज से बुटिक सरेन द्वीप भेज दिया। वहाँ उसने अपने पैरों को पेड़ की डाल में बाँध कर तपस्या करने लगा। आदम उसकी तपस्या से प्रसन्न हो गये। उन्होंने अल्लाह से आग्रह किया और उसे पृथ्वी, स्वर्ग और पाताल का राजा बनवा दिया। तीनों लोकों का राज्य मिलने पर रावण ने तीन विवाह किया। उसकी पहली पत्नी स्वर्ग की अप्सरा नील-उत्तम, दूसरी पृथ्वी देवी और तीसरी समुद्रों की रानी गंगा महादेवी थी। नीलोत्तमा ने तीन सिरों और छह भुजाओं वाले एंदेरजात (इंद्रजित), पृथ्वी देवी ने पाताल महारायन (महिरावण) और गंगा महादेवी ने गंगमहासुर नाम के पुत्रों को जन्म दिया।
यू-टिन हट्वे ने बर्मा की भाषा में राम कथा साहित्य की सोलह रचनाओं का उल्लेख किया है-

(१) रामवत्थु (१७७५ई. के पूर्व), (२) राम सा-ख्यान (१७७५ई.), (३) सीता रा-कान, (४) राम रा-कान (१७८४ई.), (५) राम प्रजात (१७८९ई.), (६) का-ले रामवत्थु (७) महारामवत्थु, (८) सीरीराम (१८४९ई.), (९) पुंटो राम प्रजात (१८३०ई.), (१०) रम्मासुङ्मुई (१९०४ई.), (११) पुंटो रालक्खन (१९३५ई.), (१२) टा राम-सा-ख्यान (१९०६ई.), (१३) राम रुई (१९०७ई.), (१४) रामवत्थु (१९३५ई.), (१५) राम सुम: मुइ (१९३ ई.) और (१६) रामवत्थु आ-ख्यान (१९५७ई.)

राम कथा पर आधारित बर्मा की प्राचीनतम गद्यकृति ‘रामवत्थु‘ है। इसकी तिथि अठारहवीं शताब्दी निर्धारित की गयी है। इसमें अयोध्या कांड तक की कथा का छह अध्यायों में वर्णन हुआ है और इसके बाद उत्तर कांड तक की कथा का समावेश चार अध्यायों में ही हो गया है। रामवत्थु में जटायु, संपाति, गरुड़, कबंध आदि प्रकरण का अभाव है।

रामवत्थु की कथा बौद्ध मान्यताओं पर आधारित है, किंतु इसके पात्रों का चरित्र चित्रण वाल्मीकीय आदर्शों के अनुरुप हुआ है।

हिन्दू पुराणिक भगवान विष्णु की भी लगभग सभी बुद्धिष्ट देशो में पूजा होती , कम्बोडिया में महाराज सूर्यदेव वर्मन ने अंकोरवाट का मंदिर बनवाया था वैसा मन्दिर पूरी दुनिया मे कही नही है । उसे विश्व विरासत के रूप में यूनेस्को ने जगह दी है यह मंदिर मिस्र के पिरामिडों से भी ज्यादा आश्चर्य जनक है । श्री लंका में विष्णु को Upulvan or uthpala (Pali. Uppala-Vaṇṇa) नाम से जाना जाता है और उन्हें बुद्धिज़्म के सरंक्षक Dharmapālas (Dharma Protectors) की तरह माना जाता है ।Vishnu as Upulvan is the Kshetra-Pāla (Protector of the Land) of Sri Lanka. इसके अतिरिक्त बुद्धिज़्म में विष्णु पूजा थाईलैंड , मलेशिया , बैंकोग में भी होती है वहा उनके मन्दिर है ।

Sinhala Buddhist सम्प्रदाय के लोग बुद्ध को प्रमुखता से पुजते है । Lankatilaka and Gadaladeniya Buddhist विष्णु मन्दिर भी बुद्धिस्टो द्वारा बनवाये गए है ।

Theravada Buddhism सम्प्रदाय के लोग तो बुद्ध को भी विष्णु का अवतार मानते है ।

6th से 8th शताब्दी के मध्य विष्णु मंदिर पूर्वी Prachinburi Province and central Phetchabun Province of Thailand में बनवाये गए । और southern Đồng Tháp Province and An Giang Province वियतनाम में बनवाये गए ।

जापान में विष्णु को Bichū-ten (毘紐天) के नाम से जाना जाता है ।

वियतनाम आदि Buddhist southeast Asian देशों में Trivikrama नाम से विष्णु प्रसिद्ध है । मिस्रवासियों के भगवान Horus को भी विष्णु का ही रूप माना जाता था । रूसी archaeologist ( पुरातत्ववेत्ता) Alexander Kozhevin को रूस के वोल्गा नदी के समीप भी विष्णु की मूर्तिया मिली थी जिसने पर उन्होंने आश्चर्य भी जताया था । Karandavyuha Sutra के अनुसार ,

nārāyaṇavaineyānāṁ sattvānāṁ nārāyaṇarūpeṇa dharmaṁ deśayati

[Avalokitesvara बुद्ध ] instructs Dharma in the form of Narayana , for the beings who are to be converted by Narayana (विष्णु)

बुद्धो की वज्रयान शाखा (तन्त्र मन्त्र मानने वाले) भी विष्णु को Parivāra Deva रुद्र के नाम से पूजते है । बुद्धो के इस सम्प्रदाय की पुस्तक Nishpannayogāvali में विष्णु के वर्णन कई बार मिलते है ।

जिसमे विष्णु के स्वरूप के बारे में लिखा है जो हूँ ब हूँ हिन्दुओ के विष्णु भगवान से मिलते है । ।

garuḍe viṣṇuś-caturbhujaḥ cakraśaṅkhabhṛt
savyavāmābhyāṁ mūrdhni kṛtāñjalir-gadā
śārṅgadharaḥ

On a Garuda there is Vishnu with four arms. With the two principal hands carrying the Cakra and the Shankha he displays the Anjali on his head. With the two others he holds the Gada and the bow.