श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – बीसवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Twenty

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: विंश अध्यायः

श्लोक 1-38

महाराज पृथु की यज्ञशाला में श्रीविष्णु भगवान् का प्रादुर्भाव

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! महाराज पृथु के निन्यानबे यज्ञों से यज्ञभोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् विष्णु को भी बड़ा सन्तोष हुआ। उन्होंने इन्द्र के सहित वहाँ उपस्थित होकर उनसे कहा। श्रीभगवान् ने कहा- राजन! (इन्द्र ने) तुम्हारे सौ अश्वमेध पूरे करने के संकल्प में विघ्न डाला है। अब ये तुमसे क्षमा चाहते हैं, तुम इन्हें क्षमा कर दो। नरदेव! जो श्रेष्ठ मानव साधु और सद्बुद्धि-सम्पन्न होते हैं, वे दूसरे जीवों से द्रोह नहीं करते; क्योंकि यह शरीर ही आत्मा नहीं है। यदि तुम-जैसे लोग भी मेरी माया से मोहित हो जायें, तो समझना चाहिये कि बहुत दिनों तक की हुई ज्ञानीजनों की सेवा से केवल श्रम ही हाथ लगा। ज्ञानवान् पुरुष इस शरीर को अविद्या, वासना और कर्मों का ही पुतला समझकर इसमें आसक्त नहीं होता। इस प्रकार जो इस शरीर में ही आसक्त नहीं है, यह विवेकी पुरुष इससे उत्पन्न हुए घर, पुत्र और धन आदि में भी किस प्रकार ममता रख सकता है। यह आत्मा एक, शुद्ध, स्वयंप्रकाश, निर्गुण, गुणों का आश्रयस्थान, सर्वव्यापक, आवरणशून्य, सबका साक्षी एवं अन्य आत्मा से रहित है; अतएव शरीर से भिन्न है। जो पुरुष इस देहस्थित आत्मा को इस प्रकार शरीर से भिन्न जानता है, वह प्रकृति से सम्बन्ध रखते हुए भी उसके गुणों से लिप्त नहीं होता; क्योंकि उसकी स्थिति मुझ परमात्मा में रहती है। राजन्! जो पुरुष किसी प्रकार की कामना न रखकर अपने वर्णाश्रम के धर्मों द्वारा नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक मेरी आराधना करता है, उसका चित्त धीरे-धीरे शुद्ध हो जाता है। चित्त शुद्ध होने पर उसका विषयों से सम्बन्ध नहीं रहता तथा उसे तत्त्वज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। फिर तो वह मेरी समतारूप स्थिति को प्राप्त हो जाता है। यही परम शान्ति, ब्रह्म अथवा कैवल्य है। जो पुरुष यह जानता है कि शरीर, ज्ञान, क्रिया और मन का साक्षी होने पर भी कूटस्थ आत्मा उनसे निर्लिप्त ही रहता है, वह कल्याणमय मोक्षपद प्राप्त कर लेता है। राजन्! गुणप्रवाहरूप आवाहन तो भूत, इन्द्रिय, इन्द्रियाभिमानी देवता और चिदाभास- इन सबकी समष्टिरूप परिच्छिन्न लिंग शरीर का ही हुआ करता है; इसका सर्वसाक्षी आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है। मुझमें दृढ़ अनुराग रखने वाले बुद्धिमान् पुरुष सम्पत्ति और विपत्ति प्राप्त होने पर कभी हर्ष-शोकादि विकारों के वशीभूत नहीं होते। इसलिये वीरवर! तुम उत्तम, मध्यम और अधम पुरुषों में समान भाव रखकर सुख-दुःख को भी एक-सा समझो तथा मन और इन्द्रियों को जीतकर मेरे ही द्वारा जुटाये हुए मन्त्री आदि समस्त राजकीय पुरुषों की सहायता से सम्पूर्ण लोकों की रक्षा करो। राजा का कल्याण प्रजा पालन में ही है। इससे उसे परलोक में प्रजा के पुण्य का छठा भाग मिलता है। इसके विपरीत जो राजा प्रजा की रक्षा तो नहीं करता; किंतु उससे कर वसूल करता जाता है, उसका सारा पुण्य तो प्रजा छीन लेती है और बदले में उसे प्रजा के पाप का भागी होना पड़ता है। ऐसा विचार कर यदि तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणों की सम्मति और पूर्वपरम्परा से प्राप्त हुए धर्म को ही मुख्यतः अपना लो और कहीं भी आसक्त न होकर इस पृथ्वी का न्यायपूर्वक पालन करते रहो तो सब लोग तुमसे प्रेम करेंगे और कुछ ही दिनों में तुम्हें घर बैठे ही सनकादि सिद्धों के दर्शन होंगे।

राजन्! तुम्हारे गुणों ने और स्वभाव ने मुझको वश में कर लिया है। अतः तुम्हे जो इच्छा हो, मुझसे वर माँग लो। उन क्षमा आदि गुणों से रहित यज्ञ, तप अथवा योग के द्वारा मुझको पाना सरल नहीं है, मैं तो उन्हीं के हृदय में रहता हूँ जिनके चित्त में समता रहती है।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! सर्वलोकगुरु श्रीहरि के इस प्रकार कहने पर जगद्विजयी महाराज पृथु ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की

देवराज इन्द्र अपने कर्म से लज्जित होकर उनके चरणों पर गिरना ही चाहते थे कि राजा ने उन्हें प्रेमपूर्वक हृदय से लगा लिया और मनोमालिन्य निकाल दिया। फिर महाराज पृथु ने विश्वात्मा भक्तवत्सल भगवान् का पूजन किया और क्षण-क्षण में उमड़ते हुए भक्तिभाव में निमग्न होकर प्रभु के चरणकमल पकड़ लिये। श्रीहरि वहाँ से जाना चाहते थे; किन्तु पृथु के प्रति जो उनका वात्सल्यभाव था, उसने उन्हें रोक लिया। वे अपने कमलदल के समान नेत्रों से उनकी ओर देखते ही रह गये, वहाँ से जा न सके।

आदिराज महाराज पृथु भी नेत्रों में जल भर आने के कारण न तो भगवान् का दर्शन ही कर सके और न तो कण्ठ गद्गद हो जाने से कुछ बोल ही सके। उन्हें हृदय से आलिगन कर पकड़े रहे और हाथ जोड़े ज्यों-के-त्यों खड़े रह गये। प्रभु अपने चरणकमलों से पृथ्वी को स्पर्श किये खड़े थे; उनका कराग्रभाग गरुड़ जी के ऊँचे कंधे पर रखा हुआ था। महाराज पृथु नेत्रों के आँसू पोंछकर अतृप्त दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए इस प्रकार कहने लगे।

महाराज पृथु बोले- मोक्षपति प्रभो! आप वर देने वाले ब्रह्मादि देवताओं को भी वर देने में समर्थ हैं। कोई भी बुद्धिमान् पुरुष आपसे देहाभिमानियों के भोगने योग्य विषयों को कैसे माँग सकता है? वे तो नारकी जीवों को भी मिलते ही हैं। अतः मैं इन तुच्छ विषयों को आपसे नहीं माँगता। मुझे तो उस मोक्षपद की भी इच्छा नहीं है, जिसमें महापुरुषों के हृदय से उनके मुख द्वारा निकला हुआ आपके चरणकमलों का मकरन्द नहीं है-जहाँ आपकी कीर्ति-कथा सुनने का सुख नहीं मिलता। इसलिये मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप मुझे दस हजार कान दे दीजिये, जिनसे मैं आपके लीलागुणों को सुनता ही रहूँ।

पुण्यकीर्ति प्रभो! आपके चरणकमल-मकरन्दरूपी अमृत-कणों को लेकर महापुरुषों के मुख से जो वायु निकलती है, उसी में इतनी शक्ति होती है कि वह तत्त्व को भूले हुए हम कुयोगियों को पुनः तत्त्वज्ञान करा देती है। अतएव हमें दूसरे वरों की कोई आवश्यकता नहीं है।

उत्तम कीर्ति वाले प्रभो! सत्संग में आपके मंगलमय सुयश को दैववश एक बार भी सुन लेने पर कोई पशुबुद्धिपुरुष भले ही तृप्त हो जाये; गुणग्राही उसे कैसे छोड़ सकता है? सब प्रकार के पुरुषार्थों की सिद्धि के लिये स्वयं लक्ष्मी जी भी आपके सुयश को सुनना चाहती हैं। अब लक्ष्मी जी के समान मैं भी अत्यन्त उत्सुकता से आप सर्वगुणधाम पुरुषोत्तम की सेवा ही करना चाहता हूँ। किन्तु ऐसा न हो कि एक ही पति की सेवा प्राप्त करने की होड़ होने के कारण आपके चरणों में ही मन को एकाग्र करने वाले हम दोनों में कलह छिड़ जाये।

जगदीश्वर! जगज्जननी लक्ष्मी जी के हृदय में मेरे प्रति विरोधभाव होने की संभावना तो है ही; क्योंकि जिस आपके सेवाकार्य में उनका अनुराग है, उसी के लिये मैं भी लालायित हूँ। किन्तु आप दीनों पर दया करते हैं, उनके तुच्छ कर्मों को भी बहुत करके मानते हैं। इसलिये मुझे आशा है कि हमारे झगड़े में भी आप मेरा ही पक्ष लेंगे। आप तो अपने स्वरूप में ही रमण करते हैं; आपको भला, लक्ष्मी जी से भी क्या लेना है। इसी से निष्काम महात्मा ज्ञान हो जाने के बाद भी आपके भजन करते हैं। आप में माया के कार्य अहंकारदि का सर्वथा अभाव है। भगवन्! मुझे तो आपके चरणकमलों का निरन्तर चिन्तन करने के सिवा सत्पुरुषों का कोई और प्रयोजन ही नहीं जान पड़ता। मैं भी बिना किसी इच्छा के आपका भजन करता हूँ, आपने जो मुझसे कहा कि ‘वर माँग’ सो आपकी इस वाणी को तो मैं संसार को मोह में डालने वाली ही मानता हूँ। यही क्या, आपकी वेदरूपा वाणी ने भी तो जगत् को बाँध रखा है। यदि उस वेदवाणीरूप रस्सी से लोग बँधे न होते, तो वे मोहवश सकाम कर्म क्यों करते? प्रभो! आपकी माया से ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप आपसे विमुख होकर अज्ञानवश अन्य स्त्री-पुत्रादि की इच्छा करता है। फिर भी जिस प्रकार पिता पुत्र की प्रार्थना कि अपेक्षा न रखकर अपने-आप ही पुत्र का कल्याण करता है, उसी प्रकार आप भी हमारी इच्छा की अपेक्षा न करके हमारे हित के लिये स्वयं ही प्रयत्न करें। श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- आदिराज पृथु के इस प्रकार स्तुति करने पर सर्वसाक्षी श्रीहरि ने उनसे कहा, ‘राजन्! तुम्हारी मुझमे भक्ति हो। बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम्हारा चित्त इस प्रकार मुझमें लगा हुआ है। ऐसा होने पर तो पुरुष सहज में ही मेरी उस माया को पार कर लेता है, जिसको छोड़ना या जिसके बन्धन से छूटना अत्यन्त कठिन है। अब तुम सावधानी से मेरी आज्ञा का पालन करते रहो। प्रजापालक नरेश! जो पुरुष मेरी आज्ञा का पालन करता है, उसका सर्वत्र मंगल होता है’। श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इस प्रकार भगवान् ने राजर्षि पृथु के सारगर्भित वचनों का आदर किया। फिर पृथु ने उनकी पूजा की और प्रभु उन पर सब प्रकार कृपा कर वहाँ से चलने को तैयार हुए। महाराज पृथु ने वहाँ जो देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, सिद्ध, चारण, नाग, किन्नर, अप्सरा, मनुष्य और पक्षी आदि अनेक प्रकार के प्राणी एवं भगवान् के पार्षद आये थे, उन सभी का भगवदबुद्धि से भक्तिपूर्वक वाणी और धन के द्वारा हाथ जोड़कर पूजन किया। इसके बाद वे सब अपने-अपने स्थानों को चले गये। भगवान् अच्युत भी राजा पृथु एवं उनके पुरोहितों का चित्त चुराते हुए अपने धाम को सिधारे। तदनन्तर अपना स्वरूप दिखाकर अन्तर्धान हुए अव्यक्तस्वरूप देवाधिदेव भगवान् को नमस्कार करके राजा पृथु भी अपनी राजधानी में चले आये।

Chapter Twenty: Lord Vishnu’s Appearance in the Sacrificial Arena

1. The great sage Maitreya continued: My dear Vidura, being very much satisfied by the performance of ninety-nine horse sacrifices, the Supreme Personality of Godhead, Lord Visnu, appeared on the scene. Accompanying Him was King Indra. Lord Vishnu then began to speak.

2. Lord Vishnu, the Supreme Personality of Godhead, said: My dear King Prthu, Indra, the King of heaven, has disturbed your execution of one hundred sacrifices. Now he has come with Me to be forgiven by you. Therefore excuse him.

3. O King, one who is advanced in intelligence and eager to perform welfare activities for others is considered best amongst human beings. An advanced human being is never malicious to others. Those with advanced intelligence are always conscious that this material body is different from the soul.

4. If a personality like you, who are so much advanced because of executing the instructions of the previous acaryas, is carred away by the influence of My material energy, then all your advancement may be considered simply a waste of time.

5. Those who are in full knowledge of the bodily conception of life, who know that this body is composed of nescience, desires and activities resulting from illusion, do not become addicted to the body.

6. How can a highly learned person who has absolutely no affinity for the bodily conception of life be affected by the bodily conception in regard to house, children, wealth and similar other bodily productions?

7. The individual soul is one, Pure, nonmaterial and self-effulgent. He is the reservoir of all good qualities, and He is all-pervading. He is without material covering, and He is the witness of all activities.He is completely distinguished from other living entities, and He is transcendental to all embodied souls.

8. Although within the material nature, one who is thus situated in full knowledge of the Paramatma and atma is never affected by the modes of material nature, for he is always situated in My transcendental loving service.

9. The Supreme Personality of Godhead, Lord Visnu, continued: My dear King Prthu, when one situated in his occupational duty engages in My loving service without motive for material gain, he gradually becomes very satisfied within.

10. When the heart is cleansed of all material contamination, the devotee’s mind becomes broader and transparent, and he can see things equally. At that stage of life there is peace, and one is situated equally with Me as sac-cid-ananda-vigraha.

11. Anyone who knows that this material body, made of the five gross elements, the sense organs, the working senses and the mind, is simply supervised by the fixed soul is eligible to be liberated from material bondage.

12. Lord Vishnu told King Prthu: My dear King, the constant change of this material world is due to the interaction of the three modes of material nature. The five elements, the senses, the demigods who control the senses, as well as the mind, which is agitated by the spirit soul–all these taken together comprise the body. Since the spirit soul is completely different from this combination of gross and subtle
material elements, My devotee who is connected with Me in intense friendship and affection, being completely in knowledge, is never agitated by material happiness and distress.

13. My dear heroic King, please keep yourself always equipoised and treat people equally, whether they are greater than you, in the intermediate stage or lower than you. Do not be disturbed by temporary distress or happiness. Fully control your mind and senses. In this transcendental position, try to execute your duty as king in whatever condition of life you may be posted by My arrangement, for your only duty here is to give protection to the citizens of your kingdom.

14. To give protection to the general mass of people who are citizens of the state is the prescribed occupational duty for a king. By acting in that way, the king in his next life shares one sixth of the result of the pious activities of the citizens. But a king or executive head of state who simply collects taxes from the citizens but does not give them proper protection as human beings has the results of his own pious activities taken away by the citizens, and in exchange for his not giving protection he becomes liable to punishment for the impious activities of his subjects.

15. Lord Vishnu continued: My dear King Prthu, if you continue to protect the citizens according to the instructions of the learned brahmana authorities, as they are received by the disciplic succession–by hearing–from master to disciple, and if you follow the religious principles laid down by them, without attachment to ideas manufactured by mental concoction, then every one of your citizens will be happy
and will love you, and very soon you will be able to see such already liberated personalities as the four Kumaras [Sanaka, Sanatana, Sanandana and Sanat-kumara].

16. My dear King, I am very captivated by your elevated qualities and excellent behavior, and thus I am very favorably inclined toward you. You may therefore ask from Me any benediction you like. One who does not possess elevated qualities and behavior cannot possibly achieve My favor simply by performance of sacrifices, severe austerities or mystic yoga. But I always remain equipoised in the heart of one who is also equipoised in all circumstances.

17. The great saint Maitreya continued: My dear Vidura, in this way Maharaja Prthu, the conqueror of the entire world, accepted the instructions of the Supreme Personality of Godhead on his head.

18. As King Indra was standing by, he became ashamed of his own activities and fell down before King Prthu to touch his lotus feet. But Prthu Maharaja immediately embraced him in great ecstasy and gave up all envy against him for his having stolen the horse meant for the sacrifice.

19. King Prthu abundantly worshiped the lotus feet of the Supreme Personality of Godhead, who was so merciful to him. While worshiping the lotus feet of the Lord, Prthu Maharaja gradually increased his ecstasy in devotional service.

20. The Lord was just about to leave, but because He was so greatly inclined toward the behavior of King Prthu, He did not depart. Seeing the behavior of Maharaja Prthu with His lotus eyes, He was detained because He is always the well-wisher of His devotees.

21. The original king, Maharaja Prthu, his eyes full of tears and his voice faltering and choked up, could neither see the Lord very distinctly nor speak to address the Lord in any way. He simply embraced the Lord within his heart and remained standing in that way with folded hands.

22. The Supreme Personality of Godhead stood with His lotus feet almost touching the ground while He rested the front of His hand on the raised shoulder of Garuda, the enemy of the snakes. Maharaja Prthu, wiping the tears from his eyes, tried to look upon the Lord, but it appeared that the King was not fully satisfied by looking at Him. Thus the King offered the following prayers.

23. My dear Lord, You are the best of the demigods who can offer benedictions. Why, therefore, should any learned person ask You for benedictions meant for living entities bewildered by the modes of nature? Such benedictions are available automatically, even in the lives of living entities suffering in
hellish conditions. My dear Lord, You can certainly bestow merging into Your existence, but I do not wish to have such a benediction.

24. My dear Lord, I therefore do not wish to have the benediction of merging into Your existence, a benediction in which there is no existence of the nectarean beverage of Your lotus feet. I want the benediction of at least one million ears, for thus I may be able to hear about the glories of Your lotus feet from the mouths of Your pure devotees.

25. My dear Lord, You are glorified by the selected verses uttered by great personalities. Such glorification of Your lotus feet is just like saffron particles. When the transcendental vibration from the mouths of great devotees carries the aroma of the saffron dust of Your lotus feet, the forgetful living entity gradually remembers his eternal relationship with You. Devotees thus gradually come to the right
conclusion about the value of life. My dear Lord, I therefore do not need any other benediction but the opportunity to hear from the mouth of Your pure devotee.

26. My dear highly glorified Lord, if one, in the association of pure devotees, hears even once the glories of Your activities, he does not, unless he is nothing but an animal, give up the association of devotees, for no intelligent person would be so careless as to leave their association. The perfection of chanting and hearing about Your glories was accepted even by the goddess of fortune, who desired to
hear of Your unlimited activities and transcendental glories.

27. Now I wish to engage in the service of the lotus feet of the Supreme Personality of Godhead and to serve just like the goddess of fortune, who carries a lotus flower in her hand, because His Lordship, the Supreme Personality of Godhead, is the reservoir of all transcendental qualities. I am afraid that the
goddess of fortune and I would quarrel because both of us would be attentively engaged in the same service.

28. My dear Lord of the universe, the goddess of fortune, Laksmi, is the mother of the universe, and yet I think that she may be angry with me because of my intruding upon her service and acting on that very platform to which she is so much attached. Yet I am hopeful that even though there is some misunderstanding, You will take my part, for You are very much inclined to the poor and You always magnify even insignificant service unto You. Therefore even though she becomes angry, I think that there is no harm for You, because You are so self-sufficient that You can do without her.

29. Great saintly persons who are always liberated take to Your devotional service because only by devotional service can one be relieved from the illusions of material existence. O my Lord, there is no reason for the liberated souls to take shelter at Your lotus feet except that such souls are constantly thinking of Your feet.

30. My dear Lord, what You have said to Your unalloyed devotee is certainly very much bewildering. The allurements You offer in the Vedas are certainly not suitable for pure devotees. People in general, bound by the sweet words of the Vedas, engage themselves again and again in fruitive activities, enamored by the results of their actions.

31. My Lord, due to Your illusory energy, all living beings in this material world have forgotten their real constitutional position, and out of ignorance they are always desirous of material happiness in the form of society, friendship and love. Therefore, please do not ask me to take some material benefits from
You, but as a father, not waiting for the son’s demand, does everything for the benefit of the son, please bestow upon me whatever You think best for me.

32. The great sage Maitreya continued by saying that the Lord, the seer of the universe, after hearing Prthu Maharaja’s prayer, addressed the King: My dear King, may you always be blessed by engaging in My devotional service. Only by such purity of purpose, as you yourself very intelligently express, can one cross over the insurmountable illusory energy of maya.

33. My dear King, O protector of the citizens, henceforward be very careful to execute My orders and not be misled by anything. Anyone who lives in that way, simply carrying out My orders faithfully, will always find good fortune all over the world.

34. The great saint Maitreya told Vidura: The Supreme Personality of Godhead amply appreciated the meaningful prayers of Maharaja Prthu. Thus, after being properly worshiped by the King, the Lord blessed him and decided to depart.

35-36. King Prthu worshiped the demigods, the great sages, the inhabitants of Pitrloka, the inhabitants of Gandharvaloka and those of Siddhaloka, Caranaloka, Pannagaloka, Kinnaraloka, Apsaroloka, the earthly planets and the planets of the birds. He also worshiped many other living entities who presented
themselves in the sacrificial arena. With folded hands he worshiped all these, as well as the Supreme Personality of Godhead and the personal associates of the Lord, by offering sweet words and as much wealth as possible. After this function, they all went back to their respective abodes, following in the footsteps of Lord Vishnu.

37. The infallible Supreme Personality of Godhead, having captivated the minds of the King and the priests who were present, returned to His abode in the spiritual sky.

38. King Prthu then offered his respectful obeisances unto the Supreme Personality of Godhead, who is the Supreme Lord of all demigods. Although not an object of material vision, the Lord revealed Himself to the sight of Maharaja Prthu. After offering obeisances to the Lord, the King returned to his home.

After the death of King Vena there was no king, and the thieves and rogues increased their crooked activities. All the citizens suffered. At that time to fulfill the desires of the great sages, Lord Vishnu in His partial representation appeared from the body of Vena as King Prthu.

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – बीसवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Twenty

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: विंश अध्यायः

श्लोक 1-53 का हिन्दी अनुवाद

ब्रह्मा जी की रची हुई अनेक प्रकार की सृष्टि का वर्णन

शौनक जी कहते हैं- सूत जी! पृथ्वीरूप आधार पाकर स्वायम्भुव मनु ने आगे होने वाली सन्तति को उत्पन्न करने के लिये किन-किन उपायों का अवलम्बन किया?

विदुर जी बड़े ही भगवद्भक्त और भगवान् श्रीकृष्ण के अनन्य सुहृद् थे। इसीलिये उन्होंने अपने बड़े भाई धृतराष्ट्र को, उनके पुत्र दुर्योधन के सहित, भगवान् श्रीकृष्ण का अनादर करने के कारण अपराधी समझकर त्याग दिया था। वे महर्षि द्वैपायन के पुत्र थे और महिमा में उनसे किसी प्रकार कम नहीं थे तथा सब प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण के आश्रित और कृष्णभक्तों के अनुगामी थे। तीर्थ सेवन से उनका अन्तःकरण और भी शुद्ध हो गया था। उन्होंने कुशावर्त क्षेत्र (हरिद्वार) में बैठे हुए तत्त्वज्ञानियों में श्रेष्ठ मैत्रेय जी के पास जाकर और क्या पूछा?

सूत जी! उन दोनों में वार्तालाप होने पर श्रीहरिके चरणों से सम्बन्ध रखने वाली बड़ी पवित्र कथाएँ हुई होंगी, जो उन्हीं चरणों से निकले हुए गंगाजल के समान सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाली होंगी। सूत जी! आपका मंगल हो, आप हमें भगवान् की वे पवित्र कथाएँ सुनाइये। प्रभु के उदार चरित्र तो कीर्तन करने योग्य होते हैं। भला, ऐसा कौन रसिक होगा जो श्रीहरि के लीलामृत का पान करते-करते तृप्त हो जाये।

नैमिषारण्यवासी मुनियों के इस प्रकार पूछने पर उग्रश्रवा सूत जी ने भगवान् में चित्त लगाकर उनसे कहा- ‘सुनिये’।

सूत जी ने कहा- मुनिगण! अपनी माया से वराहरूप धारण करने वाले श्रीहरि की रसातल से पृथ्वी को निकालने और खेल में ही तिरस्कारपूर्वक हिरण्याक्ष को मार डालने की लीला सुनकर विदुर जी को बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने मुनिवर मैत्रेय जी से कहा।

विदुर जी ने कहा- ब्रह्ममन्! आप परोक्ष विषयों को भी जानने वाले हैं; अतः यह बतलाइये कि प्रजापतियों के पति श्रीब्रह्मा जी ने मरीचि आदि प्रजापतियों को उत्पन्न करके फिर सृष्टि को बढ़ाने के लिये क्या किया। मरीचि आदि मुनीश्वरों ने और स्वायम्भुव मनु ने भी ब्रह्मा जी की आज्ञा से किस प्रकार प्रजा की वृद्धि की? क्या उन्होंने इस जगत् को पत्नियों के सहयोग से उत्पन्न किया या अपने-अपने कार्य में स्वतन्त्र रहकर अथवा सबने एक साथ मिलकर इस जगत् की रचना की?

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! जिसकी गति को जानना अत्यन्त कठिन है-उन जीवों के प्रारब्ध, प्रकृति के नियन्ता पुरुष और काल-इन तीनों हेतुओं से तथा भगवान् की सन्निधि से त्रिगुणमय प्रकृति में क्षोभ होने पर उससे महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। दैव की प्रेरणा से रजःप्रधान महत्तत्त्व से वैकारिक (सात्त्विक), राजस और तामस- तीन प्रकार का अहंकार उत्पन्न हुआ। उसने आकाशादि पाँच-पाँच तत्त्वों के अनेक वर्ग[1] प्रकट किये। वे सब अलग-अलग रहकर भूतों के कार्यरूप ब्रह्माण्ड की रचना नहीं कर सकते थे; इसलिये उन्होंने भगवान् की शक्ति से परस्पर संगठित होकर एक सुवर्णवर्ण अण्ड की रचना की। वह अण्ड चेतनाशून्य अवस्था में एक हजार वर्षों से भी अधिक समय तक कारणाब्धि के जल में पड़ा रहा। फिर उसमें श्रीभगवान् ने प्रवेश किया। उसमें अधिष्ठित होने पर उनकी नाभि से सहस्र सूर्यों के समान अत्यन्त देदीप्यमान एक कमल प्रकट हुआ, जो सम्पूर्ण जीव-समुदाय का आश्रय था। उसी से स्वयं ब्रह्मा जी का भी आविर्भाव हुआ है। जब ब्रह्माण्ड के गर्भरूप जल में शयन करने वाले श्रीनारायणदेव ने ब्रह्मा जी के अन्तःकरण में प्रवेश किया, तब वे पूर्वकल्पों में अपने ही द्वारा निश्चित की हुई नाम-रूपमयी व्यवस्था के अनुसार लोकों की रचना करने लगे।

सबसे पहले उन्होंने अपनी छाया से तामिस्र, अन्धतामिस्र, तम, मोह और महामोह- यों पाँच प्रकार की अविद्या उत्पन की। ब्रह्मा जी को अपना वह तमोमय शरीर अच्छा नहीं लगा, अतः उन्होंने उसे त्याग दिया। तब जिससे भूख-प्यास की उत्पत्ति होती है-ऐसे रात्रिरूप उस शरीर को उसी से उत्पन्न हुए यक्ष और राक्षसों ने ग्रहण कर लिया। उस समय भूख-प्यास से अभिभूत होकर वे ब्रह्मा जी को खाने को दौड़ पड़े और कहने लगे- ‘इसे खा जाओ, इसकी रक्षा मत करो’, क्योंकि वे भूख-प्यास से व्याकुल हो रहे थे। ब्रह्मा जी ने घबराकर उनसे कहा- ‘अरे यक्ष-राक्षसों! तुम मेरी सन्तान हो; इसलिये मुझे भक्षण मत करो, मेरी रक्षा करो!’ (उनमें से जिन्होंने कहा ‘खा जाओ’, वे यक्ष हुए और जिन्होंने कहा ‘रक्षा मत करो’, वे राक्षस कहलाये)। फिर ब्रह्मा जी ने सात्त्विक प्रभा से देदीप्यमान होकर मुख्य-मुख्य देवताओं की रचना की। उन्होंने क्रीड़ा करते हुए, ब्रह्मा जी के त्यागने पर, उनका वह दिनरूप प्रकाशमय शरीर ग्रहण कर लिया। इसके पश्चात् ब्रह्मा जी ने अपने जघनदेश से कामासक्त असुरों को उत्पन्न किया। वे अत्यन्त कामलोलुप होने के कारण उत्पन्न होते ही मैथुन के लिये ब्रह्मा जी की ओर चले। यह देखकर पहले तो वे हँसे; किन्तु फिर उन निर्लज्ज असुरों को अपने पीछे लगा देख भयभीत और क्रोधित होकर बड़े जोर से भागे। तब उन्होंने भक्तों पर कृपा करने के लिये उनकी भावना के अनुसार दर्शन देने वाले, शरणागतवत्सल वरदायक श्रीहरि के पास जाकर कहा- ‘परमात्मन्! मेरी रक्षा कीजिये; मैंने तो आपकी ही आज्ञा से प्रजा उत्पन्न की थी, किन्तु यह तो पाप में प्रवृत्त होकर मुझको ही तंग करने चली है। नाथ! एकमात्र आप ही दुःखी जीवों का दुःख दूर करने वाले हैं और जो आपकी चरणशरण में नहीं आते, उन्हें दुःख देने वाले भी एकमात्र आप ही हैं’। प्रभु तो प्रत्यक्षवत् सबके हृदय की जानने वाले हैं। उन्होंने ब्रह्मा जी की आतुरता देखकर कहा- ‘तुम अपने इस कामकलुषित शरीर को त्याग दो।’ भगवान् के यों कहते ही उन्होंने वह शरीर भी छोड़ दिया। (ब्रह्मा जी का छोड़ा हुआ वह शरीर एक सुन्दरी स्त्री-संध्यादेवी के रूप में परिणत हो गया।) उसके चरणकमलों के पायजेब झंकृत हो रहे थे। उसकी आँखें मतवाली हो रही थीं और कमर करधनी की लड़ों से सुशोभित सजीली साड़ी से ढकी हुई थी। उसके उभरे हुए स्तन इस प्रकार एक-दूसरे से सटे हुए थे कि उनके बीच में कोई अन्तर ही नहीं रह गया था। उसकी नासिका और दन्तावली बड़ी ही सुघड़ थी तथा वह मधुर-मधुर मुसकराती हुई असुरों की ओर हाव-भावपूर्ण दृष्टि से देख रही थी। वह नीली-नीली अलकावली से सुशोभित सुकुमारी मानो लज्जा के मारे अपने अंचल में ही सिमटी जाती थी। विदुर जी! उस सुन्दरी को देखकर सब-के-सब असुर मोहित हो गये। ‘अहो! इसका कैसा विचित्र रूप, कैसा अलौकिक धैर्य और कैसी नयी अवस्था है। देखो, हम कामपीड़ितों के बीच में यह कैसी बेपरवाह-सी विचर रही है’। इस प्रकार उन कुबुद्धि दैत्यों ने स्त्रीरूपिणी सन्ध्या के विषय में तरह-तरह के तर्क-वितर्क करके फिर उसका बहुत आदर करते हुए प्रेमपूर्वक पूछा- ‘सुन्दरि! तुम कौन हो और किसकी पुत्री हो? भामिनी! यहाँ तुम्हारे आने का क्या प्रयोजन है? तुम अपने अनूप रूप का यह बेमोल सौदा दिखाकर हम अभागों को क्यों तरसा रही हो। अबले! तुम कोई भी क्यों न हो, हमें तुम्हारा दर्शन हुआ-यह बड़े सौभाग्य की बात है। तुम अपनी गेंद उछाल-उछालकर तो हम दर्शकों के मन को मथे डालती हो।

सुन्दरि! जब तुम उछलती हुई गेंद पर अपनी हथेली की थपकी मारती हो, तब तुम्हारा चरण-कमल एक जगह नहीं ठहरता; तुम्हारा कटिप्रदेश स्थूल स्तनों के भार से थक-सा जाता है और तुम्हारी निर्मल दृष्टि से भी थकावट झलकने लगती है। अहो! तुम्हारा केशपाश कैसा सुन्दर है’। इस प्रकार स्त्रीरूप से प्रकट हुई उस सायंकालीन सन्ध्या ने उन्हें अत्यन्त कामासक्त कर दिया और उन मूढ़ों ने उसे कोई रमणीरत्न समझकर ग्रहण कर लिया। तदनन्तर ब्रह्मा जी ने गम्भीर भाव से हँसकर अपनी कान्तिमयी मूर्ति से, जो अपने सौन्दर्य का मानो आप ही आस्वादन करती थी, गन्धर्व और अप्सराओं को उत्पन्न किया। उन्होंने ज्योत्स्ना (चन्द्रिका) रूप अपने उस कान्तिमय प्रिय शरीर को त्याग दिया। उसी को विश्वावसु आदि गन्धर्वों ने प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण किया। इसके पश्चात् भगवान् ब्रह्मा ने अपनी तन्द्रा से भूत-पिशाच उत्पन्न किये। उन्हें दिगम्बर (वस्त्रहीन) और बाल बिखेरे देख उन्होंने आँखें मूँद लीं। ब्रह्मा जी के त्यागे हुए उस जँभाईरूप शरीर को भूत-पिशाचों ने ग्रहण किया। इसी को निद्रा भी कहते हैं, जिससे जीवों की इन्द्रियों में शिथिलता आती देखी जाती है। यदि कोई मनुष्य जूठे मुँह सो जाता है तो उस पर भूत-पिशाचादि आक्रमण करते हैं; उसी को उन्माद कहते हैं। फिर भगवान् ब्रह्मा ने भावना की कि मैं तेजोमय हूँ और अपने अदृश्यरूप से साध्यगण एवं पितृगण को उत्पन्न किया। पितरों ने अपनी उत्पत्ति के स्थान उस अदृश्य शरीर को ग्रहण कर लिया। इसी को लक्ष्य में रखकर पण्डितजन श्राद्धादि के द्वारा पितर और साध्यगणों को क्रमशः कव्य (पिण्ड) और हव्य अर्पण करते हैं। अपनी तिरोधान शक्ति से ब्रह्मा जी ने सिद्ध और विद्याधरों की सृष्टि की और उन्हें अपना वह अन्तर्धान नामक अद्भुत शरीर दिया। एक बार ब्रह्मा जी ने अपना प्रतिबिम्ब देखा। तब अपने को बहुत सुन्दर मानकर उस प्रतिबिम्ब से किन्नर और किम्पुरुष उत्पन्न किये। उन्होंने ब्रह्मा जी के त्याग देने पर उनका वह प्रतिबिम्ब-शरीर ग्रहण किया। इसीलिये ये सब उषःकाल में अपनी पत्नियों के साथ मिलकर ब्रह्मा जी के गुण-कर्मादी का गान किया करते हैं। एक बार ब्रह्मा जी सृष्टि की वृद्धि न होने के कारण बहुत चिन्तित होकर हाथ-पैर आदि अवयवों को फैलाकर लेट गये और फिर क्रोधवश उस भोगमय शरीर को त्याग दिया। उससे जो बाल झड़कर गिरे, वे अहि हुए तथा उसके हाथ-पैर सिकोड़कर चलने से क्रूर स्वभाव सर्प और नाग हुए, जिनका शरीर फणरूप से कंधे के पास बहुत फैला होता है। एक बार ब्रह्मा जी ने अपने को कृतकृत्य-सा अनुभव किया। उस समय अन्त में उन्होंने अपने मन से मनुओं की सृष्टि की। ये सब प्रजा की वृद्धि करने वाले हैं। मनस्वी ब्रह्मा जी ने उनके लिये अपना पुरुषाकार शरीर त्याग दिया। मनुओं को देखकर उनसे पहले उत्पन्न हुए देवता-गन्धर्वादि ब्रह्मा जी की स्तुति करने लगे। वे बोले, ‘विश्वकर्ता ब्रह्मा जी! आपकी यह (मनुओं की) सृष्टि बड़ी ही सुन्दर है। इसमें अग्निहोत्र आदि सभी कर्म प्रतिष्ठित हैं। इसकी सहायता से हम भी अपना अन्न (हविर्भाग) ग्रहण कर सकेंगे’। फिर आदिऋषि ब्रह्मा जी ने इन्द्रियसंयमपूर्वक तप, विद्या, योग और समाधि से सम्पन्न हो अपनी प्रिय सन्तान ऋषिगण की रचना की और उनमें से प्रत्येक को अपने समाधि, योग, ऐश्वर्य, तप, विद्या और वैराग्यमय शरीर का अंश दिया।

Chapter Twenty: Conversation Between Maitreya and Vidura

1. Sri Saunaka inquired: O Suta Gosvami, after the earth was again situated in its orbit, what did
Svayambhuva Manu do to show the path of liberation to persons who were to take birth later on?

2. Saunaka Rsi inquired about Vidura, who was a great devotee and friend of Lord Krsna and who gave up the company of his elder brother because the latter, along with his sons, played tricks against the desires of the Lord.

3. Vidura was born from the body of Veda-vyasa and was not less than he. Thus he accepted the lotus feet of Krsna wholeheartedly and was attached to His devotees.

4. Vidura was purified of all passion by wandering in sacred places, and at last he reached Hardwar, where he met the great sage who knew the science of spiritual life, and he inquired from him. Saunaka Risi therefore asked: What more did Vidura inquire from Maitreya?

5. Saunaka inquired about the conversation between Vidura and Maitreya: There must have been many narrations of the spotless pastimes of the Lord. The hearing of such narrations is exactly like bathing in the water of the Ganges, for it can free one from all sinful reactions.

6. O Suta Gosvami, all good fortune to you! Please narrate the activities of the Lord, which are all magnanimous and worth glorifying. What sort of devotee can be satiated by hearing the nectarean pastimes of the Lord?

7. On being asked to speak by the great sages of Naimisaranya, the son of Romaharsana, Suta
Gosvami, whose mind was absorbed in the transcendental pastimes of the Lord, said: Please hear what I shall now speak.

8. Suta Gosvami continued: Vidura, the descendant of Bharata, was delighted to hear the story of the Lord, who, having assumed by His own divine potency the form of a boar, had enacted the sport of lifting the earth from the bottom of the ocean and indifferently killing the demon Hiranyaksa. Vidura then spoke to the sage as follows.

9. Vidura said: Since you know of matters inconceivable to us, tell me, O holy sage, what did Brahma do to create living beings after evolving the Prajapatis, the progenitors of living beings?

10. Vidura inquired: How did the Prajapatis [such progenitors of living entities as Marici and
Svayambhuva Manu] create according to the instruction of Brahma, and how did they evolve this manifested universe?

11. Did they evolve the creation in conjunction with their respective wives, did they remain independent in their action, or did they all jointly produce it?

12. Maitreya said: When the equilibrium of the combination of the three modes of nature was agitated by the unseen activity of the living entity, by Maha-Visnu and by the force of time, the total material elements were produced.

13. As impelled by the destiny of the jiva, the false ego, which is of three kinds, evolved from the mahat-tattva, in which the element of rajas predominates. From the ego, in turn, evolved many groups of five principles.

14. Separately unable to produce the material universe, they combined with the help of the energy of the Supreme Lord and were able to produce a shining egg.

15. For over one thousand years the shiny egg lay on the waters of the Causal Ocean in the lifeless state. Then the Lord entered it as Garbhodakasayi Vishnu.

16. From the navel of the Personality of Godhead Garbhodakasayi Visnu sprouted a lotus flower
effulgent like a thousand blazing suns. This lotus flower is the reservoir of all conditioned souls, and the first living entity who came out of the lotus flower was the omnipotent Brahma

17. When that Supreme Personality of Godhead who is lying on the Garbhodaka Ocean entered the heart of Brahma, Brahma brought his intelligence to bear, and with the intelligence invoked he began to create the universe as it was before.

18. First of all, Brahma created from his shadow the coverings of ignorance of the conditioned souls. They are five in number and are called tamisra, andha-tamisra, tamas, moha and maha-moha.

19. Out of disgust, Brahma threw off the body of ignorance, and taking this opportunity, Yaksas and Raksasas sprang for possession of the body, which continued to exist in the form of night. Night is the source of hunger and thirst.
20. Overpowered by hunger and thirst, they ran to devour Brahma from all sides and cried, “Spare him not! Eat him up!”
21. Brahma, the head of the demigods, full of anxiety, asked them, “Do not eat me, but protect me. You are born from me and have become my sons. Therefore you are Yaksas and Raksasas.”

22. He then created the chief demigods, who were shining with the glory of goodness. He dropped before them the effulgent form of daytime, and the demigods sportingly took possession of it.

23. Lord Brahma then gave birth to the demons from his buttocks, and they were very fond of sex. Because they were too lustful, they approached him for copulation.

24. The worshipful Brahma first laughed at their stupidity, but finding the shameless asuras close upon him, he grew indignant and ran in great haste out of fear.

25. He approached the Personality of Godhead, who bestows all boons and who dispels the agony of His devotees and of those who take shelter of His lotus feet. He manifests His innumerable transcendental forms for the satisfaction of His devotees.26. Lord Brahma, approaching the Lord, addressed Him thus: My Lord, please protect me from these sinful demons, who were created by me under Your order. They are infuriated by an appetite for sex and have come to attack me.

27. My Lord, You are the only one capable of ending the affliction of the distressed and inflicting agony on those who never resort to your feet.

28. The Lord, who can distinctly see the minds of others, perceived Brahma’s distress and said to him: “Cast off this impure body of yours.” Thus commanded by the Lord, Brahma cast off his body.

29. The body given up by Brahma took the form of the evening twilight, when the day and night meet, a time which kindles passion. The asuras, who are passionate by nature, dominated as they are by the element of rajas, took it for a damsel, whose lotus feet resounded with the tinkling of anklets, whose eyes were wide with intoxication and whose hips were covered by fine cloth, over which shone a girdle.

30. Her breasts projected upward because of their clinging to each other, and they were too contiguous to admit any intervening space. She had a shapely nose and beautiful teeth; a lovely smile played on her lips, and she cast a sportful glance at the asuras.

31. Adorned with dark tresses, she hid herself, as it were, out of shyness. Upon seeing that girl, the
asuras were all infatuated with an appetite for sex.

32. The demons praised her: Oh, what a beauty! What rare self-control! What a budding youth! In the midst of us all, who are passionately longing for her, she is moving about like one absolutely free from passion.

33. Indulging in various speculations about the evening twilight, which appeared to them endowed with the form of a young woman, the wicked-minded asuras treated her with respect and fondly spoke to her as follows.

34. Who are you, O pretty girl? Whose wife or daughter are you, and what can be the object of your appearing before us? Why do you tantalize us, unfortunate as we are, with the priceless commodity of your beauty?

35. Whosoever you may be, O beautiful girl, we are fortunate in being able to see you. While playing with a ball, you have agitated the minds of all onlookers.36. O beautiful woman, when you strike the bouncing ball against the ground with your hand again and again, your lotus feet do not stay in one place. Oppressed by the weight of your full-grown breasts, your waist becomes fatigued, and your clear vision grows dull, as it were. Pray braid your comely hair.

37. The asuras, clouded in their understanding, took the evening twilight to be a beautiful woman
showing herself in her alluring form, and they seized her.

38. With a laugh full of deep significance, the worshipful Brahma then evolved by his own loveliness, which seemed to enjoy itself by itself, the hosts of Gandharvas and Apsaras.

39. After that, Brahma gave up that shining and beloved form of moonlight. Visvavasu and other
Gandharvas gladly took possession of it.

40. The glorious Brahma next evolved from his sloth the ghosts and fiends, but he closed his eyes when he saw them stand naked with their hair scattered.

41. The ghosts and hobgoblins took possession of the body thrown off in the form of yawning by
Brahma, the creator of the living entities. This is also known as the sleep which causes drooling. The hobgoblins and ghosts attack men who are impure, and their attack is spoken of as insanity.

42. Recognizing himself to be full of desire and energy, the worshipful Brahma, the creator of the living entities, evolved from his own invisible form, from his navel, the hosts of Sadhyas and Pitas.

43. The Pitas themselves took possession of the invisible body, the source of their existence. It is
through the medium of this invisible body that those well versed in the rituals offer oblations to the Sadhyas and Pitas [in the form of their departed ancestors] on the occasion of sraddha.

44. Then Lord Brahma, by his ability to be hidden from vision, created the Siddhas and Vidyadharas and gave them that wonderful form of his known as the Antardhana.

45. One day, Brahma, the creator of the living entities, beheld his own reflection in the water, and admiring himself, he evolved Kimpurusas as well as Kinnaras out of that reflection.

46. The Kimpurusas and Kinnaras took possession of that shadowy form left by Brahma. That is why they and their spouses sing his praises by recounting his exploits at every daybreak.

47. Once Brahma lay down with his body stretched at full length. He was very concerned that the work of creation had not proceeded apace, and in a sullen mood he gave up that body too.

48. O dear Vidura, the hair that dropped from that body transformed into snakes, and even while the body crawled along with its hands and feet contracted, there sprang from it ferocious serpents and Nagas with their hoods expanded.

49. One day Brahma, the self-born, the first living creature, felt as if the object of his life had been
accomplished. At that time he evolved from his mind the Manus, who promote the welfare activities or the universe.
50. The self-possessed creator gave them his own human form. On seeing the Manus, those who had been created earlier–the demigods, the Gandharvas and so on–applauded Brahma, the lord of the universe.

51. They prayed: O creator of the universe, we are glad; what you have produced is well done. Since
ritualistic acts have now been established soundly in this human form, we shall all share the sacrificial oblations.

52. Having equipped himself with austere penance, adoration, mental concentration and absorption in devotion, accompanied by dispassion, and having controlled his senses, Brahma, the self-born living creature, evolved great sages as his beloved sons.

53. To each one of these sons the unborn creator of the universe gave a part of his own body, which was characterized by deep meditation, mental concentration, supernatural power, austerity, adoration and renunciation.