श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – सोलहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Sixteen

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – सोलहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Sixteen

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: षोडश अध्यायः

श्लोक 1-27

वन्दीजन द्वारा महाराज पृथु की स्तुति

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- महाराज पृथु ने जब इस प्रकार कहा, तब उनके वचनामृत का आस्वादन करके सूत आदि गायक लोग बड़े प्रसन्न हुए। फिर वे मुनियों की प्रेरणा से उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे। ‘आप साक्षात् देवप्रवर श्रीनारायण ही हैं’, जो अपनी माया से अवतीर्ण हुए हैं; हम आपकी महिमा का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं। आपने जन्म तो राजा वेन के मृतक शरीर से लिया है, किन्तु आपके पौरुषों का वर्णन करने में साक्षात् ब्रह्मादि की बुद्धि भी चकरा जाती है। तथापि आपके कथामृत के आस्वादन में आदर-बुद्धि रखकर मुनियों के उपदेश के अनुसार उन्हीं की प्रेरणा से हम आपके परम प्रशंसनीय कर्मों का कुछ विस्तार करना चाहते हैं, आप साक्षात् श्रीहरि के कलावतार हैं और आपकी कीर्ति बड़ी उदार है।

‘ये धर्मधारियों में श्रेष्ठ महाराज पृथु लोक को धर्म में प्रवृत्त करके धर्ममर्यादा की रक्षा करेंगे तथा उसके विरोधियों को दण्ड देंगे। ये अकेले ही समय-समय पर प्रजा के पालन, पोषण और अनुरंजन आदि कार्य के अनुसार अपने शरीर में भिन्न-भिन्न लोकपालों की मूर्ति को धारण करेंगे तथा यज्ञ आदि के प्रचार द्वरा स्वर्गलोक और वृष्ठि की व्यवस्था द्वारा भूलोक- दोनों का ही हित साधन करेंगे। ये सूर्य के समान अलौकिक, महिमान्वित, प्रतापवान् और समदर्शी होंगे। जिस प्रकार सूर्य देवता आठ महीने तपते रहकर जल खींचते हैं और वर्षा-ऋतु में उसे उड़ेल देते हैं, उसी प्रकार ये कर आदि के द्वारा कभी धन-संचय करेंगे और कभी उसका प्रजा के हित के लिये व्यय कर डालेंगे। ये बड़े दयालु होंगे। यदि कभी कोई दीनपुरुष इनके मस्तक पर पैर भी रख देगा, तो भी ये पृथ्वी के समान उसके इस अनुचित व्यवहार को सदा सहन करेंगे।

कभी वर्षा न होगी और प्रजा के प्राण संकट में पड़ जायेंगे, तो ये राजवेषधारी श्रीहरि इन्द्र की भाँति जल बरसाकर अनायास ही उसकी रक्षा कर लेंगे। ये अपने अमृतमय मुखचन्द्र की मनोहर मुस्कान और प्रेमभरी चितवन से सम्पूर्ण लोकों को आनन्दमग्न कर देंगे। इनकी गति को कोई समझ न सकेगा, इनके कार्य भी गुप्त होंगे तथा उन्हें सम्पन्न करने का ढंग भी बहुत गम्भीर होगा। इनका धन सदा सुरक्षित रहेगा। ये अनन्त माहात्म्य और गुणों के एकमात्र आश्रय होंगे। इस प्रकार मनस्वी पृथु साक्षात् वरुण के ही समान होंगे।

‘महाराज पृथु वेनरूप अरणि के मन्थन से प्रकट हुए अग्नि के समान हैं। शत्रुओं के लिये ये अत्यन्त दुर्धर्ष और दुःसह होंगे। ये उनके समीप रहने पर भी, सेनादि से सुरक्षित रहने के कारण, बहुत दूर रहने वाले-से होंगे। शत्रु कभी इन्हें हरा न सकेंगे। जिस प्रकार प्राणियों के भीतर रहने वाला प्राणरूप सूत्रात्मा शरीर के भीतर-बाहर के समस्त व्यापारों को देखते रहने पर भी उदासीन रहता है, उसी प्रकार ये गुप्तचरों के द्वारा प्राणियों के गुप्त और प्रकट सभी प्रकार के व्यापार देखते हुए भी अपनी निन्दा और स्तुति आदि के प्रति उदासीनवत् रहेंगे। ये धर्ममार्ग में स्थित रहकर अपने शत्रु के पुत्र को भी, दण्डनीय न होने पर, कोई न दण्ड ने देंगे और दण्डनीय होने पर तो अपने पुत्र को भी दण्ड देंगे। भगवान् सूर्य मानसोत्तर पर्वत तक जितने प्रदेश को अपनी किरणों से प्रकाशित करते हैं, उस सम्पूर्ण क्षेत्र में इनका निष्कण्टक राज्य रहेगा। ये अपने कार्यों से सब लोकों को सुख पहुँचावेंगे- उनका रंजन करेंगे; इससे उन मनोरंजनात्मक व्यापारों के कारण प्रजा इन्हें ‘राजा’ कहेगी। ये बड़े दृशसंकल्प, सत्यप्रतिज्ञ, ब्राह्मण भक्त, वृद्धों की सेवा करने वाले, शरणागतवत्सल, सब प्राणियों को मान देने वाले और दीनों पर दया करने वाले होंगे।

ये परस्त्री में माता के समान भक्ति रखेंगे, पत्नी को अपने आधे अंग के समान मानेंगे, प्रजा पर पिता के समान प्रेम रखेंगे और और ब्रह्मवादियों के सेवक होंगे। दूसरे प्राणी इन्हें उतना ही चाहेंगे, जितना अपने शरीर को। ये सुहृदों के आनन्द को बढ़ायेंगे। ये सर्वदा वैराग्यवान् पुरुषों से विशेष प्रेम करेंगे और दुष्टों को दण्डपाणि यमराज के समान सदा दण्ड देने के लिये उद्यत रहेंगे। ‘तीनों गुणों के अधिष्ठाता और निर्विकार साक्षात् श्रीनारायण ने ही इनके रूप में अपने अंश से अवतार लिया है, जिनमें पण्डित लोग अविद्यावश प्रतीत होने वाले इस नानात्व को मिथ्या ही समझते हैं। ये अद्वितीय वीर और एकच्छत्र सम्राट् होकर अकेले ही उदयाचलपर्यन्त समस्त भूमण्डल की रक्षा करेंगे तथा अपने जयशील रथ पर चढ़कर धनुष हाथ में लिये सूर्य के समान सर्वत्र प्रदक्षिणा करेंगे। उस समय जहाँ-तहाँ सभी लोकपाल और पृथ्वीपाल इन्हें भेंटे समर्पण करेंगे, उनकी स्त्रियाँ इनका गुणगान करेंगी और इन आदिराज को साक्षात् श्रीहरि ही समझेंगी। ये प्रजापालक राजाधिराज होकर प्रजा के जीवन-निर्वाह के लिये गोरूपधारिणी पृथ्वी का दोहन करेंगे और इन्द्र के समान अपने धनुष के कोनों से बातों-की-बात में पर्वतों को तोड़-फोड़कर पृथ्वी को समतल कर देंगे। रणभूमि में कोई भी इनका वेग नहीं सह सकेगा। जिस समय वे जंगल में पूँछ उठाकर विचरते हुए सिंह के समान अपने ‘आजगव’ धनुष का टंकार करते हुए भूमण्डल में विचरेंगे, उस समय सभी दुष्टजन इधर-उधर छिप जायेंगे। ये सरस्वती के उद्गम स्थान पर सौ अश्वमेध यज्ञ करेंगे। तब अन्तिम यज्ञानुष्ठान के समय इन्द्र इनके घोड़े को हरकर ले जायेंगे। अपने महल के बगीचे में इनकी एक बार भगवान् सनत्कुमार से भेंट होगी। अकेले उनकी भक्तिपूर्वक सेवा करके ये उस निर्मल ज्ञान को प्राप्त करेंगे, जिससे परब्रह्म की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जब इनके पराक्रम जनता के सामने आ जायेंगे, अब ये परमपराक्रमी महाराज जहाँ-तहाँ अपने चरित्र की ही चर्चा सुनेंगे। इनकी आज्ञा का विरोध कोई भी न कर सकेगा तथा ये सारी दिशाओं को जीतकर और अपने तेज से प्रजा के क्लेशरूप काँटे को निकालकर सम्पूर्ण भूमण्डल के शासक होंगे। उस समय देवता और असुर भी इनके विपुल प्रभाव का वर्णन करेंगे’।

Chapter Sixteen: Praise of King Prthu by the Professional Reciters

1. The great sage Maitreya continued: While King Prthu thus spoke, the humility of his nectarean
speeches pleased the reciters very much. Then again they continued to praise the King highly with exalted prayers, as they had been instructed by the great sages.

2. The reciters continued: Dear King, you are a direct incarnation of the Supreme Personality of
Godhead, Lord Visnu, and by His causeless mercy you have descended on this earth. Therefore it is not possible for us to actually glorify your exalted activities. Although you have appeared through the body of King Vena, even great orators and speakers like Lord Brahma and other demigods cannot exactly describe the glorious activities of Your Lordship.

3. Although we are unable to glorify you adequately, we nonetheless have a transcendental taste for glorifying your activities. We shall try to glorify you according to the instructions received from authoritative sages and scholars. Whatever we speak, however, is always inadequate and very insignificant. Dear King, because you are a direct incarnation of the Supreme Personality of Godhead, all your activities are liberal and ever laudable.

4. This King, Maharaja Prthu, is the best amongst those who are following religious principles. As such, he will engage everyone in the pursuit of religious principles and give those principles all protection. He will also be a great chastiser to the irreligious and atheistic.

5. This King alone, in his own body, will be able in due course of time to maintain all living entities and keep them in a pleasant condition by manifesting himself as different demigods to perform various departmental activities. Thus he will maintain the upper planetary system by inducing the populace to perform Vedic sacrifices. In due course of time he will also maintain this earthly planet by discharging
proper rainfall.

6. This King Prthu will be as powerful as the sun-god, and just as the sun-god equally distributes his sunshine to everyone, King Prthu will distribute his mercy equally. Similarly, just as the sun-god evaporates water for eight months and, during the rainy season, returns it profusely, this King will also exact taxes from the citizens and return these monies in times of need.

7. This King Prthu will be very, very kind to all citizens. Even though a poor person may trample over the King’s head by violating the rules and regulations, the King, out of his causeless mercy, will be forgetful and forgiving. As a protector of the world, he will be as tolerant as the earth itself.

8. When there is no rainfall and the citizens are in great danger due to the scarcity of water, this royal Personality of Godhead will be able to supply rains exactly like the heavenly King Indra. Thus he will very easily be able to protect the citizens from drought.

9. This King, Prthu Maharaja, by virtue of his affectionate glances and beautiful moonlike face, which is always smiling with great affection for the citizens, will enhance everyone’s peaceful life.

10. The reciters continued: No one will be able to understand the policies the King will follow. His
activities will also be very confidential, and it will not be possible for anyone to know how he will make every activity successful. His treasury will always remain unknown to everyone. He will be the reservoir of unlimited glories and good qualities, and his position will be maintained and covered just as Varuna, the deity of the seas, is covered all around by water.

11. King Prthu was born of the dead body of King Vena as fire is produced from arani wood. Thus King Prthu will always remain just like fire, and his enemies will not be able to approach him. Indeed, he will be unbearable to his enemies, for although staying very near him, they will never be able to approach him but will have to remain as if far away. No one will be able to overcome the strength of King Prthu.

12. King Prthu will be able to see all the internal and external activities of every one of his citizens. Still no one will be able to know his system of espionage, and he himself will remain neutral regarding all matters of glorification or vilification paid to him. He will be exactly like air, the life force within the body, which is exhibited internally and externally but is always neutral to all affairs.

13. Since this King will always remain on the path of piety, he will be neutral to both his son and the son of his enemy. If the son of his enemy is not punishable, he will not punish him, but if his own son is punishable, he will immediately punish him.

14. Just as the sun-god expands his shining rays up to the Arctic region without impedance, the
influence of King Prthu will cover all tracts of land up to the Arctic region and will remain undisturbed as long as he lives.

15. This King will please everyone by his practical activities, and all of his citizens will remain very
satisfied. Because of this the citizens will take great satisfaction in accepting him as their ruling king.

16. The King will be firmly determined and always situated in truth. He will be a lover of the brahminical culture and will render all service to old men and give shelter to all surrendered souls. Giving respect to all, he will always be merciful to the poor and innocent.

17. The King will respect all women as if they were his own mother, and he will treat his own wife as the other half of his body. He will be just like an affectionate father to his citizens, and he will treat himself as the most obedient servant of the devotees, who always preach the glories of the Lord.

18. The King will consider all embodied living entities as dear as his own self, and he will always be increasing the pleasures of his friends. He will intimately associate with liberated persons, and he will be a chastising hand to all impious persons.

19. This King is the master of the three worlds, and he is directly empowered by the Supreme
Personality of Godhead. He is without change, and he is an incarnation of the Supreme known as a saktyavesa-avatara. Being a liberated soul and completely learned, he sees all material varieties as meaningless because their basic principle is nescience.

20. This King, being uniquely powerful and heroic, will have no competitor. He will travel around the globe on his victorious chariot, holding his invincible bow in his hand and appearing exactly like the sun, which rotates in its own orbit from the south.

21. When the King travels all over the world, other kings, as well as the demigods, will offer him all kinds of presentations. Their queens will also consider him the original king, who carries in His hands the emblems of club and disc, and will sing of his fame, for he will be as reputable as the Supreme Personality of Godhead.

22. This King, this protector of the citizens, is an extraordinary king and is equal to the Prajapati
demigods. For the living facility of all citizens, he will milk the earth, which is like a cow. Not only that, but he will level the surface of the earth with the pointed ends of his bow, breaking all the hills exactly as King Indra, the heavenly King, breaks mountains with his powerful thunderbolt.

23. When the lion travels in the forest with its tail turned upward, all menial animals hide themselves. Similarly, when King Prthu will travel over his kingdom and vibrate the string of his bow, which is made of the horns of goats and bulls and is irresistible in battle, all demoniac rogues and thieves will hide themselves in all directions.

24. At the source of the River Sarasvati, this King will perform one hundred sacrifices known as
asvamedha. In the course of the last sacrifice, the heavenly King Indra will steal the sacrificial horse.

25. This King Prthu will meet Sanat-kumara, one of the four Kumaras, in the garden of his palace
compound. The King will worship him with devotion and will be fortunate to receive instructions by which one can enjoy transcendental bliss.

26. In this way when the chivalrous activities of King Prthu come to be known to the people in general, King Prthu will always hear about himself and his uniquely powerful activities.

27. No one will be able to disobey the orders of Prthu Maharaja. After conquering the world, he will completely eradicate the threefold miseries of the citizens. Then he will be recognized all over the world.  At that time both the suras and the asuras will undoubtedly glorify his magnanimous activities.

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कन्ध – सोलहवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Sixteen

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: षोडश अध्यायः

श्लोक 1-37

जय-विजय का वैकुण्ठ से पतन

श्रीब्रह्मा जी ने कहा- देवगण! जब योगनिष्ठ सनकादि मुनियों ने इस प्रकार स्तुति की, तब वैकुण्ठ-निवास श्रीहरि ने उनकी प्रशंसा करते हुए यह कहा। श्रीभगवान् ने कहा- मुनिगण! ये जय-विजय मेरे पार्षद हैं। उन्होंने मेरी कुछ भी परवा न करके आपका बहुत बड़ा अपराध किया है। आप लोग भी मेरे अनुगत भक्त हैं; अतः इस प्रकार मेरी ही अवज्ञा करने के कारण आपने इन्हें जो दण्ड दिया है, वह मुझे भी अभिमत है। ब्राह्मण मेरे परम आराध्य हैं; मेरे अनुचरों के द्वारा आप लोगों का जो तिरस्कार हुआ है, उसे मैं अपना ही किया हुआ मानता हूँ। इसलिये मैं आप लोगों से प्रसन्नता की भिक्षा माँगता हूँ। सेवकों के अपराध करने पर संसार उनके स्वामी का ही नाम लेता है। वह अपयश उसकी कीर्ति को इस प्रकार दूषित कर देता है, जैसे त्वचा को कर्मरोग। मेरी निर्मल सुयश-सुधा में गोता लगाने से चाण्डालपर्यन्त सारा जगत् तुरंत पवित्र हो जाता है, इसीलिये मैं ‘विकुण्ठ’ कहलाता हूँ। किन्तु यह पवित्र कीर्ति मुझे आप लोगों से ही प्राप्त हुई है। इसलिये जो कोई आपके विरुद्ध आचरण करेगा, वह मेरी भुजा हो क्यों न हो-मैं उसे तुरन्त काट डालूँगा। आप लोगों की सेवा करने से ही मेरी चरणरज को ऐसी पवित्रता प्राप्त हुई है कि वह सारे पापों को तत्काल नष्ट कर देती है और मुझे ऐसा सुन्दर स्वभाव मिला है कि मेरे उदासीन रहने पर भी लक्ष्मी जी मुझे एक क्षण के लिये भी नहीं छोड़ती-यद्यपि इन्हीं के लेशमात्र कृपाकटाक्ष के लिये अन्य ब्रह्मादि देवता नाना प्रकार के नियमों एवं व्रतों का पालन करते हैं। जो अपने सम्पूर्ण कर्म फल मुझे अर्पण कर सदा सन्तुष्ट रहते हैं, वे निष्काम ब्राह्मण ग्रास-ग्रास पर तृप्त होते हुए घी से तर तरह-तरह के पकवानों का जब भोजन करते हैं, तब उनके मुख से मैं जैसा तृप्त होता हूँ वैसा यज्ञ में अग्निरूप मुख से यजमान की दी हुई आहुतियों को ग्रहण करके नहीं होता। योगमाया का अखण्ड और असीम ऐश्वर्य मेरे अधीन है तथा मेरी चरणोदकरूपिणी गंगाजी चन्द्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले भगवान् शंकर के सहित समस्त लोकों को पवित्र करती हैं। ऐसा परम पवित्र एवं परमेश्वर होकर भी मैं जिनकी पवित्र चरण-रज को अपने मुकुट पर धारण करता हूँ, उन ब्राह्मणों के कर्म को कौन नहीं सहन करेगा। ब्राह्मण, दूध देने वाली गौएँ और अनाथ प्राणी-ये मेरे ही शरीर हैं। पापों के द्वारा विवेकदृष्टि नष्ट हो जाने के कारण जो लोग इन्हें मुझसे भिन्न समझते हैं, उन्हें मेरे द्वारा नियुक्त यमराज के गृध-जैसे दूत-जो सर्प के समान क्रोधी हैं-अत्यन्त क्रोधित होकर अपनी चोंचो से नोचते हैं। ब्राह्मण तिरस्कारपूर्वक कटुभाषण भी करे, तो भी जो उसमें मेरी भावना मुखकमल से उसका आदर करते हैं तथा जैसे रूठे हुए पिता को पुत्र और आप लोगों को मैं मानता हूँ, उसी प्रकार जो प्रेमपूर्ण वचनों से प्रार्थना करते हुए उन्हें शान्त करते हैं, वे मुझे अपने वश में कर लेते हैं। मेरे इन सेवकों ने मेरा अभिप्राय न समझकर ही आप लोगों का अपमान किया है। इसलिये मेरे अनुरोध से आप केवल इतनी कृपा कीजिये कि इनका यह निर्वासन काल शीघ्र ही समाप्त हो जाये, ये अपने अपराध के अनुरूप अधम गति को भोगकर शीघ्र ही मेरे पास लौट आयें।

श्रीब्रह्मा जी कहते हैं- देवताओं! सनकादि मुनि क्रोधरूप सर्प से डसे हुए थे, तो भी उनका चित्त अन्तःकरण को प्रकाशित करने वाली भगवान् की मन्त्रमयी सुमधुर वाणी सुनते-सुनते तृप्त नहीं हुआ। भगवान् की उक्ति बड़ी ही मनोहर और थोड़े अक्षरों वाली थी; किन्तु वह इतनी अर्थपूर्ण, सारयुक्त, दुर्विज्ञेय और गम्भीर थी कि बहुत ध्यान देकर सुनने और विचार करने पर भी वे यह न जान सके कि भगवान् क्या करना चाहते हैं। भगवान् की इस अद्भुत उदारता को देखकर वे बहुत आनन्दित हुए और उनका अंग-अंग पुलकित हो गया। फिर योगमाया के प्रभाव से अपने परम ऐश्वर्य का प्रभाव प्रकट करने वाले प्रभु से वे हाथ जोड़कर कहने लगे। मुनियों ने कहा- स्वप्रकाश भगवन्! आप सर्वेश्वर होकर भी जो यह कह रहे हैं कि ‘यह आपने मुझ पर बड़ा अनुग्रह किया’ सो इससे आपका क्या अभिप्राय है-यह हम नहीं जान सके हैं। प्रभो! आप ब्राह्मणों के परम हितकारी हैं; इससे लोक शिक्षा के लिये आप भले ही ऐसा मानें कि ब्राह्मण मेरे आराध्यदेव हैं। वस्तुतः तो ब्राह्मण तथा देवताओं के भी देवता ब्रह्मादि के भी आप ही आत्मा और आराध्यदेव हैं। सनातन धर्म आपसे ही उत्पन्न हुआ है, आपके अवतारों द्वारा ही समय-समय पर उसकी रक्षा होती है तथा निर्विकारस्वरूप आप ही धर्म के परमगुह्य रहस्य हैं-यह शास्त्रों का मत है। आपकी कृपा से निवृत्तिपरायण योगीजन सहज में ही मृत्युरूप संसार सागर से पार हो जाते हैं; फिर भला, दूसरा कोई आप पर क्या कृपा कर सकता है। भगवन्! दूसरे अर्थार्थी जन जिनकी चरणरज सर्वदा अपने मस्तक पर धारण करते हैं, वे लक्ष्मी जी निरन्तर आपकी सेवा में लगी रहती हैं; सो ऐसा जान पड़ता है कि भाग्यवान् भक्तजन आपके चरणों पर जो नूतन तुलसी की मालाएँ अर्पण करते हैं, उन पर गुंजार करते हुए भौरों के समान वे भी आपके पादपद्मों को ही अपना निवास स्थान बनाना चाहती हैं। किन्तु अपने पवित्र चरित्रों से निरन्तर सेवा में तत्पर रहने वाली उन लक्ष्मी जी का भी आप विशेष आदर नहीं करते, आप तो अपने भक्तों से ही विशेष प्रेम रखते हैं। आप स्वयं ही सम्पूर्ण भजनीय गुणों के आश्रय हैं; क्या जहाँ-तहाँ विचरते हुए ब्राह्मणों के चरणों में लगने से पवित्र हुई मार्ग की धूलि और श्रीवत्स का चिह्न आपको पवित्र कर सकते हैं? क्या इनसे आपकी शोभा बढ़ सकती है? भगवन्! आप साक्षात् धर्म स्वरूप हैं। आप सत्यादि तीनों युगों में प्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहते हैं तथा ब्राह्मण और देवताओं के लिये तप, शौच और दया-अपने इन तीन चरणों से इस चराचर जगत् की रक्षा करते हैं। अब आप अपनी शुद्धसत्त्वमयी वरदायिनी मूर्ति से हमारे धर्मविरोधी रजोगुण-तमोगुण को दूर कर दीजिये देव! यह ब्राह्मणकुल आपके द्वारा अवश्य रक्षणीय है। यदि साक्षात् धर्मरूप होकर भी आप सुमधुर वाणी और पूजनादि के द्वारा इस उत्तम कुल की रक्षा न करें तो आपका निश्चित किया हुआ कल्याण मार्ग ही नष्ट हो जाये; क्योंकि लोक तो श्रेष्ठ पुरुषों के आचरण को ही प्रमाणरूप से ग्रहण करता है। प्रभो! आप सत्त्वगुण की खान हैं और सभी जीवों का कल्याण करने के लिये उत्सुक हैं। इसी से आप अपनी शक्तिरूप राजा आदि के द्वारा धर्म के शत्रुओं का संहार करते हैं; क्योंकि वेदमार्ग का उच्छेद आपको अभीष्ट नहीं है। आप त्रिलोकीनाथ और जगत्प्रतिपालक होकर भी ब्राह्मणों के प्रति इतने नम्र रहते हैं, इससे आपके तेज की कोई हानि नहीं होती; यह तो आपकी लीलामात्र है।

सर्वेश्वर! इन द्वारपालों को आप जैसा उचित समझें वैसा दण्ड दें अथवा पुरस्कार रूप में इनकी वृत्ति बढ़ा दें-हम निष्कपट भाव से सब प्रकार आपसे सहमत हैं अथवा हमने आपके इन निरपराध अनुचरों को शाप दिया है, इसके लिये हमीं को उचित दण्ड दें; हमें वह भी सहर्ष स्वीकार है।

श्रीभगवान् ने कहा- मुनिगण! आपने इन्हें जो शाप दिया है-सच जानिये, वह मेरी ही प्रेरणा से हुआ है। अब ये शीघ्र ही दैत्ययोनि को प्राप्त होंगे और वहाँ क्रोधावेश से बढ़ी हुई एकाग्रता के कारण सुदृढ़ योग सम्पन्न होकर फिर जल्दी ही मेरे पास लौट आयेंगे।

श्रीब्रह्मा जी कहते हैं- तदनन्तर उन मुनीश्वरों ने नयनाभिराम भगवान् विष्णु और उनके स्वयंप्रकाश वैकुण्ठधाम के दर्शन करके प्रभु की परिक्रमा की और उन्हें प्रणाम कर तथा उनकी आज्ञा पा भगवान् के ऐश्वर्य का वर्णन करते हुए प्रमुदित हो वहाँ से लौट गये। फिर भगवान् ने अपने अनुचरों से कहा, ‘जाओ, मन में किसी प्रकार का भय मत करो; तुम्हारा कल्याण होगा। मैं सब कुछ करने में समर्थ होकर भी ब्रह्मतेज को मिटाना नहीं चाहता; क्योंकि ऐसा ही मुझे अभिमत भी है।

एक बार जब मैं योगनिद्रा में स्थित हो गया था, तब तुमने द्वार में प्रवेश करती हुई लक्ष्मी जी को रोका था। उस समय उन्होंने क्रुद्ध होकर पहले ही तुम्हें यह शाप दे दिया था। अब दैत्ययोनि में मेरे प्रति क्रोधाकार वृत्ति रहने से तुम्हें जो एकाग्रता होगी, उससे तुम इस विप्र-तिरस्कारजनित पाप से मुक्त हो जाओगे और फिर थोड़े ही समय में मेरे पास लौट आओगे।

द्वारपालों को इस प्रकार आज्ञा दे, भगवान् ने विमानों की श्रेणियों से सुसज्जित अपने सर्वादिक श्रीसम्पन्न धाम में प्रवेश किया। वे देवश्रेष्ठ जय-विजय तो ब्रह्मशाप के कारण उस अलंघनीय भगवद्धाम में ही श्रीहीन हो गये तथा उनका सारा गर्व गलित हो गया।

पुत्रों! फिर जब वे वैकुण्ठलोक से गिरने लगे, तब वहाँ श्रेष्ठ विमानों पर बैठे हुए वैकुण्ठवासियों में महान् हाहाकार मच गया। इस समय दिति के गर्भ में स्थित जो कश्यप जी का उग्र तेज है, उसमें भगवान् के उन पार्षद प्रवरों ने ही प्रवेश किया है। उन दोनों असुरों के तेज से ही तुम सबका तेज फीका पड़ गया है। इस समय भगवान् ऐसा ही करना चाहते हैं, जो आदिपुरुष संसार की उत्पत्ति, स्थिति और लय के कारण हैं, जिनकी योगमाया को बड़े-बड़े योगिजन भी बड़ी कठिनता से पार पाते हैं-वे सत्त्वादि तीनों गुणों के नियन्ता श्रीहरि ही हमारा कल्याण करेंगे। अब इस विषय में हमारे विशेष विचार करने से क्या लाभ हो सकता है।

Chapter Sixteen: The Two Doorkeepers of Vaikuntha, Cursed by the Sages

1. Lord Brahma said: After thus congratulating the sages for their nice words, the Supreme Personality of Godhead, whose abode is in the kingdom of God, spoke as follows.

2. The Personality of Godhead said: These attendants of Mine, Jaya and Vijaya by name, have committed a great offense against you because of ignoring Me.

3. O great sages, I approve of the punishment that you who are devoted to Me have meted out to them.

4. To Me, the brahmana is the highest and most beloved personality. The disrespect shown by My
attendants has actually been displayed by Me because the doormen are My servitors. I take this to be an offense by Myself; therefore I seek your forgiveness for the incident that has arisen.

5. A wrong act committed by a servant leads people in general to blame his master, just as a spot of white leprosy on any part of the body pollutes all of the skin.

6. Anyone in the entire world, even down to the candala, who lives by cooking and eating the flesh of the dog, is immediately purified if he takes bath in hearing through the ear the glorification of My name, fame, etc. Now you have realized Me without doubt; therefore I will not hesitate to lop off My own arm if its conduct is found hostile to you.

7. The Lord continued: Because I am the servitor of My devotees, My lotus feet have become so sacred that they immediately wipe out all sin, and I have acquired such a disposition that the goddess of fortune does not leave Me, even though I have no attachment for her and others praise her beauty and observe sacred vows to secure from her even a slight favor.

8. I do not enjoy the oblations offered by the sacrificers in the sacrificial fire, which is one of My own mouths, with the same relish as I do the delicacies overflowing with ghee which are offered to the mouths of the brahmanas who have dedicated to Me the results of their activities and who are ever satisfied with My prasada.

9. I am the master of My unobstructed internal energy, and the water of the Ganges is the remnant left after My feet are washed. That water sanctifies the three worlds, along with Lord Siva, who bears it on his head. If I can take the dust of the feet of the Vaisnava on My head, who will refuse to do the same?

10. The brahmanas, the cows and the defenseless creatures are My own body. Those whose faculty of judgment has been impaired by their own sin look upon these as distinct from Me. They are just like furious serpents, and they are angrily torn apart by the bills of the vulturelike messengers of Yamaraja, the superintendent of sinful persons.

11. On the other hand, they captivate My heart who are gladdened in heart and who, their lotus faces enlightened by nectarean smiles, respect the brahmanas, even though the brahmanas utter harsh words. They look upon the brahmanas as My own Self and pacify them by praising them in loving words, even as a son would appease an angry father or as I am pacifying you.

12. These servants of Mine have transgressed against you, not knowing the mind of their master. I shall therefore deem it a favor done to Me if you order that, although reaping the fruit of their transgression, they may return to My presence soon and the time of their exile from My abode may expire before long.

13. Brahma continued: Even though the sages had been bitten by the serpent of anger, their souls were not satiated with hearing the Lord’s lovely and illuminating speech, which was like a series of Vedic hymns.

14. The Lord’s excellent speech was difficult to comprehend because of its momentous import and its most profound significance. The sages heard it with wide-open ears and pondered it as well. But although hearing, they could not understand what He intended to do.

15. The four brahmana sages were nevertheless extremely delighted to behold Him, and they
experienced a thrill throughout their bodies. They then spoke as follows to the Lord, who had revealed the multiglories of the Supreme Personality through His internal potency, yogamaya.

16. The sages said: O Supreme Personality of Godhead, we are unable to know what You intend for us to do, for even though You are the supreme ruler of all, You speak in our favor as if we had done something good for You.

17. O Lord, You are the supreme director of the brahminical culture. Your considering the brahmanas to be in the highest position is Your example for teaching others. Actually You are the supreme worshipable Deity, not only for the gods but for the brahmanas also.

18. You are the source of the eternal occupation of all living entities, and by Your multimanifestations of Personalities of Godhead, You have always protected religion. You are the supreme objective of religious principles, and in our opinion You are inexhaustible and unchangeable eternally.

19. Mystics and transcendentalists, by the mercy of the Lord, cross beyond nescience by ceasing all material desires. It is not possible, therefore, that the Supreme Lord can be favored by others.

20. The goddess of fortune, Laksmi, the dust of whose feet is worn on the head by others, waits upon You, as appointed, for she is anxious to secure a place in the abode of the king of bees, who hovers on the fresh wreath of tulasi leaves offered at Your feet by some blessed devotee.

21. O Lord, You are exceedingly attached to the activities of Your pure devotees, yet You are never attached to the goddesses of fortune who constantly engage in Your transcendental loving service. How can You be purified, therefore, by the dust of the path traversed by the brahmanas, and how can You be glorified or made fortunate by the marks of Srivatsa on Your chest?

22. O Lord, You are the personification of all religion. Therefore You manifest Yourself in three
millenniums, and thus You protect this universe, which consists of animate and inanimate beings. By Your grace, which is of pure goodness and is the bestower of all blessings, kindly drive away the elements of rajas and tamas for the sake of the demigods and twice-born.

23. O Lord, You are the protector of the highest of the twice-born. If You do not protect them by offering worship and mild words, then certainly the auspicious path of worship will be rejected by people in general, who act on the strength and authority of Your Lordship.

24. Dear Lord, You never want the auspicious path to be destroyed, for You are the reservoir of all goodness. Just to benefit people in general, You destroy the evil element by Your mighty potency. You are the proprietor of the three creations and the maintainer of the entire universe. Therefore Your potency is not reduced by Your submissive behavior. Rather, by submission You exhibit Your
transcendental pastimes.

25. O Lord, whatever punishment You wish to award to these two innocent persons or also to us we shall accept without duplicity. We understand that we have cursed two faultless persons.

26. The Lord replied: O brahmanas, know that the punishment you inflicted on them was originally
ordained by Me, and therefore they will fall to a birth in a demoniac family. But they will be firmly united with Me in thought through mental concentration intensified by anger, and they will return to My
presence shortly.

27. Lord Brahma said: After seeing the Lord of Vaikuntha, the Supreme Personality of Godhead, in the self-illuminated Vaikuntha planet, the sages left that transcendental abode.

28. The sages circumambulated the Supreme Lord, offered their obeisances and returned, extremely delighted at learning of the divine opulences of the Vaisnava.

29. The Lord then said to His attendants, Jaya and Vijaya: Depart this place, but fear not. All glories unto you. Though I am capable of nullifying the brahmanas’ curse, I would not do so. On the contrary, it has My approval.

30. This departure from Vaikuntha was foretold by Laksmi, the goddess of fortune. She was very angry because when she left My abode and then returned, you stopped her at the gate while I was sleeping.

31. The Lord assured the two Vaikuntha inhabitants, Jaya and Vijaya: By practicing the mystic yoga system in anger, you will be cleansed of the sin of disobeying the brahmanas and within a very short time return to Me.

32. After thus speaking at the door of Vaikuntha, the Lord returned to His abode, where there are many celestial airplanes and all-surpassing wealth and splendor.

33. But those two gatekeepers, the best of the demigods, their beauty and luster diminished by the curse of the brahmanas, became morose and fell from Vaikuntha, the abode of the Supreme Lord.

34. Then, as Jaya and Vijaya fell from the Lord’s abode, a great roar of disappointment arose from all the demigods, who were sitting in their splendid airplanes.

35. Lord Brahma continued: Those two principal doorkeepers of the Personality of Godhead have now entered the womb of Diti, the powerful semen of Kasyapa Muni having covered them.

36. It is the prowess of these twin asuras [demons] that has disturbed you, for it has minimized your power. There is no remedy within my power, however, for it is the Lord Himself who desires to do all this.

37. My dear sons, the Lord is the controller of the three modes of nature and is responsible for the
creation, preservation and dissolution of the universe. His wonderful creative power, yogamaya, cannot be easily understood even by the masters of yoga. That most ancient person, the Personality of Godhead, will alone come to our rescue. What purpose can we serve on His behalf by deliberating on the subject?

श्रीमद्भागवत – प्रथम स्कंध – सोलहवाँ अध्याय

परीक्षित की दिग्विजय तथा धर्म और पृथ्वी का संवाद

 

सूत उवाच:-
ततः परीक्षिद्द्विजवर्यशिक्षया महीं महाभागवतः शशास ह
यथा हि सूत्यामभिजातकोविदाः समादिशन्विप्र महद्गुणस्तथा 1

सूतजी कहते हैं—– शौनकजी ! पाण्डवों के महाप्रयाण के पश्चात भगवान् के परम भक्त राजा परीक्षित श्रेष्ट ब्राह्मणों की शिक्षा के अनुसार पृथ्वी का शासन करने लगे। उनके जन्म के समय ज्योतिषियों ने उनके सम्बन्ध में जो कुछ कहा था, वास्तव में वे सभी महान गुण उनमें विद्यमान थे ।।1।।

स उत्तरस्य तनयामुपयेम इरावतीम्
जनमेजयादींश्चतुरस्तस्यामुत्पादयत्सुतान् 2

उन्होंने उत्तर की पुत्री इरावती से विवाह किया। उससे उन्होंने जन्मेजय आदि चार पुत्र उत्पन्न किये।।2।।

आजहाराश्वमेधांस्त्रीन्गङ्गायां भूरिदक्षिणान्
शारद्वतं गुरुं कृत्वा देवा यत्राक्षिगोचराः 3

तथा कृपाचार्य को आचार्य बनाकर उन्होंने गंगा के तट पर तीन अश्वमेघयज्ञ किये, जिनमें ब्राह्मणों को पुष्कल दक्षिणा दी गयी। उन यज्ञों में देवताओं ने प्रत्यक्षरूप में प्रकट होकर अपना भाग ग्रहण किया था ।।3।।

निजग्राहौजसा वीरः कलिं दिग्विजये क्वचित्
नृपलिङ्गधरं शूद्रं घ्नन्तं गोमिथुनं पदा 4

एक बार दिग्विजय करते समय उन्होंने देखा की शूद्र के रूप में कलियुग राजा का वेश धारण करके एक गाय और बैल के जोड़े को ठोकरों से मर रहा है। तब उन्होंने उसे बलपूर्वक पकड़कर दण्ड दिया ।।4।।

शौनक उवाच
कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः
नृदेवचिह्नधृक्षूद्र कोऽसौ गां यः पदाहनत्
तत्कथ्यतां महाभाग यदि कृष्णकथाश्रयम् 5
अथवास्य पदाम्भोज मकरन्दलिहां सताम्
किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः 6

शौनकजी ने पूछा —– महाभाग्यवान सूतजी ! दिग्विजय के समय महाराज परीक्षित ने कलियुग को दण्ड देकर ही क्यों छोड़ दिया— मार क्यों नही डाला? क्योंकि राजा का वेष धारण करने पर भी था तो वह अधम शूद्र ही, जिसने गाय को लात से मारा था? यदि यह प्रसंग भगवान् श्रीकृष्ण की लीला से अथवा उनके चरणकमलों के मकरन्द-रस का पान करनेवाले रसिक महानुभावों से सम्बन्ध रखता हो तो अवश्य कहिये। दूसरी व्यर्थ की बातों से क्या लाभ। उनमें तो आयु व्यर्थ नष्ट होती है ।।5-6।।

क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानामृतमिच्छताम्
इहोपहूतो भगवान्मृत्युः शामित्रकर्मणि 7
     

प्यारे सूतजी ! जो लोग चाहते तो हैं मोक्ष परन्तु अल्पायु होने के कारण मृत्यु से ग्रस्त हो रहे हैं, उनके कल्याण के लिए भगवान् यम का आवाहन करके उन्हें यहाँ शामित्रकर्म में नियुक्त कर दिया गया है ।।7।।

न कश्चिन्म्रियते तावद्यावदास्त इहान्तकः
एतदर्थं हि भगवानाहूतः परमर्षिभिः
अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः 8

जबतक यमराज यहाँ इस कर्म में नियुक्त है, तबतक किसी की मृत्यु नहीं होगी। मृत्यु से ग्रस्त मनुष्यलोक के जीव भी भगवान् की सुधातुल्य लीला-कथा का पान कर सकें, इसीलिए महर्षियों ने भगवान् यम को यहाँ बुलाया है ।।8।।

मन्दस्य मन्दप्रज्ञस्य वयो मन्दायुषश्च वै
निद्रया ह्रियते नक्तं दिवा च व्यर्थकर्मभिः 9

एक तो थोड़ी आयु और दूसरे कम समझ। ऐसी अवस्था में संसार के मंदभाग्य विषयी पुरुषों की आयु व्यर्थ ही बीती जा रही है — नींद में रात और व्यर्थ के कामों में दिन ।।9।।

सूत उवाच
यदा परीक्षित्कुरुजाङ्गलेऽवसत्कलिं प्रविष्टं निजचक्रवर्तिते
निशम्य वार्तामनतिप्रियां ततः शरासनं संयुगशौण्डिराददे 10
     

सूतजी ने कहा —– जिस समय राजा परीक्षित कुरुजांगल देश में सम्राट के रूप में निवास कर रहे थे, उस समय उन्होंने सुना की मेरे सेनाद्वारा सुरक्षित साम्राज्य में कलियुग का प्रवेश हो गया है। इस समाचार से उन्हें दुःख तो अवश्य हुआ; परन्तु यह सोचकर कि युद्ध करने अवसर हाथ लगा, वे उतने दुःखी नहीं हुए। इसके बाद युद्धवीर परीक्षित ने धनुष हाथ में ले लिया।।10।।

स्वलङ्कृतं श्यामतुरङ्गयोजितं रथं मृगेन्द्रध्वजमाश्रितः पुरात्
वृतो रथाश्वद्विपपत्तियुक्तया स्वसेनया दिग्विजयाय निर्गतः 11

वे श्यामवर्ण के घोड़ों से जुते  हुए, सिंह की ध्वजा, सुसज्जित रथपर सवार होकर दिग्विजय करने के लिये नगर से बाहर निकल पड़े। उस समय रथ,हाथी, घोड़े और पैदल सेना उनके साथ-साथ चल रही थी।।11।।

भद्राश्वं केतुमालं च भारतं चोत्तरान्कुरून्
किम्पुरुषादीनि वर्षाणि विजित्य जगृहे बलिम् 12
     

उन्होंने भद्राश्व,केतुमाल,भारत,उत्तरकुरु और किम्पुरुष आदि सभी वर्षों को जीतकर वहाँ के राजाओं से भेंट ली।।12।।

तत्र तत्रोपशृण्वानः स्वपूर्वेषां महात्मनाम्
प्रगीयमाणं च यशः कृष्णमाहात्म्यसूचकम् 13

उन्हें उन देशों में सर्वत्र अपने पूर्वज महात्माओं का सुयश सुनने का मिला। उस यशोगान से पद-पद पर भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा प्रकट होती थी ।।13।।

आत्मानं च परित्रातमश्वत्थाम्नोऽस्त्रतेजसः
स्नेहं च वृष्णिपार्थानां तेषां भक्तिं च केशवे 14

इसके साथ ही उन्हें यह भी सुनने को मिलता था कि भगवान् श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र की ज्वाला से किस प्रकार उनकी रक्षा की थी, यदुवंशी और पाण्डवों में परस्पर कितना प्रेम था तथा पाण्डवों की भगवान् श्रीकृष्ण में कितनी भक्ति थी ।।14।।

तेभ्यः परमसन्तुष्टः प्रीत्युज्जृम्भितलोचनः
महाधनानि वासांसि ददौ हारान्महामनाः 15

जो लोग उन्हें ये चरित्र सुनाते, उनपर महामना राजा परीक्षित बहुत प्रसन्न होते; उनके नेत्र प्रेम से खिल उठते। वे बड़ी उदारता से उन्हें बहुमूल्य वस्त्र और मणियों के हार उपहाररूप में देते ।।15।।

सारथ्यपारषदसेवनसख्यदौत्य
वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामान्
स्निग्धेषु पाण्डुषु जगत्प्रणतिं च विष्णोर्
भक्तिं करोति नृपतिश्चरणारविन्दे 16

वे सुनते कि भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रेमपरवश होकर पाण्डवों के सारथि का काम किया, उनके सभासद बने—यहाँ तक कि उनके मन के अनुसार काम करके उनकी सेवा भी की। उनके सखा तो थे ही, दूत भी बने। वे रात को शास्त्र ग्रहण करके वीरासन से बैठ जाते और शिविर का पहरा देते, उनके पीछे-पीछे चलते, स्तुति करते तथा प्रणाम करते; इतना ही नहीं, अपने प्रेमी पाण्डवों के चरणों में उहोने सारे जगत को झुका दिया। तब परीक्षित की भक्ति भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों में और भी बढ़ जाती ।।16।।

तस्यैवं वर्तमानस्य पूर्वेषां वृत्तिमन्वहम्
नातिदूरे किलाश्चर्यं यदासीत्तन्निबोध मे 17

इस प्रकार वे दिन-दिन पाण्डवों के आचरण का अनुसरण करते हुए दिग्विजय कर रहे थे। उन्हीं दिनों उनके शिविर से थोड़ी ही दूरपर एक आश्चर्यजनक घटना घटी। वह मैं आपको सुनाता हूँ।।17।।

धर्मः पदैकेन चरन्विच्छायामुपलभ्य गाम्
पृच्छति स्माश्रुवदनां विवत्सामिव मातरम् 18

धर्म बैल का रूप धारण करके एक पैर से घूम रहा था। एक स्थानपर उसे गाय के रूप में पृथ्वी मिली। पुत्र की मृत्यु से दुःखिनी माता के समान उसके नेत्रों से आंसुओं के झरने झर रहे थे। उसका शरीर श्रीहीन हो गया था। धर्म पृथ्वी से पूछने लगा।।18।।

धर्म उवाच
कच्चिद्भद्रेऽनामयमात्मनस्ते विच्छायासि म्लायतेषन्मुखेन
आलक्षये भवतीमन्तराधिं दूरे बन्धुं शोचसि कञ्चनाम्ब 19

धर्म ने कहा —– कल्याणी ! कुशल से तो हो न? तुम्हारा मुख कुछ-कुछ मलिन हो रहा है। तुम श्रीहीन हो रही हो, मालूम होता है तुम्हारे हृदय में कुछ-न-कुछ दुःख अवश्य है। क्या तुम्हारा कोई सम्बन्धी दूर देश में चला गया है, जिसके लिये तुम इतनी चिन्ता कर रही हो? ।।19।।

पादैर्न्यूनं शोचसि मैकपादमात्मानं वा वृषलैर्भोक्ष्यमाणम्
आहो सुरादीन्हृतयज्ञभागान्प्रजा उत स्विन्मघवत्यवर्षति 20

कहीं तुम मेरी तो चिन्ता नहीं कर रही हो कि अब इसके तीन पैर टूट गये, एक ही पैर रहा गया है? सम्भव है, तुम अपने लिये शोक कर रही हो की अब शुद्र तुम्हारे ऊपर शासन करेंगे। तुम्हेअ इन देवताओं के लिए भी खेद हो सकता है, जिन्हें अब यज्ञों में आहुति नहीं दी जाती, अथवा उस प्रजा के लिए भी, जो वर्षा न होने के कारण अकाल एवं दुर्भिक्ष से पीड़ित हो रही है ।।20।।

अरक्ष्यमाणाः स्त्रिय उर्वि बालान्शोचस्यथो पुरुषादैरिवार्तान्
वाचं देवीं ब्रह्मकुले कुकर्मण्यब्रह्मण्ये राजकुले कुलाग्र्यान् 21
     

देवि ! क्या तुम राक्षस-सरीखे मनुष्यों के द्वारा सतायी हुई अरक्षित स्त्रियों एवं आर्तबालकों के लिये  शोक कर रही हों? सम्भव है, विद्या अब कुकर्मी-ब्राम्हणों के चंगुल में पड़ गयी है और ब्राह्मण विप्रद्रोही राजाओं की सेवा करने लगे है, और इसी का तुम्हें दुःख हो ।।21।।

किं क्षत्रबन्धून्कलिनोपसृष्टान्राष्ट्राणि वा तैरवरोपितानि
इतस्ततो वाशनपानवासः स्नानव्यवायोन्मुखजीवलोकम् 22

आज के नाममात्र के राजा तो सोलहों आने कलियुगी हो गये हैं, उन्होंने बड़े-बड़े देशोंके लिये शोक कर रही हो? आज की जनता खान-पान,वस्त्र,स्नान और स्त्री-सहवास आदि में शास्त्रीय नियमों का पालन न करके स्वेच्छाचार कर रही है; क्या इसके लिए तुम दुःखी हो? ।।22।।

यद्वाम्ब ते भूरिभरावतार कृतावतारस्य हरेर्धरित्रि
अन्तर्हितस्य स्मरती विसृष्टा कर्माणि निर्वाणविलम्बितानि 23
     

मा  पृथ्वी ! अब समझ में आया, हो-न-हो तुम्हें भगवान् श्रीकृष्ण की याद आ रही होगी; क्योंकि उन्होंने तुम्हारा भार उतारने  के लिए ही अवतार लिया था और ऐसी लीलाएँ की थीं, जो मोक्ष का भी अवलम्बन हैं। अब उनके लीला-संवरण कर लेने पर उनके परित्याग से तुम दुःखी हो रही हो ।।23।।

इदं ममाचक्ष्व तवाधिमूलं वसुन्धरे येन विकर्शितासि
कालेन वा ते बलिनां बलीयसा सुरार्चितं किं हृतमम्ब सौभगम् 24

देवि ! तुम तो धन-रत्नों की खान हो। तुम अपने क्लेश का कारण, जिससे तुम इतनी दुर्बल हो गयी हो, मुझे बतलाओ। मालूम होता है, बड़े-बड़े बलवानों को भी हरा देनेवाले काल ने देवताओं के द्वारा वन्दनीय तुम्हारे सौभाग्य को छीन लिया है ।।24।।

धरण्युवाच
भवान्हि वेद तत्सर्वं यन्मां धर्मानुपृच्छसि
चतुर्भिर्वर्तसे येन पादैर्लोकसुखावहैः 25
सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्यागः सन्तोष आर्जवम्
शमो दमस्तपः साम्यं तितिक्षोपरतिः श्रुतम् 26
ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो बलं स्मृतिः
स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिर्धैर्यं मार्दवमेव च 27
प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः
गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः 28
एते चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः
प्रार्थ्या महत्त्वमिच्छद्भिर्न वियन्ति स्म कर्हिचित् 29
तेनाहं गुणपात्रेण श्रीनिवासेन साम्प्रतम्
शोचामि रहितं लोकं पाप्मना कलिनेक्षितम् 30

पृथ्वी ने कहा —– धर्म ! तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब स्वयं जानते हो।जिन भगवान् के सहारे तुम सारे संसार को सुख पहुँचानेवाले अपने चारों चरणों से युक्त थे, जिनमें सत्य,पवित्रता, दया, क्षमा, त्याग,संतोष,सरलता,शम,दम,तप, समता, तितिक्षा, उपरति,  शास्त्रविचार,ज्ञान,वैराग्य,ऐश्वर्य,वीरता,तेज,बल, स्मृति, स्वतन्त्रता,कौशल,कांति,धैर्य, कोमलता, निर्भीकता,विनय, शील, साहस, उत्साह,बल,सौभाग्य,गम्भीरता,स्थिरता, आस्तिकता, कीर्ति, गौरव और निरहंकारता—ये उन्तालिश अप्राकृत गुण तथा महत्त्वाकांक्षी पुरुषों के द्वारा वांछनीय ( शरणागतवत्सलता आदि ) और भी बहुत-से महान गुण उनकी सेवा करने के लिये नित्य-निरन्तर निवास करते हैं, एक क्षण के लिये भी उनसे अलग नहीं होते— उन्हीं समस्त गुणों के आश्रय,सौन्दर्यधाम भगवान् श्रीकृष्ण ने इस समय इस लोक से अपनी लीला संवरण कर ली और यह संसार पापमय कलियुग की कुदृष्टि का शिकार हो गया। यही देखकर मुझे बड़ा शोक हो रहा है ।।25-30।।

आत्मानं चानुशोचामि भवन्तं चामरोत्तमम्
देवान्पितॄनृषीन्साधून्सर्वान्वर्णांस्तथाश्रमान् 31

अपने लिये, देवताओं में श्रेष्ट तुम्हारे लिये,देवता,पितर,ऋषि,साधु और समस्त वर्णों तथा आश्रमों के मनुष्यों के लिये  मैं शोकग्रस्त हो रही हूँ।।31।।

ब्रह्मादयो बहुतिथं यदपाङ्गमोक्ष
कामास्तपः समचरन्भगवत्प्रपन्नाः 
सा श्रीः स्ववासमरविन्दवनं विहाय
यत्पादसौभगमलं भजतेऽनुरक्ता 32
तस्याहमब्जकुलिशाङ्कुशकेतुकेतैः
श्रीमत्पदैर्भगवतः समलङ्कृताङ्गी
त्रीनत्यरोच उपलभ्य ततो विभूतिं
लोकान्स मां व्यसृजदुत्स्मयतीं तदन्ते 33

जिनका कृपाकटाक्ष प्राप्त करने के लिये ब्रह्मा आदि देवता भगवान् के शरणागत होकर बहुत दिनोंतक तपस्या करते रहे, वही लक्ष्मीजी अपने निवासस्थान कमलवन का परित्याग करके बड़े प्रेम से जिनके चरणकमलों की सुभग छत्रछाया का सेवन करती हैं, उन्हीं भगवान् के कमल,वज्र,अंकुश,ध्वजा आदि चिन्हों से युक्त श्रीचरणों से विभूषित होने के कर्ण मुझे महान वैभव प्राप्त हुआ था और मेरी तीनों लोकों से बढ़कर शोभा हुई थी; परन्तु मेरे सौभाग्य का अब अन्त हो गया ! भगवान् ने मुझ अभागिनी को छोड़ दिया ! मालूम होता है मुझे अपने सौभाग्य पर गर्व हो गया था, इसीलिये उन्होंने मुझे यह दण्ड दिया है ।।32-33।।

यो वै ममातिभरमासुरवंशराज्ञाम्
अक्षौहिणीशतमपानुददात्मतन्त्रः
त्वां दुःस्थमूनपदमात्मनि पौरुषेण
सम्पादयन्यदुषु रम्यमबिभ्रदङ्गम् 34

तुम अपने तीन चरणों के कम हो जाने से मन-ही-मन कुढ़ रहे थे; अतः अपने पुरुषार्थ से तुम्हें अपने ही अन्दर पुनः सब अंगों से पूर्ण एवं स्वस्थ कर देने के लिये वे अत्यन्त रमणीय श्यामसुन्दर विग्रह से यदुवंश में प्रकट हुए और मेरे बड़े भारी भार को, जो असुरवंशी राजाओं की सैकड़ों अक्षौहिणियों के रूप में था, नष्ट कर डाला। क्योंकि वे परम स्वतंत्र थे ।।34।।

का वा सहेत विरहं पुरुषोत्तमस्य, प्रेमावलोकरुचिरस्मितवल्गुजल्पैः
स्थैर्यं समानमहरन्मधुमानिनीनां, रोमोत्सवो मम यदङ्घ्रिविटङ्कितायाः 35

जिन्होंने अपनी प्रेमभरी चितवन, मनोहर मुसकान और मीठी-मीठी बातों से सत्यभामा आदि मधुमयी मनिनियों के मान के साथ धीरज को भी छीन लिया था और जिनके चरणकमलों के स्पर्श से मैं निरन्तर आनन्द से पुलकित रहती थी, उन पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण का विरह भला कौन सह सकती है ।।35।।

तयोरेवं कथयतोः पृथिवीधर्मयोस्तदा
परीक्षिन्नाम राजर्षिः प्राप्तः प्राचीं सरस्वतीम् 36

धर्म और पृथ्वी इस प्रकार आपस में बातचीत कर ही रहे थे कि उसी समय राजर्षि परीक्षित पूर्ववाहिनी सरस्वती के तटपर आ पहुँचे ।।36।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायाम् प्रथमस्कन्धे पृथ्वी धर्म सम्वादो नाम षोडशोऽध्यायः ।।

 

Chapter Sixteen: How Pariksit Received the Age of Kali

1. Suta Gosvami said: O learned brahmanas, Maharaja Pariksit then began to rule over the world as a great devotee of the Lord under the instructions of the best of the twice-born brahmanas. He ruled by those great qualities which were foretold by expert astrologers at the time of his birth.

2. King Pariksit married the daughter of King Uttara and begot four sons, headed by Maharaja
Janamejaya.

3. Maharaja Pariksit, after having selected Krpacarya for guidance as his spiritual master, performed three horse sacrifices on the banks of the Ganges. These were executed with sufficient rewards for the attendants. And at these sacrifices, even the common man could see demigods.

4. Once, when Maharaja Pariksit was on his way to conquer the world, he saw the master of Kali-yuga, who was lower than a sudra, disguised as a king and hurting the legs of a cow and bull. The King at once caught hold of him to deal sufficient punishment.

5. Saunaka Rsi inquired: Why did Maharaja Pariksit simply punish him, since he was the lowest of the sudras, having dressed as a king and having struck a cow on the leg? Please describe all these incidents if they relate to the topics of Lord Krishna.

6. The devotees of the Lord are accustomed to licking up the honey available from the lotus feet of the Lord. What is the use of topics which simply waste one’s valuable life?

7. O Suta Gosvami, there are those amongst men who desire freedom from death and get eternal life. They escape the slaughtering process by calling the controller of death, Yamaraja.

8. As long as Yamaraja, who causes everyone’s death, is present here, no one shall meet with death. The great sages have invited the controller of death, Yamaraja, who is the representative of the Lord. Living beings who are under his grip should take advantage by hearing the deathless nectar in the formof this narration of the transcendental pastimes of the Lord.

9. Lazy human beings with paltry intelligence and a short duration of life pass the night sleeping and the day performing activities that are for naught.

10. Suta Gosvami said: While Maharaja Pariksit was residing in the capital of the Kuru empire, the symptoms of the age of Kali began to infiltrate within the jurisdiction of his state. When he learned about this, he did not think the matter very palatable. This did, however, give him a chance to fight. He took up his bow and arrows and prepared himself for military activities.

11. Maharaja Pariksit sat on a chariot drawn by black horses. His flag was marked with the sign of a lion. Being so decorated and surrounded by charioteers, cavalry, elephants and infantry soldiers, he left the capital to conquer in all directions.

12. Maharaja Pariksit then conquered all parts of the earthly planet–Bhadrasva, Ketumala, Bharata, the northern Kuru, Kimpurusa, etc.–and exacted tributes from their respective rulers.

13-15. Wherever the King visited, he continuously heard the glories of his great forefathers, who were all devotees of the Lord, and also of the glorious acts of Lord Krishna. He also heard how he himself had been protected by the Lord from the powerful heat of the weapon of Asvatthama. People also mentioned the great affection between the descendants of Vrsni and Prtha due to the latter’s great devotion to Lord Kesava. The King, being very pleased with the singers of such glories, opened his eyes in great satisfaction. Out of magnanimity he was pleased to award them very valuable necklaces and clothing.

16. Maharaja Pariksit heard that out of His causeless mercy Lord Krishna [Vishnu], who is universally obeyed, rendered all kinds of service to the malleable sons of Pandu by accepting posts ranging from chariot driver to president to messenger, friend, night watchman, etc., according to the will of the Pandavas, obeying them like a servant and offering obeisances like one younger in years. When he heard this, Maharaja Pariksit became overwhelmed with devotion to the lotus feet of the Lord.

17. Now you may hear from me of what happened while Maharaja Pariksit was passing his days hearing of the good occupations of his forefathers and being absorbed in thought of them.

18. The personality of religious principles, Dharma, was wandering about in the form of a bull. And hemet the personality of earth in the form of a cow who appeared to grieve like a mother who had lost her child. She had tears in her eyes, and the beauty of her body was lost. Thus Dharma questioned the earth as follows.

19. Dharma [in the form of a bull] asked: Madam, are you not hale and hearty? Why are you covered with the shadow of grief? It appears by your face that you have become black. Are you suffering from some internal disease, or are you thinking of some relative who is away in a distant place?

20. I have lost my three legs and am now standing on one only. Are you lamenting for my state of existence? Or are you in great anxiety because henceforward the unlawful meat-eaters will exploit you? Or are you in a sorry plight because the demigods are now bereft of their share of sacrificial offerings because no sacrifices are being performed at present? Or are you grieving for living beings because of their sufferings due to famine and drought?

21. Are you feeling compunction for the unhappy women and children who are left forlorn by
unscrupulous persons? Or are you unhappy because the goddess of learning is being handled by brahmanas addicted to acts against the principles of religion? Or are you sorry to see that the brahmanas have taken shelter of administrative families that do not respect brahminical culture?

22. The so-called administrators are now  bewildered by the influence of this age of Kali, and thus they have put all state affairs into disorder. Are you now lamenting this disorder? Now the general populace does not follow the rules and regulations for eating, sleeping, drinking, mating, etc., and they are inclined to perform such anywhere and everywhere. Are you unhappy because of this?

23. O mother earth, the Supreme Personality of Godhead, Hari, incarnated Himself as Lord Sri Krishna just to unload your heavy burden. All His activities here are transcendental, and they cement the path of liberation. You are now bereft of His presence. You are probably now thinking of those activities and feeling sorry in their absence.

24. Mother, you are the reservoir of all riches. Please inform me of the root cause of your tribulations by which you have been reduced to such a weak state. I think that the powerful influence of time, which conquers the most powerful, might have forcibly taken away all your fortune, which was adored even by the demigods.

25. The earthly deity [in the form of a cow] thus replied to the personality of religious principles [in the form of a bull]: O Dharma, whatever you have inquired from me shall be known to you. I shall try to reply to all those questions. Once you too were maintained by your four legs, and you increased happiness all over the universe by the mercy of the Lord.

26-30. In Him reside (1) truthfulness, (2) cleanliness, (3) intolerance of another’s unhappiness, (4) the power to control anger, (5) self-satisfaction, (6) straightforwardness, (7) steadiness of mind, (8) control of the sense organs, (9) responsibility, (10) equality, (11) tolerance, (12) equanimity, (13) faithfulness, (14) knowledge, (15) absence of sense enjoyment, (16) leadership, (17) chivalry, (18) influence, (19) the power to make everything possible, (20) the discharge of proper duty, (21) complete  independence, (22) dexterity, (23) fullness of all beauty, (24) serenity, (25) kindheartedness, (26) ingenuity, (27) gentility, (28) magnanimity, (29) determination, (30) perfection in all knowledge, (31) proper execution, (32) possession of all objects of enjoyment, (33) joyfulness, (34) immovability, (35) fidelity, (36) fame, (37) worship, (38) pridelessness, (39) being (as the Personality of Godhead), (40) eternity, and many other transcendental qualities which are eternally present and never to be separated from Him. That Personality of Godhead, the reservoir of all goodness and beauty, Lord Sri Krishna, has now closed His transcendental pastimes on the face of the earth. In His absence the age of Kali has spread its influence everywhere, so I am sorry to see this condition of existence.

31. I am thinking about myself and also, O best amongst the demigods, about you, as well as about all the demigods, sages, denizens of Pitrloka, devotees of the Lord and all men obedient to the system of varna and asrama in human society.

32-33. Laksmiji, the goddess of fortune, whose glance of grace was sought by demigods like Brahma and for whom they surrendered many a day unto the Personality of Godhead, gave up her own abode in the forest of lotus flowers and engaged herself in the service of the lotus feet of the Lord. I wasendowed with specific powers to supersede the fortune of all the three planetary systems by being decorated with the  limpressions of the flag, thunderbolt, elephant-driving rod and lotus flower, which are signs of the lotus feet of the Lord. But at the end, when I felt I was so fortunate, the Lord left me.

34. O personality of religion, I was greatly overburdened by the undue military phalanxes arranged by atheistic kings, and I was relieved by the grace of the Personality of Godhead. Similarly you were also in a distressed condition, weakened in your standing strength, and thus He also incarnated by His internal energy in the family of the Yadus to relieve you.

35. Who, therefore, can tolerate the pangs of separation from that Supreme Personality of Godhead? He could conquer the gravity and passionate wrath of His sweethearts like Satyabhama by His sweet smile of love, pleasing glance and hearty appeals. When He traversed my [earth’s] surface, I would be immersed in the dust of His lotus feet and thus would be sumptuously covered with grass which appeared like hairs standing on me out of pleasure.

36. While the earth and the personality of religion were thus engaged in conversation, the saintly King Pariksit reached the shore of the Sarasvati River, which flowed towards the east.