श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – उन्नीसवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Nineteen

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – उन्नीसवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Nineteen

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: एकोनविंश अध्यायः

श्लोक 1-42

महाराज पृथु के सौ अश्वमेध यज्ञ

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! महाराज मनु के ब्रह्मावर्त क्षेत्र में, जहाँ सरस्वती नदी पूर्वमुखी होकर बहती है, राजा पृथु ने सौ अश्वमेध यज्ञों की दीक्षा ली। यह देखकर भगवान् इन्द्र को विचार हुआ कि इस प्रकार तो पृथु के कर्म मेरे कर्मों की अपेक्षा भी बढ़ जायेंगे। इसलिये वे उनके यज्ञमहोत्सव को सहन न कर सके। महाराज पृथु के यज्ञ में सबके अन्तरात्मा सर्वलोकपूज्य जगदीश्वर भगवान् हरि ने यज्ञेश्वर रूप से साक्षात् दर्शन दिया था। उनके साथ ब्रह्मा, रुद्र तथा अपने-अपने अनुचरों के सहित लोकपालगण भी पधारे थे। उस समय गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ प्रभु की कीर्ति गा रहे थे। सिद्ध, विद्याधर, दैत्य, दानव, यक्ष, सुनन्द-नन्दादि भगवान् के प्रमुख पार्षद और जो सर्वदा भगवान् की सेवा के लिये उत्सुक रहते हैं- वे कपिल, नारद, दत्तात्रेय एवं सनकादि योगेश्वर भी उनके साथ आये थे। भारत! उस यज्ञ में यज्ञसामग्रियों को देने वाली भूमि ने कामधेनुरूप होकर यजमान की सारी कामनाओं को पूर्ण किया था। नदियाँ दाख और ईख आदि सब प्रकार के रसों को बहा लाती थीं तथा जिनके मधु चूता रहता था- ऐसे बड़े-बड़े वृक्ष दूध, दही, अन्न और घृत आदि तरह-तरह की सामग्रियों समर्पण करते थे। समुद्र बहुत-सी रत्नराशियाँ, पर्वत भक्ष्य, भोज्य, चोष्य और लेह्य- चार प्रकार के अन्न तथा लोकपालों के सहित सम्पूर्ण लोक तरह-तरह के उपहार उन्हें समपर्ण करते थे। महाराज पृथु तो एकमात्र श्रीहरि को ही अपना प्रभु मानते थे। उनकी कृपा से उस यज्ञानुष्ठान में उनका बड़ा उत्कर्ष हुआ। किन्तु यह बात देवराज इन्द्र को सहन न हुई और उन्होंने उसमें विघ्न डालने की भी चेष्टा की। जिस समय महाराज पृथु अन्तिम यज्ञ द्वारा भगवान् यज्ञपति की आराधना कर रहे थे, इन्द्र ने ईर्ष्यावश गुप्तरूप से उनके यज्ञ का घोड़ा हर लिया। इन्द्र ने अपनी रक्षा के लिये कवचरूप से पाखण्ड वेष धारण कर लिया था, जो अधर्म में धर्म का भ्रम उत्पन्न करने वाला है- जिसका आश्रय लेकर पापी पुरुष भी धर्मात्मा-सा जान पड़ता है। इस वेष में वे घोड़े को लिये बड़ी शीघ्रता से आकाश मार्ग से जा रहे थे कि उन पर भगवान् अत्रि की दृष्टि पड़ गयी। उनके कहने से महाराज पृथु का महारथी पुत्र इन्द्र को मारने के लिये उनके पीछे दौड़ा और बड़े क्रोध से बोला, ‘अरे खड़ा रहा! खड़ा रह’। इन्द्र सिर पर जटाजूट और शरीर में भस्म धारण किये हुए थे। उनका ऐसा वेष देखकर पृथुकुमार ने उन्हें मूर्तिमान् धर्म समझा, इसलिये उन पर बाण नहीं छोड़ा। जब वह इन्द्र पर वार किये बिना ही लौट आया, तब महर्षि अत्रि ने पुनः उसे इन्द्र को मारने के लिये आज्ञा दी- ‘वत्स! इस देवताधम इन्द्र ने तुम्हारे यज्ञ में विघ्न डाला है, तुम इसे मार डालो’। अत्रि मुनि के इस प्रकार उत्साहित करने पर पृथुकुमार क्रोध में भर गया। इन्द्र बड़ी तेजी से आकाश में जा रहे थे। उनके पीछे वह इस प्रकार दौड़ा, जैसे रावण के पीछे जटायु। स्वर्गपति इन्द्र उसे पीछे आते देख, उस वेष और घोड़े को छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये और वह वीर अपना यज्ञपशु लेकर पिता की यज्ञशाला में लौट आया। शक्तिशाली विदुर जी! उसके इस अद्भुत पराक्रम को देखकर महर्षियों ने उसका नाम विजिताश्व रखा।

यज्ञपशु को चषाल और यूप में बाँध दिया गया था। शक्तिशाली इन्द्र ने घोर अन्धकार फैला दिया और उसी में छिपकर वे फिर उस घोड़े को उसकी सोने की जंजीर समेत ले गये। अत्रि मुनि ने फिर उन्हें आकाश में तेजी से जाते दिखा दिया, किन्तु उनके पास कपाल और खट्वांग देखकर पृथुपुत्र ने उनके मार्ग में कोई बाधा न डाली। तब अत्रि ने राजकुमार को फिर उकसाया और उसने गुस्से में भरकर इन्द्र को लक्ष्य बनाकर अपना बाण चढ़ाया। यह देखते ही देवराज उस वेष और घोडों को छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये। वीर विजिताश्व अपना घोड़ा लेकर पिता की यज्ञशाला में लौट गया। तब से इन्द्र के उस निन्दित वेष को मन्दबुद्धि पुरुषों ने ग्रहण कर लिया। इन्द्र ने अश्वहरण की इच्छा से जो-जो रूप धारण किये थे, वे पाप के खण्ड होने के कारण पाखण्ड कहलाये। यहाँ ‘खण्ड’ शब्द चिह्न का वाचक है। इस प्रकार पृथु के यज्ञ का विध्वंस करने के लिये यज्ञपशु चुराते समय इन्द्र ने जिन्हें कई बार ग्रहण करके त्यागा था, उन ‘नग्न’, ‘रक्ताम्बर’ तथा ‘कापालिक’ आदि पाखण्डपूर्ण आचारों में मनुष्यों की बुद्धि प्रायः मोहित हो जाती है; क्योंकि ये नास्तिकमत देखने में सुन्दर हैं और बड़ी-बड़ी युक्तियों से अपने पक्ष का समर्थन करते हैं। वास्तव में उपधर्ममात्र हैं। लोग भ्रमवश धर्म मानकर उनमें आसक्त हो जाते हैं।

इन्द्र की इस कुचाल का पता लगने पर परम पराक्रमी महाराज पृथु को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अपना धनुष उठाकर उस पर बाण चढ़ाया। उस समय क्रोधावेश के कारण उनकी ओर देखा नहीं जाता था। जब ऋत्विजों ने देखा कि असह्य पराक्रमी महाराज पृथु इन्द्र का वध करने को तैयार हैं, तब उन्हें रोकते हुए कहा, ‘राजन्! आप तो बड़े बुद्धिमान् हैं, यज्ञदीक्षा ले लेने पर शास्त्रविहित यज्ञपशु को छोड़कर और किसी का वध करना उचित नहीं है। इस यज्ञ कार्य में विघ्न डालने वाला आपका शत्रु इन्द्र तो आपके सुयश से ही ईर्ष्यावश निस्तेज हो रहा है। हम अमोघ आवाहन-मन्त्रों द्वारा उसे यहीं बुला लेते हैं और बलात् अग्नि में हवन किये देते हैं’।

विदुर जी! यजमान से इस प्रकार सलाह करके उसके याजकों ने क्रोधपूर्वक इन्द्र का आवाहन किया। वे स्रुवा द्वारा आहुति डालना ही चाहते थे कि ब्रह्मा जी ने वहाँ आकर उन्हें रोक दिया। वे बोले, ‘याजको! तुम्हें इन्द्र का वध नहीं करना चाहिये, यह यज्ञसंज्ञक इन्द्र तो भगवान् की ही मूर्ति है। तुम यज्ञ द्वारा जिन देवताओं की आराधना कर रहे हो, वे इन्द्र के ही तो अंग हैं और उसे तुम यज्ञ द्वारा मारना चाहते हो। पृथु के इस यज्ञानुष्ठान में विघ्न डालने के लिये इन्द्र ने जो पाखण्ड फैलाया है, वह धर्म का उच्छेदन करने वाला है। इस बात पर तुम ध्यान दो, अब उससे अधिक विरोध मत करो; नहीं तो वह और भी पाखण्ड मार्गों का प्रचार करेगा। अच्छा, परमयशस्वी महाराज पृथु के निन्यानबे ही यज्ञ रहने दो।’

फिर राजर्षि पृथु से कहा, ‘राजन्! आप तो मोक्षधर्म के जानने वाले हैं; अतः अब आपको इन यज्ञानुष्ठानों की आवश्यकता नहीं है। आपका मंगल हो! आप और इन्द्र-दोनों की पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीहरि के शरीर हैं; इसलिये अपने ही स्वरूपभूत इन्द्र के प्रति आपको क्रोध नहीं करना चाहिये। आपका यह यज्ञ निर्विघ्न समाप्त नहीं हुआ-इसके लिये आप चिन्ता न करें। हमारी बात आप आदरपूर्वक स्वीकार कीजिये। देखिये, जो मनुष्य विधाता के बिगाड़े हुए काम को बनाने का विचार करता है, उसका मन अत्यन्त क्रोध में भरकर भयंकर मोह में फँस जाता है। बस, इस यज्ञ को बंद कीजिये। इसी के कारण इन्द्र के चलाये हुए पाखण्डों से धर्म का नाश हो रहा है; क्योंकि देवताओं में बड़ा दुराग्रह होता है।

जरा देखिये तो, जो इन्द्र घोड़े को चुराकर आपके यज्ञ में विघ्न डाल रहा था, उसी के रचे हुए इन मनोहर पाखण्डों की ओर सारी जनता खिंचती चली जा रही है। आप साक्षात् विष्णु के अंश हैं। वेन के दुराचार से धर्म लुप्त हो रहा था, उस समयोचित धर्म की रक्षा के लिये ही आपने उसके शरीर से अवतार लिया है। अतः प्रजापालक पृथु जी! अपने इस अवतार का उद्देश्य विचार कर आप भृगु आदि विश्वरचयिता मुनीश्वरों का संकल्प पूर्ण कीजिये। यह प्रचण्ड पाखण्ड-पथरूप इन्द्र की माया अधर्म की जननी है। आप इसे नष्ट कर डालिये’।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- लोकगुरु भगवान् ब्रह्मा जी के इस प्रकार समझाने पर प्रबल पराक्रमी महराज पृथु ने यज्ञ का आग्रह छोड़ दिया और इन्द्र के साथ प्रीतिपूर्वक सन्धि भी कर ली। इसके पश्चात् जब वे यज्ञान्त स्नान करके निवृत्त हुए, तब उनके यज्ञों से तृप्त हुए देवताओं ने उन्हें अभीष्ट वर दिये। आदिराज पृथु ने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दक्षिणाएँ दीं तथा ब्राह्मणों ने उनके सत्कार से सन्तुष्ट होकर उन्हें अमोघ आशीर्वाद दिये। वे कहने लगे, ‘महाबाहो! आपके बुलाने से जो पितर, देवता, ऋषि और मनुष्यादि आये थे, उन सभी का आपने दान-मान से खूब सत्कार किया’।

Chapter Nineteen: King Prthu’s One Hundred Horse Sacrifices

1. The great sage Maitreya continued: My dear Vidura, King Prthu initiated the performance of one hundred horse sacrifices at the spot where the River Sarasvati flows towards the east. This piece of land is known as Brahmavarta, and it was controlled by Svayambhuva Manu.

2. When the most powerful Indra, the King of heaven, saw this, he considered the fact that King Prthu was going to exceed him in fruitive activities. Thus Indra could not tolerate the great sacrificial ceremonies performed by King Prthu.

3. The Supreme Personality of Godhead, Lord Visnu, is present in everyone’s heart as the Supersoul, and He is the proprietor of all planets and the enjoyer of the results of all sacrifices. He was personally present at the sacrifices made by King Prthu.

4. When Lord Vishnu appeared in the sacrificial arena, Lord Brahma, Lord Shiva and all the chief
predominating personalities of every planet, as well as their followers, came with Him. When He
appeared on the scene, the residents of Gandharvaloka, the great sages, and the residents of Apsaroloka all praised Him.

5. The Lord was accompanied by the residents of Siddhaloka and Vidyadhara-loka, all the descendants of Diti, and the demons and the Yaksas. He was also accompanied by His chief associates, headed by Sunanda and Nanda.

6. Great devotees, who were always engaged in the service of the Supreme Personality of Godhead, as well as the great sages named Kapila, Narada and Dattatreya, and masters of mystic powers, headed by Sanaka Kumara, all attended the great sacrifice with Lord Vishnu.

7. My dear Vidura, in that great sacrifice the entire land came to be like the milk-producing kama-dhenu, and thus, by the performance of yajna, all daily necessities for life were supplied.

8. The flowing rivers supplied all kinds of tastes–sweet, pungent, sour, etc.–and very big trees supplied fruit and honey in abundance. The cows, having eaten sufficient green grass, supplied profuse quantities of milk, curd, clarified butter and similar other necessities.

9. King Prthu was presented with various gifts from the general populace and predominating deities of all planets. The oceans and seas were full of valuable jewels and pearls, and the hills were full of chemicals and fertilizers. Four kinds of edibles were produced profusely.

10. King Prthu was dependent on the Supreme Personality of Godhead, who is known as Adhoksaja. Because King Prthu Performed so many sacrifices, he was superhumanly enhanced by the mercy of the Supreme Lord. King Prthu’s opulence, however, could not be tolerated by the King of heaven, Indra,who tried to impede the progress of his opulence.

11. When Prthu Maharaja was performing the last horse sacrifice [asvamedha-yajna], King Indra, invisible to everyone, stole the horse intended for sacrifice. He did this because of his great envy of King Prthu.

12. When King Indra was taking away the horse, he dressed himself to appear as a liberated person. Actually this dress was a form of cheating, for it falsely created an impression of religion. When Indra went into outer space in this way, the great sage Atri saw him and understood the whole situation.

13. When the son of King Prthu was informed by Atri of King Indra’s trick, he immediately became very angry and followed Indra to kill him, calling, “Wait! Wait!”

14. King Indra was fraudulently dressed as a sannyasi, having knotted his hair on his head and
smeared ashes all over his body. Upon seeing such dress, the son of King Prthu considered Indra a religious man and pious sannyasi. Therefore he did not release his arrows.

15. When Atri Muni saw that the son of King Prthu did not kill Indra but returned deceived by him, Atri Muni again instructed him to kill the heavenly King because he thought that Indra had become the lowliest of all demigods due to his impeding the execution of King Prthu’s sacrifice.

16. Being thus informed, the grandson of King Vena immediately began to follow Indra, who was fleeing through the sky in great haste. He was very angry with him, and he chased him just as the king of the vultures chased Ravana.

17. When Indra saw that the son of Prthu was chasing him, he immediately abandoned his false dress and left the horse. Indeed, he disappeared from that very spot, and the great hero, the son of Maharaja Prthu, returned the horse to his father’s sacrificial arena.

18. My dear Lord Vidura, when the great sages observed the wonderful prowess of the son of King Prthu, they all agreed to give him the name Vijitasva.

19. My dear Vidura, Indra, being the King of heaven and very powerful, immediately brought a dense darkness upon the sacrificial arena. Covering the whole scene in this way, he again took away the horse, which was chained with golden shackles near the wooden instrument where animals were sacrificed.

20. The great sage Atri again pointed out to the son of King Prthu that Indra was fleeing through the sky. The great hero, the son of Prthu, chased him again. But when he saw that Indra was carrying in his hand a staff with a skull at the top and was again wearing the dress of a sannyasi, he still chose not to kill him.

21. When the great sage Atri again gave directions, the son of King Prthu became very angry and placed an arrow on his bow. Upon seeing this, King Indra immediately abandoned the false dress of a sannyasi and, giving up the horse, made himself invisible.

22. Then the great hero, Vijitasva, the son of King Prthu, again took the horse and returned to his
father’s sacrificial arena. Since that time, certain men with a poor fund of knowledge have adopted the dress of a false sannyasi. It was King Indra who introduced this.

23. Whatever different forms Indra assumed as a mendicant because of his desire to seize the horse were symbols of atheistic philosophy.

24-25. In this way, King Indra, in order to steal the horse from King Prthu’s sacrifice, adopted several orders of sannyasa. Some sannyasis go naked, and sometimes they wear red garments and pass under the name of kapalika. These are simply symbolic representations of their sinful activities. These so-called sannyasis are very much appreciated by sinful men because they are all godless atheists and very expert in putting forward arguments and reasons to support their case. We must know, however, that they are only passing as adherents of religion and are not so in fact. Unfortunately, bewildered
persons accept them as religious, and being attracted to them, they spoil their life.

26. Maharaja Prthu, who was celebrated as very powerful, immediately took up his bow and arrows and prepared to kill Indra himself, because Indra had introduced such irregular sannyasa orders.

27. When the priests and all the others saw Maharaja Prthu very angry and prepared to kill Indra, they requested him: O great soul, do not kill him, for only sacrificial animals can be killed in a sacrifice. Such are the directions given by sastra.

28. Dear King, Indra’s powers are already reduced due to his attempt to impede the execution of your sacrifice. We shall call him by Vedic mantras which were never before used, and certainly he will come. Thus by the power of our mantra, we shall cast him into the fire because he is your enemy.

29. My dear Vidura, after giving the King this advice, the priests who had been engaged in performing the sacrifice called for Indra, the King of heaven, in a mood of great anger. When they were just ready to put the oblation in the fire, Lord Brahma appeared on the scene and forbade them to start the sacrifice.

30. Lord Brahma addressed them thus: My dear sacrificial performers, you cannot kill Indra, the King of heaven. It is not your duty. You should know that Indra is as good as the Supreme Personality of Godhead. Indeed, he is one of the most powerful assistants of the Personality of Godhead. You are trying to satisfy all the demigods by the performance of this yajna, but you should know that all these demigods are but parts and parcels of Indra, the King of heaven. How, then, can you kill him in this great sacrifice?

31. In order to make trouble and impede the performance of King Prthu’s great sacrifice, King Indra has adopted some means that in the future will destroy the clear path of religious life. I draw your attention to this fact. If you oppose him any further, he will further misuse his power and introduce many other irreligious systems.

32. “Let there be only ninety-nine sacrificial performances for Maharaja Prthu,” Lord Brahma concluded. Lord Brahma then turned towards Maharaja Prthu and informed him that since he was thoroughly aware of the path of liberation, what was the use in performing more sacrifices?

33. Lord Brahma continued: Let there be good fortune to both of you, for you and King Indra are both part and parcel of the Supreme Personality of Godhead. Therefore you should not be angry with King Indra, who is nondifferent from you.

34. My dear King, do not be agitated and anxious because your sacrifices have not been properly
executed due to providential impediments. Kindly take my words with great respect. We should always remember that if something happens by providential arrangement, we should not be very sorry. The more we try to rectify such reversals, the more we enter into the darkest region of materialistic thought.

35. Lord Brahma continued: Stop the performance of these sacrifices, for they have induced Indra to introduce so many irreligious aspects. You should know very well that even amongst the demigods there are many unwanted desires.

36. Just see how Indra, the King of heaven, was creating a disturbance in the midst of the sacrifice by stealing the sacrificial horse. These attractive sinful activities he has introduced will be carried out by the people in general.

37. O King Prthu, son of Vena, you are the part-and-parcel expansion of Lord Visnu. Due to the
mischievous activities of King Vena, religious principles were almost lost. At that opportune moment you descended as the incarnation of Lord Visnu. Indeed, for the protection of religious principles you have appeared from the body of King Vena.

38. O protector of the people in general, please consider the purpose of your being incarnated by Lord Vishnu. The irreligious principles created by Indra are but mothers of so many unwanted religions. Please therefore stop these imitations immediately.

39. The great sage Maitreya continued: When King Prthu was thus advised by the supreme teacher, Lord Brahma, he abandoned his eagerness to perform yajnas and with great affection concluded a peace with King Indra.

40. After this, Prthu Maharaja took his bath, which is customarily taken after the performance of a yajna, and received the benedictions and due blessings of the demigods, who were very pleased by his glorious activities.

41. With great respect, the original king, Prthu, offered all kinds of rewards to the brahmanas present at the sacrifice. Since all these brahmanas were very much satisfied, they gave their heartfelt blessings to the King.

42. All the great sages and brahmanas said: O mighty King, by your invitation all classes of living entities have attended this assembly. They have come from Pitrloka and the heavenly planets, and great sages as well as common men have attended this meeting. Now all of them are very much satisfied by your dealings and your charity towards them.

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श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – उन्नीसवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Nineteen

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: एकोनविंश अध्यायः

श्लोक 1-38  

हिरण्याक्ष वध

मैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! ब्रह्मा जी के कपटरहित अमृतमय वचन सुनकर भगवान् ने उनके भोलेपन पर मुसकराकर अपने प्रेमपूर्ण कटाक्ष के द्वारा उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। फिर उन्होंने झपटकर अपने सामने निर्भय विचरते हुए शत्रु की ठुड्डी पर गदा मारी। किन्तु हिरण्याक्ष की गदा से टकराकर वह गदा भगवान् के हाथ से छूट गयी और चक्कर काटती हुई जमीन पर गिरकर सुशोभित हुई। किंतु यह बड़ी अद्भुत-सी घटना हुई। उस समय शत्रु पर वार करने का अच्छा अवसर पाकर भी हिरण्याक्ष ने उन्हें निरस्त्र देखकर युद्ध धर्म का पालन करते हुए उन पर आक्रमण नहीं किया। उसने भगवान् का क्रोध बढ़ाने के लिये ही ऐसा किया था। गदा गिर जाने पर और लोगों का हाहाकार बंद हो जाने पर प्रभु ने उसकी धर्म बुद्धि की प्रशंसा की और अपने सुदर्शन चक्र का स्मरण किया। चक्र तुरंत ही उपस्थित होकर भगवान् के हाथ में घूमने लगा। किंतु वे अपने प्रमुख पार्षद दैत्यधम हिरण्याक्ष के साथ विशेष रूप से क्रीड़ा करने लगे। उस समय उनके प्रभाव को न जानने वाले देवताओं के ये विचित्र वचन सुनायी देने लगे- ‘प्रभो! आपकी जय हो; इसे और न खेलाइये, शीघ्र ही मार डालिये’। जब हिरण्याक्ष ने देखा कि कमल-दल-लोचन श्रीहरि उसके सामने चक्र लिये खड़े हैं, तब उसकी सारी इन्द्रियाँ क्रोध से तिलमिला उठीं और वह लम्बी साँसें लेता हुआ अपने दाँतों से होंठ चबाने लगा। उस समय वह तीखी दाढ़ों वाला दैत्य, अपने नेत्रों से इस प्रकार उनकी ओर घूरने लगा मानो वह भगवान् को भस्म कर देगा। उसने छलकर ‘ले अब तू नहीं बच सकता’ इस प्रकार ललकारते हुए श्रीहरि पर गदा से प्रहार किया। साधुस्वभाव विदुर जी! यज्ञमूर्ति श्रीवाराह भगवान् ने शत्रु के देखते-देखते लीला से ही अपने बायें पैर से उसकी वह वायु के समान वेग वाली गदा पृथ्वी पर गिरा दी और उससे कहा, ‘अरे दैत्य! तू मुझे जीतना चाहता है, इसलिये अपना शस्त्र उठा ले और एक बार फिर वार कर।’ भगवान् के इस प्रकार कहने पर उसने फिर गदा चलायी और बड़ी भीषण गर्जना करने लगा। गदा को अपनी ओर आते देखकर भगवान् ने, जहाँ खड़े थे वहीं से, उसे आते ही अनायास इस प्रकार पकड़ लिया, जैसे गरुड़ साँपिनी को पकड़ कर लें। अपने उद्यम को इस प्रकार व्यर्थ हुआ देख उस महादैत्य का घमंड ठंडा पड़ गया और उसका तेज नष्ट हो गया। अबकी बार भगवान् के देने पर उसने उस गदा को लेना न चाहा। किन्तु जिस प्रकार कोई ब्राह्मण के ऊपर निष्फल अभिचार (मारणादि प्रयोग) करे-मूठ आदि चलाये, वैसे ही उसने श्रीयज्ञपुरुष पर प्रहार करने के लिये एक प्रज्वलित अग्नि के समान लपलपाता हुआ त्रिशूल लिया। महाबली हिरण्याक्ष का अत्यन्त वेग से छोड़ा हुआ वह तेजस्वी त्रिशूल आकाश में बड़ी तेजी से चमकने लगा। तब भगवान् ने उसे अपनी तीखी धार वाले चक्र से इस प्रकार काट डाला, जैसे इन्द्र ने गरुड़ जी के छोड़े हुए तेजस्वी पंख को काट डाला था (एक बार गरुड़ जी अपनी माता विनता को सर्पों की माता कद्रू के दासीपन से मुक्त करने के लिये देवताओं के पास से अमृत छीन लाये थे। तब इन्द्र ने उनके ऊपर अपना वज्र छोड़ा। इन्द्र का वज्र कभी व्यर्थ नहीं जाता, इसलिये उसका मान रखने के लिये गरुड़ जी ने अपना एक पर गिरा दिया। उसे उस वज्र ने काट डाला)। भगवान् के चक्र से अपने त्रिशूल के बहुत-से टुकड़े हुए देखकर उसे बड़ा क्रोध हुआ। उसने पास आकर उनके विशाल वक्षःस्थल पर, जिस पर श्रीवत्स का चिह्न सुशोभित है, कसकर घूँसा मारा और फिर बड़े जोर से गरजकर अन्तर्धान हो गया।

विदुर जी! जैसे हाथी पर पुष्पमाला की चोट का कोई असर नहीं होता, उसी प्रकार उसके इस प्रकार घूँसा मारने से भगवान् आदिवराह तनिक भी टस-से-मस नहीं हुए। तब वह महामायावी दैत्य मायापति श्रीहरि पर अनेक प्रकार की मायाओं का प्रयोग करने लगा, जिन्हें देखकर सभी प्रजा बहुत डर गयी और समझने लगी कि अब संसार का प्रलय होने वाला है। बड़ी प्रचण्ड आँधी चलने लगी, जिसके कारण धूल से सब ओर अन्धकार छा गया। सब ओर से पत्थरों की वर्षा होने लगी, जो ऐसे जान पड़ते थे मानो किसी क्षेपण यन्त्र (गुलेल) से फेंके जा रहे हों। बिजली की चमचमाहट और कड़क के साथ बादलों के घिर आने से आकाश में सूर्य, चन्द्र आदि ग्रह छिप गये तथा उनसे निरन्तर पीब, केश, रुधिर, विष्ठा, मूत्र और हड्डियों की वर्षा होने लगी। विदुर जी! ऐसे-ऐसे पहाड़ दिखायी देने लगे, जो तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र बरसा रहे थे। हाथ में त्रिशूल लिये बाल खोले नंगी राक्षसियाँ दीखने लगीं। बहुत-से पैदल, घुड़सवार, रथी और हाथियों पर चढ़े सनिकों के साथ आततायी यक्ष-राक्षसों का ‘मारो-मारो, काटो-काटो’ ऐसा अत्यन्त क्रूर और हिंसामय कोलाहल सुनायी देने लगा। इस प्रकार प्रकट हुए उस आसुरी माया-जाल का नाश करने के लिये यज्ञमूर्ति भगवान् वराह ने अपना प्रिय सुदर्शन चक्र छोड़ा। उस समय अपने पति का कथन स्मरण हो आने से दिति का हृदय सहसा काँप उठा और उसके स्तनों से रक्त बहने लगा। अपना माया-जाल नष्ट हो जाने पर वह दैत्य फिर भगवान् के पास आया। उसने उन्हें क्रोध से दबाकर चूर-चूर करने की इच्छा से भुजाओं में भर लिया, किंतु देखा कि वे तो बाहर ही खड़े हैं। अब वह भगवान् को वज्र के समान कठोर मुक्कों से मारने लगा। तब इन्द्र ने जैसे वृत्रासुर पर प्रहार किया था, उसी प्रकार भगवान् ने उसकी कनपटी पर एक तमाचा मारा। विश्व विजयी भगवान् ने यद्यपि बड़ी उपेक्षा से तमाचा मारा था, तो भी उसकी चोट से हिरण्याक्ष का शरीर घूमने लगा, उसके नेत्र बाहर निकल आये तथा हाथ-पैर और बाल छिन्न-भिन्न हो गये और वह निष्प्राण होकर आँधी से उखड़े हुए विशाल वृक्ष के समान पृथ्वी पर गिर पड़ा। हिरण्याक्ष का तेज अब भी मलिन नहीं हुआ था। उस कराल दाढ़ों वाले दैत्य को दाँतों से होठ चबाते पृथ्वी पर पड़ा देख वहाँ युद्ध देखने के लिये आये हुए ब्रह्मादि देवता उसकी प्रशंसा करने लगे कि ‘अहो! ऐसी अलभ्य मृत्यु किसको मिल सकती है। अपनी मिथ्या उपाधि से छूटने के लिये जिनका योगिजन समाधियोग के द्वारा एकान्त में ध्यान करते हैं, उन्हीं के चरण-प्रहार उनका मुख देखते-देखते इस दैत्यराज ने अपना शरीर त्यागा। ये हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु भगवान् के ही पार्षद हैं। इन्हें शापवश यह अधोगति प्राप्त हुई है। अब कुछ जन्मों में ये फिर अपने स्थान पर पहुँच जायँगे’। देवता लोग कहने लगे- ‘प्रभो! आपको बारम्बार नमस्कार है। आप सम्पूर्ण यज्ञों का विस्तार करने वाले हैं तथा संसार की स्थिति के लिये शुद्धसत्त्वमय मंगलविग्रह प्रकट करते हैं। बड़े आनन्द की बात है कि संसार को कष्ट देने वाला यह दुष्ट दैत्य मारा गया। अब आपके चरणों की भक्ति के प्रभाव से हमें भी सुख-शान्ति मिल गयी।’ मैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इस प्रकार महापराक्रमी हिरण्याक्ष का वध करके भगवान् आदिवराह अपने अखण्ड आनन्दमय धाम को पधार गये। उस समय ब्रह्मादि देवता उनकी स्तुति कर रहे थे।

भगवान् अवतार लेकर जैसी लीलाएँ करते हैं और जिस प्रकार उन्होंने भीषण संग्राम में खिलौने की भाँति महापराक्रमी हिरण्याक्ष का वध कर डाला, मित्र विदुर जी! वह सब चरित्र जैसा मैंने गुरुमुख से सुना था, तुम्हें सुना दिया। सूत जी कहते हैं- शौनक जी! मैत्रेय जी के मुख से भगवान् की कथा सुनकर परमभागवत विदुर जी को बड़ा आनन्द हुआ। जब अन्य पवित्रकीर्ति और परमयशस्वी महापुरुषों का चरित्र सुनने से ही बड़ा आनन्द होता है, तब श्रीवत्सधारी भगवान् की ललितललाम लीलाओं की तो बात ही क्या है। जिस समय ग्राह के पकड़ने पर गजराज प्रभु के चरणों का ध्यान करने लगे और उनकी हथिनियाँ दुःख से चिग्घाड़ने लगीं, उस समय जिन्होंने उन्हें तत्काल दुःख से छुड़ाया और जो सब ओर से निराश होकर अपनी शरण में आये हुए सरल हृदय भक्तों से सहज में ही प्रसन्न हो जाते हैं, किंतु दुष्ट पुरुषों के लिये अत्यन्त दुराराध्य हैं-उन पर जल्दी प्रसन्न नहीं होते, उन प्रभु के उपकारों को जानने वाला कौन ऐसा पुरुष है, जो उनका सेवन न करेगा? शौनकादि ऋषियों! पृथ्वी का उद्धार करने के लिये वराहरूप धारण करने वाले श्रीहरि की इस हिरण्याक्ष-वध नामक परम अद्भुत लीला को जो पुरुष सुनता, गाता अथवा अनुमोदन करता है, वह ब्रह्महत्या-जैसे घोर पाप से भी सहज में ही छूट जाता हैं। यह चरित्र अत्यन्त पुण्यप्रद परमपवित्र, धन और यश की प्राप्ति कराने वाला तथा आयुवर्धक और कामनाओं की पूर्ति करने वाला तथा युद्ध में प्राण और इन्द्रियों की शक्ति बढ़ाने वाला है। जो लोग इसे सुनते हैं, उन्हें अन्त में श्रीभगवान् का आश्रय प्राप्त होता है।

Chapter Nineteen: The Killing of the Demon Hiranyaksa

1. Sri Maitreya said: After hearing the words of Brahma, the creator, which were free from all sinful purposes and as sweet as nectar, the Lord heartily laughed and accepted his prayer with a glance laden with love.

2. The Lord, who had appeared from the nostril of Brahma, sprang and aimed His mace at the chin of his enemy, the Hiranyaksa demon, who was stalking fearlessly before Him.

3. Struck by the demon’s mace, however, the Lord’s mace slipped from His hand and looked splendid as it fell down whirling. This was miraculous, for the mace was blazing wonderfully.

4. Even though the demon had an excellent opportunity to strike his unarmed foe without obstruction, he respected the law of single combat, thereby kindling the fury of the Supreme Lord.

5. As the Lord’s mace fell to the ground and a cry of alarm arose from the witnessing crowd of gods and risis, the Personality of Godhead acknowledged the demon’s love of righteousness and therefore invoked His Sudarsana discus.

6. As the discus began to revolve in the Lord’s hands and the Lord contended at close quarters with the chief of His Vaikuntha attendants, who had been born as Hiranyaksa, a vile son of Diti, there issued from every direction strange expressions uttered by those who were witnessing from airplanes. They had no knowledge of the Lord’s reality, and they cried, “May victory attend You! Pray dispatch him. Play
no more with him.”

7. When the demon saw the Personality of Godhead, who had eyes just like lotus petals, standing in position before him, armed with His Sudarsana discus, his senses were overpowered by indignation. He began to hiss like a serpent, and he bit his lip in great resentment.

8. The demon, who had fearful tusks, stared at the Personality of Godhead as though to burn Him. Springing into the air, he aimed his mace at the Lord, exclaiming at the same time, “You are slain!”

9. O saintly Vidura, while His enemy looked on, the Lord in His boar form, the enjoyer of all sacrificial offerings, playfully knocked down the mace with His left foot, even as it came upon Him with the force of a tempest.

10. The Lord then said: “Take up your weapon and try again, eager as you are to conquer Me.”
Challenged in these words, the demon aimed his mace at the Lord and once more loudly roared.

11. When the Lord saw the mace flying toward Him, He stood firmly where He was and caught it with the same ease as Garuda, the king of birds, would seize a serpent.

12. His valor thus frustrated, the great demon felt humiliated and was put out of countenance. He was reluctant to take back the mace when it was offered by the Personality of Godhead.

13. He now took a trident which was as rapacious as a flaming fire and hurled it against the Lord, the enjoyer of all sacrifices, even as one would use penance for a malevolent purpose against a holy brahmana.

14. Hurled by the mighty demon with all his strength, the flying trident shone brightly in the sky. The Personality of Godhead, however, tore it to pieces with His discus Sudarsana, which had a sharp-edged rim, even as Indra cut off a wing of Garuda.

15. The demon was enraged when his trident was cut to pieces by the discus of the Personality of Godhead. He therefore advanced toward the Lord and, roaring aloud, struck his hard fist against the Lord’s broad chest, which bore the mark of Srivatsa. Then he went out of sight.

16. Hit in this manner by the demon, O Vidura, the Lord, who had appeared as the first boar, did not feel the least quaking in any part of His body, any more than an elephant would when struck with a wreath of flowers.

17. The demon, however, employed many conjuring tricks against the Personality of Godhead, who is the Lord of yogamaya. At the sight of this the people were filled with alarm and thought that the dissolution of the universe was near.

18. Fierce winds began to blow from all directions, spreading darkness occasioned by dust and hail storms; stones came in volleys from every corner, as if thrown by machine guns.

19. The luminaries in outer space disappeared due to the sky’s being overcast with masses of clouds, which were accompanied by lightning and thunder. The sky rained pus, hair, blood, stool, urine and bones.

20. O sinless Vidura, mountains discharged weapons of various kinds, and naked demonesses armed with tridents appeared with their hair hanging loose.

21. Cruel and savage slogans were uttered by hosts of ruffian Yaksas and Raksasas, who all either marched on foot or rode on horses, elephants or chariots.

22. The Lord, the personal enjoyer of all sacrifices, now discharged His beloved Sudarsana, which was capable of dispersing the magical forces displayed by the demon.

23. At that very moment, a shudder suddenly ran through the heart of Diti, the mother of Hiranyaksa. She recalled the words of her husband, Kasyapa, and blood flowed from her breasts.

24. When the demon saw his magic forces dispelled, he once again came into the presence of the Personality of Godhead, Kesava, and, full of rage, tried to embrace Him within his arms to crush Him. But to his great amazement he found the Lord standing outside the circle of his arms.

25. The demon now began to strike the Lord with his hard fists, but Lord Adhoksaja slapped him in the root of the ear, even as Indra, the lord of the Maruts, hit the demon Vrtra.

26. Though struck indifferently by the Lord, the conqueror of all, the demon’s body began to wheel. His eyeballs bulged out of their sockets. His arms and legs broken and the hair on his head scattered, he fell down dead, like a gigantic tree uprooted by the wind.

27. Aja [Brahma] and others arrived on the spot to see the fearfully tusked demon lying on the ground, biting his lip. The glow of his face was yet unfaded, and Brahma admiringly said: Oh, who could meet such blessed death?

28. Brahma continued: He was struck by a forefoot of the Lord, whom yogis, seeking freedom from their unreal material bodies, meditate upon in seclusion in mystic trance. While gazing on His countenance, this crest jewel of Diti’s sons has cast off his mortal coil.

29. These two personal assistants of the Supreme Lord, having been cursed, have been destined to take birth in demoniac families. After a few such births, they will return to their own positions.

30. The demigods addressed the Lord: All obeisances unto You! You are the enjoyer of all sacrifices, and You have assumed the form of a boar, in pure goodness, for the purpose of maintaining the world. Fortunately for us, this demon, who was a torment to the worlds, has been slain by You, and we too, O Lord, are now at ease, in devotion to Your lotus feet.

31. Sri Maitreya continued: After thus killing the most formidable demon Hiranyaksa, the Supreme Lord Hari, the origin of the boar species, returned to His own abode, where there is always an uninterrupted festival. The Lord was praised by all the demigods, headed by Brahma.

32. Maitreya continued: My dear Vidura, I have explained to you the Personality of Godhead’s coming down as the first boar incarnation and killing in a great fight a demon of unprecedented prowess as if he were just a plaything. This has been narrated by me as I heard it from my predecessor spiritual master.

33. Sri Suta Gosvami continued: My dear brahmana, Ksatta [Vidura] the great devotee of the Lord achieved transcendental bliss by hearing the narration of the pastimes of the Supreme Personality of Godhead from the authoritative source of the sage Kausarava [Maitreya], and he was very pleased.

34. What to speak of hearing the pastimes of the Lord, whose chest is marked with Srivatsa, people may take transcendental pleasure even in hearing of the works and deeds of the devotees, whose fame is immortal.

35. The Personality of Godhead delivered the king of the elephants, who was attacked by an alligator and who meditated upon the lotus feet of the Lord. At that time the female elephants who accompanied him were crying, and the Lord saved them from the impending danger.

36. What grateful soul is there who would not render his loving service to such a great master as the Personality of Godhead? The Lord can be easily pleased by spotless devotees who resort exclusively to Him for protection, though the unrighteous man finds it difficult to propitiate Him.

37. O brahmanas, anyone who hears, chants, or takes pleasure in the wonderful narration of the killing of the Hiranyaksa demon by the Lord, who appeared as the first boar in order to deliver the world, is at once relieved of the results of sinful activities, even the killing of a brahmana.

38. This most sacred narrative confers extraordinary merit, wealth, fame, longevity, and all the objects of one’s desire. On the field of battle it promotes the strength of one’s vital organs and organs of action. One who listens to it at the last moment of his life is transferred to the supreme abode of the Lord, O dear Saunaka.

श्रीमद्भागवत – प्रथम स्कंध – उन्नीसवाँ अध्याय

श्रीमद्भागवत – प्रथम स्कंध – उन्नीसवाँ अध्याय

परीक्षित का अनशनव्रत और शुकदेव जी का आगमन

सूत उवाच
महीपतिस्त्वथ तत्कर्म गर्ह्यं विचिन्तयन्नात्मकृतं सुदुर्मनाः
अहो मया नीचमनार्यवत्कृतं निरागसि ब्रह्मणि गूढतेजसि 1

सूतजी कहते है —– राजधानी में पहुँचने पर राजा परीक्षित को अपने उस निन्दनीय कर्म के लिये  बड़ा पश्चात्ताप हुआ। वे अत्यन्त  उदास हो गये और सोचने लगे — ‘मैंने निरपराध एवं अपना तेज़ छिपाये हुए ब्राह्मण के साथ अनार्य पुरुषों के समान बड़ा नीच व्यवहार किया। यह बड़े खेद की बात है ।।1।।

ध्रुवं ततो मे कृतदेवहेलनाद्दुरत्ययं व्यसनं नातिदीर्घात्
तदस्तु कामं ह्यघनिष्कृताय मे यथा न कुर्यां पुनरेवमद्धा 2

अवश्य ही उन महात्मा के अपमान के फलस्वरूप शीघ्र मुझपर कोई घोर विपत्ति आवेगी। मैं भी ऐसा ही चाहता हूँ; क्योंकि उससे मेरे पाप का प्रायश्चित हो जायेगा और फिर कभी मैं ऐसा काम करने का दुःसाहस नही करूँगा ।।2।।

अद्यैव राज्यं बलमृद्धकोशं प्रकोपितब्रह्मकुलानलो मे
दहत्वभद्रस्य पुनर्न मेऽभूत्पापीयसी धीर्द्विजदेवगोभ्यः 3
     

ब्राह्मणों की क्रोधाग्नि आज ही मेरे राज्य,सेना और भरे -पूरे खजाने को जलाकर खाक कर दे — जिससे फिर कभी मुझ दुष्टकी ब्राह्मण ,देवता और गौओं के प्रति ऐसी पापबुद्धि न हो ।।3।।

स चिन्तयन्नित्थमथाशृणोद्यथा मुनेः सुतोक्तो निरृतिस्तक्षकाख्यः
स साधु मेने न चिरेण तक्षका नलं प्रसक्तस्य विरक्तिकारणम् 4

वे इस प्रकार चिन्ता  कर ही रहे थे कि उन्हें मालूम हुआ —ऋषिकुमार के शाप से तक्षक मुझे डसेगा। उन्हें वह धधकती हुई आग के समान तक्षक का डसना बहुत भला मालूम हुआ। उन्होने सोचा कि बहुत दिनों से मैं संसार में आसक्त हो रहा था, अब मुझे शीघ्र वैराग्य होने का कारण प्राप्त हो गया ।।4।।

अथो विहायेमममुं च लोकं विमर्शितौ हेयतया पुरस्तात्
कृष्णाङ्घ्रिसेवामधिमन्यमान उपाविशत्प्रायममर्त्यनद्याम् 5

वे इस लोक और परलोक के भोगों को तो पहले से ही तुच्छ और त्याज्य समझते थे। अब उनका स्वरुपतः त्याग करके भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों की सेवा को ही सर्वोपरी मानकर आमरण अनशनव्रत लेकर वे गंगातट पर बैठ गये ।।5।।

या वै लसच्छ्रीतुलसीविमिश्र कृष्णाङ्घ्रिरेण्वभ्यधिकाम्बुनेत्री
पुनाति लोकानुभयत्र सेशान्कस्तां न सेवेत मरिष्यमाणः 6

गंगाजी का जल भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों का वह प्राग लेकर प्रवाहित होता है, जो श्रीमती तुलसी की गन्ध से मिश्रित है। यही कारण है कि वे लोकपालों के सहित ऊपर -नीचे के समस्त लोकों को पवित्र करती हैं। कौन ऐसा मरणासन्न पुरुष होगा, जो उनका सेवन न करेगा ? ।।6।।

इति व्यवच्छिद्य स पाण्डवेयः प्रायोपवेशं प्रति विष्णुपद्याम्
दधौ मुकुन्दाङ्घ्रिमनन्यभावो मुनिव्रतो मुक्तसमस्तसङ्गः 7

इस प्रकार गंगाजी के तटपर आमरण अनशन का निश्चय करके उन्होंने समस्त आसक्तियों का परित्याग कर दिया और वे मुनियों का व्रत स्वीकार करके अनन्यभाव से श्रीकृष्ण चरणकमलों का ध्यान करने लगे।।7।।

तत्रोपजग्मुर्भुवनं पुनाना महानुभावा मुनयः सशिष्याः
प्रायेण तीर्थाभिगमापदेशैः स्वयं हि तीर्थानि पुनन्ति सन्तः 8

उस समय त्रिलोकी को पवित्र करनेवाले बड़े -बड़े महानुभाव ऋषि-मुनि अपने शिष्यों के साथ वहाँ पधारे। संतजन प्रायः तीर्थयात्रा के बहाने स्वयं उन तीर्थस्थानों को ही पवित्र करते हैं।।8।।

अत्रिर्वसिष्ठश्च्यवनः शरद्वानरिष्टनेमिर्भृगुरङ्गिराश्च
पराशरो गाधिसुतोऽथ राम उतथ्य इन्द्रप्रमदेध्मवाहौ 9
मेधातिथिर्देवल आर्ष्टिषेणो भारद्वाजो गौतमः पिप्पलादः
मैत्रेय और्वः कवषः कुम्भयोनिर्द्वैपायनो भगवान्नारदश्च 10
अन्ये च देवर्षिब्रह्मर्षिवर्या राजर्षिवर्या अरुणादयश्च
नानार्षेयप्रवरान्समेतानभ्यर्च्य राजा शिरसा ववन्दे 11

उस समय वहाँ पर अत्रि,वसिष्ठ,च्यवन,शरद्वान,अरिष्टनेमि, भृगु,अंगिरा,पराशर,विश्वामित्र,परशुराम, उतथ्य,इन्द्रप्रमद,इध्मवाह,मेधातिथि,देवल,आर्ष्टिषेण भरद्वाज,गौतम,पिप्पलाद,मैत्रेय,और्व,कवष,अगस्त्य,भगवान् व्यास,नारद तथा इनके अतिरिक्त और भी कई श्रेष्ठ देवर्षि, ब्रह्मर्षि तथा अरुणादि राजर्षिवर्यों का शुभागमन हुआ। इस प्रकार विभिन्न गोत्रों के मुख्य -मुख्य ऋषियों को एकत्र देखकर राजा ने सबका यथायोग्य सत्कार किया और उनके चरणों पर सिर  रखकर वन्दना की ।।9-11।।

सुखोपविष्टेष्वथ तेषु भूयः कृतप्रणामः स्वचिकीर्षितं यत्
विज्ञापयामास विविक्तचेता उपस्थितोऽग्रेऽभिगृहीतपाणिः 12

जब सब लोग आराम से अपने -अपने आसनों पर बैठ गये , तब महाराज परीक्षित ने उन्हें फिर से प्रणाम किया और उनके सामने खड़े होकर शुद्ध हृदय से अंजलि बाँधकर वे जो कुछ करना चाहते थे, उसे सुनाने लगे ।।12।।

राजोवाच
अहो वयं धन्यतमा नृपाणां महत्तमानुग्रहणीयशीलाः
राज्ञां कुलं ब्राह्मणपादशौचाद्दूराद्विसृष्टं बत गर्ह्यकर्म 13

राजा परीक्षित ने कहा —– अहो ! समस्त राजाओं में हम धन्य हैं। धन्य्तम हैं। क्योंकि अपने शील -स्वाभाव के कारण हम आप महापुरुषों के कृपापात्र बन गये हैं। राजवंश के लोग प्रायः निन्दित कर्म करने के कारण ब्राह्मणों के चरण -धोवन से दूर पड़ जाते हैं— कितने खेद की बात है ।। 13।।

तस्यैव मेऽघस्य परावरेशो व्यासक्तचित्तस्य गृहेष्वभीक्ष्णम्
निर्वेदमूलो द्विजशापरूपो यत्र प्रसक्तो भयमाशु धत्ते 14

मैं भी राजा ही हूँ। निरन्तर देह -गेह  में आसक्त रहने के कारण मैं भी पापरूप ही हो गया हूँ।इसी से स्वयं भगवान् ही ब्राह्मण के शाप वैराग्य उत्पन्न करनेवाला है। क्योंकि इस प्रकार के शाप से संसारासक्त पुरुष भयभीत होकर विरक्त हो जाया करते हैं ।।14।।

तं मोपयातं प्रतियन्तु विप्रा गङ्गा च देवी धृतचित्तमीशे
द्विजोपसृष्टः कुहकस्तक्षको वा दशत्वलं गायत विष्णुगाथाः 15

ब्राह्मणों ! अब मैंने अपने चित्त को भगवान् के चरणों में समर्पित कर दिया है। आपलोग और माँ गंगाजी शरणागत जानकार मुझपर अनुग्रह करें, ब्राह्मणकुमार के शाप से प्रेरित कोई दूसरा कपट से तक्षक का रूप धरकर मुझे डस ले; इसकी मुझे तनिक भी परवा नहीं है। आपलोग कृपा करके भगवान् की रसमयी लीलाओं का गायन करें ।।15।।

पुनश्च भूयाद्भगवत्यनन्ते रतिः प्रसङ्गश्च तदाश्रयेषु
महत्सु यां यामुपयामि सृष्टिं मैत्र्यस्तु सर्वत्र नमो द्विजेभ्यः 16

मैं आप ब्राह्मणों के चरणों में प्रणाम करके पुनः यही प्रार्थना करता हूँ कि मुझे कर्मवश चाहे जिस योनि में जन्म लेना पड़े, भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में मेरा अनुराग हो उनके चरणाश्रित महात्माओं से विशेष प्रीति हो और जगत के समस्त प्राणियों के प्रति मेरी एक -सी मैत्री रहे। ऐसा आप आशीर्वाद दीजिये ।।16।।

इति स्म राजाध्यवसाययुक्तः प्राचीनमूलेषु कुशेषु धीरः
उदङ्मुखो दक्षिणकूल आस्ते समुद्रपत्न्याः स्वसुतन्यस्तभारः 17

महाराज परीक्षित परमधीर थे। वे ऐसा दृढ निश्चय करके गंगाजी दे दक्षिण तटपर पूर्वाग्र कुशों के आसनपर उत्तरमुख होकर बैठ गये। राज -काज का भर तो उन्होंने पहले ही अपने पुत्र जनमेजय को सौंप दिया था ।।17।।

एवं च तस्मिन्नरदेवदेवे प्रायोपविष्टे दिवि देवसङ्घाः
प्रशस्य भूमौ व्यकिरन्प्रसूनैर्मुदा मुहुर्दुन्दुभयश्च नेदुः 18
     

पृथ्वी के एकच्छत्र सम्राट परीक्षित जब इस प्रकार आमरण अनशन का निश्चय करके बैठ गये, तब आकाश में स्थित देव्तालोग बड़े आनन्द से उनकी प्रशंसा करते हुए वहाँ पृथ्वी पर पुष्पों की वर्षा करने लगे तथा उनके नगारे बार -बार बजने लगे ।।18।।

महर्षयो वै समुपागता ये प्रशस्य साध्वित्यनुमोदमानाः
ऊचुः प्रजानुग्रहशीलसारा यदुत्तमश्लोकगुणाभिरूपम् 19

सभी उपस्थित महर्षियों ने परीक्षित के निश्चय की प्रशंसा की और ‘साधु -साधु ‘कहकर उनका अनुमोदन किया। ऋषिलोग तो स्वाभाव से ही लोगों पर अनुग्रह की वर्षा करते रहते हैं; यही नहीं, उनकी साडी शक्ति लोकपर कृपा करने के लिए ही होती है। उन लोगों ने भगवान् श्रीकृष्ण के गुणों से प्रभावित परीक्षित के प्रति उनके अनुरूप वचन कहे ।।19।।

न वा इदं राजर्षिवर्य चित्रं भवत्सु कृष्णं समनुव्रतेषु 
येऽध्यासनं राजकिरीटजुष्टं सद्यो जहुर्भगवत्पार्श्वकामाः 20

‘राजर्षिशिरोमणे ! भगवान् श्रीकृष्ण के सेवक और अनुयायी आप पाण्डुवंशियों के लिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है; क्योकि आपलोगों ने भगवान् की सन्निधि प्राप्त करने की आकांक्षा से उस राजसिंहासन का एक क्षण में ही परित्याग कर दिया, जिसकी सेवा बड़े -बड़े राजा अपने मुकुटों से करते थे ।। 20।।

सर्वे वयं तावदिहास्महेऽथ कलेवरं यावदसौ विहाय
लोकं परं विरजस्कं विशोकं यास्यत्ययं भागवतप्रधानः 21

हम सब तबतक यहीं रहेंगे, जबतक ये भगवान् के परम भक्त परीक्षित अपने नश्वर शरीर को छोड़कर मायादोष एवं शोक से रहित भगवद्धाम में नहीं चले जाते’ ॥21॥

आश्रुत्य तदृषिगणवचः परीक्षित्समं मधुच्युद्गुरु चाव्यलीकम्
आभाषतैनानभिनन्द्य युक्तान्शुश्रूषमाणश्चरितानि विष्णोः 22

ऋषियों के  वचन बड़े ही मधुर,गम्भीर,सत्य और समता से युक्त थे। उन्हें सुनकर राजा परीक्षित ने उन योगयुक्त मुनियों का अभिनन्दन किया और भगवान् के मनोहर चरित्र सुनने की इच्छा से ऋषियों से प्रार्थना की ।।22।।

समागताः सर्वत एव सर्वे वेदा यथा मूर्तिधरास्त्रिपृष्ठे
नेहाथ नामुत्र च कश्चनार्थ ऋते परानुग्रहमात्मशीलम् 23

‘महात्माओं ! आप सभी सब ओर से यहाँ पधारे हैं। आप सत्यलोक में रहनेवाले मूर्तिमान वेदों के समान हैं। आपलोगों का दूसरों पर अनुग्रह करने के अतिरिक्त, जो आपका सहज स्वभाव ही है, इस लोक या परलोक में और कोई स्वार्थ नहीं है ।।23।।

ततश्च वः पृच्छ्यमिमं विपृच्छे विश्रभ्य विप्रा इति कृत्यतायाम्
सर्वात्मना म्रियमाणैश्च कृत्यं शुद्धं च तत्रामृशताभियुक्ताः 24

विप्रवरो ! आपलोगों पर पूर्ण विश्वास करके मैं अपने कर्तव्य के सम्बन्ध में यह पूछने योग्य प्रश्न करता हूँ। आप सभी विद्वान परस्पर विचार करके बतलाइये कि सबके लिये सब अवस्थाओं में और विशेष करके थोड़े ही समय में मरनेवाले पुरुषों के लिये अन्तःकरण और शरीर से करनेयोग्य विशुद्ध कर्म कौन -सा हैं ।। 24।।

तत्राभवद्भगवान्व्यासपुत्रो यदृच्छया गामटमानोऽनपेक्षः
अलक्ष्यलिङ्गो निजलाभतुष्टो वृतश्च बालैरवधूतवेषः 25

उसी समय पृथ्वी पर स्वेच्छा से विचरण करते हुए, किसी की कोई उपेक्षा न रखनेवाले व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजी महाराज वहाँ प्रकट हो गये। वे वर्ण अथवा आश्रम के बाह्य चिह्नों से रहित एवं आत्मानुभूति में संतुष्ट थे। बच्चों और स्त्रियों ने उन्हें घेर रखा था उनका वेष अवधूत का था ।।25।।

तं द्व्यष्टवर्षं सुकुमारपाद करोरुबाह्वंसकपोलगात्रम् 
चार्वायताक्षोन्नसतुल्यकर्ण सुभ्र्वाननं कम्बुसुजातकण्ठम् 26

सोलह वर्ष की अवस्था था। चरण,हाथ,जंघा,भुजाएँ,कंधे,कपोल और अन्य सब अंग अत्यन्त सुकुमार थे। नेत्र बड़े -बड़े और मनोहर थे। नासिका कुछ ऊँची थी। कान बराबर थे। सुंदर भौंहें थीं, इनसे मुख बड़ा ही शोभायमान हो रहा थे। गला तो मानो सुन्दर शंख ही था ।।26।।

निगूढजत्रुं पृथुतुङ्गवक्षसमावर्तनाभिं वलिवल्गूदरं च  
दिगम्बरं वक्त्रविकीर्णकेशं प्रलम्बबाहुं स्वमरोत्तमाभम् 27

हँसली ढकी हुई, छाती चौड़ी और उभरी हुई, नाभि भँवर के समान गहरी तथा उदर बड़ा ही सुंदर,त्रिवली से युक्त था। लम्बी -लम्बी भुजाएँ थीं , मुखपर घुँघराले  बाल बिखरे हुए थे। इस दिगम्बर वेष में वे श्रेष्ट देवता के समान तेजस्वी जान पड़ते थे ।।27।।

श्यामं सदापीव्यवयोऽङ्गलक्ष्म्या स्त्रीणां मनोज्ञं रुचिरस्मितेन
प्रत्युत्थितास्ते मुनयः स्वासनेभ्यस्तल्लक्षणज्ञा अपि गूढवर्चसम् 28

श्याम रंग था। चित्त को चुरानेवाली भरी जवानी थी। वे शरीर की छटा और मधुर मुस्कान से स्त्रियों को सदा ही मनोहर जान पड़ते थे। यद्यपि उन्होंने अपने तेज को छिपा रखा था, फिर भी उनके लक्षण जाननेवाले मुनियों ने उन्हें पहचान लिया और वे सब -के-सब अपने-अपने आसन छोड़कर उनके सम्मान के लिये उठ खड़े हुए ।।28।।

स विष्णुरातोऽतिथय आगताय तस्मै सपर्यां शिरसाजहार
ततो निवृत्ता ह्यबुधाः स्त्रियोऽर्भका महासने सोपविवेश पूजितः 29

राजा परीक्षित ने अतिथिरूप से पधारे हुए श्रीशुकदेवजी को सिर झुककर प्रणाम किया और उनकी पूजा की। उनके स्वरुप को न जाननेवाले बच्चे और स्त्रियाँ उनकी यह महिमा देखकर वहाँ से लौट गये; सबके द्वारा सम्मानित होकर श्रीशुकदेवजी श्रेष्ठ आसन पर विराजमान हुए ।।29।।

स संवृतस्तत्र महान्महीयसां ब्रह्मर्षिराजर्षिदेवर्षिसङ्घैः
व्यरोचतालं भगवान्यथेन्दुर्ग्रहर्क्षतारानिकरैः परीतः 30

ग्रह,नक्षत्र और तारों से घिरे हुए चन्द्रमा के समान ब्रह्मर्षि,देवर्षि और राजर्षियों के समूह से आवृत श्रीशुकदेवजी जी अत्यन्त शोभायमान हुए। वास्तव में वे महात्माओं के भी आदरणीय थे ।।30।।

प्रशान्तमासीनमकुण्ठमेधसं मुनिं नृपो भागवतोऽभ्युपेत्य
प्रणम्य मूर्ध्नावहितः कृताञ्जलिर्नत्वा गिरा सूनृतयान्वपृच्छत् 31

जब प्रखरबुद्धि श्रीशुकदेवजी शान्तभाव से बैठ गये, तब भगवान् के परम भक्त परीक्षित ने उनके समीप आकर और चरणों पर सिर रखकर प्रणाम किया। फिर खड़े होकर हाथ जोड़कर नमस्कार किया। उसके पश्चात् बड़ी मधुर वाणी से उनसे यह पूछा ।।31।।

परीक्षिदुवाच 
अहो अद्य वयं ब्रह्मन्सत्सेव्याः क्षत्रबन्धवः
कृपयातिथिरूपेण भवद्भिस्तीर्थकाः कृताः 32

परीक्षित ने कहा —– ब्रह्मस्वरूप भगवन ! आज हम बडभागी हुए ; क्योंकि अपराधी क्षत्रिय होने पर भी हमें संत -समागम का अधिकारी समझा गया। आज कृपापूर्वक अतिथिरूप से पधारकर आपने हमें तीर्थ के तुल्य पवित्र बना दिया ।।32।।

येषां संस्मरणात्पुंसां सद्यः शुद्ध्यन्ति वै गृहाः
किं पुनर्दर्शनस्पर्श पादशौचासनादिभिः 33

आप -जैसे महात्माओं के स्मरणमात्र से ही गृहस्थो के घर तत्काल पवित्र हो जाते है;फिर दर्शन,स्पर्श, पादप्रक्षालन और आसन -दानादि का सुअवसर मिलनेपर तो कहना ही क्या है ।।33।।

सान्निध्यात्ते महायोगिन्पातकानि महान्त्यपि
सद्यो नश्यन्ति वै पुंसां विष्णोरिव सुरेतराः 34

महायोगिन ! जैसे भगवान् विष्णु के सामने दैत्यलोग नहीं ठहरते , वैसे ही आपकी सन्निधि से बड़े -बड़े पाप भी तुरन्त नष्ट हो जाते हैं ।। 34।।

अपि मे भगवान्प्रीतः कृष्णः पाण्डुसुतप्रियः 
पैतृष्वसेयप्रीत्यर्थं तद्गोत्रस्यात्तबान्धवः 35

अवश्य ही पाण्डवों के सुहृद भगवान् श्रीकृष्ण मुझपर अत्यन्त प्रसन्न हैं; उन्होंने अपने फुफेरे भाइयों की प्रसन्नता के लिये उन्हीं के कुल में उत्पन्न हुए मेरे साथ भी अपनेपन का व्यवहार किया हैं ।।35।।

अन्यथा तेऽव्यक्तगतेर्दर्शनं नः कथं नृणाम्
नितरां म्रियमाणानां संसिद्धस्य वनीयसः 36

भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा न होती तो आप -सरीखे एकान्त वनवासी अव्यक्तगति परम सिंद्ध पुरुष स्वयं पधारकर इस मृत्यु के समय हम -जैसे प्राकृत मनुष्यों को क्यों दर्शन देते ।।36।।

अतः पृच्छामि संसिद्धिं योगिनां परमं गुरुम्
पुरुषस्येह यत्कार्यं म्रियमाणस्य सर्वथा 37

आप योगियों के परम गुरु हैं, इसलिये मैं आप से परम सिद्धि के स्वरुप और साधन के सम्बन्ध में प्रश्न कर रहा हूँ। जो पुरुष सर्वथा मरणासन्न है, उसको क्या करना चाहिये? ।।37।।

यच्छ्रोतव्यमथो जप्यं यत्कर्तव्यं नृभिः प्रभो
स्मर्तव्यं भजनीयं वा ब्रूहि यद्वा विपर्ययम् 38

भगवन ! साथ ही यह भी बतलाइये कि मनुष्यमात्र को क्या करना चाहिये। वे किसका श्रवण,किसका जप, किसका स्मरण और किसका भजन करें तथा किसका त्याग करें ? ।।38।।

नूनं भगवतो ब्रह्मन्गृहेषु गृहमेधिनाम्
न लक्ष्यते ह्यवस्थानमपि गोदोहनं क्वचित् 39

भगवत्स्वरूप मुनिवर ! आपका दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है ; क्योंकि जिनती देर एक गाय दुही जाती हैं, गृहस्थों के घर पर उन्ती देर भी तो आप नहीं ठहरते ।।39।।

सूत उवाच
एवमाभाषितः पृष्टः स राज्ञा श्लक्ष्णया गिरा
प्रत्यभाषत धर्मज्ञो भगवान्बादरायणिः 40

सूतजी कहते हैं —– जब राजा ने बड़ी ही मधुर वाणी में इस प्रकार सम्भाषण एवं प्रश्न किये, तब समस्त धर्मों के मर्मज्ञ व्यासनन्दन भगवान् श्रीशुकदेवजी उनका उत्तर देने लगे ।।40।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायाम् प्रथमस्कन्धे शुकागमनं नामैकोनविंशोऽध्यायः ।।


   
। प्रथम स्कन्धः समाप्तः । हरिः ॐ तत्सत् 

 

Chapter Nineteen: The Appearance of Sukadeva Gosvami

1. Sri Suta Gosvami said: While returning home, the King [Maharaja Pariksit] felt that the act he had committed against the faultless and powerful brahmana was heinous and uncivilized. Consequently he was distressed.

2. [King Pariksit thought:] Due to my neglecting the injunctions of the Supreme Lord I must certainly expect some difficulty to overcome me in the near future. I now desire without reservation  that the calamity come now, for in this way I may be freed of the sinful action and not commit such an offense again.

3. I am uncivilized and sinful due to my neglect of brahminical culture, God consciousness and cow protection. Therefore I wish that my kingdom, strength and riches burn up immediately by the fire of the brahmana’s wrath so that in the future I may not be guided by such inauspicious attitudes.

4. While the King was thus repenting, he received news of his imminent death, which would be due to the bite of a snake-bird, occasioned by the curse spoken by the sage’s son. The King accepted this as good news, for it would be the cause of his indifference toward worldly things.

5. Maharaja Pariksit sat down firmly on the banks of the Ganges to concentrate his mind in Krishna consciousness, rejecting all other practices of self-realization, because transcendental loving service to Krishna is the greatest achievement, superseding all other methods.

6. The river [Ganges, by which the King sat to fast] carries the most auspicious water, which is mixed with the dust of the lotus feet of the Lord and tulasi leaves. Therefore that water sanctifies the three worlds inside and outside and even sanctifies Lord Shiva and other demigods. Consequently everyone who is destined to die must take shelter of this river.

7. Thus the King, the worthy descendant of the Pandavas, decided once and for all and sat on the Ganges’ bank to fast until death and give himself up to the lotus feet of Lord Krsna, who alone is able to award liberation. So, freeing himself from all kinds of associations and attachments, he accepted the vows of a sage.

8. At that time all the great minds and thinkers, accompanied by their disciples, and sages who could verily sanctify a place of pilgrimage just by their presence, arrived there on the plea of making a
pilgrim’s journey.

9-10. From different parts of the universe there arrived great sages like Atri, Cyavana, Saradvan,
Aristanemi, Bhrgu, Vasistha, Parasara, Visvamitra, Angira, Parasurama, Utathya, Indrapramada, Idhmavahu, Medhatithi, Devala, Arstisena, Bharadvaja, Gautama, Pippalada, Maitreya, Aurva, Kavasa, Kumbhayoni, Dvaipayana and the great personality Narada.

11. There were also many other saintly demigods, kings and special royal orders called arunadayas [a special rank of rajarishis] from different dynasties of sages. When they all assembled together to meet the Emperor [Pariksit], he received them properly and bowed his head to the ground.

12. After all the rsis and others had seated themselves comfortably, the King, humbly standing before them with folded hands, told them of his decision to fast until death.

13. The fortunate King said: Indeed, we are the most grateful of all the kings who are trained to get favors from the great souls. Generally you [sages] consider royalty as refuse to be rejected and left in a distant place.

14. The Supreme Personality of Godhead, the controller of both the transcendental and mundane worlds, has graciously overtaken me in the form of a brahmana’s curse. Due to my being too much attached to family life, the Lord, in order to save me, has appeared before me in such a way that only out of fear I will detach myself from the world.

15. O brahmanas, just accept me as a completely surrendered soul, and let mother Ganges, the
representative of the Lord, also accept me in that way, for I have already taken the lotus feet of the Lord into my heart. Let the snake-bird–or whatever magical thing the brahmana created–bite me at once. I only desire that you all continue singing the deeds of Lord Vishnu.

16. Again, offering obeisances unto all you brahmanas, I pray that if I should again take my birth in the material world I will have complete attachment to the unlimited Lord Krishna, association with His devotees and friendly relations with all living beings.

17. In perfect self-control, Maharaja Pariksit sat down on a seat of straw, with straw-roots facing the east, placed on the southern bank of the Ganges, and he himself faced the north. Just previously he had given charge of his kingdom over to his son.

18. Thus the King, Maharaja Pariksit, sat to fast until death. All the demigods of the higher planets praised the King’s actions and in pleasure continually scattered flowers over the earth and beat celestial drums.

19. All the great sages who were assembled there also praised the decision of Maharaja Pariksit and they expressed their approval by saying, “Very good.” Naturally the sages are inclined to do good to common men, for they have all the qualitative powers of the Supreme Lord. Therefore they were very much pleased to see Maharaja Pariksit, a devotee of the Lord, and they spoke as follows.

20. [The sages said:] O chief of all the saintly kings of the Pandu dynasty who are strictly in the line of Lord Sri Krishna! It is not at all astonishing that you give up your throne, which is decorated with the helmets of many kings, to achieve eternal association with the Personality of Godhead.

21. We shall all wait here until the foremost devotee of the Lord, Maharaja Pariksit, returns to the supreme planet, which is completely free from all mundane contamination and all kinds of  lamentation.

22. All that was spoken by the great sages was very sweet to hear, full of meaning and appropriately presented as perfectly true. So after hearing them, Maharaja Pariksit, desiring to hear of the activities of Lord Sri Krishna, the Personality of Godhead, congratulated the great sages.

23. The King said: O great sages, you have all very kindly assembled here, having come from all parts of the universe. You are all as good as supreme knowledge personified, who resides in the planet above the three worlds [Satyaloka]. Consequently you are naturally inclined to do good to others, and but for this you have no interest, either in this life or in the next.

24. O trustworthy brahmanas, I now ask you about my immediate duty. Please, after proper
deliberation, tell me of the unalloyed duty of everyone in all circumstances, and specifically of those who are just about to die.

25. At that moment there appeared the powerful son of Vyasadeva, who traveled over the earth
disinterested and satisfied with himself. He did not manifest any symptoms of belonging to any social order or status of life. He was surrounded with women and children, and he dressed as if others had neglected him.

26. This son of Vyasadeva was only sixteen years old. His legs, hands, thighs, arms, shoulders, forehead and the other parts of his body were all delicately formed. His eyes were beautifully wide, and his nose and ears were highly raised. He had a very attractive face, and his neck was well formed and beautiful like a conchshell.

27. His collarbone was fleshy, his chest broad and thick, his navel deep and his abdomen beautifully striped. His arms were long, and curly hair was strewn over his beautiful face. He was naked, and the hue of his body reflected that of Lord Krishna.

28. He was blackish and very beautiful due to his youth. Because of the glamor of his body and his
attractive smiles, he was pleasing to women. Though he tried to cover his natural glories, the great sages present there were all expert in the art of physiognomy, and so they honored him by rising from their seats.

29. Maharaja Pariksit, who is also known as Visnurata [one who is always protected by Visnu], bowed his head to receive the chief guest, Sukadeva Gosvami. At that time all the ignorant women and boys ceased following Srila Sukadeva. Receiving respect from all, Sukadeva Gosvami took his exalted seat.

30. Sukadeva Gosvami was then surrounded by saintly sages and demigods just as the moon is
surrounded by stars, planets and other heavenly bodies. His presence was gorgeous, and he was
respected by all.

31. The sage Sri Sukadeva Gosvami sat perfectly pacified, intelligent and ready to answer any question without hesitation. The great devotee, Maharaja Pariksit, approached him, offered his respects by bowing before him, and politely inquired with sweet words and folded hands.

32. The fortunate King Pariksit said: O brahmana, by your mercy only, you have sanctified us, making us like unto places of pilgrimage, all by your presence here as my guest. By your mercy, we, who are but unworthy royalty, become eligible to serve the devotee.

33. Simply by our remembering you, our houses become instantly sanctified. And what to speak of seeing you, touching you, washing your holy feet and offering you a seat in our home?

34. Just as the atheist cannot remain in the presence of the Personality of Godhead, so also the invulnerable sins of a man are immediately vanquished in your presence, O saint! O great mystic!

35. Lord Krishna, the Personality of Godhead, who is very dear to the sons of King Pandu, has accepted me as one of those relatives just to please His great cousins and brothers.

36. Otherwise [without being inspired by Lord Krishna] how is it that you have voluntarily appeared here, though you are moving incognito to the common man and are not visible to us who are on the verge of death?

37. You are the spiritual master of great saints and devotees. I am therefore begging you to show the way of perfection for all persons, and especially for one who is about to die.

38. Please let me know what a man should hear, chant, remember and worship, and also what he
should not do. Please explain all this to me.

39. O powerful brahmana, it is said that you hardly stay in the houses of men long enough to milk a cow.

40. Sri Suta Gosvami said: The King thus spoke and questioned the sage, using sweet language. Then the great and powerful personality, the son of Vyasadeva, who knew the principles of religion, began his reply.