श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – तैतीसवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Thirty Three

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: त्रयस्त्रिंश अध्यायः

श्लोक 1-37

देवहूति को तत्त्वज्ञान एवं मोक्षपद की प्राप्ति

मैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! श्रीकपिल भगवान् के ये वचन सुनकर कर्दम जी की प्रिय पत्नी माता देवहूति के मोह का पर्दा फट गया और वे तत्त्वप्रतिपादक सांख्यशास्त्र के ज्ञान की आधारभूमि भगवान् श्रीकपिल जी को प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगीं। देवहूति जी ने कहा- कपिल जी! ब्रह्मा जी आपके ही नाभिकमल से प्रकट हुए थे। उन्होंने प्रलयकालीन जल में शयन करने वाले आपके पंचभूत, इन्द्रिय, शब्दादि विषय और मनोमय विग्रह का, जो सत्त्वादि गुणों के प्रवाह से युक्त, सत्स्वरूप और कार्य एवं कारण दोनों का बीज है, ध्यान ही किया था। आप निष्क्रिय, सत्यसंकल्प, सम्पूर्ण जीवों के प्रभु तथा सहस्रों अचिन्त्य शक्तियों से सम्पन्न हैं। अपनी शक्ति को गुण प्रवाहरूप से ब्रह्मादि अनन्त मूर्तियों में विभक्त करके उनके द्वारा आप स्वयं ही विश्व की रचना आदि करते हैं। नाथ! यह कैसी विचित्र बात है कि जिनके उदर में प्रलयकाल आने पर यह सारा प्रपंच लीन हो जाता है और जो कल्पान्त में मायामय बालक का रूप धारण कर अपने चरण का अँगूठा चूसते हुए अकेले ही वट वृक्ष के पत्ते पर शयन करते हैं, उन्हीं आपको मैंने गर्भ में धारण किया। विभो! आप पापियों का दमन और अपने आज्ञाकारी भक्तों का अभ्युदय एवं कल्याण करने के लिये स्वेच्छा से देह धारण किया करते हैं। अतः जिस प्रकार आपके वराह आदि अवतार हुए हैं, उसी प्रकार यह कपिलावतार भी मुमुक्षुओं को ज्ञान मार्ग दिखाने के लिये हुआ है। भगवन्! आपके नामों का श्रवण या कीर्तन करने से तथा भूले-भटके कभी-कभी आपका वन्दन या स्मरण करने से ही कुत्ते का मांस खाने वाला चाण्डाल भी सोमयाजी ब्राह्मण के समान पूजनीय हो सकता है; फिर आपका दर्शन करने से मनुष्य कृतकृत्य हो जाये-इसमें तो कहना ही क्या है। अहो! वह चाण्डाल भी इसी में सर्वश्रेष्ठ है कि उसकी जिह्वा के अग्रभाग में आपका नाम विराजमान है। जो श्रेष्ठ पुरुष आपका नाम उच्चारण करते हैं, उन्होंने तप, हवन, तीर्थस्थान, सदाचार का पालन और वेदाध्ययन-सब कुछ कर लिया। कपिलदेव जी! आप साक्षात् परब्रह्म हैं, आप ही परम पुरुष हैं, वृत्तियों के प्रवाह को अन्तर्मुख करके अन्तःकरण में आपका ही चिन्तन किया जाता है। आप अपने तेज से माया के कार्य गुण-प्रवाह को शान्त कर देते हैं तथा आपके ही उदर में सम्पूर्ण वेदतत्त्व निहित है। ऐसे साक्षात् विष्णुस्वरूप आपको मैं प्रणाम करती हूँ। मैत्रेय जी कहते हैं- माता के इस प्रकार स्तुति करने पर मातृवत्सल परमपुरुष भगवान् कपिलदेव जी ने उनसे गम्भीर वाणी में कहा। कपिलदेव जी ने कहा- माताजी! मैंने तुम्हें जो यह सुगम मार्ग बताया है, इसका अवलम्बन करने से तुम शीघ्र ही परमपद प्राप्त कर लोगी। तुम मेरे इस मत में विश्वास करो, ब्रह्मवादी लोगों ने इसका सेवन किया है; इसके द्वारा तुम मेरे जन्म-मरणरहित स्वरूप को प्राप्त कर लोगी। जो लोग मेरे इस मत को नहीं जानते, वे जन्म-मृत्यु के चक्र में पड़ते हैं। मैत्रेय जी कहते हैं- इस प्रकार अपने श्रेष्ठ आत्मज्ञान का उपदेश कर श्रीकपिलदेव जी अपनी ब्रह्मवादिनी जननी की अनुमति लेकर वहाँ से चले गये। तब देवहूति भी सरस्वती के मुकुट सदृश अपने आश्रम में अपने पुत्र के उपदेश किये हुए योग साधन के द्वारा योगाभ्यास करती हुई समाधि में स्थित हो गयीं।

त्रिकाल स्नान करने से उनकी घुँघराली अलकें भूरि-भूरि जटाओं में परिणत हो गयीं तथा चीर-वस्त्रों से ढका हुआ शरीर उग्र तपस्या से कारण दुर्बल हो गया। उन्होंने प्रजापति कर्दम के तप और योगबल से प्राप्त अनुपम गार्हस्थ्य सुख को, जिसके लिये देवता तरसते थे, त्याग दिया। जिसमें दुग्धफेन के समान स्वच्छ और सुकोमल शय्या से युक्त हाथी-दाँत के पलंग, सुवर्ण के पात्र, सोने के सिंहासन और उन पर कोमल-कोमल गद्दे बिछे हुए थे तथा जिसकी स्वच्छ स्फटिकमणि और महामरकतमणि की भीतों में रत्नों की बनी हुई रमणी-मूर्तियों के सहित मणिमय दीपक जगमगा रहे थे, जो फूलों से लदे हुए अनेकों दिव्य वृक्षों से सुशोभित था, जिसमें अनेक प्रकार के पक्षियों का कलरव और मतवाले भौंरों का गुंजार होता रहता था, जहाँ की कमलगन्ध से सुवासित बावलियों में कर्दम जी के साथ उनका लाड़-प्यार पाकर क्रीड़ा के लिये प्रवेश करने पर उसका (देवहूति का) गर्न्धवगण गुणगान किया करते थे और जिसे पाने के लिये इन्द्राणियाँ भी लालायित रहती थीं-उस गृहोद्यान की भी ममता उन्होंने त्याग दी। किन्तु पुत्र वियोग से व्याकुल होने के कारण अवश्य उनका मुख कुछ उदास हो गया। पति के वनगमन के अनन्तर पुत्र का भी वियोग हो जाने से वे आत्मज्ञान सम्पन्न होकर भी ऐसी व्याकुल हो गयीं, जैसे बछड़े के बिछुड़ जाने से उसे प्यार करने वाली गौ। वत्स विदुर! अपने पुत्र कपिलदेवरूप भगवान् हरि का चिन्तन करते-करते वे कुछ ही दिनों में ऐसे ऐश्वर्य सम्पन्न घर से भी उपरत हो गयीं। फिर वे, कपिलदेव जी ने भगवान् के जिस ध्यान करने योग्य प्रसन्नवदनारविन्द युक्त स्वरूप का वर्णन किया था, उसके एक-एक अवयव का तथा उस समग्र रूप का भी चिन्तन करती हुई ध्यान में तत्पर हो गयीं। भगवद्भक्ति के प्रवाह, प्रबल वैराग्य और यथोचित कर्मानुष्ठान से उत्पन्न हुए ब्रह्म साक्षात्कार कराने वाले ज्ञान द्वारा चित्त शुद्ध हो जाने पर वे उस सर्वव्यापक आत्मा के ध्यान में मग्न हो गयीं, जो अपने स्वरूप के प्रकाश से मायाजनित आवरण को दूर कर देता है। इस प्रकार जीव के अधिष्ठानभूत परमब्रह श्रीभगवान् में ही बुद्धि की स्थति हो जाने से उनका जीव भाव निवृत्त हो गया और वे समस्त क्लेशों से मुक्त होकर परमानन्द में निमग्न हो गयीं। अब निरन्तर समाधिस्थ रहने के कारण उनकी विषयों के सत्यत्व की भ्रान्ति मिट गयी और उन्हें अपने शरीर की भी सुधि न रही-जैसे जागे हुए पुरुष को अपने स्वप्न में देखे हुए शरीर की नहीं रहती। उनके शरीर का पोषण भी दूसरों के द्वारा ही होता था, किन्तु किसी प्रकार का मानसिक क्लेश न होने के कारण वह दुर्बल नहीं हुआ। उसका तेज और भी निखर गया और वह मैल के कारण धूमयुक्त अग्नि के समान सुशोभित होने लगा। उनके बाल बिथुर गये थे और वस्त्र भी गिर गया था; तथापि निरन्तर श्रीभगवान् में ही चित्त लगा रहने के कारण उन्हें अपने तपोयोगमय शरीर की कुछ भी सुधि नहीं थी, केवल प्रारब्ध ही उसकी रक्षा करता था। विदुर जी! इस प्रकार देवहूति जी ने कपिलदेव जी के बताये हुए मार्ग द्वारा थोड़े ही समय में नित्यमुक्त परमात्मस्वरूप श्रीभगवान् को प्राप्त कर लिया। वीरवर! जिस स्थान पर उन्हें सिद्धि प्राप्त हुई थी, वह परम पवित्र क्षेत्र त्रिलोकी में ‘सिद्धपद’ नाम से विख्यात हुआ। साधुस्वभाव विदुर जी! योग साधन के द्वारा उनके शरीर के सारे दैहिक मल दूर हो गये थे। वह एक नदी के रूप में परिणत हो गया, जो सिद्धगण से सेवित और सब प्रकार कि सिद्धि देने वाली है। महायोगी भगवान् कपिल जी भी माता की आज्ञा ले पिता के आश्रम से ईशानकोण की ओर चले गये। वहाँ स्वयं समुद्र ने उनका पूजन करके उन्हें स्थान दिया। वे तीनों लोकों को शान्ति प्रदान करने के लिये योगमार्ग का अवलम्बन कर समाधि में स्थित हो गये हैं। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, मुनि और अप्सरागण उनकी स्तुति करते हैं तथा सांख्याचार्यगण भी उनका सब प्रकार स्तवन करते रहते हैं। निष्पाप विदुर जी! तुम्हारे पूछने से मैंने तुम्हें यह भगवान् कपिल और देवहूति का परम पवित्र संवाद सुनाया। यह कपिलदेव जी का मत अध्यात्मयोग का गूढ़ रहस्य है। जो पुरुष इसका श्रवण या वर्णन करता है, वह भगवान् गरुड़ध्वज की भक्ति से युक्त होकर शीघ्र ही श्रीहरि के चरणारविन्दों को प्राप्त करता है।

Chapter Thirty-three: Activities of Kapila

1. Sri Maitreya said: Thus Devahuti, the mother of Lord Kapila and wife of Kardama Muni, became freed from all ignorance concerning devotional service and transcendental knowledge. She offered her obeisances unto the Lord, the author of the basic principles of the Sankhya system of philosophy, which is the background of liberation, and she satisfied Him with the following verses of prayer.

2. Devahuti said: Brahma is said to be unborn because he takes birth from the lotus flower which grows from Your abdomen while You lie in the ocean at the bottom of the universe. But even Brahma simply meditated upon You, whose body is the source of unlimited universes.

3. My dear Lord, although personally You have nothing to do, You have distributed Your energies in the interactions of the material modes of nature, and for that reason the creation, maintenance and dissolution of the cosmic manifestation take place. My dear Lord, You are self-determined and are the Supreme Personality of Godhead for all living entities. For them You created this material manifestation, and although You are one, Your diverse energies can act multifariously. This is inconceivable to us.

4. As the Supreme Personality of Godhead, You have taken birth from my abdomen. O my Lord, how is that possible for the supreme one, who has in His belly all the cosmic manifestation? The answer is that it is possible, for at the end of the millennium You lie down on a leaf of a banyan tree, and just like a small baby, You lick the toe of Your lotus foot.

5. My dear Lord, You have assumed this body in order to diminish the sinful activities of the fallen and to enrich their knowledge in devotion and liberation. Since these sinful people are dependent on Your direction, by Your own will You assume incarnations as a boar and as other forms. Similarly, You have appeared in order to distribute transcendental knowledge to Your dependents.

6. To say nothing of the spiritual advancement of persons who see the Supreme Person face to face, even a person born in a family of dog-eaters immediately becomes eligible to perform Vedic sacrifices if he once utters the holy name of the Supreme Personality of Godhead or chants about Him, hears about His pastimes, offers Him obeisances or even remembers Him.

7. Oh, how glorious are they whose tongues are chanting Your holy name! Even if born in the families of dog-eaters, such persons are worshipable. Persons who chant the holy name of Your Lordship must have executed all kinds of austerities and fire sacrifices and achieved all the good manners of the Aryans. To be chanting the holy name of Your Lordship, they must have bathed at holy places of pilgrimage, studied the Vedas and fulfilled everything required.

8. I believe, my Lord, that You are Lord Visnu Himself under the name of Kapila, and You are the Supreme Personality of Godhead, the Supreme Brahman! The saints and sages, being freed from all the disturbances of the senses and mind, meditate upon You, for by Your mercy only can one become free from the clutches of the three modes of material nature. At the time of dissolution, all the Vedas are sustained in You only.

9. Thus the Supreme Personality of Godhead Kapila, satisfied by the words of His mother, towards whom He was very affectionate, replied with gravity.

10. The Personality of Godhead said: My dear mother, the path of self-realization which I have already instructed to you is very easy. You can execute this system without difficulty, and by following it you shall very soon be liberated, even within your present body.

11. My dear mother, those who are actually transcendentalists certainly follow My instructions, as I have given them to you. You may rest assured that if you traverse this path of self-realization perfectly, surely you shall be freed from fearful material contamination and shall ultimately reach Me. Mother, persons who are not conversant with this method of devotional service certainly cannot get out of the cycle of birth and death

12. Sri Maitreya said: The Supreme Personality of Godhead Kapila, after instructing His beloved mother, took permission from her and left His home, His mission having been fulfilled.

13. As instructed by her son, Devahuti also began to practice bhakti-yoga in that very asrama. She
practiced samadhi in the house of Kardama Muni, which was so beautifully decorated with flowers that it was considered the flower crown of the River Sarasvati.

14. She began to bathe three times daily, and thus her curling black hair gradually became gray. Due to austerity, her body gradually became thin, and she wore old garments.

15. The home and household paraphernalia of Kardama, who was one of the Prajapatis, was
developed in such a way, by dint of his mystic powers of austerity and yoga, that his opulence was sometimes envied by those who travel in outer space in airplanes.

16. The opulence of the household of Kardama Muni is described herein. The bedsheets and
mattresses were all as white as the foam of milk, the chairs and benches were made of ivory and were covered by cloths of lace with golden filigree, and the couches were made of gold and had very soft pillows.

17. The walls of the house were made of first-class marble, decorated with valuable jewels. There was no need of light, for the household was illuminated by the rays of these jewels. The female members of the household were all amply decorated with jewelry.

18. The compound of the main household was surrounded by beautiful gardens, with sweet, fragrant flowers and many trees which produced fresh fruit and were tall and beautiful. The attraction of such gardens was that singing birds would sit on the trees, and their chanting voices, as well as the humming sound of the bees, made the whole atmosphere as pleasing as possible.

19. When Devahuti would enter that lovely garden to take her bath in the pond filled with lotus flowers, the associates of the denizens of heaven, the Gandharvas, would sing about Kardama’s glorious household life. Her great husband, Kardama, gave her all protection at all times.

20. Although her position was unique from all points of view, saintly Devahuti, in spite of all her
possessions, which were envied even by the ladies of the heavenly planets, gave up all such comforts. She was only sorry that her great son was separated from her.

21. Devahuti’s husband had already left home and accepted the renounced order of life, and then her only son, Kapila, left home. Although she knew all the truths of life and death, and although her heart was cleansed of all dirt, she was very aggrieved at the loss of her son, just as a cow is affected when her calf dies.

22. O Vidura, thus always meditating upon her son, the Supreme Personality of Godhead Kapiladeva, she very soon became unattached to her nicely decorated home.

23. Thereafter, having heard with great eagerness and in all detail from her son, Kapiladeva, the eternally smiling Personality of Godhead, Devahuti began to meditate constantly upon the Vishnu form of the Supreme Lord.

24-25. She did so with serious engagement in devotional service. Because she was strong in
renunciation, she accepted only the necessities of the body. She became situated in knowledge due to realization of the Absolute Truth, her heart became purified, she became fully absorbed in meditation upon the Supreme Personality of Godhead, and all misgivings due to the modes of material nature disappeared.

26. Her mind became completely engaged in the Supreme Lord, and she automatically realized the
knowledge of the impersonal Brahman. As a Brahman-realized soul, she was freed from the
designations of the materialistic concept of life. Thus all material pangs disappeared, and she attained transcendental bliss.

27. Situated in eternal trance and freed from illusion impelled by the modes of material nature, she forgot her material body, just as one forgets his different bodies in a dream.

28. Her body was being taken care of by the spiritual damsels created by her husband, Kardama, and since she had no mental anxiety at that time, her body did not become thin. She appeared just like a fire surrounded by smoke.

29. Because she was always absorbed in the thought of the Supreme Personality of Godhead, she was not aware that her hair was sometimes loosened or her garments were disarrayed.

30. My dear Vidura, by following the principles instructed by Kapila, Devahuti soon became liberated from material bondage, and she achieved the Supreme Personality of Godhead, as Supersoul, without difficulty.

31. The palace where Devahuti achieved her perfection, my dear Vidura, is understood to be a most sacred spot. It is known all over the three worlds as Siddhapada.

32. Dear Vidura, the material elements of her body have melted into water and are now a flowing river, which is the most sacred of all rivers. Anyone who bathes in that river also attains perfection, and therefore all persons who desire perfection go bathe there.

33. My dear Vidura, the great sage Kapila, the Personality of Godhead, left His father’s hermitage with the permission of His mother and went towards the northeast.

34. While He was passing in the northern direction, all the celestial denizens known as Caranas and Gandharvas, as well as the munis and the damsels of the heavenly planets, prayed and offered Him all respects. The ocean offered Him oblations and a place of residence.

35. Even now Kapila Muni is staying there in trance for the deliverance of the conditioned souls in the three worlds, and all the acaryas, or great teachers, of the system of Sankhya philosophy are worshiping Him.

36. My dear son, since you have inquired from me, I have answered. O sinless one, the descriptions of Kapiladeva and His mother and their activities are the purest of all pure discourses.

37. The description of the dealings of Kapiladeva and His mother is very confidential, and anyone who hears or reads this narration becomes a devotee of the Supreme Personality of Godhead, who is carried by Garuda, and he thereafter enters into the abode of the Supreme Lord to engage in the transcendental loving service of the Lord.

 

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – बत्तीसवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Thirty Two

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: द्वात्रिंश अध्यायः

श्लोक 1-43  

धूममार्ग और अर्चिरादि मार्ग से जाने वालों की गति का और भक्तियोग की उत्कृष्टता का वर्णन

कपिलदेव जी कहते हैं- माताजी! जो पुरुष घर में रहकर सकामभाव से गृहस्थ के धर्मों का पालन करता है और उनके फलस्वरूप अर्थ एवं काम का उपभोग करके फिर उन्हीं का अनुष्ठान करता रहता है, वह तरह-तरह की कामनाओं से मोहित रहने के कारण भगवद्धर्मों से विमुख हो जाता है और यज्ञों द्वारा श्रद्धापूर्वक देवता तथा पितरों की ही आराधना करता रहता है। उसकी बुद्धि उसी प्रकार की श्रद्धा से युक्त रहती है, देवता और पितर ही उसके उपास्य रहते हैं; अतः वह चन्द्रलोक में जाकर उनके साथ सोमपान करता है और फिर पुण्य क्षीण होने पर इसी लोक में लौट आता है। जिस समय प्रलयकाल में शेषशायी भगवान् शेषशय्या पर शयन करते हैं, उस समय सकाम गृहस्थाश्रमियों को प्राप्त होने वाले ये सब लोक भी लीन हो जाते हैं। जो विवेकी पुरुष अपने धर्मों का अर्थ और भोग-विलास के लिये उपयोग नहीं करते, बल्कि भगवान् की प्रसन्नता के लिये ही उनका पालन करते हैं-वे अनासक्त, प्रशान्त, शुद्धचित्त, निवृत्ति धर्मपरायण, ममतारहित और अहंकारशून्य पुरुष स्वधर्म पालनरूप सत्त्वगुण के द्वारा सर्वथा शुद्धचित्त हो जाते हैं। वे अन्त में सूर्यमार्ग (आर्चिमार्ग या देवयान) के द्वारा सर्वव्यापी पूर्णपुरुष श्रीहरि को ही प्राप्त होते हैं-जो कार्य-कारणरूप जगत् के नियन्ता, संसार के उपादान-कारण और उसकी उत्पत्ति, पालन एवं संहार करने वाले हैं। जो लोग परमात्मदृष्टि से हिरण्यगर्भ की उपासना करते हैं, वे दो परार्द्ध में होने वाले ब्रह्मा जी के प्रलयपर्यन्त उनके सत्यलोक में ही रहते हैं। जिस समय देवतादि से श्रेष्ठ ब्रह्मा जी अपने द्विपरार्द्ध काल के अधिकार को भोगकर पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, इन्द्रिय, उनके विषय (शब्दादि) और अहंकारादि के सहित सम्पूर्ण विश्व का संहार करने की इच्छा से त्रिगुणात्मिक प्रकृति के साथ एकरूप होकर निर्विशेष परमात्मा में लीन हो जाते हैं, उस समय प्राण और मन को जीते हुए वे विरक्त योगिगण भी देह त्यागकर उन भगवान् ब्रह्मा जी में ही प्रवेश करते हैं और फिर उन्हीं के साथ परमानन्दस्वरूप पुराणपरुष परब्रह्म में लीन हो जाते हैं। इससे पहले वे भगवान् में लीन नहीं हुए; क्योंकि अब तक उनमें अहंकार शेष था। इसलिये माताजी! अब तुम भी अत्यन्त भक्तिभाव से उन श्रीहरि की ही चरण-शरण में जाओ; समस्त प्राणियों का हृदयकमल ही उनका मन्दिर है और तुमने भी मुझसे उनका प्रभाव सुन ही लिया है। वेदगर्भ ब्रह्मा जी भी-जो समस्त स्थावर-जंगम प्राणियों के आदिकारण हैं-मरीचि आदि ऋषियों, योगेश्वरों, सनकादिकों तथा योग प्रवर्तक सिद्धों के सहित निष्काम कर्म के द्वारा आदिपुरुष पुरुषश्रेष्ठ सगुण ब्रह्म को प्राप्त होकर भी भेददृष्टि और कर्तृत्वभिमान के कारण भगवदिच्छा-से, जब सर्गकाल उपस्थित होता है, तब कालरूप ईश्वर की प्रेरणा से गुणों में क्षोभ होने पर फिर पूर्ववत् प्रकट हो जाते हैं। इस प्रकार पूर्वोक्त ऋषिगण भी अपने-अपने कर्मानुसार ब्रह्मलोक के ऐश्वर्य को भोगकर भगवदिच्छा से गुणों में क्षोभ होने पर पुनः इस लोक में आ जाते हैं। जिसका चित्त इस लोक में आसक्त है और जो कर्मों में श्रद्धा रखते हैं, वे वेद में कहे हुए काम्य और नित्य कर्मों का सांगोपांग अनुष्ठान करने में ही लगे रहते हैं।

उनकी बुद्धि रजोगुण की अधिकता के कारण कुण्ठित रहती है, हृदय में कामनाओं का जाल फैला रहता है और इन्द्रियाँ उनके वश में नहीं होतीं; बस, अपने घरों में ही आसक्त होकर वे नित्यप्रति पितरों की पूजा में लगे रहते हैं। ये लोग अर्थ, धर्म और काम के ही परायण होते हैं; इसलिये जिनके महान् पराक्रम अत्यन्त कीर्तनिय हैं, उन भवभयहारी श्रीमधुसूदन भगवान् की कथा-वार्ताओं से तो ये विमुख ही रहते हैं। हाय! विष्ठाभोगी कूकर-सूकर आदि जीवों के विष्ठा चाहने के समान जो मनुष्य भगवत्कथामृत को छोड़कर निन्दित विषय-वार्ताओं को सुनते हैं-वे तो अवश्य ही विधाता के मारे हुए हैं, उनका बड़ा ही मन्द भाग्य है। गर्भाधान से लेकर अन्त्येष्टि तक सब संस्कारों को विधिपूर्वक करने वाले ये सकामकर्मी सूर्य से दक्षिण ओर के पितृयान या धूममार्ग से पित्रीश्वर अर्यमा के लोक में जाते हैं और फिर अपनी ही सन्तति के वंश में उत्पन्न होते हैं। माताजी! पितृलोक को भोग लेने पर जब उनके पुण्य क्षीण हो जाते हैं, तब देवता लोग उन्हें वहाँ के ऐश्वर्य से च्युत कर देते हैं और फिर उन्हें विवश होकर तुरन्त ही इस लोक में गिरना पड़ता है। इसलिये माताजी! जिनके चरणकमल सदा भजने योग्य हैं, उन भगवान् का तुम उन्हीं के गुणों का आश्रय लेने वाली भक्ति के द्वारा सब प्रकार से (मन, वाणी और शरीर से) भजन करो। भगवान् वासुदेव के प्रति किया हुआ भक्तियोग तुरंत ही संसार से वैराग्य और ब्रह्म साक्षात्काररूप ज्ञान की प्राप्ति करा देता है। वस्तुतः सभी विषय भगवद् रूप होने के कारण समान हैं। अतः जब इन्द्रियों की वृत्तियों के द्वारा भी भगवद्भक्त का चित्त उनमें प्रिय-अप्रियरूप विषता का अनुभव नहीं करता-सर्वत्र भगवान् का ही दर्शन करता है-उसी समय वह संगरहित, सब में समान रूप से स्थित, त्याग और ग्रहण करने योग्य, दोष और गुणों से रहित, अपनी महिमा में आरूढ़ अपने आत्मा का ब्रह्मरूप से साक्षात्कार करता है। वही ज्ञानस्वरूप है, वही परब्रह्म है, वही परमात्मा है, वही ईश्वर है, वही पुरुष है; वही एक भगवान् स्वयं जीव, शरीर, विषय, इन्द्रियों आदि अनेक रूपों में प्रतीत होता है। सम्पूर्ण संसार में आसक्ति का अभाव हो जाना-बस, यही योगियों के सब प्रकार के योग साधन का एकमात्र अभीष्ट फल है। ब्रह्म एक है, ज्ञानस्वरूप और निर्गुण है, तो भी वह बाह्यवृत्तियों वाली इन्द्रियों के द्वारा भ्रान्तिवश शब्दादि धर्मों वाले विभिन्न पदार्थों के रूप में भास रहा है। जिस प्रकार एक ही परब्रह्म महत्तत्त्व, वैकारिक, राजस और तामस-तीन प्रकार का अहंकार, पंचमहाभूत एवं ग्यारह इन्द्रियरूप बन गया है और फिर वही स्वयंप्रकाश इनके संयोग से जीव कहलाया, उसी प्रकार उस जीव का शरीररूप यह ब्रह्माण्ड भी वस्तुतः ब्रह्म ही है, क्योंकि ब्रह्म से ही इसकी उत्पत्ति हुई है। किन्तु इसे ब्रह्मरूप वही देख सकता है, जो श्रद्धा, भक्ति और वैराग्य तथा निरन्तर के योगाभ्यास के द्वारा एकाग्रचित्त और असंग बुद्धि हो गया है। पूजनीय माताजी! मैंने तुम्हें यह ब्रह्म साक्षात्कार का साधनरूप ज्ञान सुनाया, इसके द्वारा प्रकृति और पुरुष के यथार्थ स्वरूप का बोध हो जाता है। देवि! निर्गुणब्रह्म-विषयक ज्ञानयोग और मेरे प्रति किया हुआ भक्तियोग-इन दोनों का फल एक ही है। उसे ही भगवान् कहते हैं।

जिस प्रकार रूप, रस एवं गन्ध आदि अनेक गुणों का आश्रयभूत एक ही पदार्थ भिन्न-भिन्न इन्द्रियों द्वारा विभिन्न रूप से अनुभूत होता है, वैसे ही शास्त्र के विभिन्न मार्गों द्वारा एक ही भगवान् की अनेक प्रकार से अनुभूति होती है। नाना प्रकार के कर्म कलाप, यज्ञ, दान, तप, वेदाध्ययन, वेद विचार (मीमांसा), मन और इन्द्रियों के संयम, कर्मों के त्याग, विविध अंगों वाले योग, भक्तियोग, निवृत्ति और प्रवृत्तिरूप सकाम और निष्काम दोनों प्रकार के धर्म, आत्मतत्त्व के ज्ञान और दृढ़ वैराग्य-इन सभी साधनों से सगुण-निर्गुणरूप स्वयंप्रकाश भगवान् को ही प्राप्त किया जाता है। माताजी! सात्त्विक, राजस, तामस और निर्गुणभेद से चार प्रकार के भक्तियोग का और जो प्राणियों के जन्मादि विकारों का हेतु है तथा जिसकी गति जानी नहीं जाती, उस काल का स्वरूप मैं तुमसे कह ही चुका हूँ। देवि! अविद्याजनित कर्म के कारण जीव की अनेकों गतियाँ होती हैं; उनमें जाने पर वह अपने स्वरूप को नहीं पहचान सकता। मैंने तुम्हें जो ज्ञानोपदेश दिया है-उसे दुष्ट, दुर्विनीत, घमंडी, दुराचारी और धर्मध्वजी (दम्भी) पुरुषों को नहीं सुनाना चाहिये। जो विषयलोलुप हो, गृहासक्त हो, मेरा भक्त न हो अथवा मेरे भक्तों से द्वेष करने वाला हो, उसे भी इसका उपदेश कभी न करे। जो अत्यन्त श्रद्धालु, भक्त, विनयी, दूसरों के प्रति दोषदृष्टि न रखने वाला, सब प्राणियों से मित्रता रखने वाला, गुरु सेवा में तत्पर, बाह्य विषयों में अनासक्त, शान्तचित्त, मत्सरशून्य और पवित्रचित्त हो तथा मुझे परम प्रियतम मानने वाला हो, उसे इसका अवश्य उपदेश करे।

माँँ! जो पुरुष मुझमें चित्त लगाकर इसका श्रद्धापूर्वक एक बार भी श्रवण या कथन करेगा, वह मेरे परमपद को प्राप्त होगा।

 

Chapter Thirty-two: Entanglement in Fruitive Activities

1. The Personality of Godhead said: The person who lives in the center of household life derives
material benefits by performing religious rituals, and thereby he fulfills his desire for economic
development and sense gratification. Again and again he acts the same way.

2. Such persons are ever bereft of devotional service due to being too attached to sense gratification, and therefore, although they perform various kinds of sacrifices and take great vows to satisfy the demigods and forefathers, they are not interested in Krsna consciousness, devotional service.

3. Such materialistic persons, attracted by sense gratification and devoted to the forefathers and
demigods, can be elevated to the moon, where they drink an extract of the soma plant. They again return to this planet.

4. All the planets of the materialistic persons, including all the heavenly planets, such as the moon, are vanquished when the Supreme Personality of Godhead, Hari, goes to His bed of serpents, which is known as Ananta Sesa.

5. Those who are intelligent and are of purified consciousness are completely satisfied in Krsna
consciousness. Freed from the modes of material nature, they do not act for sense gratification; rather, since they are situated in their own occupational duties, they act as one is expected to act.

6. By executing one’s occupational duties, acting with detachment and without a sense of proprietorship or false egoism, one is posted in one’s constitutional position by dint of complete purification of consciousness, and by thus executing so-called material duties he can easily enter into the kingdom of God.

7. Through the path of illumination, such liberated persons approach the complete Personality of Godhead, who is the proprietor of the material and spiritual worlds and is the supreme cause of their manifestation and dissolution.

8. Worshipers of the Hiranyagarbha expansion of the Personality of Godhead remain within this
material world until the end of two parardhas, when Lord Brahma also dies.

9. After experiencing the inhabitable time of the three modes of material nature, known as two
parardhas, Lord Brahma closes the material universe, which is covered by layers of earth, water, air, fire, ether, mind, ego, etc., and goes back to Godhead.

10. The yogis who become detached from the material world by practice of breathing exercises and control of the mind reach the planet of Brahma, which is far, far away. After giving up their bodies, they enter into the body of Lord Brahma, and therefore when Brahma is liberated and goes to the Supreme Personality of Godhead, who is the Supreme Brahman, such yogis can also enter into the kingdom of God.

11. Therefore, My dear mother, by devotional service take direct shelter of the Supreme Personality of Godhead, who is seated in everyone’s heart.

12-15. My dear mother, someone may worship the Supreme Personality of Godhead with a special self-interest, but even demigods such as Lord Brahma, great sages such as Sanat-kumara and great munis such as Marici have to come back to the material world again at the time of creation. When the interaction of the three modes of material nature begins, Brahma, who is the creator of this cosmic manifestation and who is full of Vedic knowledge, and the great sages, who are the authors of the spiritual path and the yoga system, come back under the influence of the time factor. They are liberated by their nonfruitive activities and they attain the first incarnation of the purusa, but at the time of creation they come back in exactly the same forms and positions as they had previously.

16. Persons who are too addicted to this material world execute their prescribed duties very nicely and with great faith. They daily perform all such prescribed duties with attachment to the fruitive result.

17. Such persons, impelled by the mode of passion, are full of anxieties and always aspire for sense gratification due to uncontrolled senses. They worship the forefathers and are busy day and night improving the economic condition of their family, social or national life.

18. Such persons are called trai-vargika because they are interested in the three elevating processes.They are averse to the Supreme Personality of Godhead, who can give relief to the conditioned soul. They are not interested in the Supreme Personality’s pastimes, which are worth hearing because of His transcendental prowess.

19. Such persons are condemned by the supreme order of the Lord. Because they are averse to the nectar of the activities of the Supreme Personality of Godhead, they are compared to stool-eating hogs. They give up hearing the transcendental activities of the Lord and indulge in hearing of the abominable activities of materialistic persons.

20. Such materialistic persons are allowed to go to the planet called Pitrloka by the southern course of the sun, but they again come back to this planet and take birth in their own families, beginning again the same fruitive activities from birth to the end of life.

21. When the results of their pious activities are exhausted, they fall down by higher arrangement and again come back to this planet, just as any person raised to a high position sometimes all of a sudden falls.

22. My dear mother, I therefore advise that you take shelter of the Supreme Personality of Godhead, for His lotus feet are worth worshiping. Accept this with all devotion and love, for thus you can be situated in transcendental devotional service.

23. Engagement in Krsna consciousness and application of devotional service unto Krsna make it possible to advance in knowledge and detachment, as well as in self-realization.

24. The exalted devotee’s mind becomes equipoised in sensory activities, and he is transcendental to that which is agreeable and not agreeable.

25. Because of his transcendental intelligence, the pure devotee is equipoised in his vision and sees himself to be uncontaminated by matter. He does not see anything as superior or inferior, and he feels himself elevated to the transcendental platform of being equal in qualities with the Supreme Person.

26. The Supreme Personality of Godhead alone is complete transcendental knowledge, but according to the different processes of understanding He appears differently, either as impersonal Brahman, as Paramatma, as the Supreme Personality of Godhead or as the purusa-avatara.

27. The greatest common understanding for all yogis is complete detachment from matter, which can be achieved by different kinds of yoga.

28. Those who are averse to the Transcendence realize the Supreme Absolute Truth differently through speculative sense perception, and therefore, because of mistaken speculation, everything appears to them to be relative.

29. From the total energy, the mahat-tattva, I have manifested the false ego, the three modes of material nature, the five material elements, the individual consciousness, the eleven senses and the material body. Similarly, the entire universe has come from the Supreme Personality of Godhead.

30. This perfect knowledge can be achieved by a person who is already engaged in devotional service with faith, steadiness and full detachment, and who is always absorbed in thought of the Supreme. He is aloof from material association.

31. My dear respectful mother, I have already described the path of understanding the Absolute Truth, by which one can come to understand the real truth of matter and spirit and their relationship.

32. Philosophical research culminates in understanding the Supreme Personality of Godhead. After achieving this understanding, when one becomes free from the material modes of nature, he attains the stage of devotional service. Either by devotional service directly or by philosophical research, one has to find the same destination, which is the Supreme Personality of Godhead.

33. A single object is appreciated differently by different senses due to its having different qualities. Similarly, the Supreme Personality of Godhead is one, but according to different scriptural injunctions He appears to be different.

34-36. By performing fruitive activities and sacrifices, by distributing charity, by performing austerities, by studying various literatures, by conducting philosophical research, by controlling the mind, by subduing the senses, by accepting the renounced order of life and by performing the prescribed duties of one’s social order; by performing the different divisions of yoga practice, by performing devotional service and by exhibiting the process of devotional service containing the symptoms of both attachment and detachment; by understanding the science of self-realization and by developing a strong sense of detachment, one who is expert in understanding the different processes of self-realization realizes the Supreme Personality of Godhead as He is represented in the material world as well as in transcendence.

37. My dear mother, I have explained to you the process of devotional service and its identity in four different social divisions. I have explained to you as well how eternal time is chasing the living entities, although it is imperceptible to them.

38. There are varieties of material existence for the living entity according to the work he performs in ignorance or forgetfulness of his real identity. My dear mother, if anyone enters into that forgetfulness, he is unable to understand where his movements will end.

39. Lord Kapila continued: This instruction is not meant for the envious, for the agnostics or for persons who are unclean in their behavior. Nor is it for hypocrites or for persons who are proud of material possessions.

40. It is not to be instructed to persons who are too greedy and too attached to family life, nor to
persons who are nondevotees and who are envious of the devotees and of the Personality of Godhead.

41. Instruction should be given to the faithful devotee who is respectful to the spiritual master,
nonenvious, friendly to all kinds of living entities and eager to render service with faith and sincerity.

42. This instruction should be imparted by the spiritual master to persons who have taken the Supreme Personality of Godhead to be more dear than anything, who are not envious of anyone, who arep erfectly cleansed and who have developed detachment for that which is outside the purview of Krishna consciousness.

43. Anyone who once meditates upon Me with faith and affection, who hears and chants about Me, surely goes back home, back to Godhead.

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – इकतीसवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Thirty One

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: एकत्रिंश अध्यायः श्लोक 1-48 का हिन्दी अनुवाद

मनुष्य योनि को प्राप्त हुए जीव की गति का वर्णन

श्रीभगवान् कहते हैं- माताजी! जब जीव को मनुष्य-शरीर में जन्म लेना होता है, तो वह भगवान् की प्रेरणा से अपने पूर्वकर्मानुसार देहप्राप्ति के लिये पुरुष के वीर्यकण के द्वारा स्त्री के उदर में प्रवेश करता है। वहाँ वह एक रात्रि में स्त्री के रज में मिलकर एकरूप कलल बन जाता है, पाँच रात्रि में बुद्बुदरूप हो जाता है, दस दिन में बेर के समान कुछ कठिन हो जाता है और उसके बाद मांसपेशी अथवा अण्डज प्राणियों में अण्डे के रूप में परिणत हो जाता है। एक महीने में उसके सिर निकल आता है, दो मास में हाथ-पाँव आदि अंगों का विभाग हो जाता है और तीन मास में नख, रोम, अस्थि, चर्म, स्त्री-पुरुष के चिह्न तथा अन्य छिद्र उत्पन्न हो जाते हैं।

चार मास में उसमें मांसादि सातों धातुएँ पैदा हो जाती हैं, पाँचवें महीने में भूख-प्यास लगने लगती है और छठे मास में झिल्ली से लिपटकर वह दाहिनी कोख में घूमने लगता है। उस समय माता के खाये हुए अन्न-जल आदि से उसकी सब धातुएँ पुष्ट होने लगती हैं और वह कृमि आदि जंतुओं के उत्पत्ति स्थान उस जघन्य मल-मूत्र के गढ़े में पड़ा रहता है। वह सुकुमार तो होता ही है; इसलिये जब वहाँ के भूखे कीड़े उसके अंग-प्रत्यंग नोचते हैं, तब अत्यन्त क्लेश के कारण वह क्षण-क्षण में अचेत हो जाता है। माता के खाये हुए कड़वे, तीखे, गरम, नमकीन, रूखे और खट्टे आदि उग्र पदार्थों का स्पर्श होने से उसके सारे शरीर में पीड़ा होने लगती है। वह जीव माता के गर्भाशय में झिल्ली से लिपटा और आँतों से घिरा रहता है। उसका सिर पेट की ओर तथा पीठ और गर्दन कुण्डलाकार मुड़े रहते हैं। वह पिंजड़े में बंद पक्षी के समान पराधीन एवं अंगों को हिलाने-डुलाने में भी असमर्थ रहता है। इसी समय अदृष्ट की प्रेरणा से उसे स्मरणशक्ति प्राप्त होती है। तब अपने सैकड़ों जन्मों के कर्म याद आ जाते हैं और वह बेचैन हो जाता है तथा उसका दम घुटने लगता है। ऐसी अवस्था में उसे क्या शान्ति मिल सकती है?

सातवाँ महीना आरम्भ होने पर उसमें ज्ञान-शक्ति का भी उन्मेष हो जाता है; परन्तु प्रसूतिवायु से चलायमान रहने के कारण वह उसी उदर में उत्पन्न हुए विष्ठा के कीड़ों के समान एक स्थान पर नहीं रह सकता। तब सप्तधातुमय स्थूल शरीर से बँधा हुआ वह देहात्मदर्शीजीव अत्यन्त भयभीत होकर दीन वाणी से कृपा-याचना करता हुआ, हाथ जोड़कर उस प्रभु की स्तुति करता है, जिसने उसे माता के गर्भ में डाला है।

जीव कहता है- मैं बड़ा अधम हूँ; भगवान् ने मुझे जो इस प्रकार की गति दिखायी है, वह मेरे योग्य ही है। वे अपनी शरण में आये हुए इस नश्वर जगत् की रक्षा के लिये ही अनेक प्रकार के रूप धारण करते हैं; अतः मैं भी भूतल पर विचरण करने वाले उन्हीं के निर्भय चरणारविन्दों की शरण लेता हूँ। जो मैं (जीव) इस माता के उदर में देह, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूपा माया का आश्रय कर पुण्य-पापरूप कर्मों से आच्छादित रहने के कारणबद्ध की तरह हूँ, वही मैं यहीं अपने सन्तप्त हृदय में प्रतीत होने वाले उन विशुद्ध (उपाधिरहित), अविकारी और अखण्ड बोधस्वरूप परमात्मा को नमस्कार करता हूँ।

मैं वस्तुतः शरीरादि से रहित (असंग) होने पर भी देखने में पांचभौतिक शरीर से सम्बद्ध हूँ और इसीलिये इन्द्रिय, गुण, शब्दादि विषय और चिदाभास (अहंकार) रूप जान पड़ता हूँ। अतः इस शरीरादि के आवरण से जिनकी महिमा कुण्ठित नहीं हुई है, उन प्रकृति और पुरुष नियन्ता सर्वज्ञ (विद्याशक्ति सम्पन्न) परमपुरुष की मैं वन्दना करता हूँ। उन्हीं की माया से अपने स्वरूप की स्मृति नष्ट हो जाने के कारण यह जीव अनेक प्रकार के सत्त्वादि गुण और कर्म के बन्धन से युक्त इस संसार मार्ग में तरह-तरह के कष्ट झेलता हुआ भटकता रहता है; अतः उन परमपुरुष परमात्मा की कृपा के बिना और किस युक्ति से इसे अपने स्वरूप का ज्ञान हो सकता है।

मुझे जो यह त्रैकालिक ज्ञान हुआ है, यह भी उनके सिवा और किसने दिया है; क्योंकि स्थावर-जंगम समस्त प्राणियों में एकमात्र वे ही तो अन्तर्यामीरूप अंश से विद्यमान हैं। अतः जीवरूप कर्मजनित पदवी का अनुवर्तन करने वाले हम अपने त्रिविध तापों की शान्ति के लिये उन्हीं का भजन करते हैं।

भगवन्! यह देहधारी जीव दूसरी (माता के) देह के उदर के भीतर मल, मूत्र और रुधिर के कुएँ में गिरा हुआ है, उसकी जठराग्नि से इसका शरीर अत्यन्त सन्तप्त हो रहा है। उससे निकलने की इच्छा करता हुआ यह अपने महीने गिन रहा है। भगवन्! अब इस दीन को यहाँ से कब निकाला जायेगा? स्वामिन्! आप बड़े दयालु हैं, आप-जैसे उदार प्रभु ने ही इस दस मास के जीव को ऐसा उत्कृष्ट ज्ञान दिया है। दीनबन्धों! इस अपने किये हुए उपकार से ही आप प्रसन्न हों; क्योंकि आपको हाथ जोड़ने के सिवा आपके उस उपकार का बदला तो कोई दे भी क्या सकता है।

प्रभो! संसार के ये पशु-पक्षी आदि अन्य जीव तो अपनी मूढ़ बुद्धि के अनुसार अपने शरीर में होने वाले सुख-दुःखादि ही अनुभव करते हैं; किन्तु मैं तो आपकी कृपा से शम-दमादि साधन सम्पन्न शरीर से युक्त हुआ हूँ, अतः आपकी दी हुई विवेकवती बुद्धि से आप पुराणपुरुष को अपने शरीर के बाहर और भीतर अहंकार के आश्रयभूत आत्मा की भाँति प्रत्यक्ष अनुभव करता हूँ। भगवन्! इस अत्यन्त दुःख से भरे हुए गर्भाशय में यद्यपि मैं बड़े कष्ट से रह रहा हूँ, तो भी इससे बाहर निकलकर संसारमय अन्धकूप में गिरने की मुझे बिलकुल इच्छा नहीं है; क्योंकि उसमें जाने वाले जीव को आपकी माया घेर लेती है। जिसके कारण उसकी शरीर में अहंबुद्धि हो जाती है और उसके परिणाम में उसे फिर इस संसारचक्र में ही पड़ता होता है। अतः मैं व्याकुलता को छोड़कर हृदय में श्रीविष्णु भगवान् के चरणों को स्थापित कर अपनी बुद्धि की सहायता से ही अपने को बहुत शीघ्र इस संसाररूप समुद्र के पार लगा दूँगा, जिससे मुझे अनेक प्रकार के दोषों से युक्त यह संसार-दुःख फिर न प्राप्त हो।

कपिलदेव जी कहते हैं- माता! वह दस महीने का जीव गर्भ में ही जब इस प्रकार विवेक सम्पन्न होकर भगवान् की स्तुति करता है, तब उस अधोमुख बालक को प्रसवकाल की वायु तत्काल बाहर आने के लिये ढकेलती है। उसके सहसा ठकेलने पर वह बालक अत्यन्त व्याकुल हो नीचे सिर करके बड़े कष्ट से बाहर निकलता है। उस समय उसके श्वास की गति रुक जाती है और पूर्वस्मृति नष्ट हो जाती है। पृथ्वी पर माता के रुधिर और मूत्र में पड़ा हुआ वह बालक विष्ठा के कीड़े के समान छटपटाता है। उसका गर्भवास का सारा ज्ञान नष्ट हो जाता है और वह विपरीत गति (देहाभिमानरूप अज्ञान-दशा) को प्राप्त होकर बार-बार जोर-जोर से रोता है। फिर जो लोग उसका अभिप्राय नहीं समझ सकते, उनके द्वारा उसका पालन-पोषण होता है। ऐसी अवस्था में उसे जो प्रतिकूलता प्राप्त होती है, उसका निषेध करने की शक्ति भी उसमें नहीं होती। जब उस जीव को शिशु-अवस्था में मैली-कुचैली खाट पर सुला दिया जाता है, जिसमें खटमल आदि स्वेदज जीव चिपटे रहते हैं, तब उसमें शरीर को खुजलाने, उठाने अथवा करवट बदलने की सामर्थ्य न होने के कारण वह बड़ा कष्ट पाता है। उसकी त्वचा बड़ी कोमल होती है; उसे डांस, मच्छर और खटमल आदि उसी प्रकार काटते रहते हैं, जैसे बड़े कीड़े को छोटे कीड़े। इस समय उसका गर्भावस्था का सारा ज्ञान जाता रहता है, सिवा रोने के वह कुछ नहीं कर सकता।

इसी प्रकार बाल्य (कौमार) और पौगण्ड-अवस्थाओं के दुःख भोगकर वह बालक युवावस्था में पहुँचता है। इस समय उसे यदि कोई इच्छित भोग नहीं प्राप्त होता, तो अज्ञानवश उसका क्रोध उद्दीप्त हो उठता है और वह शोकाकुल हो जाता है। देह के साथ-ही-साथ अभिमान और क्रोध बढ़ जाने के कारण वह कामपरवश जीव अपना ही नाश करने के लिये दूसरे कामी पुरुषों के साथ वैर ठानता है। खोटी बुद्धि वाला वह अज्ञानी जीव पंचभूतों से रचे हुए इस देह में मिथ्याभिनिवेश के कारण निरन्तर मैं-मेरेपन का अभिमान करने लगता है। जो शरीर इसे वृद्धावस्था आदि अनेक प्रकार के कष्ट ही देता है तथा अविद्या और कर्म के सूत्र से बँधा रहने के कारण सदा इसके पीछे लगा रहता है, उसी के लिये यह तरह-तरह के कर्म करता रहता है-जिनमें बँध जाने के कारण इसे बार-बार संसारचक्र में पड़ना होता है।

सन्मार्ग में चलते हुए यदि इसका किन्हीं जिह्वा और उपस्थेन्द्रिय के भोगों में लगे हुए विषयी पुरुषों से समागम हो जाता है और यह उनमें आस्था करके उन्हीं का अनुगमन करने लगता है, तो पहले के समान ही फिर नारकी योनियों में पड़ता है। जिनके संग से इसके सत्य, शौच (बाहर-भीतर की पवित्रता), दया, वाणी का संयम, बुद्धि, धन-सम्पत्ति, लज्जा, यश, क्षमा, मन और इन्द्रियों का संयम तथा ऐश्वर्य आदि सभी सद्गुण नष्ट हो जाते हैं। उन अत्यन्त शोचनीय, स्त्रियों के क्रीड़ामृग (खिलौना), अशान्त, मूढ़ और देहात्मदर्शी असत्पुरुषों का संग कभी नहीं करना चाहिये। क्योंकि इस जीव को किसी और का संग करने से ऐसा मोह और बन्धन नहीं होता, जैसा स्त्री और स्त्रियों के संगियों का संग करने से होता है। एक बार अपनी पुत्री सरस्वती को देखकर ब्रह्मा जी भी उसके रूप-लावण्य से मोहित हो गये थे और उसके मृगीरूप होकर भागने पर उसके पीछे निर्लज्जतापूर्वक मृगरूप होकर दौड़ने लगे।

उन्हीं ब्रह्मा जी ने मरीचि आदि प्रजापतियों की तथा मरीचि आदि ने कश्यपादि की और कश्यपादि ने देव-मनुष्यादि प्राणियों की सृष्टि की। अतः इनमें एक ऋषिप्रवर नारायण को छोड़कर ऐसा कौन पुरुष हो सकता है, जिसकी बुद्धि स्त्रीरूपिणी माया से मोहित न हो।

अहो! मेरी इस स्त्रीरूपिणी माया का बल तो देखो, जो अपने भ्रुकुटि-विलासमात्र से बड़े-बड़े दिग्विजयी वीरों को पैरों से कुचल देती है। जो पुरुष योग के परमपद पर आरुढ़ होना चाहता हो अथवा जिसे मेरी सेवा के प्रभाव से आत्मा-अनात्मा का विवेक हो गया हो, वह स्त्रियों का संग कभी न करे; क्योंकि उन्हें ऐसे पुरुष के लिये नरक का खुला द्वार बताया गया है। भगवान् की रची हुई यह जो स्त्रीरूपिणी माया धीरे-धीरे सेवा आदि के मिस से पास आती है, इसे तिनकों से ढके हुए कुएँ के समान अपनी मृत्यु ही समझे।

स्त्री में आसक्त रहने के कारण तथा अन्त समय में स्त्री का ही ध्यान रहने से जीव को स्त्रीयोनि प्राप्त होती है। इस प्रकार स्त्रीयोनि को प्राप्त हुआ जीव पुरुषरूप में प्रतीत होने वाली मेरी माया को ही धन, पुत्र और गृह आदि देने वाला अपना पति मानता रहता है; सो जिस प्रकार व्याधे का गान कानों को प्रिय लगने पर भी बेचारे भोले-भाले पशु-पक्षियों को फँसाकर उनके नाश का ही कारण होता है-उसी प्रकार उन पुत्र, पति और गृह आदि को विधाता की निश्चित की हुई अपनी मृत्यु ही जाने।

देवि! जीव के उपाधिभूत लिंगदेह के द्वारा पुरुष एक लोक से दूसरे लोक में जाता है और अपने प्रारब्ध कर्मों को भोगता हुआ निरन्तर अन्य देहों की प्राप्ति के लिये दूसरे कर्म करता रहता है। जीव का उपाधिरूप लिंग शरीर तो मोक्ष पर्यन्त उसके साथ रहता है तथा भूत, इन्द्रिय और मन का कार्यरूप स्थूल शरीर इसका भोगाधिष्ठान है। इन दोनों का परस्पर संगठित होकर कार्य न करना ही प्राणी की ‘मृत्यु’ है और दोनों का साथ-साथ प्रकट होना ‘जन्म’ कहलाता है।

पदार्थों की उपलब्धि के स्थानरूप इस स्थूल शरीर में जब उनको ग्रहण करने की योग्यता नहीं रहती, यह उसका मरण है और यह स्थूल शरीर ही मैं हूँ-इस अभिमान के साथ उसे देखना उसका जन्म है। नेत्रों में जब किसी दोष के कारण रूपादि को देखने की योगता नहीं रहती, तभी उनमें रहने वाली चक्षु-इन्द्रिय भी रूप देखने में असमर्थ हो जाती है और जब नेत्र और उनमें रहने वाली इन्द्रिय दोनों ही रूप देखने में असमर्थ हो जाते हैं, तभी इन दोनों के साक्षी जीव में भी वह योग्यता नही रहती। अतः मुमुक्ष पुरुष को मरणादि से भय, दीनता अथवा मोह नहीं करना चाहिये। उसे जीव के स्वरूप को जानकर धैर्यपूर्वक निःसंगभाव से विचरना चाहिये तथा इस मायामय संसार में योग-वैराग्य-युक्त सम्यक् ज्ञानमयी बुद्धि से शरीर को निक्षेप (धरोहर) की भाँति रखकर उसके प्रति अनासक्त रहते हुए विचरण करना चाहिये।

Chapter Thirty-one: Lord Kapila’s Instructions on the Movements of the Living Entities

1. The Personality of Godhead said: Under the supervision of the Supreme Lord and according to the result of his work, the living entity, the soul, is made to enter into the womb of a woman through the particle of male semen to assume a particular type of body.

2. On the first night, the sperm and ovum mix, and on the fifth night the mixture ferments into a bubble. On the tenth night it develops into a form like a plum, and after that, it gradually turns into a lump of flesh or an egg, as the case may be.

3. In the course of a month, a head is formed, and at the end of two months the hands, feet and other limbs take shape. By the end of three months, the nails, fingers, toes, body hair, bones and skin appear, as do the organ of generation and the other apertures in the body, namely the eyes, nostrils, ears, mouth and anus.

4. Within four months from the date of conception, the seven essential ingredients of the body, namely chyle, blood, flesh, fat, bone, marrow and semen, come into existence. At the end of five months,
hunger and thirst make themselves felt, and at the end of six months, the fetus, enclosed by the
amnion, begins to move on the right side of the abdomen.

5. Deriving its nutrition from the food and drink taken by the mother, the fetus grows and remains in that abominable residence of stools and urine, which is the breeding place of all kinds of worms.

6. Bitten again and again all over the body by the hungry worms in the abdomen itself, the child suffers terrible agony because of his tenderness. He thus becomes unconscious moment after moment because of the terrible condition.

7. Owing to the mother’s eating bitter, pungent foodstuffs, or food which is too salty or too sour, the body of the child incessantly suffers pains which are almost intolerable.

8. Placed within the amnion and covered outside by the intestines, the child remains lying on one side of the abdomen, his head turned towards his belly and his back and neck arched like a bow.

9. The child thus remains just like a bird in a cage, without freedom of movement. At that time, if the child is fortunate, he can remember all the troubles of his past one hundred births, and he grieves. wretchedly. What is the possibility of peace of mind in that condition?

10. Thus endowed with the development of consciousness from the seventh month after his conception, the child is tossed downward by the airs that press the embryo during the weeks preceding delivery. Like the worms born of the same filthy abdominal cavity, he cannot remain in one place.

11. The living entity in this frightful condition of life, bound by seven layers of material ingredients, prays with folded hands, appealing to the Lord, who has put him in that condition.

12. The human soul says: I take shelter of the lotus feet of the Supreme Personality of Godhead, who appears in His various eternal forms and walks on the surface of the world. I take shelter of Him only, because He can give me relief from all fear and from Him I have received this condition of life, which is just befitting my impious activities.

13. I, the pure soul, appearing now bound by my activities, am lying in the womb of my mother by the arrangement of maya. I offer my respectful obeisances unto Him who is also here with me but who is unaffected and changeless. He is unlimited, but He is perceived in the repentant heart. To Him I offer my respectful obeisances.

14. I am separated from the Supreme Lord because of my being in this material body, which is made of five elements, and therefore my qualities and senses are being misused, although I am essentially spiritual. Because the Supreme Personality of Godhead is transcendental to material nature and the living entities, because He is devoid of such a material body, and because He is always glorious in His spiritual qualities, I offer my obeisances unto Him.

15. The human soul further prays: The living entity is put under the influence of material nature and continues a hard struggle for existence on the path of repeated birth and death. This conditional life is due to his forgetfulness of his relationship with the Supreme Personality of Godhead. Therefore, without the Lord’s mercy, how can he again engage in the transcendental loving service of the Lord?

16. No one other than the Supreme Personality of Godhead, as the localized Paramatma, the partial representation of the Lord, is directing all inanimate and animate objects. He is present in the three phases of time–past, present and future. Therefore, the conditioned soul is engaged in different activities by His direction, and in order to get free from the threefold miseries of this conditional life, we have to surrender unto Him only.

17. Fallen into a pool of blood, stool and urine within the abdomen of his mother, his own body scorched by the mother’s gastric fire, the embodied soul, anxious to get out, counts his months and prays, “O my Lord, when shall I, a wretched soul, be released from this confinement?”

18. My dear Lord, by Your causeless mercy I am awakened to consciousness, although I am only ten months old. For this causeless mercy of the Supreme Personality of Godhead, the friend of all fallen souls, there is no way to express my gratitude but to pray with folded hands.

19. The living entity in another type of body sees only by instinct; he knows only the agreeable and
disagreeable sense perceptions of that particular body. But I have a body in which I can control my
senses and can understand my destination; therefore, I offer my respectful obeisances to the Supreme Personality of Godhead, by whom I have been blessed with this body and by whose grace I can see him within and without.

20. Therefore, my Lord, although I am living in a terrible condition, I do not wish to depart from my mother’s abdomen to fall again into the blind well of materialistic life. Your external energy, called deva-maya, at once captures the newly born child, and immediately false identification, which is the beginning of the cycle of continual birth and death, begins.

21. Therefore, without being agitated any more, I shall deliver myself from the darkness of nescience with the help of my friend, clear consciousness. Simply by keeping the lotus feet of Lord Visnu in my mind, I shall be saved from entering into the wombs of many mothers for repeated birth and death.

22. Lord Kapila continued: The ten-month-old living entity has these desires even while in the womb. But while he thus extols the Lord, the wind that helps parturition propels him forth with his face turned downward so that he may be born.

23. Pushed downward all of a sudden by the wind, the child comes out with great trouble, head downward, breathless and deprived of memory due to severe agony.

24. The child thus falls on the ground, smeared with stool and blood, and plays just like a worm
germinated from the stool. He loses his superior knowledge and cries under the spell of maya.

25. After coming out of the abdomen, the child is given to the care of persons who are unable to
understand what he wants, and thus he is nursed by such persons. Unable to refuse whatever is given to him, he falls into undesirable circumstances.

26. Laid down on a foul bed infested with sweat and germs, the poor child is incapable of scratching his body to get relief from his itching sensation to say nothing of sitting up, standing or even moving.

27. In his helpless condition, gnats, mosquitoes, bugs and other germs bite the baby, whose skin is tender, just as smaller worms bite a big worm. The child, deprived of his wisdom, cries bitterly.

28. In this way, the child passes through his childhood, suffering different kinds of distress, and attains boyhood. In boyhood also he suffers pain over desires to get things he can never achieve. And thus, due to ignorance, he becomes angry and sorry.

29. With the growth of the body, the living entity, in order to vanquish his soul, increases his false
prestige and anger and thereby creates enmity towards similarly lusty people.

30. By such ignorance the living entity accepts the material body, which is made of five elements, as himself. With this misunderstanding, he accepts nonpermanent things as his own and increases his ignorance in the darkest region.

31. For the sake of the body, which is a source of constant trouble to him and which follows him
because he is bound by ties of ignorance and fruitive activities, he performs various actions which cause him to be subjected to repeated birth and death.

32. If, therefore, the living entity again associates with the path of unrighteousness, influenced by
sensually minded people engaged in the pursuit of sexual enjoyment and the gratification of the palate, he again goes to hell as before.

33. He becomes devoid of truthfulness, cleanliness, mercy, gravity, spiritual intelligence, shyness, austerity, fame, forgiveness, control of the mind, control of the senses, fortune and all such opportunities.

34. One should not associate with a coarse fool who is bereft of the knowledge of self-realization and who is no more than a dancing dog in the hands of a woman.

35. The infatuation and bondage which accrue to a man from attachment to any other object is not as complete as that resulting from attachment to a woman or to the fellowship of men who are fond of women.

36. At the sight of his own daughter, Brahma was bewildered by her charms and shamelessly ran up to her in the form of a stag when she took the form of a hind.

37. Amongst all kinds of living entities begotten by Brahma, namely men, demigods and animals, none but the sage Narayana is immune to the attraction of maya in the form of woman.

38. Just try to understand the mighty strength of My maya in the shape of woman, who by the mere movement of her eyebrows can keep even the greatest conquerors of the world under her grip.

39. One who aspires to reach the culmination of yoga and has realized his self by rendering service unto Me should never associate with an attractive woman, for such a woman is declared in the scripture to be the gateway to hell for the advancing devotee.

40. The woman, created by the Lord, is the representation of maya, and one who associates with such maya by accepting services must certainly know that this is the way of death, just like a blind well covered with grass.

41. A living entity who, as a result of attachment to a woman in his previous life, has been endowed with the form of a woman, foolishly looks upon maya in the form of a man, her husband, as the bestower of wealth, progeny, house and other material assets.

42. A woman, therefore, should consider her husband, her house and her children to be the
arrangement of the external energy of the Lord for her death, just as the sweet singing of the hunter is death for the deer.

43. Due to his particular type of body, the materialistic living entity wanders from one planet to another, following fruitive activities. In this way, he involves himself in fruitive activities and enjoys the result incessantly.

44. In this way the living entity gets a suitable body with a material mind and senses, according to his fruitive activities. When the reaction of his particular activity comes to an end, that end is called death, and when a particular type of reaction begins, that beginning is called birth.

45-46. When the eyes lose their power to see color or form due to morbid affliction of the optic nerve, the sense of sight becomes deadened. The living entity, who is the seer of both the eyes and the sight, loses his power of vision. In the same way, when the physical body, the place where perception of objects occurs, is rendered incapable of perceiving, that is known as death. When one begins to view the physical body as one’s very self, that is called birth.

47. Therefore, one should not view death with horror, nor have recourse to defining the body as soul, nor give way to exaggeration in enjoying the bodily necessities of life. Realizing the true nature of the living entity, one should move about in the world free from attachment and steadfast in purpose.

48. Endowed with right vision and strengthened by devotional service and a pessimistic attitude towards material identity, one should relegate his body to this illusory world through his reason. Thus one can be unconcerned with this material world.

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – तीसवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Thirty

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: त्रिंश अध्यायः

श्लोक 1-34

देह-गेह में आसक्त पुरुषों की अधोगति का वर्णन

श्रीकपिल देव जी कहते हैं- माताजी! जिस प्रकार वायु के द्वारा उड़ाया जाने वाला मेघसमूह उसके बल को नहीं जानता, उसी प्रकार यह जीव भी बलवान् काल की प्रेरणा से भिन्न-भिन्न अवस्थाओं तथा योनियों में भ्रमण करता रहता है, किन्तु उसके प्रबल पराक्रम को नहीं जानता। जीव सुख की अभिलाषा से जिस-जिस वस्तु को बड़े कष्ट से प्राप्त करता है, उसी-उसी को भगवान् काल विनष्ट कर देता है-जिसके लिये उसे बड़ा शोक होता है। इसका कारण यही है कि यह मन्दमति जीव अपने इस नाशवान् शरीर तथा उसके सम्बन्धियों के घर, खेत और धन आदि को मोहवश नित्य मान लेता है। इस संसार में यह जीव जिस-जिस योनि में जन्म लेता है, उसी-उसी में आनन्द मानने लगता है और उस से विरक्त नहीं होता। यह भगवान् की माया से ऐसा मोहित हो रहा है कि कर्मवश नारकी योनियों में जन्म लेने पर भी वहाँ के विष्ठा आदि भोगों में ही सुख मानने के कारण उसे भी छोड़ना नहीं चाहता।यह मूर्ख अपने शरीर, स्त्री, पुत्र, गृह, पशु, धन और बन्धु-बान्धवों में अत्यन्त आसक्त होकर उनके सम्बन्ध में नाना प्रकार के मनोरथ करता हुआ अपने को बड़ा भाग्यशाली समझता है। इनके पालन-पोषण की चिन्ता से इसके सम्पूर्ण अंग जलते रहते हैं; तथापि दुर्वासनाओं से दूषित हृदय होने के कारण यह मूढ़ निरन्तर इन्हीं के लिये तरह-तरह के पाप करता रहता है। कुलटा स्त्रियों के द्वारा एकान्त में सम्भोगादि के समय प्रदर्शित किये हुए कपटपूर्ण प्रेम में तथा बालकों की मीठी-मीठी बातों में मन और इन्द्रियों के फँस जाने से गृहस्थ पुरुष घर के दुःख प्रधान कपटपूर्ण कर्मों में लिप्त हो जाता है। उस समय बहुत सावधानी करने पर यदि उसे किसी दुःख का प्रतीकार करने में सफलता मिल जाती है, तो उसे ही वह सुख-सा मान लेता है। जहाँ-तहाँ से भयंकर हिंसावृत्ति के द्वारा धन संचय कर यह ऐसे लोगों का पोषण करता है, जिनके पोषण से नरक में जाता है। स्वयं तो उनके खाने-पीने से बचे हुए अन्न को ही खाकर रहता है।

बार-बार प्रयत्न करने पर भी जब इसकी कोई जीविका नहीं चलती, तो यह लोभवश अधीर हो जाने से दूसरे के धन की इच्छा करने लगता है। जब मन्दभाग्य के कारण इसका कोई प्रयत्न नहीं चलता और यह मन्दबुद्धि धनहीन होकर कुटुम्ब के भरण-पोषण में असमर्थ हो जाता है, तब अत्यन्त दीन और चिन्तातुर होकर लंबी-लंबी साँसे छोड़ने लगता है। इसे अपने पालन-पोषण में असमर्थ देखकर वे स्त्री-पुत्रादि इसका पहले के समान आदर नहीं करते, जैसे कृपण किसान बूढ़े बैल की उपेक्षा कर देते हैं। फिर भी इसे वैराग्य नहीं होता। जिन्हें उसने स्वयं पाला था, वे ही अब उसका पालन करते हैं, वृद्धावस्था के कारण इसका रूप बिगड़ जाता है, शरीर रोगी हो जाता है, अग्नि मन्द पड़ जाती है, भोजन और पुरुषार्थ दोनों ही कम हो जाते हैं। वह मरणोन्मुख होकर घर में पड़ा रहता है और कुत्ते की भाँति स्त्री-पुत्रादि के अपमानपूर्वक दिये हुए टुकड़े खाकर जीवन-निर्वाह करता है। मृत्यु का समय निकट आने पर वायु के उत्क्रमण से इसकी पुतलियाँ चढ़ जाती हैं, श्वास-प्रश्वास की नलिकाएँ कफ से रुक जाती हैं, खाँसने और साँस लेने में भी इसे बड़ा कष्ट होता है तथा कफ बढ़ जाने के कारण कण्ठ में घुरघुराहट होने लगती है।यह अपने शोकातुर बन्धु-बान्धवों से घिरा हुआ पड़ा रहता है और मृत्युपाश के वशीभूत हो जाने से उनके बुलाने पर भी नहीं बोल सकता। इस प्रकार जो मूढ़ पुरुष इन्द्रियों को न जीतकर निरन्तर कुटुम्ब-पोषण में ही लगा रहता है, वह रोते हुए स्वजनों के बीच अत्यन्त वेदना से अचेत होकर मृत्यु को प्राप्त होता है। इस अवसर पर उसे लेने के लिये अति भयंकर और रोषयुक्त नेत्रों वाले जो दो यमदूत आते हैं, उन्हें देखकर वह भय के कारण मल-मूत्र कर देता है। वे यमदूत उसे यातनादेह में डाल देते हैं और फिर जिस प्रकार सिपाही किसी अपराधी को ले जाते हैं, उसी प्रकार उसके गले में रस्सी बाँधकर बलात् यमलोक की लंबी यात्रा में उसे ले जाते हैं।

उनकी घुड़कियों से उसका हृदय फटने और शरीर काँपने लगता है, मार्ग में उसे कुत्ते नोचते हैं। उस समय अपने पापों को याद करके वह व्याकुल हो उठता है। भूख-प्यास उसे बेचैन कर देती है तथा घाम, दावानल और लूओं से वह तप जाता है। ऐसी अवस्था में जल और विश्रामस्थान से रहित उस तप्तबालुकामय मार्ग में जब उसे एक पग आगे बढ़ने की ही शक्ति नहीं रहती, यमदूत उसकी पीठ पर कोड़े बरसाते हैं, तब बड़े कष्ट से उसे चलना ही पड़ता है। वह जहाँ-तहाँ थककर गिर जाता है, मूर्च्छा आ जाती है, चेतना आने पर फिर उठता है। इस प्रकार अति दुःखमय अँधेरे मार्ग से अत्यन्त क्रूर यमदूत उसे शीघ्रता से यमपुरी को ले जाते हैं। यमलोक का मार्ग निन्यानबे हजार योजन है। इतने लम्बे मार्ग को दो-ही-तीन मुहूर्त में तय करके वह नरक में तरह-तरह की यातनाएँ भोगता है। वहाँ उसके शरीर को धधकती लकड़ियों आदि के बीच में डालकर जलाया जाता है, कहीं स्वयं और दूसरों के द्वारा काट-काटकर उसे अपना ही मांस खिलाया जाता है। यमपुरी के कुत्तों अथवा गिद्धों द्वारा जीते-जी उसकी आँतें खींची जाती हैं। साँप, बिच्छू और डांस आदि डसने वाले तथा डंक मारने वाले जीवों से शरीर को पीड़ा पहुँचायी जाती है। शरीर को काटकर टुकड़े-टुकड़े किये जाते हैं। उसे हाथियों से चिरवाया जाता है, पर्वत शिखरों से गिराया जाता है अथवा जल या गढ़े में डालकर बन्द कर दिया जाता है। ये सब यातनाएँ तथा इसी प्रकार तामिस्त्र, अन्धतामिस्त्र एवं रौरव आदि नरकों की और भी अनेकों यन्त्रणाएँ, स्त्री हो या पुरुष, उस जीव को पारस्परिक संसर्ग से होने वाले पाप के कारण भोगनी ही पड़ती हैं।

माताजी! कुछ लोगों का कहना है कि स्वर्ग और नरक तो इसी लोक में हैं, क्योंकि जो नारकी यातनाएँ हैं, वे यहाँ भी देखी जाती हैं। इस प्रकार अनेक कष्ट भोगकर अपने कुटुम्ब का ही पालन करने वाला अथवा केवल अपना ही पेट भरने वाला पुरुष उन कुटुम्ब और शरीर-दोनों को यहीं छोड़कर मरने के बाद अपने किये हुए पापों का ऐसा फल भोगता है। अपने इस शरीर को यही छोड़कर प्राणियों से द्रोह करके एकत्रित किये हुए पापरूप पाथेय को साथ लेकर वह अकेला ही नरक में जाता है। मनुष्य अपन कुटुम्ब का पेट पालने में जो अन्याय करता है, उसका दैवविहित कुफल वह नरक में जाकर भोगता है। उस समय वह ऐसा व्याकुल होता है, मानो उसका सर्वस्व लुट गया हो। जो पुरुष निरी पाप की कमाई से ही अपने परिवार का पालन करने में व्यस्त रहता है, वह अन्धतामिस्त्र नरक में जाता है-जो नरकों में चरम सीमा का कष्टप्रद स्थान है। मनुष्य-जन्म मिलने के पूर्व जितनी भी यातनाएँ हैं तथा शूकर-कुकरादि योनियों के जितने कष्ट हैं, उन सबको क्रम से भोगकर शुद्ध हो जाने पर वह फिर मनुष्य योनि में जन्म लेता है।

Chapter Thirty: Description by Lord Kapila of Adverse Fruitive Activities

1. The Personality of Godhead said: As a mass of clouds does not know the powerful influence of the wind, a person engaged in material consciousness does not know the powerful strength of the time factor, by which he is being carried.

2. Whatever is produced by the materialist with great pain and labor for so-called happiness, the
Supreme Personality, as the time factor, destroys, and for this reason the conditioned soul laments.

3. The misguided materialist does not know that his very body is impermanent and that the attractions of home, land and wealth, which are in relationship to that body, are also temporary. Out of ignorance only, he thinks that everything is permanent.

4. The living entity, in whatever species of life he appears, finds a particular type of satisfaction in that species, and he is never averse to being situated in such a condition.

5. The conditioned living entity is satisfied in his own particular species of life; while deluded by the covering influence of the illusory energy, he feels little inclined to cast off his body, even when in hell, for he takes delight in hellish enjoyment.

6. Such satisfaction with one’s standard of living is due to deep-rooted attraction for body, wife, home, children, animals, wealth and friends. In such association, the conditioned soul thinks himself quite perfect.

7. Although he is always burning with anxiety, such a fool always performs all kinds of mischievous activities, with a hope which is never to be fulfilled, in order to maintain his so-called family and society.

8. He gives heart and senses to a woman, who falsely charms him with maya. He enjoys solitary
embraces and talking with her, and he is enchanted by the sweet words of the small children.

9. The attached householder remains in his family life, which is full of diplomacy and politics. Always spreading miseries and controlled by acts of sense gratification, he acts just to counteract the reactions of all his miseries, and if he can successfully counteract such miseries, he thinks that he is happy.

10. He secures money by committing violence here and there, and although he employs it in the service of his family, he himself eats only a little portion of the food thus purchased, and he goes to hell for those for whom he earned the money in such an irregular way.

11. When he suffers reverses in his occupation, he tries again and again to improve himself, but when he is baffled in all attempts and is ruined, he accepts money from others because of excessive greed.

12. Thus the unfortunate man, unsuccessful in maintaining his family members, is bereft of all beauty. He always thinks of his failure, grieving very deeply.

13. Seeing him unable to support them, his wife and others do not treat him with the same respect as before, even as miserly farmers do not accord the same treatment to their old and worn-out oxen.

14. The foolish family man does not become averse to family life although he is maintained by those whom he once maintained. Deformed by the influence of old age, he prepares himself to meet ultimate death.

15. Thus he remains at home just like a pet dog and eats whatever is so negligently given to him.
Afflicted with many illnesses, such as dyspepsia and loss of appetite, he eats only very small morsels of food, and he becomes an invalid, who cannot work any more.

16. In that diseased condition, one’s eyes bulge due to the pressure of air from within, and his glands become congested with mucus. He has difficulty breathing, and upon exhaling and inhaling he produces a sound like ghura-ghura, a rattling within the throat.

17. In this way he comes under the clutches of death and lies down, surrounded by lamenting friends and relatives, and although he wants to speak with them, he no longer can because he is under the control of time.

18. Thus the man, who engaged with uncontrolled senses in maintaining a family, dies in great grief, seeing his relatives crying. He dies most pathetically, in great pain and without consciousness.

19. At death, he sees the messengers of the lord of death come before him, their eyes full of wrath, and in great fear he passes stool and urine.

20. As a criminal is arrested for punishment by the constables of the state, a person engaged in criminal sense gratification is similarly arrested by the Yamadutas, who bind him by the neck with strong rope and cover his subtle body so that he may undergo severe punishment.

21. While carried by the constables of Yamaraja, he is overwhelmed and trembles in their hands. While passing on the road he is bitten by dogs, and he can remember the sinful activities of his life. He is thus terribly distressed.

22. Under the scorching sun, the criminal has to pass through roads of hot sand with forest fires on both sides. He is whipped on the back by the constables because of his inability to walk, and he is afflicted by hunger and thirst, but unfortunately there is no drinking water, no shelter and no place for rest on the road.

23. While passing on that road to the abode of Yamaraja, he falls down in fatigue, and sometimes he becomes unconscious, but he is forced to rise again. In this way he is very quickly brought to the presence of Yamaraja.

24. Thus he has to pass ninety-nine thousand yojanas within two or three moments, and then he is at once engaged in the torturous punishment which he is destined to suffer.

25. He is placed in the midst of burning pieces of wood, and his limbs are set on fire. In some cases he is made to eat his own flesh or have it eaten by others.

26. His entrails are pulled out by the hounds and vultures of hell, even though he is still alive to see it, and he is subjected to torment by serpents, scorpions, gnats and other creatures that bite him.

27. Next his limbs are lopped off and torn asunder by elephants. He is hurled down from hilltops, and he is also held captive either in water or in a cave.

28. Men and women whose lives were built upon indulgence in illicit sex life are put into many kinds of miserable conditions in the hells known as Tamisra, Andha-tamisra and Raurava.

29. Lord Kapila continued: My dear mother, it is sometimes said that we experience hell or heaven on this planet, for hellish punishments are sometimes visible on this planet also.

30. After leaving this body, the man who maintained himself and his family members by sinful activities suffers a hellish life, and his relatives suffer also.

31. He goes alone to the darkest regions of hell after quitting the present body, and the money he
acquired by envying other living entities is the passage money with which he leaves this world.

32. Thus, by the arrangement of the Supreme Personality of Godhead, the maintainer of kinsmen is put into a hellish condition to suffer for his sinful activities, like a man who has lost his wealth.

33. Therefore a person who is very eager to maintain his family and kinsmen simply by black methods certainly goes to the darkest region of hell, which is known as Andha-tamisra.

34. Having gone through all the miserable, hellish conditions and having passed in a regular order
through the lowest forms of animal life prior to human birth, and having thus been purged of his sins, one is reborn again as a human being on this earth.

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – उनतीसवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Twenty Nine

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: एकोनत्रिंश अध्यायः श्लोक 1-45 

भक्ति का मर्म और काल की महिमा

देवहूति ने पूछा- प्रभो! प्रकृति, पुरुष और महत्तत्त्वादि का जैसा लक्षण सांख्यशास्त्र में कहा गया है तथा जिसके द्वारा उनका वास्तविक स्वरूप अलग-अलग जाना जाता है और भक्तियोग को ही जिसका प्रयोजन कहा गया है, वह आपने मुझे बताया। अब कृपा करके भक्तियोग का मार्ग मुझे विस्तारपूर्वक बताइये। इसके सिवा जीवों की जन्म-मरणरूपा अनेक प्रकार की गतियों का भी वर्णन कीजिये; जिनके सुनने से जीव को सब प्रकार की वस्तुओं से वैराग्य होता है। जिसके भय से लोग शुभ कर्मों में प्रवृत्त होते हैं और जो ब्रह्मादि का भी शासन करने वाला है, उस सर्वसमर्थ काल का स्वरूप भी आप मुझसे कहिये। ज्ञानदृष्टि के लुप्त हो जाने के कारण देहादि मिथ्या वस्तुओं में जिन्हें आत्माभिमान हो गया तथा बुद्धि के कर्मासक्त रहने के कारण अत्यन्त श्रमिक होकर जो चिरकाल से अपार अन्धकारमय संसार में सोये पड़े हैं, उन्हें जगाने के लिये आप योगप्रकाशक सूर्य ही प्रकट हुए हैं।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- कुरुश्रेष्ठ विदुर जी! माता के ये मनोहर वचन सुनकर महामुनि कपिल जी ने उनकी प्रशंसा की और जीवों के प्रति दया से द्रवित हो बड़ी प्रसन्नता के साथ उनसे इस प्रकार बोले-

श्रीभगवान् ने कहा- माताजी! साधकों के भाव के अनुसार भक्तियोग का अनेक प्रकार से प्रकाश होता है, क्योंकि स्वभाव और गुणों के भेद से मनुष्यों के भाव में भी विभिन्नता आ जाती है। जो भेददर्शी क्रोधी पुरुष हृदय में हिंसा, दम्भ अथवा मात्सर्य का भाव रखकर मुझसे प्रेम करता है, वह मेरा तामस भक्त है। जो पुरुष विषय, यश और ऐश्वर्य की कामना से प्रतिमादि में मेरा भेदभाव से पूजन करता है, वह राजस भक्त है। जो व्यक्ति पापों का क्षय करने के लिये, परमात्मा को अर्पण करने के लिये और मेरा पूजन करना कर्तव्य है-इस बुद्धि से मेरा भेदभाव से पूजन करता है, वह सात्त्विक भक्त है। जिस प्रकार गंगा का प्रवाह अखण्ड रूप से समुद्र की ओर बहता रहता है, उसी प्रकार मेरे गुणों के श्रवणमात्र से मन की गति का तैल धारावत् अविच्छिन्न रूप से मुझ सर्वान्तर्यामी के प्रति हो जाना तथा मुझ पुरुषोत्तम में निष्काम और अनन्य प्रेम होना-यह निर्गुण भक्तियोग का लक्षण कहा गया है। ऐसे निष्काम भक्त, दिये जाने पर भी, मेरी सेवा को छोड़कर सालोक्य (भगवान् के नित्य धाम में निवास) , सार्ष्टि (भगवान् के समान ऐश्वर्य भोग), सामीप्य (भगवान् की नित्य समीपता) और सारूप्य (भगवान् का-सा रूप) और सायुज्य (भगवान् के विग्रह में समा जाना, उनसे एक हो जाना या ब्रह्मरूप प्राप्त कर लेना) मोक्ष तक नहीं लेते-भगवत् सेवा के लिये मुक्ति का तिरस्कार करने वाला यह भक्तियोग ही परम पुरुषार्थ अथवा साध्य कहा गया है। इसके द्वारा पुरुष तीनों गुणों को लाँघकर मेरे भाव-मेरे प्रेमरूप अप्राकृत स्वरूप को प्राप्त हो जाता है।

निष्कामभाव से श्रद्धापूर्वक अपने नित्य-नैमित्तिक कर्तव्यों का पालन कर, नित्यप्रति हिंसारहित उत्तम क्रियायोग का अनुष्ठान करने, मेरी प्रतिमा का दर्शन, स्पर्श, पूजा, स्तुति और वन्दना करने, प्राणियों में मेरी भावना करने, धैर्य और वैराग्य के अवलम्बन, महापुरुषों का मान, दीनों पर दया और समान स्थिति वालों के प्रति मित्रता का व्यवहार करने, यम-नियमों का पालन, अध्यात्म शास्त्रों का श्रवण और मेरे नामों का उच्च स्वर से कीर्तन करने से तथा मन की सरलता, सत्पुरुषों के संग और अहंकार के त्याग से मेरे धर्मों का (भागवत धर्मों का) अनुष्ठान करने वाले भक्तपुरुष का चित्त अत्यन्त शुद्ध होकर मेरे गुणों के श्रवणमात्र से अनायास ही मुझमें लग जाता है।

जिस प्रकार वायु के द्वारा उड़कर जाने वाला गन्ध अपने आश्रय पुष्प से घ्राणेन्द्रिय तक पहुँच जाता है, उसी प्रकार भक्तियोग में तत्पर और राग-द्वेषादि विकारों से शून्यचित्त परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। मैं आत्मारूप से सदा सभी जीवों में स्थित हूँ; इसलिये जो लोग मुझ सर्वभूत स्थित परमात्मा का अनादर करके केवल प्रतिमा में ही मेरा पूजन करते हैं, उनकी वह पूजा स्वाँग मात्र है। मैं सबका आत्मा, परमेश्वर सभी भूतों में स्थित हूँ; ऐसी दशा में जो मोहवश मेरी उपेक्षा करके केवल प्रतिमा के पूजन में ही लगा रहता है, वह तो मानो भस्म में ही हवन करता है। जो भेददर्शी और और अभिमानी पुरुष दूसरे जीवों के साथ वैर बाँधता है और इस प्रकार उनके शरीरों में विद्यमान मुझ आत्मा से ही द्वेष करता है, उसके मन को कभी शान्ति नहीं मिलती।

माताजी! जो दूसरे जीवों का अपमान करता है, वह बहुत-सी घटिया-बढ़िया सामग्रियों से अनेक प्रकार के विधि-विधान के साथ मेरी मूर्ति का पूजन भी करे तो भी मैं उससे प्रसन्न नहीं हो सकता। मनुष्य अपने धर्म का अनुष्ठान करता हुआ तब तक मुझ ईश्वर की प्रतिमा आदि में पूजा करता रहे, जब तक उसे अपने हृदय में एवं सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित परमात्मा का अनुभव न हो जाये। जो व्यक्ति आत्मा और परमात्मा के बीच में थोड़ा-सा भी अन्तर करता है, उस भेददर्शी को मैं मृत्युरूप महान् भय उपस्थित करता हूँ। अतः सम्पूर्ण प्राणियों के भीतर घर बनाकर उन प्राणियों के ही रूप में स्थित मुझ परमात्मा का यथायोग्य दान, मान, मित्रता के व्यवहार तथा समदृष्टि के द्वारा पूजन करना चाहिये।

माताजी! पाषाणादि अचेतनों की अपेक्षा वृक्षादि जीव श्रेष्ठ हैं, उनसे साँस लेने वाले प्राणी श्रेष्ठ हैं, उनमें भी मन वाले प्राणी उत्तम और उनसे इन्द्रिय की वृत्तियों से युक्त प्राणी श्रेष्ठ हैं। सेन्द्रिय प्राणियों में ही केवल स्पर्श का अनुभव करने वालों की अपेक्षा रस का ग्रहण कर सकने वाले मत्स्यादि उत्कृष्ट हैं तथा रसवेत्ताओं की अपेक्षा गन्ध का अनुभव करने वाले (भ्रमरादि) और गन्ध का ग्रहण करने वालों से भी शब्द का ग्रहण करने वाले (सर्पादि) श्रेष्ठ हैं। उनसे भी रूप का अनुभव करने वाले (काकादि) उत्तम हैं और उनकी अपेक्षा जिनके ऊपर-नीचे दोनों ओर दाँत होते हैं, वे जीव श्रेष्ठ हैं। उनमें भी बिना पैर वालों से बहुत-से चरणों वाले श्रेष्ठ हैं तथा बहुत चरणों वालों से भी दो चरण वाले मनुष्य श्रेष्ठ हैं। मनुष्यों में भी चार वर्ण श्रेष्ठ हैं; उसमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ है। ब्राह्मणों में वेद को जानने वाले उत्तम हैं और वेदज्ञों में भी वेद का तात्पर्य जानने वाले श्रेष्ठ हैं। तात्पर्य जानने वालों से संशय निवारण करने वाले, उनसे भी अपने वर्णाश्रमोचित धर्म का पालन करने वाले तथा उनसे भी आसक्ति का त्याग और अपने धर्म का निष्कामभाव से आचरण करने वाले श्रेष्ठ हैं।

उनकी अपेक्षा भी जो लोग अपने सम्पूर्ण कर्म, उनके फल तथा अपने शरीर को भी मुझे ही अर्पण करके भेदभाव छोड़कर मेरी उपासना करते हैं, वे श्रेष्ठ हैं। इस प्रकार मुझे ही चित्त और कर्म समर्पण करने वाले अकर्ता और समदर्शी पुरुष से बढ़कर मुझे कोई अन्य प्राणी नहीं दीखता। अतः यह मानकर कि जीवरूप अपने अंश से साक्षात् भगवान् ही सबमें अनुगत हैं, इस समस्त प्राणियों को बड़े आदर के साथ मन से प्रणाम करे।

माताजी! इस प्रकार मैंने तुम्हारे लिये भक्तियोग और अष्टांगयोग का वर्णन किया। इसमें से एक का भी साधन करने से जीव परमपुरुष भगवान् को प्राप्त कर सकता है। भगवान् परमात्मा परब्रह्म का अद्भुत प्रभाव सम्पन्न तथा जागतिक पदार्थों के नानाविध वैचित्र्य का हेतुभूत स्वरूपविशेष ही ‘काल’ नाम से विख्यात है। प्रकृति और पुरुष इसी के रूप हैं तथा इनसे यह पृथक् भी है। नाना प्रकार के कर्मों का मूल अदृष्ट भी यही है तथा इसी से महत्तत्त्वादि के अभिमानी भेददर्शी प्राणियों को सदा भय लगा रहता है। जो सबका आश्रय होने के कारण समस्त प्राणियों में अनुप्रविष्ट होकर भूतों द्वारा ही उनका संहार करता है, वह जगत् का शासन करने वाले ब्रह्मादि का भी प्रभु भगवान् काल ही यज्ञों का फल देने वाला विष्णु है।

इसका न तो कोई मित्र है न कोई शत्रु और न तो कोई सगा-सम्बन्धी ही है। यह सर्वदा सजग रहता है और अपने स्वरूपभूत श्रीभगवान् को भूलकर भोगरूप प्रमाद में पड़े हुए प्राणियों पर आक्रमण करके उनका संहार करता है। इसी के भय से वायु चलता है, इसी के भय से सूर्य तपता है, इसी के भय से इन्द्र वर्षा करते हैं और इसी के भय से तारे चमकते हैं। इसी से भयभीत होकर ओषधियों के सहित लताएँ और सारी वनस्पतियाँ समय-समय पर फल-फूल धारण करती हैं। इसी के डर से नदियाँ बहती हैं और समुद्र अपनी मर्यादा से बाहर नहीं जाता। इसी के भय से अग्नि प्रज्वलित होती है और पर्वतों के सहित पृथ्वी जल में नहीं डूबती। इसी के शासन से यह आकाश जीवित प्राणियों को श्वास-प्रश्वास के लिये अवकाश देता है और महत्तत्त्व अहंकाररूप शरीर का सात आवरणों से युक्त ब्राह्मण के रूप में विस्तार करता है।

इस काल के ही भय से सत्त्वादि गुणों के नियामक विष्णु आदि देवगण, जिनके अधीन यह सारा चराचर जगत् है, अपने जगत्-रचना आदि कार्यों में युगक्रम से तत्पर रहते हैं। यह अविनाशी काल स्वयं अनादि किन्तु दूसरों का आदिकर्ता (उत्पादक) है तथा स्वयं अनन्त होकर भी दूसरों का अन्त करने वाला है। यह पिता से पुत्र की उत्पत्ति कराता हुआ सारे जगत् की रचना करता है और अपनी संहार शक्ति मृत्यु के द्वारा यमराज को भी मरवाकर इसका अन्त कर देता है।

Chapter Twenty-nine: Explanation of Devotional Service by Lord Kapila

1-2. Devahuti inquired: My dear Lord, You have already very scientifically described the symptoms of the total material nature and the characteristics of the spirit according to the Sankhya system of philosophy. Now I shall request You to explain the path of devotional service, which is the ultimate end of all philosophical systems.

3. Devahuti continued: My dear Lord, please also describe in detail, both for me and for people in
general, the continual process of birth and death, for by hearing of such calamities we may become detached from the activities of this material world.

4. Please also describe eternal time, which is a representation of Your form and by whose influence people in general engage in the performance of pious activities.

5. My dear Lord, You are just like the sun, for You illuminate the darkness of the conditional life of the living entities. Because their eyes of knowledge are not open, they are sleeping eternally in that darkness without Your shelter, and therefore they are falsely engaged by the actions and reactions of their material activities, and they appear to be very fatigued.

6. Sri Maitreya said: O best amongst the Kurus, the great sage Kapila, moved by great compassion and pleased by the words of His glorious mother, spoke as follows.

7. Lord Kapila, the Personality of Godhead, replied: O noble lady, there are multifarious paths of devotional service in terms of the different qualities of the executor.

8. Devotional service executed by a person who is envious, proud, violent and angry, and who is a
separatist, is considered to be in the mode of darkness.

9. The worship of Deities in the temple by a separatist, with a motive for material enjoyment, fame and opulence, is devotion in the mode of passion.

10. When a devotee worships the Supreme Personality of Godhead and offers the results of his activities in order to free himself from the inebrieties of fruitive activities, his devotion is in the mode of goodness.

11-12. The manifestation of unadulterated devotional service is exhibited when one’s mind is at once attracted to hearing the transcendental name and qualities of the Supreme Personality of Godhead, who is residing in everyone’s heart. Just as the water of the Ganges flows naturally down towards the ocean, such devotional ecstasy, uninterrupted by any material condition, flows towards the Supreme Lord.

13. A pure devotee does not accept any kind of liberation–salokya, sarsti, samipya, sarupya or ekatva–even though they are offered by the Supreme Personality of Godhead.

14. By attaining the highest platform of devotional service, as I have explained, one can overcome the influence of the three modes of material nature and be situated in the transcendental stage, as is the Lord.

15. A devotee must execute his prescribed duties, which are glorious, without material profit. Without excessive violence, one should regularly perform one’s devotional activities.

16. The devotee should regularly see My statues in the temple, touch My lotus feet and offer
worshipable paraphernalia and prayer. He should see in the spirit of renunciation, from the mode of goodness, and see every living entity as spiritual.

17. The pure devotee should execute devotional service by giving the greatest respect to the spiritual master and the acaryas. He should be compassionate to the poor and make friendship with persons who are his equals, but all his activities should be executed under regulation and with control of the senses.

18. A devotee should always try to hear about spiritual matters and should always utilize his time in chanting the holy name of the Lord. His behavior should always be straightforward and simple, and although he is not envious but friendly to everyone, he should avoid the company of persons who are not spiritually advanced.

19. When one is fully qualified with all these transcendental attributes and his consciousness is thus completely purified, he is immediately attracted simply by hearing My name or hearing of My transcendental quality.

20. As the chariot of air carries an aroma from its source and immediately catches the sense of smell,similarly, one who constantly engages in devotional service, in Krsna consciousness, can catch the Supreme Soul, who is equally present everywhere.

21. I am present in every living entity as the Supersoul. If someone neglects or disregards that Supersoul everywhere and engages himself in the worship of the Deity in the temple, that is simply imitation.

22. One who worships the Deity of Godhead in the temples but does not know that the Supreme Lord, as Paramatma, is situated in every living entity’s heart, must be in ignorance and is compared to one who offers oblations into ashes.

23. One who offers Me respect but is envious of the bodies of others and is therefore a separatist never attains peace of mind, because of his inimical behavior towards other living entities.

24. My dear Mother, even if he worships with proper rituals and paraphernalia, a person who is ignorant of My presence in all living entities never pleases Me by the worship of My Deities in the temple.

25. Performing his prescribed duties, one should worship the Deity of the Supreme Personality of
Godhead until one realizes My presence in his own heart and in the hearts of other living entities as well.

26. As the blazing fire of death, I cause great fear to whoever makes the least discrimination between himself and other living entities because of a differential outlook.

27. Therefore, through charitable gifts and attention, as well as through friendly behavior and by viewing all to be alike, one should propitiate Me, who abide in all creatures as their very Self.

28. Living entities are superior to inanimate objects, O blessed mother, and among them, living entities who display life symptoms are better. Animals with developed consciousness are better than them, and better still are those who have developed sense perception.

29. Among the living entities who have developed sense perception, those who have developed the sense of taste are better than those who have developed only the sense of touch. Better than them are those who have developed the sense of smell, and better still are those who have developed the sense of hearing.

30. Better than those living entities who can perceive sound are those who can distinguish between one form and another. Better than them are those who have developed upper and lower sets of teeth, and better still are those who have many legs. Better than them are the quadrupeds, and better still are the human beings.

31. Among human beings, the society which is divided according to quality and work is best, and in that society, the intelligent men, who are designated as brahmanas, are best. Among the brahmanas, one who has studied the Vedas is the best, and among the brahmanas who have studied the Vedas, one who knows the actual purport of Veda is the best.

32. Better than the brahmana who knows the purpose of the Vedas is he who can dissipate all doubts, and better than him is one who strictly follows the brahminical principles. Better than him is one who is liberated from all material contamination, and better than him is a pure devotee, who executes devotional service without expectation of reward.

33. Therefore I do not find a greater person than he who has no interest outside of Mine and who
therefore engages and dedicates all his activities and all his life–everything–unto Me without cessation.

34. Such a perfect devotee offers respects to every living entity because he is under the firm conviction that the Supreme Personality of Godhead has entered the body of every living entity as the Supersoul, or controller.

35. My dear mother, O daughter of Manu, a devotee who applies the science of devotional service and mystic yoga in this way can achieve the abode of the Supreme Person simply by that devotional service.

36. This purusa whom the individual soul must approach is the eternal form of the Supreme Personality of Godhead, who is known as Brahman and Paramatma. He is the transcendental chief personality, and his activities are all spiritual.

37. The time factor, who causes the transformation of the various material manifestations, is another feature of the Supreme Personality of Godhead. Anyone who does not know that time is the same
Supreme Personality is afraid of the time factor.

38. Lord Visnu, the Supreme Personality of Godhead, who is the enjoyer of all sacrifices, is the time factor and the master of all masters. He enters everyone’s heart, He is the support of everyone, and He causes every being to be annihilated by another.

39. No one is dear to the Supreme Personality of Godhead, nor is anyone His enemy or friend. But He gives inspiration to those who have not forgotten Him and destroys those who have.

40. Out of fear of the Supreme Personality of Godhead the wind blows, out of fear of Him the sun shines, out of fear of Him the rain pours forth showers, and out of fear of Him the host of heavenly bodies shed their luster.

41. Out of fear of the Supreme Personality of Godhead the trees, creepers, herbs and seasonal plants and flowers blossom and fructify, each in its own season.

42. Out of fear of the Supreme Personality of Godhead the rivers flow, and the ocean never overflows. Out of fear of Him only does fire burn and does the earth, with its mountains, not sink in the water of the universe.

43. Subject to the control of the Supreme Personality of Godhead, the sky allows outer space to accommodate all the various planets, which hold innumerable living entities. The total universal body expands with its seven coverings under His supreme control.

44. Out of fear of the Supreme Personality of Godhead, the directing demigods in charge of the modes of material nature carry out the functions of creation, maintenance and destruction; everything animate and inanimate within this material world is under their control.

45. The eternal time factor has no beginning and no end. It is the representative of the Supreme
Personality of Godhead, the maker of the criminal world. It brings about the end of the phenomenal world, it carries on the work of creation by bringing one individual into existence from another, and likewise it dissolves the universe by destroying even the lord of death, Yamaraja.

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – सत्ताईसवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Twenty Seven

श्रीमद्भागवत महापुराण:

तृतीय स्कन्ध: सप्तविंश अध्यायः श्लोक 1-30

प्रकृति-पुरुष के विवेक से मोक्ष-प्राप्ति का वर्णन

श्रीभगवान् कहते हैं- माताजी! जिस तरह जल में प्रतिबिम्ब सूर्य के साथ जल में शीतलता, चंचलता आदि गुणों का सम्बन्ध नहीं होता, उसी प्रकार प्रकृति के कार्य शरीर में स्थित रहने पर भी आत्मा वास्तव में उसके सुख-दुःखादि धर्मों से लिप्त नहीं होता; क्योंकि वह स्वभाव से निर्विकार, अकर्ता और निर्गुण है। किन्तु जब वही प्राकृत गुणों से अपना सम्बन्ध स्थापित कर लेता है, तब अहंकार से मोहित होकर ‘मैं कर्ता हूँ’-ऐसा मानने लगता है। उस अभिमान के कारण वह देह के संसर्ग से किये हुए पुण्य-पापरूप कर्मो के दोष से अपनी स्वाधीनता और शान्ति खो बैठता है तथा उत्तम, मध्यम और नीच योनियों में उत्पन्न होकर संसार चक्र में घूमता रहता है। जिस प्रकार स्वप्न के पदार्थों में आस्था हो जाने के कारण दुःख उठाना पड़ता है, उसी प्रकार भय-शोक, अहं-मम एवं जन्म-मरणादिरूप संसार की कोई सत्ता न होने पर भी अविद्यावश विषयों का चिन्तन करते रहने से जीव का संसार-चक्र कभी निवृत्त नहीं होता। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को उचित है कि असन्मार्ग (विषय-चिन्तन) में फँसे हुए चित्त को तीव्र भक्तियोग और वैराग्य के द्वारा धीरे-धीरे अपने वश में लावे। यमादि योग साधनों के द्वारा श्रद्धापूर्वक अभ्यास-चित्त को बारम्बार एकाग्र करते हुए मुझमें सच्चा भाव रखने, मेरी कथा श्रवण करने, समस्त प्राणियों में समभाव रखने, किसी से वैर न करने, आसक्ति के त्याग, ब्रह्मचर्य, मौन-व्रत और बलिष्ठ (अर्थात् भगवान् को समर्पित किये हुए) स्वधर्म से जिसे ऐसी स्थिति प्राप्त हो गयी है कि-प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ मिल जाता है उसी में सन्तुष्ट रहता है, परिमित भोजन करता है, सदा एकान्त में रहता है, शान्त स्वभाव है, सबका मित्र है, दयालु और धर्यवान् है, प्रकृति और पुरुष के वास्तविक स्वरूप के अनुभव से प्राप्त हुए तत्त्वज्ञान के कारण स्त्री-पुत्रादि सम्बन्धियों के सहित इस देह में मैं-मेरेपन का मिथ्या अभिनिवेश नहीं करता, बुद्धि की जाग्रदादि अवस्थाओं से भी अलग हो गया है तथा परमात्मा के सिवा और कोई वस्तु नहीं देखता-वह आत्मदर्शी मुनि नेत्रों से सूर्य को देखने कि भाँति अपने शुद्ध अन्तःकरण द्वारा परमात्मा का साक्षात्कार कर उस अद्वितीय ब्रह्मपद को प्राप्त हो जाता है, जो देहादि सम्पूर्ण उपाधियों से पृथक्, अहंकारादि मिथ्या वस्तुओं में सत्यरूप से भासने वाला, जगत्कारणभूता प्रकृति का अधिष्ठान, महदादि कार्य-वर्ग का प्रकाशक और कार्य-कारणरूप सम्पूर्ण पदार्थों में व्याप्त है। जिस प्रकार जल में पड़ा हुआ सूर्य का प्रतिबिम्ब दीवाल पर पड़े हुए अपने आभास के सम्बन्ध से देखा जाता है और जल में दीखने वाले प्रतिबिम्ब से आकाशास्थित सूर्य का ज्ञान होता है, उसी प्रकार वैकारिक आदि भेद से तीन प्रकार का अहंकार देह, इन्द्रिय और मन में स्थित अपने प्रतिबिम्बों से लक्षित होता है और फिर सत् परमात्मा के प्रतिबिम्ब युक्त उस अहंकार के द्वारा सत्य ज्ञानस्वरूप परमात्मा का दर्शन होता है-जो सुषुप्ति के समय निद्रा से शब्दादि भूतसूक्ष्म, इन्द्रिय और मनबुद्धि आदि के अव्याकृत में लीन हो जाने पर स्वयं जागता रहता है और सर्वथा अहंकार शून्य है। (जाग्रत्-अवस्था में यह आत्मा भूत-सूक्ष्मादि दृश्य वर्ग के द्रष्टारूप में स्पष्टतया अनुभव में आता है; किन्तु) सुषुप्ति के समय अपने उपाधिभूत अहंकार का नाश होने से वह भ्रमवश अपने को ही नष्ट हुआ मान लेता है और जिस प्रकार धन का नाश हो जाने पर मनुष्य अपने को ही नष्ट हुआ मानकर अत्यन्त व्याकुल हो जाता है, उसी प्रकार वह भी अत्यन्त विवश होकर नष्टवत् हो जाता है। माताजी! इन सब बातों का मनन करके विवेकी पुरुष अपने आत्मा का अनुभव कर लेता है, जो अहंकार के सहित सम्पूर्ण तत्त्वों का अधिष्ठान और प्रकाशक है।देवाहूति ने पूछा- प्रभो! पुरुष और प्रकृति दोनों ही नित्य और एक-दूसरे के आश्रय से रहने वाले हैं, इसलिये प्रकृति तो पुरुष को कभी छोड़ ही नहीं सकती। ब्रह्मन्! जिस प्रकार गन्ध और पृथ्वी तथा रस और जल की पृथक्-पृथक् स्थिति नहीं हो सकती, उसी प्रकार पुरुष और प्रकृति भी एक-दूसरे को छोड़कर नहीं जा सकते। अतः जिनके आश्रय से अकर्ता पुरुष को यह कर्मबन्धन प्राप्त हुआ है, उन प्रकृति के गुणों के रहते हुए उसे कैवल्य कैसे प्राप्त होगा? यदि तत्त्वों का विचार करने से कभी यह संसार बन्धन का तीव्र भय निवृत्त हो भी जाये, तो भी उसके निमित्तभूत प्राकृत गुणों का अभाव न होने से वह भय फिर उपस्थित हो सकता है।

श्रीभगवान् ने कहा- माताजी! जिस प्रकार अग्नि का उत्पत्तिस्थान अरणि अपने से ही उत्पन्न अग्नि से जलकर भस्म हो जाता है, उसी प्रकार निष्काम भाव से किये हुए स्वधर्मपालन द्वारा अन्तःकरण शुद्ध होने से बहुत समय तक भगवत्कथा-श्रवण द्वारा पुष्ट हुई मेरी तीव्र भक्ति से, तत्त्व साक्षात्कार कराने वाला ज्ञान से, प्रबल वैराग्य से, व्रत नियमादि के सहित किये हुए ध्यानाभ्यास से और चित्त की प्रगाढ़ एकाग्रता से पुरुष की प्रकृति (अविद्या) दिन-रात क्षीण होती हुई धीरे-धीरे लीन हो जाती है। फिर नित्य प्रति दोष दीखने से भोगकर त्यागी हुई वह प्रकृति अपने स्वरूप में स्थित और स्वतन्त्र (बन्धनमुक्त) हुए उस पुरुष का कुछ भी नहीं बिगाड़ सकती। जैसे सोये हुए पुरुष को स्वप्न में कितने ही अनर्थों का अनुभव करना पड़ता है, किन्तु जग पड़ने पर उसे उन स्वप्न के अनुभवों से किसी प्रकार का मोह नहीं होता। उसी प्रकार जिसे तत्त्वज्ञान हो गया है और जो निरन्तर मुझमें ही मन लगाये रहता है, उस आत्माराम मुनि का प्रकृति कुछ भी बिगाड़ सकती।

जब मनुष्य अनेकों जन्मों में बहुत समय तक इस प्रकार आत्मचिन्तन में ही निमग्न रहता है, तब उसे ब्रह्मलोक-पर्यन्त सभी प्रकार के भोगों से वैराग्य हो जाता है। मेरा वह धर्यवान भक्त मेरी ही महती कृपा से तत्त्वज्ञान प्राप्त करके आत्मानुभव के द्वारा सारे संशयों से मुक्त हो जाता है और फिर लिंगदेह का नाश होने पर एकमात्र मेरे ही आश्रित अपने स्वरूपभूत कैवल्य संज्ञक मंगलमय पद को सहज में ही प्राप्त कर लेता है, जहाँ पहुँचने पर योगी फिर लौटकर नहीं आता।

माताजी! यदि योगी का चित योगसाधना से बढ़ी हुई मायामयी अणिमादि सिद्धियों में, जिनकी प्राप्ति का योग के सिवा दूसरा कोई साधन नहीं है, नहीं फँसता, तो उसे मेरा वह अविनाशी परमपद प्राप्त होता है-जहाँ मृत्यु की कुछ भी दाल नहीं गलती।

SRIMAD BHAGAVATA
Chapter Twenty-seven: Understanding Material Nature

1. The Personality of Godhead Kapila continued: When the living entity is thus unaffected by the modes of material nature, because he is unchanging and does not claim proprietorship, he remains apart from the reactions of the modes, although abiding in a material body, just as the sun remains aloof from its reflection on water.

2. When the soul is under the spell of material nature and false ego, identifying his body as the self, he becomes absorbed in material activities, and by the influence of false ego he thinks that he is the proprietor of everything.

3. The conditioned soul therefore transmigrates into different species of life, higher and lower, because of his association with the modes of material nature. Unless he is relieved of material activities, he has to accept this position because of his faulty work.

4. Actually a living entity is transcendental to material existence, but because of his mentality of lording it over material nature, his material existential condition does not cease, and just as in a dream, he is affected by all sorts of disadvantages.

5. It is the duty of every conditioned soul to engage his polluted consciousness, which is now attached to material enjoyment, in very serious devotional service with detachment. Thus his mind and consciousness will be under full control.

6. One has to become faithful by practicing the controlling process of the yoga system and must elevate himself to the platform of unalloyed devotional service by chanting and hearing about Me.

7. In executing devotional service, one has to see every living entity equally, without enmity towards
anyone yet without intimate connections with anyone. One has to observe celibacy, be grave and execute his eternal activities, offering the results to the Supreme Personality of Godhead.

8. For his income a devotee should be satisfied with what he earns without great difficulty. He should not eat more than what is necessary. He should live in a secluded place and always be thoughtful, peaceful, friendly, compassionate and self-realized.

9. One’s seeing power should be increased through knowledge of spirit and matter, and one should not unnecessarily identify himself with the body and thus become attracted by bodily relationships.

10. One should be situated in the transcendental position, beyond the stages of material
consciousness, and should be aloof from all other conceptions of life. Thus realizing freedom from false ego, one should see his own self just as he sees the sun in the sky.

11. A liberated soul realizes the Absolute Personality of Godhead, who is transcendental and who is manifest as a reflection even in the false ego. He is the support of the material cause and He enters into everything. He is absolute, one without a second, and He is the eyes of the illusory energy.

12. The presence of the Supreme Lord can be realized just as the sun is realized first as a reflection on water, and again as a second reflection on the wall of a room, although the sun itself is situated in the sky.

13. The self-realized soul is thus reflected first in the threefold ego and then in the body, senses and mind.

14. Although a devotee appears to be merged in the five material elements, the objects of material enjoyment, the material senses and material mind and intelligence, he is understood to be awake and to be freed from the false ego.

15. The living entity can vividly feel his existence as the seer, but because of the disappearance of the ego during the state of deep sleep, he falsely takes himself to be lost, like a man who has lost his fortune and feels distressed, thinking himself to be lost.

16. When, by mature understanding, one can realize his individuality, then the situation he accepts under false ego becomes manifest to him.

17. Sri Devahuti inquired: My dear brahmana, does material nature ever give release to the spirit soul? Since one is attracted to the other eternally, how is their separation possible?

18. As there is no separate existence of the earth and its aroma or of water and its taste, there cannot be any separate existence of intelligence and consciousness.

19. Hence even though he is the passive performer of all activities, how can there be freedom for the soul as long as material nature acts on him and binds him?

20. Even if the great fear of bondage is avoided by mental speculation and inquiry into the fundamental principles, it may still appear again, since its cause has not ceased.

21. The Supreme Personality of Godhead said: One can get liberation by seriously discharging
devotional service unto Me and thereby hearing for a long time about Me or from Me. By thus executing one’s prescribed duties, there will be no reaction, and one will be freed from the contamination of matter.

22. This devotional service has to be performed strongly in perfect knowledge and with transcendental vision. One must be strongly renounced and must engage in austerity and perform mystic yoga in order to be firmly fixed in self-absorption.

23. The influence of material nature has covered the living entity, and thus it is as if the living entity were always in a blazing fire. But by the process of seriously discharging devotional service, this influence can be removed, just as wooden sticks which cause a fire are themselves consumed by it.

24. By discovering the faultiness of his desiring to lord it over material nature and by therefore giving it up, the living entity becomes independent and stands in his own glory.

25. In the dreaming state one’s consciousness is almost covered, and one sees many inauspicious
things, but when he is awakened and fully conscious, such inauspicious things cannot bewilder him.

26. The influence of material nature cannot harm an enlightened soul, even though he engages in
material activities, because he knows the truth of the Absolute, and his mind is fixed on the Supreme Personality of Godhead.

27. When a person thus engages in devotional service and self-realization for many, many years and births, he becomes completely reluctant to enjoy any one of the material planets, even up to the highest planet, which is known as Brahmaloka; he becomes fully developed in consciousness.

28-29. My devotee actually becomes self-realized by My unlimited causeless mercy, and thus, when freed from all doubts, he steadily progresses towards his destined abode, which is directly under the protection of My spiritual energy of unadulterated bliss. That is the ultimate perfectional goal of the living entity. After giving up the present material body, the mystic devotee goes to that transcendental abode and never comes back.

30. When a perfect yogi’s attention is no longer attracted to the by-products of mystic powers, which are manifestations of the external energy, his progress towards Me becomes unlimited, and thus the power of death cannot overcome him.

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – छब्बीसवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Twenty Six

श्रीमद्भागवत महापुराण:

तृतीय स्कन्ध: षड्-विंश अध्यायः श्लोक 1-72

महदादि भिन्न-भिन्न तत्त्वों की उत्पत्ति का वर्णन

श्रीभगवान् ने कहा- माताजी! अब मैं तुम्हें प्रकृति आदि सब तत्त्वों के अलग-अलग लक्षण बतलाता हूँ; इन्हें जानकर मनुष्य प्रकृति के गुणों से मुक्त हो जाता है। आत्मदर्शनरूप ज्ञान ही पुरुष के मोक्ष का कारण है और वही उसकी अहंकाररूप हृदय ग्रन्थि का छेदन करने वाला है, ऐसा पण्डितजन कहते हैं। उस ज्ञान का मैं तुम्हारे आगे वर्णन करता हूँ। यह सारा जगत् जिससे व्याप्त होकर प्रकाशित होता है, वह आत्मा ही पुरुष है। वह अनादि, निर्गुण, प्रकृति से परे, अन्तःकरण में स्फुरित होने वाला और स्वयंप्रकाश है। उस सर्वव्यापक पुरुष ने अपने पास लीला-विलासपूर्वक आयी हुई अव्यक्त और त्रिगुणात्मिक वैष्णवी माया को स्वेच्छा से स्वीकार कर दिया। लीला परायण प्रकृति अपने सत्त्वादि गुणों द्वारा उन्हीं के अनुरूप प्रजा की सृष्टि करने लगी; यह देख पुरुष ज्ञान को आच्छादित करने वाली उसकी आवरण शक्ति से मोहित हो गया, अपने स्वरूप को भूल गया। इस प्रकार अपने से भिन्न प्रकृति को ही अपना स्वरूप समझ लेने से पुरुष प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाने वाले कर्मों में अपने को ही कर्ता मानने लगता है। इस कर्तृत्वाभिमान से ही अकर्ता, स्वाधीन, साक्षी और आनन्दस्वरूप पुरुष को जन्म-मृत्युरूप बन्धन एवं परतन्त्रता की प्राप्ति होती है। कार्यरूप शरीर, कारणरूप इन्द्रिय तथा कर्तारूप इन्द्रियाधिष्ठातृ-देवताओं में पुरुष जो अपनेपन का आरोप कर लेता है, उसमें पण्डितजन प्रकृति को ही कारण मानते हैं तथा वास्तव में प्रकृति से परे होकर भी जो प्रकृतिस्थ हो रहा है, उस पुरुष को सुख-दुःखों के भोगने के कारण मानते हैं। देवहूति ने कहा- पुरुषोत्तम! इस विश्व के स्थूल-सूक्ष्म कार्य जिनके स्वरूप हैं तथा जो इसके कारण हैं, उन प्रकृति और पुरुष का लक्षण भी आप मुझसे कहिये। श्रीभगवान् ने कहा- जो त्रिगुणात्मक, अव्यक्त, नित्य और कार्य-कारणरूप है तथा स्वयं निर्विशेष होकर भी सम्पूर्ण विशेष धर्मों का आश्रय है, उन प्रधान नामक तत्त्व को ही प्रकृति कहते हैं। पाँच महाभूत, पाँच तन्मात्रा, चार अन्तःकरण और दस इन्द्रिय-इन चौबीस तत्त्वों के समूह को विद्वान् लोग प्रकृति का कार्य मानते हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश- ये पाँच महाभूत हैं; गन्ध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द- ये पाँच तन्मात्र माने गये हैं। श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना, नासिका, वाक्, पाणि, पाद, उपस्थ और पायु- ये दस इन्द्रियाँ हैं। मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार- इन चार के रूप में एक ही अन्तःकरण अपनी संकल्प, निश्चय, चिन्ता और अभिमानरूप चार प्रकार की वृत्तियों से लक्षित होता है। इस प्रकार तत्त्वज्ञानी पुरुषों ने सगुण ब्रह्म के सन्निवेश स्थान इन चौबीस तत्त्वों की संख्या बतलायी है। इनके सिवा जो काल है, वह पचीसवाँ तत्त्व है। कुछ लोग काल को पुरुष से भिन्न तत्त्व न मानकर पुरुष का प्रभाव अर्थात् ईश्वर की संहारकारिणी शक्ति बताते हैं। जिससे माया के कार्यरूप देहादि में आत्मत्व का अभिमान करके अहंकार से मोहित और अपने को कर्ता मानने वाले जीव को निरन्तर भय लगा रहता है। मनुपुत्रि! जिनकी प्रेरणा से गुणों की साम्यावस्थारूप निर्विशेष प्रकृति में गति उत्पन्न होती है, वास्तव में वे पुरुषरूप भगवान् ही ‘काल’ कहे जाते हैं।

इस प्रकार जो अपनी माया के द्वारा सब प्राणियों के भीतर जीवरूप से और बाहर कालरूप से व्याप्त हैं, वे भगवान् ही पचीसवें तत्त्व हैं। जब परमपुरुष परमात्मा जीवों के अदृष्टवश क्षोभ को प्राप्त हुई सम्पूर्ण जीवों की उत्पत्तिस्थानरूपा अपनी माया में चिच्छक्तिरूप वीर्य स्थापित किया, तो उससे तेजोमय महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। लय-विक्षेपादिरहित तथा जगत् के अंकुररूप इस महत्तत्त्व ने अपने में स्थित विश्व को प्रकट करने के लिये अपने स्वरूप को आच्छादित करने वाले प्रलयकालीन अन्धकार को अपने ही तेज से पी लिया।

जो सत्त्वगुणमय, स्वच्छ, शान्त और भगवान् की उपलब्धि का स्थानरूप चित्त है, वही महत्तत्त्व है और उसी को ‘वासुदेव’ कहते हैं। (जिसे अध्यात्म में चित्त कहते हैं; उसी को अधिभूत में महत्तत्त्व कहा जाता है। चित्त में अधिष्ठाता ‘क्षेत्रज्ञ’ और उपास्यदेव ‘वासुदेव’ हैं। इसी प्रकार अहंकार में अधिष्ठाता ‘रुद्र’ और उपास्यदेव ‘संकर्षण’ हैं, बुद्धि में अधिष्ठाता ‘ब्रह्मा’ और उपास्यदेव ‘प्रद्युम्न’ हैं तथा मन में अधिष्ठाता ‘चन्द्रमा’ और उपास्यदेव ‘अनिरुद्ध’ हैं)। जिस प्रकार पृथ्वी आदि अन्य पदार्थों के संसर्ग से पूर्व जल अपनी स्वाभाविक (फेन-तरंगरहित) अवस्था में अत्यन्त स्वच्छ, विकारशून्य एवं शान्त होता है, उसी प्रकार अपनी स्वाभाविक अवस्था की दृष्टि से स्वच्छत्व, अविकारित्व और शान्तत्त्व ही वृत्तियों सहित चित्त का लक्षण कहा गया है। तदनन्तर भगवान् की वीर्यरूप चित्त्-शक्ति से उत्पन्न हुए महत्तत्त्व के विकृत होने पर उससे क्रिया-शक्तिप्रधान अहंकार उत्पन्न हुआ। वह वैकारिक, तैजस और तामस भेद से तीन प्रकार का है। उसी से क्रमशः मन, इन्द्रियों और पंचमहाभूतों की उत्पत्ति हुई। इस भूत, इन्द्रिय और मनरूप अहंकार को ही पण्डितजन साक्षात् ‘संकर्षण’ नामक सहस्र सिर वाले अनन्तदेव कहते हैं। इस अहंकार का देवतारूप से कर्तृत्व, इन्द्रियरूप से कारणत्व और पंचभूत रूप से कार्यत्व लक्षण है तथा सत्त्वादि गुणों के सम्बन्ध से शान्तत्त्व, घोरत्व और मूढत्व भी इसी के लक्षण हैं।

उपर्युक्त तीन प्रकार के अहंकार के विकृत होने पर उससे मन हुआ, जिसके संकल्प-विकल्पों से कामनाओं की उत्पत्ति होती है। यह मनस्तत्त्व ही इन्द्रियों के अधिष्ठाता ‘अनिरुद्ध’ के नाम से प्रसिद्ध है। योगिजन शरत्कालीन नीलकमल के समान श्याम वर्ण वाले इन अनिरुद्ध जी की शनैः-शनैः मन को वशीभूत करके आराधन करते हैं।

साध्वि! फिर तैजस अहंकार में विकार होने पर उससे बुद्धित्व उत्पन्न हुआ। वस्तु का स्फुरणरूप विज्ञान और इन्द्रियों के व्यापार में सहायक होना-पदार्थों का विशेष ज्ञान करना-ये बुद्धि के कार्य हैं। वृत्तियों के भेद से संशय, विपर्यय (विपरीत ज्ञान), निश्चय, स्मृति और निद्रा भी बुद्धि के ही लक्षण हैं। यह बुद्धितत्त्व ही ‘प्रद्युम्न’ है। इन्द्रियाँ भी तैजस अहंकार का ही कार्य हैं। कर्म और ज्ञान के विभाग से उनके कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय दो भेद हैं। इनमें कर्म प्राण की शक्ति है और ज्ञान बुद्धि की। भगवान् की चेतना शक्ति की प्रेरणा से तापस अहंकार के विकृत होने पर उससे शब्दतन्मात्र का प्रादुर्भाव हुआ। शब्दतन्मात्र से आकाश तथा शब्द का ज्ञान कराने वाली श्रोत्रेन्द्रिय उत्पन्न हुई। अर्थ का प्रकाशक होना, ओट में खड़े हुए वक्ता का भी ज्ञान करा देना और आकाश का सूक्ष्म रूप होना-विद्वानों के मत में यही शब्द के लक्षण हैं। भूतों को अवकाश देना, सबके बाहर-भीतर वर्तमान रहना तथा प्राण, इन्द्रिय और मन का आश्रय होना-ये आकाश के वृत्ति (कार्य) रूप लक्षण हैं।

फिर शब्दतन्मात्र के कार्य आकाश में कालगति से विकार होने पर स्पर्शतन्मात्र हुआ और उससे वायु तथा स्पर्श का ग्रहण कराने वाली त्वगिन्द्रिय (त्वचा) उत्पन्न हुई। कोमलता, कठोरता, शीतलता और उष्णता तथा वायु का सूक्ष्म रूप होना-ये स्पर्श के लक्षण हैं। वृक्ष की शाकाह आदि को हिलाना, तृणादि को इकठ्ठा कर देना, सर्वत्र पहुँचना, गन्धादियुक्त द्रव्य को घ्राणादि इन्द्रियों के पास तथा शब्द को श्रोत्रेन्द्रिय के समीप ले जाना तथा समस्त इन्द्रियों को कार्यशक्ति देना-ये वायु की वृत्तियों के लक्षण हैं। तदनन्तर दैव की प्रेरणा से स्पर्श तन्मात्राविशिष्ट वायु के विकृत होने पर उससे रूपतन्मात्र हुआ तथा उससे तेज और रूप को उपलब्ध कराने वाली नेत्रिन्द्रिका प्रादुर्भाव हुआ। साध्वि! वस्तु के आकार का बोध कराना, गौण होना-द्रव्य के अंगरूप से प्रतीत होना, द्रव्य का जैसा आकार-प्रकार और परिणाम आदि हो, उसी रूप में उपलक्षित होना तथा तेज का स्वरूपभूत होना-ये सब रूप तन्मात्र की वृत्तियाँ हैं। चमकना, पकाना, शीत को दूर करना, सुखाना, भूख-प्यास पैदा कराना-ये तेज की वृत्तियाँ हैं। फिर दैव की प्रेरणा से रूपतन्मात्रमय तेज के विकृत होने पर उससे रसतन्मात्र हुआ और उससे जल तथा रस को ग्रहण कराने वाली रसनेन्द्रिय (जिह्वा) उत्पन्न हुई। रस अपने शुद्ध स्वरूप में एक ही है; किन्तु अन्य भौतिक पदार्थों के संयोग से वह कसैला, मीठा, तीखा, कड़वा, खट्टा और नमकीन आदि कई प्रकार का हो जाता है। गीला करना, मिट्टी आदि को पिण्डाकार बना देना, तृप्त करना, जीवित रखना, प्यास बुझाना, पदार्थों को मृदु कर देना, ताप की निवृत्ति करना और कूपादि में से निकाल लिये जाने पर भी वहाँ बार-बार पुनः प्रकट हो जाना-ये जल की वृत्तियाँ हैं। इसके पश्चात् दैवप्रेरित रसस्वरूप जल के विकृत होने पर उससे गन्धतन्मात्र हुआ और उससे पृथ्वी तथा गन्ध को ग्रहण कराने वाली घ्राणेन्द्रिय प्रकट हुईं। गन्ध एक ही है; तथापि परस्पर मिले हुए द्रव्य भोगों की न्यूनाधिकता से वह मिश्रित गन्ध, दुर्गन्ध, सुगन्ध, मृदु, तीव्र और अम्ल (खट्टा) आदि अनेक प्रकार का हो जाता है। प्रतिमादिरूप से ब्रह्म की साकार-भावना का आश्रय होना, जल आदि कारण तत्त्वों से भिन्न किसी दूसरे आश्रय की अपेक्षा किये बिना ही स्थित रहना, जल आदि अन्य पदार्थों को धारण करना, आकाशादि का अवच्छेदक होना (घटाकाश, मठाकाश आदि भेदों को सिद्ध करना) तथा परिणाम विशेष से सम्पूर्ण प्राणियों के [स्त्रीत्व, पुरुषत्व आदि] गुणों को प्रकट करना-ये पृथ्वी के कार्यरूप लक्षण हैं। आकाश का विशेष गुण शब्द जिसका विषय है, वह श्रोत्रेन्द्रिय है; वायु का विशेष गुण सपर्श जिसका विषय है, वह त्वगिन्द्रिय है। तेज का विशेष गुण रूप जिसका विषय है, वह नेत्रेन्द्रिय है; जल का विशेष गुणरस जिसका विषय है, वह रसनेन्द्रिय है और पृथ्वी का विशेष गुण गन्ध जिसका विषय है, उसे घ्राणेन्द्रिय कहते हैं। वायु आदि कार्य-तत्त्वों में आकाशादि कारण-तत्त्वों के रहने से उनके गुण भी अनुगत देखे जाते हैं; इसलिये समस्त महाभूतों के गुण शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध केवल पृथ्वी में ही पाये जाते हैं। जब महत्तत्त्व, अहंकार और पंचभूत- ये सात तत्त्व परस्पर मिल न सके-पृथक्-पृथक् ही रह गये, तब जगत् के आदिकारण श्रीनारायण ने काल, अदृष्ट और सत्त्वादि गुणों के सहित उसमें प्रवेश किया।

फिर परमात्मा के प्रवेश से क्षुब्ध और आपस में मिले हुए उन तत्त्वों से एक जड़ अण्ड उत्पन्न हुआ। उस अण्ड से इस विराट् पुरुष की अभिव्यक्ति हुई। इस अण्ड का नाम विशेष है, इसी के अन्तर्गत श्रीहरि के स्वरूपभूत चौदहों भुवनों का विस्तार है। यह चारों ओर से क्रमशः एक-दूसरे से दस गुने जल, अग्नि, वायु, आकाश, अहंकार और महत्तत्त्व-इन छः अवरणों से घिरा हुआ है। इन सबके बाहर सातवाँ आवरण प्रकृति का है। कारणमय जल में स्थित उस तेजोमय अण्ड से उठकर उस विराट् पुरुष ने पुनः उसमें प्रवेश किया और फिर उसमें कई प्रकार के छिद्र किये। सबसे पहले उसमें मुख प्रकट हुआ, उससे वाक्-इन्द्रिय और उसके अनन्तर वाक् का अधिष्ठाता अग्नि उत्पन्न हुआ। फिर नाक के छिद्र (नथुने) प्रकट हुए, उनसे प्राणसहित घ्राणेन्द्रिय उत्पन्न हुई। घ्राण के बाद उसका अधिष्ठाता वायु उत्पन्न हुआ। तत्पश्चात् नेत्रगोलक प्रकट हुए, उनसे चक्षु-इन्द्रिय प्रकट हुई और उसके अनन्तर उसका अधिष्ठाता सूर्य उत्पन्न हुआ। फिर कानों के छिद्र प्रकट हुए, उनसे उनकी इन्द्रिय श्रोत और उसके अभिमानी दिग्देवता प्रकट हुए। इसके बाद उस विराट् पुरुष के त्वचा उत्पन्न हुई। उससे रोम, मूँछ-दाढ़ी तथा सिर के बाल प्रकट हुए और उनके बाद त्वचा की अभिमानी ओषधियाँ (अन्न आदि) उत्पन्न हुईं। इसके पश्चात् लिंग प्रकट हुआ। उससे वीर्य और वीर्य के बाद लिंग का अभिमानी आपोदेव (जल) उत्पन्न हुआ। फिर गुदा प्रकट हुई, उससे अपानवायु और अपान के बाद उसका अभिमानी लोकों को भयभीत करने वाला मृत्यु देवता उत्पन्न हुआ। तदनन्तर हाथ प्रकट हुए, उनसे बल और बल के बाद हस्तेन्द्रिय का अभिमानी इन्द्र उत्पन्न हुआ। फिर चरण प्रकट हुए, उनसे गति (गमन की क्रिया) और फिर पादेन्द्रिय का अभिमानी विष्णु देवता उत्पन्न हुआ। इसी प्रकार जब विराट् पुरुष के नाड़ियाँ प्रकट हुईं, तो उनसे रुधिर उत्पन्न हुआ और उससे नदियाँ हुई। फिर उसके उदर (पेट) प्रकट हुआ। उससे क्षुधा-पिपासा की अभिव्यक्ति हुई और फिर उदर का अभिमानी समुद्र देवता उत्पन्न हुआ। तत्पश्चात् उसके हृदय प्रकट हुआ, हृदय से मन का प्राकट्य हुआ। मन के बाद उसका अभिमानी देवता चन्द्रमा हुआ। फिर हृदय से ही बुद्धि और उसके बाद उसका अभिमानी ब्रह्मा हुआ। तत्पश्चात् अहंकार और उसके अनन्तर उसका अभिमानी रुद्र देवता उत्पन्न हुआ। इसके बाद चित्त और उसका अभिमानी क्षेत्रज्ञ प्रकट हुआ। जब ये क्षेत्रज्ञ के अतिरिक्त सारे देवता उत्पन्न होकर भी विराट् पुरुष को उठाने में असमर्थ रहे, तो उसे उठाने के लिये क्रमशः फिर अपने-अपने उत्पत्ति स्थानों में प्रविष्ट होने लगे। अग्नि ने वाणी के साथ मुख में प्रवेश किया, परन्तु इससे विराट् पुरुष न उठा। वायु ने घ्राणेन्द्रिय के सहित नासाछिद्रों में प्रवेश किया, फिर भी विराट् पुरुष न उठा।

Chapter Twenty-six: Fundamental Principles of Material Nature

1. The Personality of Godhead, Kapila, continued: My dear mother, now I shall describe unto you the different categories of the Absolute Truth, knowing which any person can be released from the influence of the modes of material nature.

2. Knowledge is the ultimate perfection of self-realization. I shall explain that knowledge unto you by which the knots of attachment to the material world are cut.

3. The Supreme Personality of Godhead is the Supreme Soul, and He has no beginning. He is
transcendental to the material modes of nature and beyond the existence of this material world. He is perceivable everywhere because He is self-effulgent, and by His self-effulgent luster the entire creation is maintained.

4. As His pastime, that Supreme Personality of Godhead, the greatest of the great, accepted the subtle material energy, which is invested with three material modes of nature and which is related with Vishnu.

5. Divided into varieties by her threefold modes, material nature creates the forms of the living entities, and the living entities, seeing this, are illusioned by the knowledge-covering feature of the illusory energy.

6. Because of his forgetfulness, the transcendental living entity accepts the influence of material energy as his field of activities, and thus actuated, he wrongly applies the activities to himself.

7. Material consciousness is the cause of one’s conditional life, in which conditions are enforced upon the living entity by the material energy. Although the spirit soul does not do anything and is transcendental to such activities, he is thus affected by conditional life.

8. The cause of the conditioned soul’s material body and senses, and the senses’ presiding deities, the demigods, is the material nature. This is understood by learned men. The feelings of happiness and distress of the soul, who is transcendental by nature, are caused by the spirit soul himself.

9. Devahuti said: O Supreme Personality of Godhead, kindly explain the characteristics of the Supreme Person and His energies, for both of these are the causes of this manifest and unmanifest creation.

10. The Supreme Personality of Godhead said: The unmanifested eternal combination of the three modes is the cause of the manifest state and is called pradhana. It is called prakrti when in the manifested stage of existence.

11. The aggregate elements, namely the five gross elements, the five subtle elements, the four internal senses, the five senses for gathering knowledge and the five outward organs of action, are known as the pradhana.

12. There are five gross elements, namely earth, water, fire, air and ether. There are also five subtle
elements: smell, taste, color, touch and sound.

13. The senses for acquiring knowledge and the organs for action number ten, namely the auditory sense, the sense of taste, the tactile sense, the sense of sight, the sense of smell, the active organ for speaking, the active organs for working, and those for traveling, generating and evacuating.

14. The internal, subtle senses are experienced as having four aspects, in the shape of mind,
intelligence, ego and contaminated consciousness. Distinctions between them can be made only by different functions, since they represent different characteristics.

15. All these are considered the qualified Brahman. The mixing element, which is known as time, is counted as the twenty-fifth element.

16. The influence of the Supreme Personality of Godhead is felt in the time factor, which causes fear of death due to the false ego of the deluded soul who has contacted material nature.

17. My dear mother, O daughter of Svayambhuva Manu, the time factor, as I have explained, is the
Supreme Personality of Godhead, from whom the creation begins as a result of the agitation of the neutral, unmanifested nature.

18. By exhibiting His potencies, the Supreme Personality of Godhead adjusts all these different elements, keeping Himself within as the Supersoul and without as time.

19. After the Supreme Personality of Godhead impregnates material nature with His internal potency, material nature delivers the sum total of the cosmic intelligence, which is known as Hiranmaya. This takes place in material nature when she is agitated by the destinations of the conditioned souls.

20. Thus, after manifesting variegatedness, the effulgent mahat-tattva, which contains all the universes within itself, which is the root of all cosmic manifestations and which is not destroyed at the time of annihilation, swallows the darkness that covered the effulgence at the time of dissolution.

21. The mode of goodness, which is the clear, sober status of understanding the Personality of
Godhead and which is generally called vasudeva, or consciousness, becomes manifest in the mahat-tattva.

22. After the manifestation of the mahat-tattva, these features appear simultaneously. As water in its natural state, before coming in contact with earth, is clear, sweet and unruffled, so the characteristic traits of pure consciousness are complete serenity, clarity, and freedom from distraction.

23-24. The material ego springs up from the mahat-tattva, which evolved from the Lord’s own energy. The material ego is endowed predominantly with active power of three kinds–good, passionate and ignorant. It is from these three types of material ego that the mind, the senses of perception, the organs of action, and the gross elements evolve.

25. The threefold ahankara, the source of the gross elements, the senses and the mind, is identical with them because it is their cause. It is known by the name of Sankarsana, who is directly Lord Ananta with a thousand heads.

26. This false ego is characterized as the doer, as an instrument and as an effect. It is further
characterized as serene, active or dull according to how it is influenced by the modes of goodness, passion and ignorance.

27. From the false ego of goodness, another transformation takes place. From this evolves the mind, whose thoughts and reflections give rise to desire.

28. The mind of the living entity is known by the name of Lord Aniruddha, the supreme ruler of the
senses. He possesses a bluish-black form resembling a lotus flower growing in the autumn. He is found slowly by the yogis.

29. By transformation of the false ego in passion, intelligence takes birth, O virtuous lady. The functions of intelligence are to help in ascertaining the nature of objects when they come into view, and to help the senses.

30. Doubt, misapprehension, correct apprehension, memory and sleep, as determined by their different functions, are said to be the distinct characteristics of intelligence.

31. Egoism in the mode of passion produces two kinds of senses–the senses for acquiring knowledge and the senses of action. The senses of action depend on the vital energy, and the senses for acquiring knowledge depend on intelligence.

32. When egoism in ignorance is agitated by the sex energy of the Supreme Personality of Godhead, the subtle element sound is manifested, and from sound come the ethereal sky and the sense of hearing.

33. Persons who are learned and who have true knowledge define sound as that which conveys the idea of an object, indicates the presence of a speaker screened from our view and constitutes the subtle form of ether.

34. The activities and characteristics of the ethereal element can be observed as accommodation for the room for the external and internal existences of all living entities, namely the field of activities of the vital air, the senses and the mind.

35. From ethereal existence, which evolves from sound, the next transformation takes place under the impulse of time, and thus the subtle element touch and thence the air and sense of touch become prominent.

36. Softness and hardness and cold and heat are the distinguishing attributes of touch, which is
characterized as the subtle form of air.

37. The action of the air is exhibited in movements, mixing, allowing approach to the objects of soundand other sense perceptions, and providing for the proper functioning of all other senses.

38. By interactions of the air and the sensations of touch, one receives different forms according to destiny. By evolution of such forms, there is fire, and the eye sees different forms in color.

39. My dear mother, the characteristics of form are understood by dimension, quality and individuality. The form of fire is appreciated by its effulgence.

40. Fire is appreciated by its light and by its ability to cook, to digest, to destroy cold, to evaporate, and to give rise to hunger, thirst, eating and drinking.

41. By the interaction of fire and the visual sensation, the subtle element taste evolves under a superior arrangement. From taste, water is produced, and the tongue, which perceives taste, is also manifested.

42. Although originally one, taste becomes manifold as astringent, sweet, bitter, pungent, sour and salty due to contact with other substances.

43. The characteristics of water are exhibited by its moistening other substances, coagulating various mixtures, causing satisfaction, maintaining life, softening things, driving away heat, incessantly supplying itself to reservoirs of water, and refreshing by slaking thirst.

44. Due to the interaction of water with the taste perception, the subtle element odor evolves under superior arrangement. Thence the earth and the olfactory sense, by which we can variously experience the aroma of the earth, become manifest.

45. Odor, although one, becomes many–as mixed, offensive, fragrant, mild, strong, acidic and so on–according to the proportions of associated substances.

46. The characteristics of the functions of earth can be perceived by modeling forms of the Supreme Brahman, by constructing places of residence, by preparing pots to contain water, etc. In other words, the earth is the place of sustenance for all elements.

47. The sense whose object of perception is sound is called the auditory sense, and that whose object of perception is touch is called the tactile sense.

48. The sense whose object of perception is form, the distinctive characteristic of fire, is the sense of sight. The sense whose object of perception is taste, the distinctive characteristic of water, is known as the sense of taste. Finally, the sense whose object of perception is odor, the distinctive characteristic of earth, is called the sense of smell.

49. Since the cause exists in its effect as well, the characteristics of the former are observed in the latter. That is why the peculiarities of all the elements exist in the earth alone.

50. When all these elements were unmixed, the Supreme Personality of Godhead, the origin of
creation, along with time, work, and the qualities of the modes of material nature, entered into the
universe with the total material energy in seven divisions.

51. From these seven principles, roused into activity and united by the presence of the Lord, an unintelligent egg arose, from which appeared the celebrated Cosmic Being.

52. This universal egg, or the universe in the shape of an egg, is called the manifestation of material energy. Its layers of water, air, fire, sky, ego and mahat-tattva increase in thickness one after another.

Each layer is ten times bigger than the previous one, and the final outside layer is covered by pradhana. Within this egg is the universal form of Lord Hari, of whose body the fourteen planetary systems are parts.

53. The Supreme Personality of Godhead, the virat-purusa, situated Himself in that golden egg, which was lying on the water, and He divided it into many departments.

54. First of all a mouth appeared in Him, and then came forth the organ of speech, and with it the god of fire, the deity who presides over that organ. Then a pair of nostrils appeared, and in them appeared the olfactory sense, as well as prana, the vital air.

55. In the wake of the olfactory sense came the wind-god, who presides over that sense. Thereafter a pair of eyes appeared in the universal form, and in them the sense of sight. In the wake of this sense came the sun-god, who presides over it. Next there appeared in Him a pair of ears, and in them the auditory sense and in its wake the Dig-devatas, or the deities who preside over the directions.

56. Then the universal form of the Lord, the virat-purusa, manifested His skin, and thereupon the hair, mustache and beard appeared. After this all the herbs and drugs became manifested, and then His genitals also appeared.

57. After this, semen (the faculty of procreation) and the god who presides over the waters appeared. Next appeared an anus and then the organs of defecation and thereupon the god of death, who is feared throughout the universe.

58. Thereafter the two hands of the universal form of the Lord became manifested, and with them the power of grasping and dropping things, and after that Lord Indra appeared. Next the legs became manifested, and with them the process of movement, and after that Lord Vishnu appeared.

59. The veins of the universal body became manifested and thereafter the red corpuscles, or blood. In their wake came the rivers (the deities presiding over the veins), and then appeared an abdomen.

60. Next grew feelings of hunger and thirst, and in their wake came the manifestation of the oceans. Then a heart became manifest, and in the wake of the heart the mind appeared.

61. After the mind, the moon appeared. Intelligence appeared next, and after intelligence, Lord Brahma appeared. Then the false ego appeared and then Lord Siva, and after the appearance of Lord Shiva came consciousness and the deity presiding over consciousness.

62. When the demigods and presiding deities of the various senses were thus manifested, they wanted to wake their origin of appearance. But upon failing to do so, they reentered the body of the virat-purusa one after another in order to wake Him.

63. The god of fire entered His mouth with the organ of speech, but the virat-purusa could not be aroused. Then the god of wind entered His nostrils with the sense of smell, but still the virat-purusa refused to be awakened.

64. The sun-god entered the eyes of the virat-purusa with the sense of sight, but still the virat-purusa did not get up. Similarly, the predominating deities of the directions entered through His ears with the sense of hearing, but still He did not get up.

65. The predominating deities of the skin, herbs and seasoning plants entered the skin of the virat-purusa with the hair of the body, but the Cosmic Being refused to get up even then. The god predominating over water entered His organ of generation with the faculty of procreation, but the virat-purusa still would not rise.

66. The god of death entered His anus with the organ of defecation, but the virat-purusa could not be spurred to activity. The god Indra entered the hands with their power of grasping and dropping things,but the virat-purusa would not get up even then.

67. Lord Visnu entered His feet with the faculty of locomotion, but the virat-purusa refused to stand up even then. The rivers entered His blood vessels with the blood and the power of circulation, but still the Cosmic Being could not be made to stir.

68. The ocean entered His abdomen with hunger and thirst, but the Cosmic Being refused to rise even then. The moon-god entered His heart with the mind, but the Cosmic Being would not be roused.

69. Brahma also entered His heart with intelligence, but even then the Cosmic Being could not be prevailed upon to get up. Lord Rudra also entered His heart with the ego, but even then the Cosmic Being did not stir.

70. However, when the inner controller, the deity presiding over consciousness, entered the heart with reason, at that very moment the Cosmic Being arose from the causal waters.

71. When a man is sleeping, all his material assets–namely the vital energy, the senses for recording knowledge, the senses for working, the mind and the intelligence–cannot arouse him. He can be aroused only when the Supersoul helps him.

72. Therefore, through devotion, detachment and advancement in spiritual knowledge acquired through concentrated devotional service, one should contemplate that Supersoul as present in this very body although simultaneously apart from it.

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – पचीसवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Twenty Five

श्रीमद्भागवत महापुराण:

तृतीय स्कन्ध: पंचविंश अध्यायः श्लोक 1-44

देवहूति का प्रश्न तथा भगवान् कपिल द्वारा भक्तियोग की महिमा का वर्णन

शौनक जी ने पूछा- सूतजी! तत्त्वों की संख्या करने वाले भगवान् कपिल साक्षात् अजन्मा नारायण होकर भी लोगों को आत्मज्ञान का उपदेश करने के लिये अपनी माया से उत्पन्न हुए थे। मैंने भगवान् के बहुत-से चरित्र सुने हैं, तथापि इन योगिप्रवर पुरुषश्रेष्ठ कपिल जी की कीर्ति को सुनते-सुनते मेरी इन्द्रियाँ तृप्त नहीं होतीं। सर्वथा स्वतन्त्र श्रीहरि अपनी योगमाया द्वारा भक्तों की इच्छा के अनुसार शरीर धारण करके जो-जो लीलाएँ करते हैं, वे सभी कीर्तन करने योग्य हैं; अतः आप मुझे वे सभी सुनाइये, मुझे उन्हें सुनने में बड़ी श्रद्धा है। सूत जी कहते हैं- मुने! आपकी ही भाँति जब विदुर ने भी यह आत्मज्ञान विषयक प्रश्न किया, तो श्रीव्यास जी के सखा भगवान् मैत्रेय जी प्रसन्न होकर इस प्रकार कहने लगे। श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! पिता के वन में चले जाने पर भगवान् कपिल जी माता का प्रिय करने की इच्छा से उस बिन्दुसर तीर्थ में रहने लगे। एक दिन तत्त्व समूह के पारदर्शी भगवान् कपिल कर्मकलाप से विरत हो आसन पर विराजमान थे। उस समय ब्रह्मा जी के वचनों का स्मरण करके देवहूति ने उनसे कहा। देवहूति बोली- भूमन्! प्रभो! इन दुष्ट इन्द्रियों की विषय-लालसा से मैं बहुत ऊब गयी हूँ और इनकी इच्छा पूरी करते रहने से ही घोर अज्ञानान्धकार से पार लगाने के लिये सुन्दर नेत्ररूप आप प्राप्त हुए हैं। आप सम्पूर्ण जीवों के स्वामी भगवान् आदिपुरुष हैं तथा अज्ञानान्धकार से अन्धे पुरुषों के लिये नेत्र स्वरूप सूर्य की भाँति उदित हुए हैं। देव! इन देह-गेह आदि में मैं-मेरेपन का दुराग्रह होता है, वह भी आपका ही कराया हुआ है; अतः अब आप मेरे इस महामोह को दूर कीजिये। आप अपने भक्तों के संसाररूप वृक्ष के लिये कुठार के समान हैं; मैं प्रकृति और पुरुष का ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा से आप शरणागतवत्सल की शरण में आयी हूँ। आप भागवत धर्म जानने वालों में सबसे श्रेष्ठ हैं, मैं आपको प्रणाम करती हूँ। श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- इस प्रकार माता देवहूति ने अपनी जो अभिलाषा प्रकट की, वह परम पवित्र और लोगों का मोक्ष मार्ग में अनुराग उत्पन्न करने वाली थी, उसे सुनकर आत्मज्ञ सत्पुरुषों की गति श्रीकपिल जी उसकी मन-ही-मन प्रशंसा करने लगे और फिर मृदु मुस्कान से सुशोभित मुखारविन्द से इस प्रकार कहने लगे। भगवान् कपिल ने कहा- माता! यह मेरा निश्चय है कि अध्यात्मयोग ही मनुष्यों के आत्यन्तिक कल्याण का मुख्य साधन है, जहाँ दुःख और सुख की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है। साध्वि! सब अंगों से सम्पन्न उस योग का मैंने पहले नारदादि ऋषियों के सामने, उनकी सुनने की इच्छा होने पर, वर्णन किया था। वही अब मैं आपको सुनाता हूँ। इस जीव के बन्धन और मोक्ष का कारण मन ही माना गया है। विषयों में आसक्त होने पर वह बन्धन का हेतु होता है और परमात्मा में अनुरक्त होने पर वही मोक्ष का कारण बन जाता है। जिस समय यह मन मैं और मेरेपन के कारण होने वाले काम-लोभ आदि विकारों से मुक्त एवं शुद्ध हो जाता है, उस समय वह सुख-दुःख से छूटकर सम अवस्था में आ जाता है।

तब जीव अपने ज्ञान-वैराग्य और भक्ति से युक्त हृदय से आत्मा को प्रकृति से परे, एकमात्र (अद्वितीय), भेदरहित, स्वयंप्रकाश, सूक्ष्म, अखण्ड और उदासीन (सुख-दुःख शून्य) देखता है तथा प्रकृति को शक्तिहीन अनुभव करता है। योगियों के लिये भगवत्प्राप्ति के निमित्त सर्वात्मा श्रीहरि के प्रति की हुई भक्ति के समान और कोई मंगलमय मार्ग नहीं है। विवेकीजन संग या आसक्ति को ही आत्मा का अच्छेद्द बन्धन मानते हैं; किन्तु वही संग या आसक्ति जब संतों-महापुरुषों के प्रति हो जाती है तो मोक्ष का खुला द्वार बन जाती है। जो लोग सहनशीन, दयालु, समस्त देहधारियों के अकारण हितू, किसी के प्रति भी शत्रुभाव न रखने वाले, शान्त, सरल स्वभाव और सत्पुरुषों का सम्मान करने वाले होते हैं, जो मुझमें अनन्य भाव से सुदृढ़ प्रेम करते हैं, मेरे लिये सम्पूर्ण कर्म तथा अपने सगे-सम्बन्धियों को भी त्याग देते हैं, और मेरे परायण रहकर मेरी पवित्र कथाओं का श्रवण, कीर्तन करते हैं तथा मुझमें ही चित्त लगाये रहते हैं-उन भक्तों को संसार के तरह-तरह ताप कोई कष्ट नहीं पहुँचाते हैं। साध्वि! ऐसे-ऐसे सर्वसंगपरित्यागी महापुरुष ही साधु होते हैं, तुम्हें उन्हीं के संग की इच्छा करनी चाहिये; क्योंकि वे आसक्ति से उत्पन्न सभी दोषों को हर लेने वाले हैं। सत्पुरुषों के समागम से मेरे पराक्रमों का यथार्थ ज्ञान कराने वाली तथा हृदय और कानों को प्रिय लगने वाली कथाएँ होती हैं। उनका सेवन करने से शीघ्र ही मोक्ष मार्ग में श्रद्धा, प्रेम और भक्ति का क्रमशः विकास होगा। फिर मेरी सृष्टि आदि लीलाओं का चिन्तन करने से प्राप्त हुई भक्ति के द्वारा लौकिक एवं पारलौकिक सुखों में वैराग्य हो जाने पर मनुष्य सावधानतापूर्वक योग के भक्ति प्रधान सरल उपायों से समाहित होकर मनोनिग्रह के लिये यत्न करेगा। इस प्रकार प्रकृति के गुणों से उत्पन्न हुए शब्दादि विषयों का त्याग करने से, वैराग्ययुक्त ज्ञान से, योग से और मेरे प्रति की हुई सुदृढ़ भक्ति से मनुष्य मुझे अपने अन्तरात्मा को इस देह में ही प्राप्त कर लेता है। देवहूति ने कहा- भगवन्! आपकी समुचित भक्ति का स्वरूप क्या है? और मेरी-जैसी अबलाओं के लिये कैसी भक्ति ठीक है, जिससे कि मैं सहज में ही आपके निर्वाणपद को प्राप्त कर सकूँ? निर्वाणस्वरूप प्रभो! जिसके द्वारा तत्त्वज्ञान होता है और जो लक्ष्य को बेधने वाला बाण के समान भगवान् की प्राप्ति कराने वाला है, वह आपका कहा हुआ योग कैसा है उसके कितने अंग हैं? हरे! यह सब आप मुझे इस प्रकार समझाइये जिससे कि आपकी कृपा से मैं मन्दमति स्त्रीजाति भी इस दुर्बोध विषय को सुगमता से समझ सकूँ। श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! जिसके शरीर से उन्होंने स्वयं जन्म लिया था, उस अपनी माता का ऐसा अभिप्राय जानकर कपिल जी के हृदय में स्नेह उमड़ आया और उन्होंने प्रकृति आदि तत्त्वों का निरूपण करने वाले शास्त्र का, जिसे सांख्य कहते हैं, उपदेश किया। साथ ही भक्ति-विस्तार एवं योग का भी वर्णन किया। श्रीभगवान् ने कहा- माता! जिसका चित्त एकमात्र भगवान् में ही लग गाया है, ऐसे मनुष्य की वेदविहित कर्मों में लगी हुई तथा विषयों का ज्ञान कराने वाली (कर्मेंदिय एवं ज्ञानेद्रिय-दोनों प्रकार की) इन्द्रियों की जो सत्त्वमूर्ति श्रीहरि के प्रति स्वाभाविक प्रवृत्ति है, वही भगवान् की अहैतुकी भक्ति है। यह मुक्ति से भी बढ़कर है; क्योंकि जठरानल जिस प्रकार खाये हुए अन्न को पचाता है, उसी प्रकार यह भी कर्मसंसारों के भण्डाररूप लिंगशरीर को तत्काल भस्म कर देती है।

मेरी चरण सेवा में प्रीति रखने वाले और मेरी ही प्रसन्नता के लिये समस्त कार्य करने वाले कितने ही बड़भागी भक्त, जो एक-दूसरे से मिलकर प्रेमपूर्वक मेरे ही पराक्रमों की चर्चा किया करते हैं, मेरे साथ एकीभाव (सायुज्यमोक्ष) की भी इच्छा नहीं करते। मा! वे साधुजन अरुण नयन एवं मनोहर मुखारविन्द से युक्त मेरे परम सुन्दर और वरदायक दिव्य रूपों की झाँकी करते हैं और उनके साथ सप्रेम सम्भाषण भी करते हैं, जिसके लिये बड़े-बड़े तपस्वी भी लालायित रहते हैं। दर्शनीय अंग-प्रत्यंग, उदार हास-विलास मनोहर चितवन और सुमधुर वाणी से युक्त मेरे उन रूपों की माधुरी में उनका मन और इन्द्रियाँ फँस जाती हैं। ऐसी मेरी भक्ति न चाहने पर भी उन्हें परमपद की प्राप्ति करा देती है। अविद्या की निवृत्ति हो जाने पर यद्यपि वे मुझ मायापति के सत्यादि लोकों की भोगसम्पत्ति, भक्ति की प्रवृत्ति के पश्चात् स्वयं प्राप्त होने वाली अष्टसिद्धि अथवा वैकुण्ठलोक के भगवदीय ऐश्वर्य की भी इच्छा नहीं करते, तथापि मेरे धाम पहुँचने पर उन्हें ये सब विभूतियाँ स्वयं ही प्राप्त हो जाती हैं। जिनका एकमात्र मैं ही प्रिय, आत्मा, पुत्र, मित्र, गुरु, सुहृद् और इष्टदेव हूँ-वे मेरे ही आश्रय में रहने वाले भक्तजन शान्तिमय वैकुण्ठधाम में पहुँचकर किसी प्रकार की भी इन दिव्य भोगों से रहित नहीं होते और न उन्हें मेरा कालचक्र ही ग्रस सकता है। माताजी! जो लोग इहलोक, परलोक और इन दोनों लोकों में साथ जाने वाले वासनामय लिंगदेह को तथा शरीर से सम्बन्ध रखने वाले जो धन, पशु एवं गृह आदि पदार्थ हैं, उन सबको और अन्यान्य संग्रहों को भी छोड़कर अनन्य भक्ति से सब प्रकार मेरा ही भजन करते हैं-उन्हें मैं मृत्युरूप संसारसागर से पार कर देता हूँ। मैं साक्षात् भगवान् हूँ, प्रकृति और पुरुष का भी प्रभु हूँ तथा समस्त प्राणियों का आत्मा हूँ; मेरे सिवा और किसी का आश्रय लेने से मृत्युरूप महाभय से छुटकारा नहीं मिल सकता। मेरे भय से यह वायु चलती है, मेरे भय से सूर्य तपता है, मेरे भय से इन्द्र वर्षा करता और अग्नि जलाती है तथा मेरे ही भय से मृत्यु अपने कार्य में प्रवृत्त होता है। योगिजन ज्ञान-वैराग्ययुक्त भक्तियोग के द्वारा शान्ति प्राप्त करने के लिये मेरे निर्भय चरणकमलों का आश्रय लेते हैं। संसार में मनुष्य के लिये सबसे बड़ी कल्याण प्राप्ति यही है कि उसका चित्त तीव्र भक्तियोग के द्वारा मुझमें लगकर स्थिर हो जाये।

Chapter Twenty-five: The Glories of Devotional Service

1. Sri Saunaka said: Although He is unborn, the Supreme Personality of Godhead took birth as Kapila Muni by His internal potency. He descended to disseminate transcendental knowledge for the benefit of the whole human race.

2. Saunaka continued: There is no one who knows more than the Lord Himself. No one is more worshipable or more mature a yogi than He. He is therefore the master of the Vedas, and to hear about Him always is the actual pleasure of the senses.

3. Therefore please precisely describe all the activities and pastimes of the Personality of Godhead, who is full of self-desire and who assumes all these activities by His internal potency.

4. Sri Suta Gosvami said: The most powerful sage Maitreya was a friend of Vyasadeva. Being
encouraged and pleased by Vidura’s inquiry about transcendental knowledge, Maitreya spoke as follows.

5. Maitreya said: When Kardama left for the forest, Lord Kapila stayed on the strand of the Bindu-sarovara to please His mother, Devahuti.

6. When Kapila, who could show her the ultimate goal of the Absolute Truth, was sitting leisurely before her, Devahuti remembered the words Brahma had spoken to her, and she therefore began to question Kapila as follows.

7. Devahuti said: I am very sick of the disturbance caused by my material senses, for because of this sense disturbance, my Lord, I have fallen into the abyss of ignorance.

8. Your Lordship is my only means of getting out of this darkest region of ignorance because You are my transcendental eye, which, by Your mercy only, I have attained after many, many births.

9. You are the Supreme Personality of Godhead, the origin and Supreme Lord of all living entities. You have arisen to disseminate the rays of the sun in order to dissipate the darkness of the ignorance of the universe.

10. Now be pleased, my Lord, to dispel my great delusion. Due to my feeling of false ego, I have been engaged by Your maya and have identified myself with the body and consequent bodily relations.

11. Devahuti continued: I have taken shelter of Your lotus feet because You are the only person of whom to take shelter. You are the ax which can cut the tree of material existence. I therefore offer my obeisances unto You, who are the greatest of all transcendentalists, and I inquire from You as to the relationship between man and woman and between spirit and matter.

12. Maitreya said: After hearing of His mother’s uncontaminated desire for transcendental realization, the Lord thanked her within Himself for her questions, and thus, His face smiling, He explained the path of the transcendentalists, who are interested in self-realization.

13. The Personality of Godhead answered: The yoga system which relates to the Lord and the
individual soul, which is meant for the ultimate benefit of the living entity, and which causes detachment from all happiness and distress in the material world, is the highest yoga system.

14. O most pious mother, I shall now explain unto you the ancient yoga system, which I explained
formerly to the great sages. It is serviceable and practical in every way.

15. The stage in which the consciousness of the living entity is attracted by the three modes of material nature is called conditional life. But when that same consciousness is attached to the Supreme Personality of Godhead, one is situated in the consciousness of liberation.

16. When one is completely cleansed of the impurities of lust and greed produced from the false identification of the body as “I” and bodily possessions as “mine,” one’s mind becomes purified. In that pure state he transcends the stage of so-called material happiness and distress.

17. At that time the soul can see himself to be transcendental to material existence and always self-effulgent, never fragmented, although very minute in size.

18. In that position of self-realization, by practice of knowledge and renunciation in devotional service, one sees everything in the right perspective; he becomes indifferent to material existence, and the material influence acts less powerfully upon him.

19. Perfection in self-realization cannot be attained by any kind of yogi unless he engages in devotional service to the Supreme Personality of Godhead, for that is the only auspicious path.

20. Every learned man knows very well that attachment for the material is the greatest entanglement of the spirit soul. But that same attachment, when applied to the self-realized devotees, opens the door of liberation.

21. The symptoms of a sadhu are that he is tolerant, merciful and friendly to all living entities. He has no enemies, he is peaceful, he abides by the scriptures, and all his characteristics are sublime.

22. Such a sadhu engages in staunch devotional service to the Lord without deviation. For the sake of the Lord he renounces all other connections, such as family relationships and friendly acquaintances within the world.

23. Engaged constantly in chanting and hearing about Me, the Supreme Personality of Godhead, the sadhus do not suffer from material miseries because they are always filled with thoughts of My pastimes and activities.

24. O My mother, O virtuous lady, these are the qualities of great devotees who are free from all
attachment. You must seek attachment to such holy men, for this counteracts the pernicious effects of material attachment.

25. In the association of pure devotees, discussion of the pastimes and activities of the Supreme Personality of Godhead is very pleasing and satisfying to the ear and the heart. By cultivating such knowledge one gradually becomes advanced on the path of liberation, and thereafter he is freed, and his attraction becomes fixed. Then real devotion and devotional service begin.

26. Thus consciously engaged in devotional service in the association of devotees, a person gains distaste for sense gratification, both in this world and in the next, by constantly thinking about the activities of the Lord. This process of Krishna consciousness is the easiest process of mystic power; when one is actually situated on that path of devotional service, he is able to control the mind.

27. Thus by not engaging in the service of the modes of material nature but by developing Krsna consciousness, knowledge in renunciation, and by practicing yoga, in which the mind is always fixed in devotional service unto the Supreme Personality of Godhead, one achieves My association in this very life, for I am the Supreme Personality, the Absolute Truth.

28. On hearing this statement of the Lord, Devahuti inquired: What kind of devotional service is worth developing and practicing to help me easily and immediately attain the service of Your lotus feet?

29. The mystic yoga system, as You have explained, aims at the Supreme Personality of Godhead and is meant for completely ending material existence. Please let me know the nature of that yoga system. How many ways are there by which one can understand in truth that sublime yoga?

30. My dear son, Kapila, after all, I am a woman. It is very difficult for me to understand the Absolute Truth because my intelligence is not very great. But if You will kindly explain it to me, even though I am not very intelligent, I can understand it and thereby feel transcendental happiness.

31. Sri Maitreya said: After hearing the statement of His mother, Kapila could understand her purpose, and He became compassionate towards her because of being born of her body. He described the Sankhya system of philosophy, which is a combination of devotional service and mystic realization, as received by disciplic succession.

32. Lord Kapila said: The senses are symbolic representations of the demigods, and their natural inclination is to work under the direction of the Vedic injunctions. As the senses are representatives of the demigods, so the mind is the representative of the Supreme Personality of Godhead. The mind’s natural duty is to serve. When that service spirit is engaged in devotional service to the Personality of Godhead, without any motive, that is far better even than salvation.

33. Bhakti, devotional service, dissolves the subtle body of the living entity without separate effort, just as fire in the stomach digests all that we eat.

34. A pure devotee, who is attached to the activities of devotional service and who always engages in the service of My lotus feet, never desires to become one with Me. Such a devotee, who is unflinchingly engaged, always glorifies My pastimes and activities.

35. O My mother, My devotees always see the smiling face of My form, with eyes like the rising morning sun. They like to see My various transcendental forms, which are all benevolent, and they also talk favorably with Me.

36. Upon seeing the charming forms of the Lord, smiling and attractive, and hearing His very pleasing words, the pure devotee almost loses all other consciousness. His senses are freed from all other engagements, and he becomes absorbed in devotional service. Thus in spite of his unwillingness, he attains liberation without separate endeavor.

37. Thus because he is completely absorbed in thought of Me, the devotee does not desire even the highest benediction obtainable in the upper planetary systems, including Satyaloka. He does not desire the eight material perfections obtained from mystic yoga, nor does he desire to be elevated to the kingdom of God. Yet even without desiring them, the devotee enjoys, even in this life, all the offered benedictions.

38. The Lord continued: My dear mother, devotees who receive such transcendental opulences are never bereft of them; neither weapons nor the change of time can destroy such opulences. Because the devotees accept Me as their friend, their relative, their son, preceptor, benefactor and Supreme Deity, they cannot be deprived of their possessions at any time.

39-40. Thus the devotee who worships Me, the all-pervading Lord of the universe, in unflinching
devotional service, gives up all aspirations to be promoted to heavenly planets or to become happy in this world with wealth, children, cattle, home or anything in relationship with the body. I take him to the other side of birth and death.

41. The terrible fear of birth and death can never be forsaken by anyone who resorts to any shelter
other than Myself, for I am the almighty Lord, the Supreme Personality of Godhead, the original source of all creation, and also the Supreme Soul of all souls.

42. It is because of My supremacy that the wind blows, out of fear of Me; the sun shines out of fear of me, and the lord of the clouds, Indra, sends forth showers out of fear of Me. Fire burns out of fear of Me, and death goes about taking its toll out of fear of Me.

43. The yogis, equipped with transcendental knowledge and renunciation and engaged in devotional service for their eternal benefit, take shelter of My lotus feet, and since I am the Lord, they are thus eligible to enter into the kingdom of Godhead without fear.

44. Therefore persons whose minds are fixed on the Lord engage in the intensive practice of devotional service. That is the only means for attainment of the final perfection of life.

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – चौबीसवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Twenty Four

श्रीमद्भागवत महापुराण:

तृतीय स्कन्ध: चतुर्विंश अध्यायः श्लोक 1-47

श्रीकपिल देव जी का जन्म

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- उत्तम गुणों से सुशोभित मनुकुमारी देवहूति ने जब ऐसी वैराग्ययुक्त बातें कहीं, तब कृपालु कर्दम मुनि को भगवान् विष्णु के कथन का स्मरण हो आया और उन्होंने उससे कहा।

कर्मद जी बोले- दोषरहित राजकुमारी! तुम अपने विषय में इस प्रकार का खेद न करो; तुम्हारे गर्भ में अविनाशी भगवान् विष्णु शीघ्र ही पधारेंगे। प्रिये! तुमने अनेक प्रकार के व्रतों का पालन किया है, अतः तुम्हारा कल्याण होगा। अब तुम संयम, नियम, तप और दानादि करती हुई श्रद्धापूर्वक भगवान् का भजन करो। इस प्रकार आराधना करने पर श्रीहरि तुम्हारे गर्भ से अवतीर्ण होकर मेरा यश बढ़ावेंगे और ब्रह्मज्ञान का उपदेश करके तुम्हारे हृदय की अहंकारमयी ग्रन्थि का छेदन करेंगे।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! प्रजापति कर्दम के आदेश में गौरव-बुद्धि होने से देवहूति ने उस पर पूर्ण विश्वास किया और वह निर्विकार, जगद्गुरु भगवान् श्रीपुरुषोत्तम की आराधना करने लगी। इस प्रकार बहुत समय बीत जाने पर भगवान् मधुसूदन कर्दम जी के वीर्य का आश्रय ले उसके गर्भ से इस प्रकार प्रकट हुए, जैसे काष्ठ में से अग्नि। उस समय आकाश में मेघ जल बरसाते हुए गरज-गरजकर बाजे बजाने लगे, गन्धर्वगण गान करने लगे और अप्सराएँ आनन्दित होकर नाचने लगीं। आकाश से देवताओं के बरसाये हुए दिव्य पुष्पों की वर्षा होने लगी; सब दिशाओं में आनन्द छा गया, जलाशयों का जल निर्मल हो गया और सभी जीवों के मन प्रसन्न हो गये। इसी समय सरस्वती नदी से घिरे हुए कर्दम जी के उस आश्रम में मरीचि आदि मुनियों के सहित श्रीब्रह्मा जी आये।

शत्रुदमन विदुर जी! स्वतःसिद्ध ज्ञान से सम्पन्न अजन्मा ब्रह्मा जी को यह मालूम हो गया था कि साक्षात् परब्रह्म भगवान् विष्णु सांख्यशास्त्र का उपदेश करने के लिये अपने विशुद्ध सत्त्वमय अंश से अवतीर्ण हुए हैं। अतः भगवान् जिस कार्य को करना चाहते थे, उसका उन्होंने विशुद्ध चित्त से अनुमोदन एवं आदर किया और अपनी सम्पूर्ण इन्द्रियों से प्रसन्नता प्रकट करते हुए कर्दम जी से इस प्रकार कहा।

श्रीब्रह्मा जी ने कहा- प्रिय कर्दम! तुम दूसरों को मान देने वाले हो। तुमने मेरा सम्मान करते हुए जो मेरी आज्ञा का पालन किया है, इससे तुम्हारे द्वारा निष्कपट-भाव से मेरी पूजा सम्पन्न हुई है। पुत्रों को अपने पिता की सबसे बड़ी सेवा यही करनी चाहिये कि ‘जो आज्ञा’ ऐसा कहकर आदरपूर्वक उनके आदेश को स्वीकार करे। बेटा! तुम सभ्य हो, तुम्हारी ये सुन्दरी कन्याएँ अपने वंशों द्वारा इस सृष्टि को अनेक प्रकार से बढ़ावेंगी। अब तुम इन मरीचि आदि मुनिवरों को इनके स्वभाव और रुचि के अनुसार अपनी कन्याएँ समर्पित करो और संसार में अपना सुयश फैलाओ। मुने! मैं जानता हूँ, जो सम्पूर्ण प्राणियों की निधि हैं-उनके अभीष्ट मनोरथ पूर्ण करने वाले हैं, वे आदिपुरुष श्रीनारायण ही अपनी योगमाया से कपिल के रूप में अवतीर्ण हुए हैं। [फिर देवहूति से बोले-] राजकुमारी! सुनहरे बाल, कमल-जैसे विशाल नेत्र और कमलांकित चरणकमलों वाले शिशु के रूप में कैटभासुर को मारने वाले साक्षात् श्रीहरि ने ही, ज्ञान-विज्ञान द्वारा कर्मों की वासनाओं का मूलोच्छेद करने के लिये, तेरे गर्भ में प्रवेश किया है। वे अविद्याजनित मोह की ग्रन्थियों को काटकर पृथ्वी में स्वच्छन्द विचरेंगे। ये सिद्धगणों के स्वामी और सांख्याचार्यो के भी माननीय होंगे। लोक में तेरी कीर्ति का विस्तार करेंगे और ‘कपिल’ नाम से विख्यात होंगे।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! जगत् की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा जी उन दोनों को इस प्रकार आश्वासन देकर नारद और सनकादि को साथ ले, हंस पर चढ़कर ब्रह्मलोक को चले गये। ब्रह्मा जी के चले जाने पर कर्दम जी ने उनके आज्ञानुसार मरीचि आदि प्रजापतियों के साथ अपनी कन्याओं का विधिपूर्वक विवाह कर दिया। उन्होंने अपनी कला नाम की कन्या मरीचि को, अनसूया अत्रि को, श्रद्धा अंगिरा को और हविर्भू पुलस्त्य को समर्पित की। पुलह को उनके अनुरूप गति नाम की कन्या दी, क्रतु के साथ परम साध्वी क्रिया का विवाह किया, भृगु जी को ख्याति और वसिष्ठ जी को अरुन्धती समर्पित की। अथर्वा ऋषि को शान्ति नाम की कन्या दी, जिससे यज्ञकर्म का विस्तार किया जाता है। कर्दम जी ने उन विवाहित ऋषियों का उनकी पत्नियों के सहित खूब सत्कार किया। विदुर जी! इस प्रकार विवाह हो जाने पर वे सब ऋषि कर्दम जी की आज्ञा ले अतिआनन्दपूर्वक अपने-अपने आश्रमों को चले गये। कर्दम जी ने देखा कि उनके यहाँ साक्षात् देवाधिदेव श्रीहरि ने अवतार लिया है तो वे एकान्त में उनके पास गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे। ‘अहो! अपने पाप कर्मों के कारण इस दुःखमय संसार में नाना प्रकार से पीड़ित होते हुए पुरुषों पर देवगण तो बहुत काल बीतने पर प्रसन्न होते हैं। किन्तु जिनके स्वरूप को योगिजन अनेकों जन्मों के साधन से सिद्ध हुई सुदृढ़ समाधि के द्वारा एकान्त में देखने का प्रयत्न करते हैं, अपने भक्तों की रक्षा करने वाले वे ही श्रीहरि हम विषयलोलुपों के द्वारा होने वाली अपनी अवज्ञा का कुछ भी विचार न कर आज हमारे घर अवतीर्ण हुए हैं। आप वास्तव में अपने भक्तों का मान बढ़ाने वाले हैं। आपने अपने वचनों को सत्य करने और सांख्ययोग का उपदेश करने के लिये ही मेरे यहाँ अवतार लिया है। भगवन्! आप प्राकृतरूप से रहित हैं, आपके जो चतुर्भुत आदि अलौकिक रूप हैं, वे ही आपके योग्य हैं तथा जो मनुष्य-सदृश रूप आपके भक्तों को प्रिय लगते हैं, वे भी आपको रुचिकर प्रतीत होते हैं। आपका पाद-पीठ तत्त्व ज्ञान की इच्छा से विद्वानों द्वारा सर्वदा वन्दनीय है तथा आप ऐश्वर्य, वैराग्य, यश, ज्ञान, वीर्य और श्री- इन छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं। मैं आपकी शरण में हूँ। भगवन्! आप परब्रह्म हैं; सारी शक्तियाँ आपके अधीन हैं; प्रकृति, पुरुष, महत्तत्त्व, काल, त्रिविध अहंकार, समस्त लोक एवं लोकपालों के रूप में आप ही प्रकट हैं; तथा आप सर्वज्ञ परमात्मा ही इस सारे प्रपंच को चेतनशक्ति के द्वारा अपने में लीन कर लेते हैं। अतः इन सबसे परे भी आप ही हैं। मैं आप भगवान् कपिल की शरण लेता हूँ। प्रभो! आपकी कृपा से मैं तीनों ऋणों से मुक्त हो गया हूँ और मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो चुके हैं। अब मैं संन्यास-मार्ग को ग्रहण कर आपका चिन्तन करते हुए शोकरहित होकर विचरूँगा। आप समस्त प्रजाओं के स्वामी हैं; अतएव इसके लिये मैं आपकी आज्ञा चाहता हूँ।

श्रीभगवान् ने कह- मुने! वैदिक और लौकिक सभी कर्मों में संसार के लिये मेरा कथन ही प्रमाण है। इसलिये मैंने जो तुमसे कहा था कि ‘मैं तुम्हारे यहाँ जन्म लूँगा’, उसे सत्य करने के लिये ही मैंने यह अवतार लिया है। इस लोक में मेरा यह जन्म लिंगशरीर से मुक्त होने की इच्छा वाले मुनियों के लिये आत्मदर्शन में उपयोगी प्रकृति आदि तत्त्वों का विवेचन करने के लिये ही हुआ है। आत्मज्ञान का यह सूक्ष्म मार्ग बहुत समय से लुप्त हो गया है। इसे फिर से प्रवर्तित करने के लिये ही मैंने यह शरीर ग्रहण किया है- ऐसा जानो। मुने! मैं आज्ञा देता हूँ, तुम इच्छानुसार जाओ और अपने सम्पूर्ण कर्म मुझे अर्पण करते हुए दुर्जय मृत्यु को जीतकर मोक्षपद प्राप्त करने के लिये मेरा भजन करो। मैं स्वयंप्रकाश और सम्पूर्ण जीवों के अन्तःकरणों में रहने वाला परमात्मा हूँ। अतः जब तुम विशुद्ध बुद्धि के द्वारा अपने अन्तःकरण में मेरा साक्षात्कार कर लोगे, तब सब प्रकार के शोकों से छूटकर निर्भय पद (मोक्ष) प्राप्त कर लोगे। माता देवहूति को भी मैं सम्पूर्ण कर्मों से छुड़ाने वाला आत्मज्ञान प्रदान करूँगा, जिससे यह संसाररूप भय से पार हो जायेगी। श्रीमैत्रेय जी कहते ह- भगवान् कपिल के इस प्रकार कहने पर प्रजापति कर्दम जी उनकी परिक्रमा कर प्रसन्नतापूर्वक वन को चले गये। वहाँ अहिंसामय संन्यास-धर्म का पालन करते हुए वे एकमात्र श्रीभगवान् की शरण हो गये तथा अग्नि और आश्रम का त्याग करके निःसंग भाव पृथ्वी पर विचरने लगे। जो कार्यकारण से अतीत है, सात्वादि गुणों का प्रकाशक एवं निर्गुण है और अनन्य भक्ति से ही प्रत्यक्ष होता है, उस परब्रह्म में उन्होंने अपना मन लगा दिया। वे अहंकार, ममता और सुख-दुःखादि द्वन्दों से छूटकर समदर्शी (भेददृष्टि से रहित) हो, सबमें अपने आत्मा को ही देखने लगे। उनकी बुद्धि अन्तर्मुख एवं शान्त हो गयी। उस समय धीर कर्दम जी शान्त लहरों वाले समुद्र के समान जान पड़ने लगे। परम भक्तिभाव के द्वारा सर्वान्तर्यामी सर्वज्ञ श्रीवासुदेव में चित्त स्थिर हो जाने से वे सारे बन्धनों से मुक्त हो गये। सम्पूर्ण भूतों में अपने आत्मा श्रीभगवान् को और सम्पूर्ण भूतों को आत्मस्वरूप श्रीहरि में स्थित देखने लगे। इस प्रकार इच्छा और द्वेष से रहित, सर्वत्र समबुद्धि और भगवद्भक्ति से सम्पन्न होकर श्रीकर्दम जी ने भगवान् का परमपद प्राप्त कर लिया।

Chapter Twenty-four: The Renunciation of Kardama Muni

1. Recalling the words of Lord Visnu, the merciful sage Kardama replied as follows to Svayambhuva Manu’s praiseworthy daughter, Devahuti, who was speaking words full of renunciation.

2. The sage said: Do not be disappointed with yourself, O princess. You are actually praiseworthy. The infallible Supreme Personality of Godhead will shortly enter your womb as your son.

3. You have undertaken sacred vows. God will bless you. Hence you should worship the Lord with great faith, through sensory control, religious observances, austerities and gifts of your money in charity.

4. The Personality of Godhead, being worshiped by you, will spread my name and fame. He will
vanquish the knot of your heart by becoming your son and teaching knowledge of Brahman.

5. Sri Maitreya said: Devahuti was fully faithful and respectful toward the direction of her husband, Kardama, who was one of the Prajapatis, or generators of human beings in the universe. O great sage, she thus began to worship the master of the universe, the Supreme Personality of Godhead, who is situated in everyone’s heart.

6. After many, many years, the Supreme Personality of Godhead, Madhusudana, the killer of the demon Madhu, having entered the semen of Kardama, appeared in Devahuti just as fire comes from wood in a sacrifice.

7. At the time of His descent on earth, demigods in the form of raining clouds sounded musical
instruments in the sky. The celestial musicians, the Gandharvas, sang the glories of the Lord, while celestial dancing girls known as Apsaras danced in joyful ecstasy.

8. At the time of the Lord’s appearance, the demigods flying freely in the sky showered flowers. All the directions, all the waters and everyone’s mind became very satisfied.

9. Brahma, the first-born living being, went along with Marici and other sages to the place of Kardama’s hermitage, which was surrounded by the River Sarasvati.

10. Maitreya continued: O killer of the enemy, the unborn Lord Brahma, who is almost independent in acquiring knowledge, could understand that a portion of the Supreme Personality of Godhead, in His quality of pure existence, had appeared in the womb of Devahuti just to explain the complete state of knowledge known as sankhya-yoga.

11. After worshiping the Supreme Lord with gladdened senses and a pure heart for His intended activities as an incarnation, Brahma spoke as follows to Kardama and Devahuti.

12. Lord Brahma said: My dear son Kardama, since you have completely accepted my instructions without duplicity, showing them proper respect, you have worshiped me properly. Whatever instructions you took from me you have carried out, and thereby you have honored me.

13. Sons ought to render service to their father exactly to this extent. One should obey the command of his father or spiritual master with due deference, saying, “Yes, sir.”

14. Lord Brahma then praised Kardama Muni’s nine daughters, saying: All your thin-waisted daughters are certainly very chaste. I am sure they will increase this creation by their own descendants in various ways.

15. Therefore, today please give away your daughters to the foremost of the sages, with due regard for the girls’ temperaments and likings, and thereby spread your fame all over the universe.

16. O Kardama, I know that the original Supreme Personality of Godhead has now appeared as an
incarnation by His internal energy. He is the bestower of all desired by the living entities, and He has now assumed the body of Kapila Muni.

17. By mystic yoga and the practical application of knowledge from the scriptures, Kapila Muni, who is characterized by His golden hair, His eyes just like lotus petals and His lotus feet, which bear the marks of lotus flowers, will uproot the deep-rooted desire for work in this material world.

18. Lord Brahma then told Devahuti: My dear daughter of Manu, the same Supreme Personality of Godhead who killed the demon Kaitabha is now within your womb. He will cut off all the knots of your ignorance and doubt. Then He will travel all over the world.

19. Your son will be the head of all the perfected souls. He will be approved by the acaryas expert in disseminating real knowledge, and among the people He will be celebrated by the name Kapila. As the son of Devahuti, He will increase your fame.

20. Sri Maitreya said: After thus speaking to Kardama Muni and his wife Devahuti, Lord Brahma, the creator of the universe, who is also known as Hamsa, went back to the highest of the three planetary systems on his swan carrier with the four Kumaras and Narada.

21. O Vidura, after the departure of Brahma, Kardama Muni, having been ordered by Brahma, handed over his nine daughters, as instructed, to the nine great sages who created the population of the world.

22-23. Kardama Muni handed over his daughter Kala to Marici, and another daughter, Anasuya, to Atri. He delivered Sraddha to Angira, and Havirbhu to Pulastya. He delivered Gati to Pulaha, the chaste Kriya to Kratu, Khyati to Bhrgu, and Arundhati to Vasistha.

24. He delivered Santi to Atharva. Because of Santi, sacrificial ceremonies are well performed. Thus he got the foremost brahmanas married, and he maintained them along with their wives.

25. Thus married, the sages took leave of Kardama and departed full of joy, each for his own hermitage, O Vidura.

26. When Kardama Muni understood that the Supreme Personality of Godhead, the chief of all the demigods, Visnu, had descended, Kardama approached Him in a secluded place, offered obeisances and spoke as follows.

27. Kardama Muni said: Oh, after a long time the demigods of this universe have become pleased with the suffering souls who are in material entanglement because of their own misdeeds.

28. After many births, mature yogis, by complete trance in yoga, endeavor in secluded places to see the lotus feet of the Supreme Personality of Godhead.

29. Not considering the negligence of ordinary householders like us, that very same Supreme
Personality of Godhead appears in our homes just to support His devotees.

30. Kardama Muni said: You, my dear Lord, who are always increasing the honor of Your devotees, have descended in my home just to fulfill Your word and disseminate the process of real knowledge.

31. My dear Lord, although You have no material form, You have Your own innumerable forms. They truly are Your transcendental forms, which are pleasing to Your devotees.

32. My dear Lord, Your lotus feet are the reservoir that always deserves to receive worshipful homage from all great sages eager to understand the Absolute Truth. You are full in opulence, renunciation, transcendental fame, knowledge, strength and beauty, and therefore I surrender myself unto Your lotus feet.

33. I surrender unto the Supreme Personality of Godhead, descended in the form of Kapila, who is independently powerful and transcendental, who is the Supreme Person and the Lord of the sum total of matter and the element of time, who is the fully cognizant maintainer of all the universes under the three modes of material nature, and who absorbs the material manifestations after their dissolution.

34. Today I have something to ask from You, who are the Lord of all living entities. Since I have now
been liberated by You from my debts to my father, and since all my desires are fulfilled, I wish to accept the order of an itinerant mendicant. Renouncing this family life, I wish to wander about, free from lamentation, thinking always of You in my heart.

35. The Personality of Godhead Kapila said: Whatever I speak, whether directly or in the scriptures, is authoritative in all respects for the people of the world. O Muni, because I told you before that I would become your son, I have descended to fulfill this truth.

36. My appearance in this world is especially to explain the philosophy of Sankhya, which is highly esteemed for self-realization by those desiring freedom from the entanglement of unnecessary material desires.

37. This path of self-realization, which is difficult to understand, has now been lost in the course of time. Please know that I have assumed this body of Kapila to introduce and explain this philosophy to human society again.

38. Now, being sanctioned by Me, go as you desire, surrendering all your activities to Me. Conquering insurmountable death, worship Me for eternal life.

39. In your own heart, through your intellect, you will always see Me, the supreme self-effulgent soul dwelling within the hearts of all living entities. Thus you will achieve the state of eternal life, free from all lamentation and fear.

40. I shall also describe this sublime knowledge, which is the door to spiritual life, to My mother, so that she also can attain perfection and self-realization, ending all reactions to fruitive activities. Thus she also will be freed from all material fear.

41. Sri Maitreya said: Thus when Kardama Muni, the progenitor of human society, was spoken to in fullness by his son, Kapila, he circumambulated Him, and with a good, pacified mind he at once left for the forest.

42. The sage Kardama accepted silence as a vow in order to think of the Supreme Personality of Godhead and take shelter of Him exclusively. Without association, he traveled over the surface of the globe as a sannyasi, devoid of any relationship with fire or shelter.

43. He fixed his mind upon the Supreme Personality of Godhead, Parabrahman, who is beyond cause and effect, who manifests the three modes of material nature, who is beyond those three modes, and who is perceived only through unfailing devotional service.

44. Thus he gradually became unaffected by the false ego of material identity and became free from material affection. Undisturbed, equal to everyone and without duality, he could indeed see himself also. His mind was turned inward and was perfectly calm, like an ocean unagitated by waves.

45. He thus became liberated from conditioned life and became self-situated in transcendental
devotional service to the Personality of Godhead, Vasudeva, the omniscient Supersoul within everyone.

46. He began to see that the Supreme Personality of Godhead is seated in everyone’s heart, and that everyone is existing on Him, because He is the Supersoul of everyone.

47. Freed from all hatred and desire, Kardama Muni, being equal to everyone because of discharging uncontaminated devotional service, ultimately attained the path back to Godhead

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – तेईसवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Twenty Three

श्रीमद्भागवत महापुराण:

तृतीय स्कन्ध: त्रयोविंश अध्यायः श्लोक 1-57

कर्दम और देवहूति का विहार

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! माता-पिता के चले जाने पर पति के अभिप्राय को समझ लेने में कुशल साध्वी देवहूति कर्दम जी की प्रतिदिन प्रेमपूर्वक सेवा करने लगी, ठीक उसी तरह, जैसे श्रीपार्वती जी भगवान् शंकर की सेवा करती हैं। उसने काम-वासना, दम्भ, द्वेष, लोभ, पाप और मद का त्याग कर बड़ी सावधानी और लगन के साथ सेवा में तत्पर रहकर विश्वास, पवित्रता, गौरव, संयम, शुश्रूषा, प्रेम और मधुर भाषणादि गुणों से अपने परम तेजस्वी पतिदेव को सन्तुष्ट कर लिया। देवहूति समझती थी कि मेरे पतिदेव दैव से भी बढ़कर हैं, इसलिये वह उनसे बड़ी-बड़ी आशाएँ रखकर उनकी सेवा में लगी रहती थी। इस प्रकार बहुत दिनों तक अपना अनुवर्तन करने वाली उस मनुपुत्री को व्रतादि का पालन करने से दुर्बल हुई देख देवर्षिश्रेष्ठ कर्दम को दयावश कुछ खेद हुआ और उन्होंने उससे प्रेमगद्गद वाणी में कहा। कर्दम जी बोले- मनुनन्दिनी! तुमने मेरा बड़ा आदर किया है। मैं तुम्हारी उत्तम सेवा और परम भक्ति से बहुत सन्तुष्ट हूँ। सभी देहधारियों को अपना शरीर बहुत प्रिय एवं आदर की वस्तु होता है, किन्तु तुमने मेरी सेवा के आगे उसके क्षीण होने की भी कोई परवा नहीं की। अतः अपने धर्म का पालन करते रहने से मुझे तप, समाधि, उपासना और योग के द्वारा जो भय और शोक से रहित भगवत्प्रसाद-स्वरूप विभूतियाँ प्राप्त हुईं हैं, उन पर मेरी सेवा के प्रभाव से अब तुम्हारा भी अधिकार हो गया है। मैं तुम्हें दिव्य-दृष्टि प्रदान करता हूँ, उसके द्वारा तुम उन्हें देखो। अन्य जितने भी भोग हैं, वे तो भगवान् श्रीहरि के भ्रुकुटि-विलासमात्र से नष्ट हो जाते हैं; अतः वे इनके आगे कुछ भी नहीं है। तुम मेरी सेवा से भी कृतार्थ हो गयी हो; अपने पातिव्रत-धर्म का पालन करने से तुम्हें ये दिव्य भोग प्राप्त हो गये हैं, तुम इन्हें भोग सकती हो। हम राजा हैं, हमें सब कुछ सुलभ है, इस प्रकार जो अभिमान आदि विकार हैं, उनके रहते हुए मनुष्यों को इन दिव्य भोगों की प्राप्ति होनी कठिन है। कर्दम जी के इस प्रकार कहने से अपने पतिदेव को सम्पूर्ण योगमाया और विद्याओं में कुशल जानकर उस अबला की सारी चिन्ता जाती रही। उसका मुख किंचित् संकोच भरी चितवन और मधुर मुस्कान से खिल उठा और वह विनय एवं प्रेम से गद्गद वाणी में इस प्रकार कहने लगी। देवहूति ने कहा- द्विजश्रेष्ठ! स्वामिन्! मैं यह जानती हूँ कि कभी निष्फल न होने वाली योगशक्ति और त्रिगुणात्मिक माया पर अधिकार रखने वाले आपको ये सब ऐश्वर्य प्राप्त हैं। किन्तु प्रभो! आपने विवाह के समय जो प्रतिज्ञा की थी कि गर्भाधान होने तक मैं तुम्हारे साथ गृहस्थ-सुख का उपभोग करूँगा, उसकी अब पूर्ति होनी चाहिये। क्योंकि श्रेष्ठ पति के द्वारा सन्तान प्राप्त होना पतिव्रता स्त्री के लिये महान् लाभ है। हम दोनों के समागम के लिये शास्त्र के अनुसार जो कर्तव्य हो, उसका आप उपदेश दीजिये और उबटन, गन्ध, भोजन आदि उपयोगी सामग्रियाँ भी जुटा दीजिये, जिससे मिलन की इच्छा से अत्यन्त दीन दुर्बल हुआ मेरा यह शरीर आपके अंग-संग के योग्य हो जाये; क्योंकि आपकी ही बढ़ायी हुई कामवेदना से मैं पीड़ित हो रही हूँ। स्वामिन्! इस कार्य के लिये एक उपयुक्त भवन तैयार हो जाये, इसका भी विचार कीजिये।

मैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! कर्दम मुनि ने अपनी प्रिया की इच्छा पूर्ण करने के लिये उसी समय योग में स्थित होकर एक विमान रचा, जो इच्छानुसार सर्वत्र जा सकता था। यह विमान सब प्रकार के इच्छित भोग-सुख प्रदान करने वाला, अत्यन्त सुन्दर, सब प्रकार के रत्नों से युक्त, सब सम्पत्तियों की उत्तरोत्तर वृद्धि से सम्पन्न तथा मणिमय खंभों से सुशोभित था। वह सभी ऋतुओं में सुखदायक था और उसमें जहाँ-तहाँ सब प्रकार की दिव्य सामग्रियाँ रखी हुईं थीं तथा उसे चित्र-विचित्र रेशमी झंडियों और पताकाओं से खूब सजाया गया था। जिन पर भ्रमरगण मधुर गुंजार कर रहे थे, ऐसे रंग-बिरंगे पुष्पों की मालाओं से तथा अनेक प्रकार के सूती और रेशमी वस्त्रों से वह अत्यन्त शोभायमान हो रहा था। एक के ऊपर एक बनाये हुए कमरों में अलग-अलग रखी हुई शय्या, पलंग, पंखे और आसनों के कारण वह बड़ा सुन्दर जान पड़ता था। जहाँ-तहाँ दीवारों में की हुई शिल्प रचना से उसकी अपूर्व शोभा हो रही थी। उसमें पन्ने का फर्श था और बैठने के लिये मूँगे की वेदियाँ बनायी गयी थीं। मूँगे की ही देहलियाँ थीं। उसके द्वारों में हीरे के किवाड़ थे तथा इन्द्रनील मणि के शिखरों पर सोने के कलश रखे हुए थे। उसकी हीरे की दीवारों में बढ़िया लाल जड़े हुए थे, जो ऐसे जान पड़ते थे मानो विमान की आँखें हों तथा उसे रंग-बिरंगे चंदोवे और बहुमूल्य सुनहरी बन्दनवारों से सजाया गया था। उस विमान में जहाँ-तहाँ कृत्रिम हंस और कबूतर आदि पक्षी बनाये गये थे, जो बिलकुल सजीव-से मालूम पड़ते थे; उन्हें अपना सजातीय समझकर बहुत-से हंस और कबूतर उनके पास बैठ-बैठकर अपनी बोली बोलते थे। उसमें सुविधानुसार क्रीड़ास्थली, शयनगृह, बैठक, आँगन और चौक आदि बनाये गये थे-जिनके कारण वह विमान स्वयं कर्दम जी को भी विस्मित-सा कर रहा था। ऐसे सुन्दर घर को भी जब देवहूति ने बहुत प्रसन्न चित्त से नहीं देखा तो सबके आन्तरिक भाव को परख लेने वाले कर्दम जी ने स्वयं ही कहा- ‘भीरु! तुम इस बिन्दुसर सरोवर में स्नान करके विमान पर चढ़ जाओ; यह विष्णु भगवान् का रचा हुआ तीर्थ मनुष्यों को सभी कामनाओं की प्राप्ति कराने वाला है’। कमललोचना देवहूति ने अपने पति की बात मानकर सरस्वती के पवित्र जल से भरे हुए उस सरोवर में प्रवेश किया। उस समय वह बड़ी मैली-कुचैली साड़ी पहले हुए थी, उसके सिर के बाल चिपक जाने से उनमें लटें पड़ गयी थीं, शरीर में मैल जम गया था तथा स्तन कान्तिहीन हो गये थे। सरोवर में गोता लगाने पर उसने उसके भीतर एक महल में एक हजार कन्याएँ देखीं। वे सभी किशोर-अवस्था की थीं और उनके शरीर से कमल की-सी गन्ध आती थी। देवहूति को देखते ही वे सब स्त्रियाँ सहसा खड़ी हो गयीं और हाथ जोड़कर कहने लगीं, ‘हम आपकी दासियाँ हैं; हमें आज्ञा दीजिये, आपकी क्या सेवा करें? विदुर जी! तब स्वामिनी को सम्मान देने वाली उन रमणियों ने बहुमूल्य मसालों तथा गन्ध आदि से मिश्रित जल के द्वारा मनस्विनी देवहूति को स्नान कराया तथा उसे दो नवीन और निर्मल वस्त्र पहनने को दिये। फिर उन्होंने ये बहुत मूल्य के बड़े सुन्दर और कान्तिमान् आभूषण, सर्वगुणसम्पन्न भोजन और पीने के लिये अमृत के समान स्वादिष्ट आसव प्रस्तुत किये।

अब देवहूति ने दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह भाँति-भाँति के सुगंधित फूलों के हारों से विभूषित है, स्वच्छ वस्त्र धारण किये हुए है, उसका शरीर भी निर्मल और कान्तिमान् हो गया है तथा उन कन्याओं ने बड़े आदरपूर्वक से उसका मांगलिक श्रृंगार किया है। उसे सिर से स्नान कराया गया है, स्नान के पश्चात् अंग-अंग में सब प्रकार के आभूषण सजाये गये हैं तथा उसके गले में हार-हुमेल, हाथों में कंकण और पैरों में छमछमाते हुए सोने के पायजेब सुशोभित हैं। कमर में पड़ी हुई सोने की रत्न जटित करधनी से, बहुमूल्य मणियों के हार से और अंग-अंग में लगे हुए कुंकुमादि मंगल द्रव्यों से उसकी अपूर्व शोभा हो रही है। उसका मुख सुन्दर दन्तावली, मनोहर भौंहें, कमल की कली से स्पर्धा करने वाले प्रेम कटाक्षमय सुन्दर नेत्र और नीली अलकावली से बड़ा ही सुन्दर जान पड़ता है। विदुर जी! जब देवहूति ने अपने प्रिय पतिदेव का स्मरण किया, तो अपने को सहेलियों के सहित वहीं पाया, जहाँ प्रजापति कर्दम जी विराजमान थे। उस समय अपने को सहस्रों स्त्रियों के सहित अपने प्राणनाथ के सामने देख और उनके योग का प्रभाव समझकर देवहूति को बड़ा विस्मय हुआ। शत्रुविजयी विदुर! जब कर्दम जी ने देखा कि देवहूति का शरीर स्नान करने से अत्यन्त निर्मल हो गया है, और विवाह काल से पूर्व उसका जैसा रूप था, उसी रूप को पाकर वह अपूर्व शोभा से सम्पन्न हो गयी है। उसका सुन्दर वक्षःस्थल चोली से ढका हुआ है, हजारों विद्याधरियाँ उसकी सेवा में लगी हुई हैं तथा उसके शरीर पर बढ़िया-बढ़िया वस्त्र शोभा पा रहे हैं, तब उन्होंने बड़े प्रेम से उसे विमान पर चढ़ाया। उस समय अपनी प्रिया के प्रति अनुरक्त होने पर भी कर्दम जी की महिमा (मन और इन्द्रियों पर प्रभुता) कम नहीं हुई। विद्याधरियाँ उनके शरीर की सेवा कर रही थीं। खिले हुए कुमुद के फूलों से श्रृंगार करके अत्यन्त सुन्दर बने हुए वे विमान पर इस प्रकार शोभा पा रहे थे, मानो आकाश में तारागण से घिरे हुए चन्द्रदेव विराजमान हों। उस विमान पर निवास कर उन्होंने दीर्घकाल तक कुबेर जी के समान मेरु पर्वत की घाटियों में विहार किया। ये घाटियाँ आठों लोकपालों की विहार भूमि हैं; इसमें कामदेव को बढ़ाने वाली शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चलकर इनकी कमनीय शोभा का विस्तार करती है तथा श्रीगंगा जी के स्वर्गलोक से गिरने की मंगलमय ध्वनि निरन्तर गूँजती रहती है। उस समय भी दिव्य विद्याधरियों का समुदाय उनकी सेवा में उपस्थित था और सिद्धगण वन्दना किया करते थे। इसी प्रकार प्राणप्रिया देवहूति के साथ उन्होंने वैश्रम्भ्क, सुरसन, नन्दन, पुष्पभद्र और चैत्ररथ आदि अनेकों देवोद्यानों तथा मानस-सरोवर में अनुरागपूर्वक विहार किया। उस कान्तिमान् और इच्छानुसार चलने वाले श्रेष्ठ विमान पर बैठकर वायु के समान सभी लोकों में विचरते हुए कर्दम जी विमानविहारी देवताओं से भी आगे बढ़ गये। विदुर जी! जिन्होंने भगवान् के भवभयहारी पवित्र पादपद्मों का आश्रय लिया है, उन धीर पुरुषों के लिये कौन-सी वस्तु या शक्ति दुर्लभ है। इस प्रकार महायोगी कर्दम जी यह सारा भूमण्डल, जो द्वीप-वर्ष आदि की विचित्र रचना के कारण बड़ा आश्चर्यमय प्रतीत होता है, अपनी प्रिया को दिखाकर अपने आश्रम को लौट आये। फिर उन्होंने अपने को नौ रूपों में विभक्त कर रतिसुख के लिये अत्यन्त उत्सुक मनुकुमारी देवहूति को आनन्दित करते हुए उसके साथ बहुत वर्षों तक विहार किया, किन्तु उनका इतना लम्बा समय एक मुहूर्त के समान बीत गया।

उस विमान में रतिसुख को बढ़ाने वाली बड़ी सुन्दर शय्या का आश्रय ले अपने परम रूपवान् प्रियतम के साथ रहती हुई देवहूति को इतना काल कुछ भी न जान पड़ा। इस प्रकार उस कामासक्त दम्पत्ति को अपने योगबल से सैकड़ों वर्षों तक विहार करते हुए भी वह काल बहुत थोड़े समय के समान निकल गया।

आत्मज्ञानी कर्दम जी सब प्रकार के संकल्पों को जानते थे; अतः देवहूति को सन्तान प्राप्ति के लिये उत्सुक देख तथा भगवान् के आदेश को स्मरणकर उन्होंने अपने स्वरूप के नौ विभाग किये तथा कन्याओं की उत्पत्ति के लिये एकाग्रचित्त से अर्धांगरूप से अपनी पत्नी की भावना करते हुए उसके गर्भ में वीर्य स्थापित किया। इससे देवहूति के एक ही साथ नौ कन्याएँ पैदा हुई। वे सभी सर्वांग सुन्दरी थीं और उनके शरीर से लाल कमल की-सी सुगन्ध निकलती थी।

इसी समय शुद्ध स्वभाव वाली सती देवहूति ने देखा कि पूर्व प्रतिज्ञा के अनुसार उसके पतिदेव संन्यासश्रम ग्रहण करके वन को जाना चाहते हैं तो उसने अपने आँसुओं को रोककर ऊपर से मुसकराते हुए व्याकुल एवं संतप्त हृदय से धीरे-धीरे अति मधुर वाणी में कहा। उस समय वह सिर नीचा किये हुए अपने नखमणिमण्डित चरणकमल से पृथ्वी को कुरेद रही थी।

देवहूति ने कहा- भगवन्! आपने जो कुछ प्रतिज्ञा की थी, वह सब तो पूर्णतः निभा दी; तो भी मैं आपकी शरणागत हूँ, अतः आप मुझे अभयदान और दीजिये। ब्रह्मन्! इन कन्याओं के लिये योग्य वर खोजने पड़ेंगे और आपके वन को चले जाने के बाद मेरे जन्म-मरणरूप शोक को दूर करने के लिये भी कोई होना चाहिये। प्रभो! अब तक परमात्मा से विमुख रहकर मेरा जो समय इन्द्रियसुख भोगने में बीता है, वह तो निरर्थक ही गया। आपके परम प्रभाव को न जानने के कारण ही मैंने इन्द्रियों के विषयों में आसक्त रहकर आपसे अनुराग किया तथापि यह भी मेरे संसार-भय को दूर करने वाला ही होना चाहिये। अज्ञानवश असत्पुरुषों के साथ किया हुआ जो संग संसार-बन्धन का कारण होता है, वही सत्पुरुषों के साथ किये जाने पर असंगता प्रदान करता है। संसार में जिस पुरुष के कर्मों से न तो धर्म का सम्पादन होता है, न वैराग्य उत्पन्न होता है और न भगवान् की सेवा ही सम्पन्न होती है, वह पुरुष जीते ही मुर्दे के समान है। अवश्य ही मैं भगवान् की माया से बहुत ठगी गयी, जो आप-जैसे मुक्तिदाता पतिदेव को पाकर भी मैंने संसार-बन्धन से छूटने की इच्छा नहीं की।

Chapter Twenty-three: Devahuti’s Lamentation

1. Maitreya continued: After the departure of her parents, the chaste woman Devahuti, who could
understand the desires of her husband, served him constantly with great love, as Bhavani, the wife of Lord Shiva, serves her husband.

2. O Vidura, Devahuti served her husband with intimacy and great respect, with control of the senses, with love and with sweet words.

3. Working sanely and diligently, she pleased her very powerful husband, giving up all lust, pride, envy, greed, sinful activities and vanity.

4-5. The daughter of Manu, who was fully devoted to her husband, looked upon him as greater even than providence. Thus she expected great blessings from him. Having served him for a long time, she grew weak and emaciated due to her religious observances. Seeing her condition, Kardama, the foremost of celestial sages, was overcome with compassion and spoke to her in a voice choked with great love.

6. Kardama Muni said: O respectful daughter of Svayambhuva Manu, today I am very much pleased with you for your great devotion and most excellent loving service. Since the body is so dear to embodied beings, I am astonished that you have neglected your own body to use it on my behalf.

7. Kardama Muni continued: I have achieved the blessings of the Lord in discharging my own religious life of austerity, meditation and Krsna consciousness. Although you have not yet experienced these achievements, which are free from fear and lamentation, I shall offer them all to you because you are engaged in my service. Now just look at them. I am giving you the transcendental vision to see how nice they are.

8. Kardama Muni continued: What is the use of enjoyments other than the Lord’s grace? All material achievements are subject to be annihilated simply by a movement of the eyebrows of Lord Vishnu, the Supreme Personality of Godhead. By your principles of devotion to your husband, you have achieved and can enjoy transcendental gifts very rarely obtained by persons proud of aristocracy and material possessions.

9. Upon hearing the speaking of her husband, who excelled in knowledge of all kinds of transcendental science, innocent Devahuti was very satisfied. Her smiling face shining with a slightly bashful glance, she spoke in a choked voice because of great humility and love.

10. Sri Devahuti said: My dear husband, O best of brahmanas, I know that you have achieved
perfection and are the master of all the infallible mystic powers because you are under the protection of yogamaya, the transcendental nature. But you once made a promise that our bodily union should now fulfill, since children are a great quality for a chaste woman who has a glorious husband.

11. Devahuti continued: My dear lord, I am struck by excited emotion for you. Therefore kindly make what arrangements must be made according to the scriptures so that my skinny body, emaciated through unsatisfied passion, may be rendered fit for you. Also, my lord, please think of a suitable house for this purpose.

12. Maitreya continued: O Vidura, seeking to please his beloved wife, the sage Kardama exercised his yogic power and instantly produced an aerial mansion that could travel at his will.

13. It was a wonderful structure, bedecked with all sorts of jewels, adorned with pillars of precious stones, and capable of yielding whatever one desired. It was equipped with every form of furniture andwealth, which tended to increase in the course of time.

14-15. The castle was fully equipped with all necessary paraphernalia, and it was pleasing in all seasons. It was decorated all around with flags, festoons and artistic work of variegated colors. It was further embellished with wreaths of charming flowers that attracted sweetly humming bees and with tapestries of linen, silk and various other fabrics.

16. The palace looked charming, with beds, couches, fans and seats, all separately arranged in seven stories.

17. Its beauty was enhanced by artistic engravings here and there on the walls. The floor was of emerald, with coral daises.

18. The palace was very beautiful, with its coral thresholds at the entrances and its doors bedecked with diamonds. Gold pinnacles crowned its domes of sapphire.

19. With the choicest rubies set in its diamond walls, it appeared as though possessed of eyes. It was furnished with wonderful canopies and greatly valuable gates of gold.

20. Here and there in that palace were multitudes of live swans and pigeons, as well as artificial swans and pigeons so lifelike that the real swans rose above them again and again, thinking them live birds like themselves. Thus the palace vibrated with the sounds of these birds.

21. The castle had pleasure grounds, resting chambers, bedrooms and inner and outer yards designed with an eye to comfort. All this caused astonishment to the sage himself.

22. When he saw Devahuti looking at the gigantic, opulent palace with a displeased heart, Kardama Muni could understand her feelings because he could study the heart of anyone. Thus he personally addressed his wife as follows.

23. My dear Devahuti, you look very much afraid. First bathe in Lake Bindu-sarovara, created by Lord Vishnu Himself, which can grant all the desires of a human being, and then mount this airplane.

24. The lotus-eyed Devahuti accepted the order of her husband. Because of her dirty dress and the locks of matted hair on her head, she did not look very attractive.

25. Her body was coated with a thick layer of dirt, and her breasts were discolored. She dove, however, into the lake, which contained the sacred waters of the Sarasvati.

26. In a house inside the lake she saw one thousand girls, all in the prime of youth and fragrant like lotuses.

27. Seeing her, the damsels suddenly rose and said with folded hands, “We are your maidservants. Tell us what we can do for you.”

28. The girls, being very respectful to Devahuti, brought her forth, and after bathing her with valuable oils and ointments, they gave her fine, new, spotless cloth to cover her body.

29. They then decorated her with very excellent and valuable jewels, which shone brightly. Next they offered her food containing all good qualities, and a sweet, inebriating drink called asavam.

30. Then in a mirror she beheld her own reflection. Her body was completely freed from all dirt, and she was adorned with a garland. Dressed in unsullied robes and decorated with auspicious marks of tilaka, she was served very respectfully by the maids.

31. Her entire body, including her head, was completely bathed, and she was decorated all over with ornaments. She wore a special necklace with a locket. There were bangles on her wrists and tinkling anklets of gold about her ankles.

32. About her hips she wore a girdle of gold, set with numerous jewels, and she was further adorned with a precious pearl necklace and auspicious substances.

33. Her countenance shone, with beautiful teeth and charming eyebrows. Her eyes, distinguished by lovely moist corners, defeated the beauty of lotus buds. Her face was surrounded by dark curling tresses.

34. When she thought of her great husband, the best of the sages, Kardama Muni, who was very dear to her, she, along with all the maidservants, at once appeared where he was.

35. She was amazed to find herself surrounded by a thousand maids in the presence of her husband and to witness his yogic power.

36-37. The sage could see that Devahuti had washed herself clean and was shining forth as though no longer his former wife. She had regained her own original beauty as the daughter of a prince. Dressed in excellent robes, her charming breasts duly girded, she was waited upon by a thousand Gandharva girls. O destroyer of the enemy, his fondness for her grew, and he placed her on the aerial mansion.

38. Though seemingly attached to his beloved consort while served by the Gandharva girls, the sage did not lose his glory, which was mastery over his self. In the aerial mansion Kardama Muni with his consort shone as charmingly as the moon in the midst of the stars in the sky, which causes rows of lilies to open in ponds at night.

39. In that aerial mansion he traveled to the pleasure valleys of Mount Meru, which were rendered all the more beautiful by cool, gentle, fragrant breezes that stimulated passion. In these valleys, the treasurer of the gods, Kuvera, surrounded by beautiful women and praised by the Siddhas, generally enjoys pleasure. Kardama Muni also, surrounded by the beautiful damsels and his wife, went there and enjoyed for many, many years.

40. Satisfied by his wife, he enjoyed in that aerial mansion not only on Mount Meru but in different
gardens known as Vaisrambhaka, Surasana, Nandana, Puspabhadraka and Caitrarathya, and by the Manasa-sarovara Lake.

41. He traveled in that way through the various planets, as the air passes uncontrolled in every
direction. Coursing through the air in that great and splendid aerial mansion, which could fly at his will, he surpassed even the demigods.

42. What is difficult to achieve for determined men who have taken refuge of the Supreme Personality of Godhead’s lotus feet? His feet are the source of sacred rivers like the Ganges, which put an end to the dangers of mundane life.

43. After showing his wife the globe of the universe and its different arrangements, full of many wonders, the great yogi Kardama Muni returned to his own hermitage.

44. After coming back to his hermitage, he divided himself into nine personalities just to give pleasure to Devahuti, the daughter of Manu, who was eager for sex life. In that way he enjoyed with her for many, many years, which passed just like a moment.

45. In that aerial mansion, Devahuti, in the company of her handsome husband, situated on an excellent bed that increased sexual desires, could not realize how much time was passing.

46. While the couple, who eagerly longed for sexual pleasure, were thus enjoying themselves by virtue of mystic powers, a hundred autumns passed like a brief span of time.

47. The powerful Kardama Muni was the knower of everyone’s heart, and he could grant whatever one desired. Knowing the spiritual soul, he regarded her as half of his body. Dividing himself into nine forms, he impregnated Devahuti with nine discharges of semen.

48. Immediately afterward, on the same day, Devahuti gave birth to nine female children, all charming in every limb and fragrant with the scent of the red lotus flower.

49. When she saw her husband about to leave home, she smiled externally, but at heart she was
agitated and distressed.

50. She stood and scratched the ground with her foot, which was radiant with the luster of her gemlike nails. Her head bent down, she spoke in slow yet charming accents, suppressing her tears.

51. Sri Devahuti said: My lord, you have fulfilled all the promises you gave me, yet because I am your surrendered soul, you should give me fearlessness too.

52. My dear brahmana, as far as your daughters are concerned, they will find their own suitable
husbands and go away to their respective homes. But who will give me solace after your departure as a sannyasi?

53. Until now we have simply wasted so much of our time in sense gratification, neglecting to cultivate knowledge of the Supreme Lord.

54. Not knowing your transcendental situation, I have loved you while remaining attached to the objects of the senses. Nonetheless, let the affinity I have developed for you rid me of all fear.

55. Association for sense gratification is certainly the path of bondage. But the same type of association, performed with a saintly person, leads to the path of liberation, even if performed without knowledge.

56. Anyone whose work is not meant to elevate him to religious life, anyone whose religious ritualistic performances do not raise him to renunciation, and anyone situated in renunciation that does not lead him to devotional service to the Supreme Personality of Godhead, must be considered dead, although he is breathing.

57. My lord, surely I have been solidly cheated by the insurmountable illusory energy of the Supreme Personality of Godhead, for in spite of having obtained your association, which gives liberation from material bondage, I did not seek such liberation.