श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – सत्रहवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Seventeen

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – सत्रहवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Seventeen

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः

श्लोक 1-36

महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना और पृथ्वी के द्वारा उनकी स्तुति करना

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- इस प्रकार जब वन्दीजन ने महराज पृथु के गुण और कर्मों का बखान करके उनकी प्रशंसा की, तब उन्होंने भी उनकी बड़ाई करके तथा उन्हें मनचाही वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट किया। उन्होंने ब्राह्मणादि चारों वर्णों, सेवकों, मन्त्रियों, पुरोहितों, पुरवासियों, देशवासियों, भिन्न-भिन्न व्यवसायियों तथा अन्यान्य आज्ञानुवर्तियों का भी सत्कार किया।

विदुर जी ने पूछा- ब्रह्मन्! पृथ्वी तो अनेक रूप धारण कर सकती है, उसने गौ का रूप ही क्यों धारण किया? और जब महाराज पृथु ने उसे दुहा, तब बछड़ा कौन बना? और दुहने का पात्र क्या हुआ? पृथ्वी देवी तो पहले स्वभाव से ही ऊँची-नीची थी। उसे उन्होंने समतल किस प्रकार किया और इन्द्र उनके यज्ञसम्बन्धी घोड़े को क्यों हर ले गये? ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमार जी से ज्ञान और विज्ञान प्राप्त करके वे राजर्षि किस गति को प्राप्त हुए? पृथुरूप से सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने ही अवतार ग्रहण किया था; अतः पुण्यकीर्ति श्रीहरि के उस पृथु-अवतार से सम्बन्ध रखने वाले जो और भी पवित्र-चरित्र हों, वे सभी आप मुझसे कहिये। मैं आपका और श्रीकृष्णचन्द्र का बड़ा अनुरक्त भक्त हूँ।

श्रीसूत जी कहते हैं- जब विदुर जी ने भगवान् वासुदेव की कथा कहने के लिये इस प्रकार प्रेरणा की, तब श्रीमैत्रेय जी प्रसन्नचित्त से उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे।

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! ब्राह्मणों ने महाराज पृथु का राज्याभिषेक करके उन्हें प्रजा का रक्षक उद्घोषित किया। इन दिनों पृथ्वी अन्नहीन हो गयी थी, इसलिये भूख के कारण प्रजाजनों के शरीर सूखकर काँटे हो गये थे। ‘राजन्! जिस प्रकार कोटर में सुलगती हुई आग से पेड़ जल जाता है, उसी प्रकार हम पेट की भीषण ज्वाला से जले जा रहे हैं। आप शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं और हमारे अन्नदाता प्रभु बनाये गये हैं, इसलिये हम आपकी शरण में आये हैं। आप समस्त लोकों की रक्षा करने वाले हैं, आप ही हमारी जीविका के भी स्वामी हैं। अतः राजराजेश्वर! आप हम क्षुधापीड़ितों को शीघ्र ही अन्न देने का प्रबन्ध कीजिये; ऐसा न हो कि अन्न मिलने से पहले ही हमारा अन्त हो जाये’।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- कुरुवर! प्रजा का करुणक्रन्दन सुनकर महाराज पृथु बहुत देर तक विचार करते रहे। अन्त में उन्हें अन्नाभाव का कारण मालूम हो गया। ‘पृथ्वी ने स्वयं ही अन्न एवं औषधादि को अपने भीतर छिपा लिया है’ अपनी बुद्धि से इस बात का निश्चय करके उन्होंने अपना धनुष उठाया और त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकर के समान अत्यन्त क्रोधित होकर पृथ्वी को लक्ष्य बनाकर बाण चढ़ाया। उन्हें शस्त्र उठाये देख पृथ्वी काँप उठी और जिस प्रकार व्याध के पीछा करने पर हरिणी भागती है, उसी प्रकार वह डरकर गौ का रूप धारण करके भागने लगी। यह देखकर महाराज पृथु की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। वे जहाँ-तहाँ पृथ्वी गयी, वहाँ-वहाँ धनुष पर बाण चढ़ाये उसके पीछे लगे रहे। दिशा, विदिशा, स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में जहाँ-जहाँ भी वह दौड़कर जाती, वहीं उसे महाराज पृथु हथियार उठाये अपने पीछे दिखायी देते। जिस प्रकार मनुष्य को मृत्यु से कोई नहीं बचा सकता, उसी प्रकार उसे त्रिलोकी में वेनपुत्र पृथु से बचाने वाला कोई भी न मिला।

तब वह अत्यन्त भयभीत होकर दुःखित चित्त से पीछे की ओर लौटी और महाभाग पृथु जी से कहने लगी- ‘धर्म के तत्त्व को जानने वाले शरणागतवत्सल राजन्! आप तो सभी प्राणियों की रक्षा करने में तत्पर हैं, आप मेरी भी रक्षा कीजिये। मैं अत्यन्त दीन और निरपराध हूँ, आप मुझे क्यों मरना चाहते हैं? इसके सिवा आप तो धर्मज्ञ माने जाते हैं; फिर मुझ स्त्री का वध आप कैसे कर सकेंगे? स्त्रियाँ कोई अपराध करें, तो साधारण जीव भी उन पर हाथ नहीं उठाते; फिर आप जैसे करुणामय और दीनवत्सल तो ऐसा कर ही कैसे सकते हैं? मैं तो सुदृढ़ नौका के समान हूँ, सारा जगत् मेरे ही आधार पर स्थित हैं। मुझे तोड़कर आप अपने को और अपनी प्रजा को जल के ऊपर कैसे रखेंगे?

महाराज पृथु ने कहा- पृथ्वी! तू मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने वाली है। तू यज्ञ में देवतारूप से भाग लेती है, किन्तु उसके बदले में हमें अन्न नहीं देती; इसलिये आज मैं तुझे मार डालूँगा। तू जो प्रतिदिन हरी-हरी घास खा जाती है और अपने थन का दूध नहीं देती- ऐसी दुष्टता करने पर तुझे दण्ड देना अनुचित नहीं कहा जा सकता। तू नासमझ है, तूने पूर्वकाल में ब्रह्मा जी के उत्पन्न किये हुए अन्नादि के बीजों को अपने में लीन कर लिया है, और अब मेरी भी परवा न करके उन्हें अपने गर्भ से निकालती नहीं। अब मैं अपने बाणों से तुझे छिन्न-भिन्न कर तेरे मेदे से इन क्षुधातुर और दीन प्रजाजनों का करुण-क्रन्दन शान्त करूँगा। जो दुष्ट अपना ही पोषण करने वाला तथा अन्य प्राणियों के प्रति निर्दय हो- वह पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक कोई भी हो- उसे मारना राजाओं के लिये न मारने के ही समान है। तू बड़ी गर्वीली और मदोन्मत्ता है; इस समय माया से ही यह गौ का रूप बनाये हुए है। मैं बाणों से तेरे टुकड़े-टुकड़े करके अपने योगबल से प्रजा को धारण करूँगा।

इस समय पृथु काल की भाँति क्रोधमयी मूर्ति धारण किये हुए थे। उनके ये शब्द सुनकर धरती काँपने लगी और उसने अत्यन्त विनीतभाव से हाथ जोड़कर कहा।

पृथ्वी ने कहा- आप साक्षात् परमपुरुष हैं तथा अपनी माया से अनेक प्रकार के शरीर धारणकर गुणमय जान पड़ते हैं; वास्तव में आत्मानुभव के द्वारा आप अधिभूत, अध्यात्म और अधिदैवसम्बन्धी अभिमान और उससे उत्पन्न हुए राग-द्वेषादि से सर्वथा रहित हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करती हूँ। आप सम्पूर्ण जगत् के विधाता हैं; आपने ही यह त्रिगुणात्मक सृष्टि रची है और मुझे समस्त जीवों का आश्रय बनाया है। आप सर्वथा स्वतन्त्र हैं। प्रभो! अब आप ही अस्त्र-शस्त्र लेकर मुझे मारने को तैयार हो गये, तब मैं और किसकी शरण में जाऊँ?

कल्प के आरम्भ में आपने-अपने आश्रित रहने वाली अनिर्वचिया माया से ही इस चराचर जगत् की रचना की थी और उस माया के ही द्वारा आप इसका पालन करने के लिये तैयार हुए हैं। आप धर्मपरायण हैं; फिर भी मुझ गोरूपधारिणी को किस प्रकार मारना चाहते हैं? आप एक होकर भी मायावश अनेक रूप जान पड़ते हैं तथा आपने स्वयं ब्रह्मा को रचकर उनसे विश्व की रचना करायी है। आप साक्षात् सर्वेश्वर हैं, आपकी लीलाओं को अजितेन्द्रिय लोग कैसे जान सकते हैं? उनकी बुद्धि तो आपकी दुर्जय माया से विक्षिप्त हो रही है। आप ही पंचभूत, इन्द्रिय, उनके अधिष्ठातृ देवता, बुद्धि और अहंकाररूप अपनी शक्तियों के द्वारा क्रमशः जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं। भिन्न-भिन्न कार्यों के लिये समय-समय पर आपकी शक्तियों का आविर्भाव-तिरोभाव हुआ करता है। आप साक्षात् परमपुरुष और जगाद्विधाता हैं, आपको मेरा नमस्कार है।

अजन्मा प्रभो! आप ही अपने रचे हुए भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप जगत् की स्थिति के लिये आदिवराह रूप होकर मुझे रसातल से जल के बाहर लाये थे। इस प्रकार एक बार तो मेरा उद्धार करके आपने धराधर नाम पाया था; आज वही आप वीरमूर्ति से जल के ऊपर नौका के समान स्थित मेरे ही आश्रय रहने वाली प्रजा की रक्षा करने के अभिप्राय से पैने-पैने बाण चढ़ाकर दूध न देने के अपराध में मुझे मारना चाहते हैं। इस त्रिगुणात्मक सृष्टि की रचना करने वाली आपकी माया से मेरे-जैसे साधारण जीवों के चित्त मोहग्रस्त हो रहे हैं। मुझ-जैसे लोग तो आपके भक्तों की लीलाओं का भी आशय नहीं समझ सकते, फिर आपकी किसी क्रिया का उद्देश्य न समझें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। अतः जो इन्द्रिय-संयमादि के द्वारा वीरोचित यज्ञ का विस्तार करते हैं, ऐसे आपके भक्तों को भी नमस्कार है।

Chapter Seventeen: Maharaja Prthu Becomes Angry at the Earth

1. The great sage Maitreya continued: In this way the reciters who were glorifying Maharaja Prthu
readily described his qualities and chivalrous activities. At the end, Maharaja Prthu offered them various presentations with all due respect and worshiped them adequately.

2. King Prthu thus satisfied and offered all respect to all the leaders of the brahmanas and other castes, to his servants, to his ministers and to the priests, citizens, general countrymen, people from other communities, admirers and others, and thus they all became happy.

3. Vidura inquired from the great sage Maitreya: My dear brahmana, since mother earth can appear in different shapes, why did she take the shape of a cow? And when King Prthu milked her, who became the calf, and what was the milking pot?

4. The surface of the earth is by nature low in some places and high in others. How did King Prthu level the surface of the earth, and why did the King of heaven, Indra, steal the horse meant for the sacrifice ?

5. The great saintly King, Maharaja Prthu, received knowledge from Sanat-kumara, who was the greatest Vedic scholar. After receiving knowledge to be applied practically in his life, how did the saintly King attain his desired destination?

6-7. Prthu Maharaja was a powerful incarnation of Lord Krishna’s potencies; consequently any narration concerning his activities is surely very pleasing to hear, and it produces all good fortune. As far as I am concerned, I am always your devotee as well as a devotee of the Lord, who is known as Adhoksaja. Please therefore narrate all the stories of King Prthu, who, in the form of the son of King Vena, milked the cow-shaped earth.

8. Suta Gosvami continued: When Vidura became inspired to hear of the activities of Lord Krsna in His various incarnations, Maitreya, also being inspired and being very pleased with Vidura, began to praise him. Then Maitreya spoke as follows.

9. The great sage Maitreya continued: My dear Vidura, at the time King Prthu was enthroned by the great sages and brahmanas and declared to be the protector of the citizens, there was a scarcity of food grains. The citizens actually became skinny due to starvation. Therefore they came before the King and informed him of their real situation.

10-11. Dear King, just as a tree with a fire burning in the hollow of the trunk gradually dries up, we are drying up due to the fire of hunger in our stomachs. You are the protector of surrendered souls, and you have been appointed to give employment to us. Therefore we have all come to you for protection. You are not only a king, but the incarnation of God as well. Indeed, you are the king of all kings. You can give us all kinds of occupational engagements, for you are the master of our livelihood. Therefore, O king of all kings, please arrange to satisfy our hunger by the proper distribution of food grains. Please take care of us, lest we soon die for want of food.

12. After hearing this lamentation and seeing the pitiable condition of the citizens, King Prthu
contemplated this matter for a long time to see if he could find out the underlying causes.

13. Having arrived at a conclusion, the King took up his bow and arrow and aimed them at the earth, exactly like Lord Siva, who destroys the whole world out of anger.

14. When the earth saw that King Prthu was taking his bow and arrow to kill her, she became very much afraid and began to tremble. She then began to flee, exactly like a deer, which runs very swiftlywhen followed by a 15. Seeing this, Maharaja Prthu became very angry, and his eyes became as red as the early-morning sun. Placing an arrow on his bow, he chased the cow-shaped earth wherever she would run.

16. The cow-shaped earth ran here and there in outer space between the heavenly planets and the earth, and wherever she ran, the King chased her with his bow and arrows.

17. Just as a man cannot escape the cruel hands of death, the cow-shaped earth could not escape the hands of the son of Vena. At length the earth, fearful, her heart aggrieved, turned back in helplessness.

18. Addressing the great, opulent King Prthu as the knower of religious principles and shelter of the surrendered, she said: Please save me. You are the protector of all living entities. Now you are situated as the King of this planet.

19. The cow-shaped earth continued to appeal to the King: I am very poor and have not committed any sinful activities. I do not know why you want to kill me. Since you are supposed to be the knower of all religious principles, why are you so envious of me, and why are you so anxious to kill a woman?

20. Even if a woman does commit some sinful activity, no one should place his hand upon her. And what to speak of you, dear King, who are so merciful. You are a protector, and you are affectionate to the poor.

21. The cow-shaped earth continued: My dear King, I am just like a strong boat, and all the
paraphernalia of the world is standing upon me. If you break me to pieces, how can you protect yourself and your subjects from drowning?

22. King Prthu replied to the earthly Planet: My dear earth, you have disobeyed my orders and rulings.In the form of a demigod you accepted your share of the yajnas we performed, but in return you have not produced sufficient food grains. For this reason I must kill you.

23. Although you are eating green grass every day, you are not filling your milk bag so we can utilize your milk. Since you are willfully committing offenses, it cannot be said that you are not punishable due to your assuming the form of a cow.

24. You have so lost your intelligence that, despite my orders, you do not deliver the seeds of herbs and grains formerly created by Brahma and now hidden within yourself.

25. Now, with the help of my arrows, I shall cut you to pieces and with your flesh satisfy the hunger-stricken citizens, who are now crying for want of grains. Thus I shall satisfy the crying citizens of my kingdom.

26. Any cruel person–be he a man, woman or impotent eunuch–who is only interested in his personal maintenance and has no compassion for other living entities may be killed by the king. Such killing can never be considered actual killing.

27. You are very much puffed up with pride and have become almost insane. Presently you have
assumed the form of a cow by your mystic powers. Nonetheless I shall cut you into small pieces like grain, and I will uphold the entire population by my personal mystic powers.

28. At this time Prthu Maharaja became exactly like Yamaraja, and his whole body appeared very
angry. In other words, he was anger personified. After hearing him, the planet earth began to tremble.She surrendered, and with folded hands began to speak as follows.

29. The planet earth spoke: My dear Lord, O Supreme Personality of Godhead, You are transcendental in Your position, and by Your material energy You have expanded Yourself in various forms and species of life through the interaction of the three modes of material nature. Unlike some other masters, You always remain in Your transcendental position and are not affected by the material creation, which is subject to different material interactions. Consequently You are not bewildered by material activities.

30. The planet earth continued: My dear Lord, You are the complete conductor of the material creation.You have created this cosmic manifestation and the three material qualities, and therefore You have created me, the planet earth, the resting place of all living entities. Yet You are always fully independent, my Lord. Now that You are present before me and ready to kill me with Your weapons, let me know where I should go to take shelter, and tell me who can give me protection.

31. In the beginning of creation You created all these moving and nonmoving living entities by Your inconceivable energy. Through this very same energy You are now prepared to protect the living entities. Indeed, You are the supreme protector of religious principles. Why are You so anxious to kill me, even though I am in the form of a cow?

32. My dear Lord, although You are one, by Your inconceivable potencies You have expanded Yourself in many forms. Through the agency of Brahma, You have created this universe. You are therefore directly the Supreme Personality of Godhead. Those who are not sufficiently experienced cannot understand Your transcendental activities because these persons are covered by Your illusory energy.

33. My dear Lord, by Your own potencies You are the original cause of the material elements, as well as the performing instruments (the senses), the workers of the senses (the controlling demigods), the intelligence and the ego, as well as everything else. By Your energy You manifest this entire cosmic creation, maintain it and dissolve it. Through Your energy alone everything is sometimes manifest and sometimes not manifest. You are therefore the Supreme Personality of Godhead, the cause of all
causes. I offer my respectful obeisances unto You.

34. My dear Lord, You are always unborn. Once, in the form of the original boar, You rescued me from the waters in the bottom of the universe. Through Your own energy You created all the physical elements, the senses and the heart, for the maintenance of the world.

35. My dear Lord, in this way You once protected me by rescuing me from the water, and consequently Your name has been famous as Dharadhara–He who holds the planet earth. Yet at the present moment, in the form of a great hero, You are about to kill me with sharpened arrows. I am, however, just like a boat on the water, keeping everything afloat.

36. My dear Lord, I am also the creation of one of Your energies, composed of the three modes of
material nature. Consequently I am bewildered by Your activities. Even the activities of Your devotees cannot be understood, and what to speak of Your pastimes. Thus everything appears to us to be contradictory and wonderful.

श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – सत्रहवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Seventeen

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः

श्लोक 1-31

हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष का जन्म तथा हिरण्याक्ष की दिग्विजय

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! ब्रह्मा जी के कहने से अन्धकार का कारण जानकर देवताओं की शंका निवृत्त हो गयी और फिर वे सब स्वर्गलोक को लौट आये। इधर दिति को अपने पतिदेव के कथानानुसार पुत्रों की ओर से उपद्रवादि की आशंका बनी रहती थी। इसलिये जब पूरे सौ वर्ष बीत गये, तब उस साध्वी ने दो यमज (जुड़वे) पुत्र उत्पन्न किये। उनके जन्म लेते समय स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में अनेकों उत्पात होने लगे-जिनसे लोग अत्यन्त भयभीत हो गये। जहाँ-तहाँ पृथ्वी और पर्वत काँपने लगे, सब दिशाओं में दाह होने लगा। जगह-जगह उल्कापात होने लगा, बिजलियाँ गिरने लगीं और आकाश में अनिष्टसूचक धूमकेतु (पुच्छल तारे) दिखायी देने लगे। बार-बार सायं-सायं करती और बड़े-बड़े वृक्षों को उखाड़ती हुई बड़ी विकट और असह्य वायु चलने लगी। उस समय आँधी उसकी सेना और उमड़ती हुई धूल ध्वजा के समान जान पड़ती थी। बिजली जोर-जोर से चमककर मानो खिलखिला रही थी। घटाओं ने ऐसा सघन रूप धारण किया कि सूर्य, चन्द्र आदि ग्रहों के लुप्त हो जाने से आकाश में गहरा अँधेरा छा गया। उस समय कहीं कुछ भी दिखायी न देता था। समुद्र दुःखी मनुष्य की भाँति कोलाहल करने लगा, उसमें ऊँची-ऊँची तरंगें उठने लगीं और उसके भीतर रहने वाले जीवों में बड़ी हलचल मच गयी। नदियों तथा अन्य जलाशयों में भी बड़ी खलबली मच गयी और उनके कमल सूख गये। सूर्य और चन्द्रमा बार-बार ग्रसे जाने लगे तथा उनके चारों ओर अमंगलसूचक मण्डल बैठने लगे। बिना बादलों के ही गरजने का शब्द होने लगा तथा गुफाओं में से रथ की घरघराहट का-सा शब्द निकलने लगा। गावों में गीदड़ और उल्लुओं के भयानक शब्द के साथ ही सियारियाँ मुख से दहकती हुई आग उगलकर बड़ा अमंगल शब्द करने लगीं। जहाँ-तहाँ कुत्ते अपनी गरदन ऊपर उठाकर कभी गाने कभी रोने के समान भाँति-भाँति के शब्द करने लगे। विदुर जी! झुंड-के-झुंड गधे अपने कठोर खुरों से पृथ्वी खोदते और रेंकने का शब्द करते मतवाले होकर इधर-उधर दौड़ने लगे। पक्षी गधों के शब्द से डरकर रोते-चिल्लाते और अपने घोंसलों से उड़ने लगे। अपनी खिरकों में बँधे हुए और वन में चरते हुए गाय, बैल आदि पशु डर के मारे मल-मूत्र त्यागने लगे। गौएँ ऐसी डर गयीं कि दुहने पर उनके थनों से खून निकलने लगा, बदल पीब की वर्षा करने लगे, देवमूर्तियों की आँखों से आँसू बहने लगे और आँधी के बिना ही वृक्ष उखड़-उखड़कर गिरने लगे। शनि, राहु आदि क्रूर ग्रह प्रबल होकर चन्द्र, बृहस्पति आदि सौम्य ग्रहों तथा बहुत-से नक्षत्रों को लाँघकर वक्रगति से चलने लगे तथा आपस में युद्ध करने लगे। ऐसे ही और भी अनेकों भयंकर उत्पात देखकर सनकादि के सिवा और सब जीव भयभीत हो गये तथा उन उत्पातों का मर्म न जानने के कारण उन्होंने यही समझा कि अब संसार का प्रलय होने वाला है। वे दोनों आदिदैत्य जन्म के अनन्तर शीघ्र ही अपने फौलाद के समान कठोर शरीरों से बढ़कर महान् पर्वतों के सदृश हो गये तथा उनका पूर्व पराक्रम भी प्रकट हो गया। वे इतने ऊँचे थे कि उनके सुवर्णमय मुकुटों का अग्रभाग स्वर्ग को स्पर्श करता था और उनके विशाल शरीरों से सारी दिशाएँ आच्छादित हो जाती थीं। उनकी भुजाओं में सोने के बाजूबंद चमचमा रहे थे। पृथ्वी पर जो वे एक-एक कदम रखते थे, उससे भूकम्प होने लगता था और जब वे खड़े होते थे, तब उनकी जगमगाती हुई चमकीली करधनी से सुशोभित कमर अपने प्रकाश से सूर्य को भी मात करती थी।

वे दोनों यमज थे। प्रजापति कश्यप जी ने उनका नामकरण किया। उनमें से जो उनके वीर्य से दिति के गर्भ में पहले स्थापित हुआ था, उसका नाम हिरण्यकशिपु रखा और जो दिति के उदर से पहले निकला, वह हिरण्याक्ष के नाम से विख्यात हुआ। हिरण्यकशिपु ब्रह्मा जी के वर से मृत्यु के भय से मुक्त हो जाने के कारण बड़ा उद्धत हो गया था। उसने अपनी भुजाओं के बल से लोकपालों के सहित तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया। वह अपने छोटे भाई हिरण्याक्ष को बहुत चाहता था और वह भी सदा अपने बड़े भाई का प्रिय कार्य करता रहता था। एक दिन वह हिरण्याक्ष हाथ में गदा लिये युद्ध का अवसर ढूँढता हुआ स्वर्गलोक में जा पहुँचा। उसका वेग बड़ा असह्य था। उसके पैरों में सोने के नूपुरों की झनकार हो रही थी, गले में विषयसूचक माला धारण की हुई थी और कंधे पर विशाल गदा रखी हुई थी। उसके मनोबल, शारीरिक बल तथा ब्रह्मा जी के वर ने उसे मतवाला कर रखा था; इसलिये वह सर्वथा निरंकुश और निर्भय हो रहा था। उसे देखकर देवता लोग डर के मारे वैसे ही जहाँ-तहाँ छिप गये, जैसे गरुड़ के डर से साँप छिप जाते हैं। जब दैत्यराज हिरण्याक्ष ने देखा कि मेरे तेज के सामने बड़े-बड़े गर्वीले इन्द्रादि देवता भी छिप गये हैं, तब उन्हें अपने सामने न देखकर वह बार-बार भयंकर गर्जना करने लगा। फिर वह महाबली दैत्य वहाँ से लौटकर जलक्रीड़ा करने के लिये मतवाले हाथी के समान गहरे समुद्र में घुस गया, जिसमें लहरों की बड़ी भयंकर गर्जना हो रही थी। ज्यों ही उसने समुद्र में पैर रखा कि डर के मारे वरुण के सैनिक जलचर जीव हकबका गये और किसी प्रकार की छेड़छाड़ न करने पर भी वे उसकी धाक से ही घबराकर बहुत दूर भाग गये। महाबली हिरण्याक्ष अनेक वर्षों तक समुद्र में ही घूमता और सामने किसी प्रतिपक्षी को न पाकर वह बार-बार वायु वेग से उठी हुई उसकी प्रचण्ड तरंगों पर ही अपनी लोहमयी गदा को आजमाता रहा। इस प्रकार घूमते-घूमते वह वरुण की राजधानी विभावरीपुरी में जा पहुँचा। वहाँ पाताल लोक के स्वामी, जलचरों के अधिपति वरुण जी को देखकर उसने उनकी हँसी उड़ाते हुए नीच मनुष्य की भाँति प्रणाम किया और कुछ मुसकराते हुए व्यंग से कहा- ‘महाराज! मुझे युद्ध की भिक्षा दीजिये। प्रभो! आप तो लोक-पालक, राजा और बड़े कीर्तिशाली हैं। जो लोग अपने को बाँका वीर समझते थे, उनके वीर्यमद को भी आप चूर्ण कर चुके हैं और पहले एक बार आपने संसार के समस्त दैत्य-दानवों को जीतकर राजसूय यज्ञ भी किया था’। उस मदोन्मत्त शत्रु के इस प्रकार बहुत उपहास करने से भगवान् वरुण को क्रोध तो बहुत आया, किंतु अपने बुद्धिबल से वे उसे पी गये और बदले में उससे कहने लगे- ‘भाई! हमें तो अब युद्धादि का कोई चाव नहीं रह गया है। भगवान् पुराणपुरुष के सिवा हमें और कोई ऐसा दीखता भी नहीं जो तुम-जैसे रणकुशल वीर को युद्ध में सन्तुष्ट कर सके। दैत्यराज! तुम उन्हीं के पास जाओ, वे ही तुम्हारी कामना पूरी करेंगे। तुम-जैसे वीर उन्हीं का गुणगान किया करते हैं। वे बड़े वीर हैं। उनके पास पहुँचते ही तुम्हारी सारी शेखी पूरी हो जायेगी और तुम कुत्तों से घिरकर वीर शय्या पर शयन करोगे। वे तुम-जैसे दुष्टों को मारने और सत्पुरुषों पर कृपा करने के लिये अनेक प्रकार के रूप धारण किया करते हैं’।

Chapter Seventeen: Victory of Hiranyaksa Over All the directions of the Universe

1. Sri Maitreya said: The demigods, the inhabitants of the higher planets, were freed from all fear upon hearing the cause of the darkness explained by Brahma, who was born from Visnu. Thus they all returned to their respective planets. 

2. The virtuous lady Diti had been very apprehensive of trouble to the gods from the children in her womb, and her husband predicted the same. She brought forth twin sons after a full one hundred years of pregnancy.

3. On the birth of the two demons there were many natural disturbances, all very fearful and wonderful, in the heavenly planets, the earthly planets and in between them.

4. There were earthquakes along the mountains on the earth, and it appeared that there was fire
everywhere. Many inauspicious planets like Saturn appeared, along with comets, meteors and thunderbolts.

5. There blew winds which were most uninviting to the touch, hissing again and again and uprooting gigantic trees. They had storms for their armies and clouds of dust for their ensigns.

6. The luminaries in the heavens were screened by masses of clouds, in which lightning sometimes flashed as though laughing. Darkness reigned everywhere, and nothing could be seen.

7. The ocean with its high waves wailed aloud as if stricken with sorrow, and there was a commotion among the creatures inhabiting the ocean. The rivers and lakes were also agitated, and lotuses withered.

8. Misty halos appeared around the sun and the moon during solar and lunar eclipses again and again. Claps of thunder were heard even without clouds, and sounds like those of rattling chariots emerged from the mountain caves.

9. In the interior of the villages she-jackals yelled portentously, vomiting strong fire from their mouths, and jackals and owls also joined them with their cries.

10. Raising their necks, dogs cried here and there, now in the manner of singing and now of wailing.

11. O Vidura, the asses ran hither and thither in herds, striking the earth with their hard hooves and wildly braying.

12. Frightened by the braying of the asses, birds flew shrieking from their nests, while cattle in the
cowsheds as well as in the woods passed dung and urine.

13. Cows, terrified, yielded blood in place of milk, clouds rained pus, the images of the gods in the
temples shed tears, and trees fell down without a blast of wind.

14. Ominous planets such as Mars and Saturn shone brighter and surpassed the auspicious ones such as Mercury, Jupiter and Venus as well as a number of lunar mansions. Taking seemingly retrograde courses, the planets came in conflict with one another.

15. Marking these and many other omens of evil times, everyone but the four sage-sons of Brahma, who were aware of the fall of Jaya and Vijaya and of their birth as Diti’s sons, was seized with fear.They did not know the secrets of these potents and thought that the dissolution of the universe was at hand.

16. These two demons who appeared in ancient times soon began to exhibit uncommon bodily
features; they had steellike frames which began to grow just like two great mountains.

17. Their bodies became so tall that they seemed to kiss the sky with the crests of their gold crowns.They blocked the view of all directions and while walking shook the earth at every step. Their arms were adorned with brilliant bracelets, and they stood as if covering the sun with their waists, which were bound with excellent and beautiful girdles.

18. Kasyapa, Prajapati, the creator of the living entities, gave his twin sons their names; the one who was born first he named Hiranyaksa, and the one who was first conceived by Diti he named
Hiranyakasipu.

19. The elder child, Hiranyakasipu, was unafraid of death from anyone within the three worlds because he received a benediction from Lord Brahma. He was proud and puffed up due to this benediction and was able to bring all three planetary systems under his control.

20. His younger brother, Hiranyaksa, was always ready to satisfy his elder brother by his activities.
Hiranyaksa took a club on his shoulder and traveled all over the universe with a fighting spirit just to satisfy Hiranyakasipu.

21. Hiranyaksa’s temper was difficult to control. He had anklets of gold tinkling about his feet, he was adorned with a gigantic garland, and he rested his huge mace on one of his shoulders.

22. His mental and bodily strength as well as the boon conferred upon him had made him proud. He feared death at the hands of no one, and there was no checking him. The gods, therefore, were seized with fear at his very sight, and they hid themselves even as snakes hide themselves for fear of Garuda.

23. On not finding Indra and the other demigods, who had previously been intoxicated with power, the chief of the Daityas, seeing that they had all vanished before his might, roared loudly.

24. After returning from the heavenly kingdom, the mighty demon, who was like an elephant in wrath, for the sake of sport dived into the deep ocean, which was roaring terribly.

25. On his entering the ocean, the aquatic animals who formed the host of Varuna were stricken with fear and ran far away. Thus Hiranyaksa showed his splendor without dealing a blow.

26. Moving about in the ocean for many, many years, the mighty Hiranyaksa smote the gigantic wind-tossed waves again and again with his iron mace and reached Vibhavari, the capital of Varuna.

27. Vibhavari is the home of Varuna, lord of the aquatic creatures and guardian of the lower regions of the universe, where the demons generally reside. There Hiranyaksa fell at Varuna’s feet like a lowborn man, and to make fun of him he said with a smile, “Give me battle, O Supreme Lord!”

28. You are the guardian of an entire sphere and a ruler of wide fame. Having crushed the might of arrogant and conceited warriors and having conquered all the Daityas and Danavas in the world, you once performed a Rajasuya sacrifice to the Lord.

29. Thus mocked by an enemy whose vanity knew no bounds, the worshipful lord of the waters waxed angry, but by dint of his reason he managed to curb the anger that had sprung up in him, and he replied: O dear one, we have now desisted from warfare, having grown too old for combat.

30. You are so skilled in war that I do not see anyone else but the most ancient person, Lord Visnu, who can give satisfaction in battle to you. Therefore, O chief of the asuras, approach Him, whom even heroes like you mention with praise.

31. Varuna continued: On reaching Him you will be rid of your pride at once and will lie down on the field of battle, surrounded by dogs, for eternal sleep. It is in order to exterminate wicked fellows like you and to show His grace to the virtuous that He assumes His various incarnations like Varaha.

श्रीमद्भागवत – प्रथम स्कंध – सत्रहवाँ अध्याय

महाराज परीक्षित के द्वारा कलियुग का दमन

सूत उवाच
तत्र गोमिथुनं राजा हन्यमानमनाथवत्
दण्डहस्तं च वृषलं ददृशे नृपलाञ्छनम् 1

सूतजी कहते हैं—- शौनकजी ! वहाँ पहुँचकर राजा परीक्षित ने देखा की एक राजवेषधारी शुद्र हाथ में डंडा लिये हुए है और गाय-बैल के एक जोड़े को इस तरह पीटता जा रह है, जैसे उनका कोई स्वामी ही न हो ।।1।।

वृषं मृणालधवलं मेहन्तमिव बिभ्यतम्
वेपमानं पदैकेन सीदन्तं शूद्रताडितम् 2

वह कमलतन्तु के समान श्वेत रंग का बैल एक पैर से खड़ा काँप रहा था तथा शुद्र की ताड़ना से पीड़ित और भयभीत होकर मूत्र-त्याग कर रहा था ।।2।।

गां च धर्मदुघां दीनां भृशं शूद्रपदाहताम्
विवत्सामाश्रुवदनां क्षामां यवसमिच्छतीम् 3

धर्मोप्योगी दूध,घी आदि हविष्य पदार्थों को देनेवाली वह गाय भी बार-बार शुद्र के पैरों की ठोकरें खाकर अत्यन्त दीन हो रही थी। एक तो वह स्वयं ही दुबली-पतली थी, दुसरे उसका बछड़ा भी उसके पास नहीं था। उसे भूख लगी हुई थी और उसकी आँखों से आँसू बहते जा रहे थे ।।3।।

पप्रच्छ रथमारूढः कार्तस्वरपरिच्छदम्
मेघगम्भीरया वाचा समारोपितकार्मुकः 4

स्वर्णजटित रथपर चढ़े हुए राजा परीक्षित ने अपना धनुष चढ़ाकर मेघ के समान गम्भीर वाणी से उसको ललकारा ।।4।।

कस्त्वं मच्छरणे लोके बलाद्धंस्यबलान्बली
नरदेवोऽसि वेषेण नटवत्कर्मणाद्विजः 5

अरे ! तू कौन है, जो बलवान होकर भी मेरे राज्य के इन दुर्बल प्राणियों को बलपूर्वक मार रहा है? तूने नट की भाँति वेश तो राजा का -सा बना रखा है, परन्तु कर्म से तू शुद्र जान पड़ता है ।।5।।

यस्त्वं कृष्णे गते दूरं सहगाण्डीवधन्वना
शोच्योऽस्यशोच्यान्रहसि प्रहरन्वधमर्हसि 6

हमारे दादा अर्जुन के साथ भगवान् श्रीकृष्ण के परमधाम पधार जानेपर इस प्रकार निर्जन स्थान में निरपराधों पर प्रहार करनेवाला तू अपराधी है, अतः वध के योग्य है ।।6।।

त्वं वा मृणालधवलः पादैर्न्यूनः पदा चरन्
वृषरूपेण किं कश्चिद्देवो नः परिखेदयन् 7

उन्होंने धर्म से पूछा — कमल-नाल के समान आपका श्वेतवर्ण  है।  तीन पैर न होने पर भी आप एक ही पैर से चलते-फिरते
हैं। यह  देखकर मुझे बड़ा कष्ट हो रहा है। बतलाइये, आप क्या बैल के रूप में कोई

न जातु कौरवेन्द्राणां दोर्दण्डपरिरम्भिते
भूतलेऽनुपतन्त्यस्मिन्विना ते प्राणिनां शुचः 8

अभी यह भूमण्डल कुरुवंशी नरपतियों के बाहुबल से सुरक्षित है। इसमें आपके सिवा और किसी भी प्राणी की आँखों से शोक के आँसू बहते मैंने नहीं देखे ।।8।।

मा सौरभेयात्र शुचो व्येतु ते वृषलाद्भयम्
मा रोदीरम्ब भद्रं ते खलानां मयि शास्तरि 9

धेनुपुत्र ! अब आप शोक न करें। इस शुद्र से निर्भय हो जाये। गोमाता ! मैं दुष्टों की दण्ड  देनेवाला हूँ। अब आप रोयें नहीं। आपका कल्याण हो ।।9।।

यस्य राष्ट्रे प्रजाः सर्वास्त्रस्यन्ते साध्व्यसाधुभिः
तस्य मत्तस्य नश्यन्ति कीर्तिरायुर्भगो गतिः 10

देवी ! जिस राजा के राज्य में दुष्टों के उपद्रव से सारी प्रजा त्रस्त रहती है उस मतवाले राजा की कीर्ति, आयु, ऐश्वर्य और परलोक नष्ट हो जाते हैं ।।10।।

एष राज्ञां परो धर्मो ह्यार्तानामार्तिनिग्रहः
अत एनं वधिष्यामि भूतद्रुहमसत्तमम् 11

राजाओं का परम धर्म यही है कि वे दुःखियों का दुःख दूर करें। यह महादुष्ट और प्राणियों को पीड़ित करनेवाला है। अतः मैं अभी इसे मार डालूँगा ।।11।।

कोऽवृश्चत्तव पादांस्त्रीन्सौरभेय चतुष्पद
मा भूवंस्त्वादृशा राष्ट्रे राज्ञां कृष्णानुवर्तिनाम् 12

सुरभिनन्दन ! आप तो चार पैरवाले जीव हैं। आपके तीन पैर किसने काट डाले? श्रीकृष्ण के अनुयायी राजाओं के राज्य में कभी कोई भी आपकी तरह दुःखी न हो ।।12।।

आख्याहि वृष भद्रं वः साधूनामकृतागसाम्
आत्मवैरूप्यकर्तारं पार्थानां कीर्तिदूषणम् 13

वृषभ ! आपका कल्याण हो। बताइये, आप जैसे निरपराध साधुओं का अंग-भंग करके किस दुष्ट ने पाण्डवों की कीर्ति में कलंक लगाया है? ।।13।।

जनेऽनागस्यघं युञ्जन्सर्वतोऽस्य च मद्भयम्
साधूनां भद्रमेव स्यादसाधुदमने कृते 14

जो किसी निरपराध प्राणी को सताता है, उसे चाहे वह कहीं भी रहे, मेरा भय अवश्य होगा। दुष्टों का दमन करने से साधुओं का कल्याण ही होता है ।।14।।

अनागःस्विह भूतेषु य आगस्कृन्निरङ्कुशः
आहर्तास्मि भुजं साक्षादमर्त्यस्यापि साङ्गदम् 15

जो उद्दण्ड व्यक्ति निरपराध प्राणियों को दुःख देता है, वह चाहे साक्षात् देवता ही क्यों न हो, मैं उसकी बाजूबंद से विभूषित भुजा को काट डालूँगा ।।15।।

राज्ञो हि परमो धर्मः स्वधर्मस्थानुपालनम्
शासतोऽन्यान्यथाशास्त्रमनापद्युत्पथानिह 16

बिना आपत्तिकाल के मर्यादा का उल्लंघन करनेवालों को शास्त्रानुसार दण्ड देते हुए अपने धर्म में स्थित लोगों का पालन करना राजाओं का परम धर्म है ।।16।।

धर्म उवाच
एतद्वः पाण्डवेयानां युक्तमार्ताभयं वचः
येषां गुणगणैः कृष्णो दौत्यादौ भगवान्कृतः 17

धर्म ने कहा —– राजन ! आप महाराज पाण्डु के वंशज हैं। आपका इस प्रकार दुःखियों को आश्वासन देना आपके योग्य ही है; क्योंकि आपके पूर्वजों के श्रेष्ट गुणों ने भगवान् श्रीकृष्ण को उनका सारथि और दूत आदि बना दिया था ।।17।।

न वयं क्लेशबीजानि यतः स्युः पुरुषर्षभ
पुरुषं तं विजानीमो वाक्यभेदविमोहिताः 18

नरेन्द्र ! शास्त्रों के विभिन्न वचनों से मोहित होने के कारण हम उस पुरुष को नहीं जानते, जिससे क्लेशों के कारण उत्पन्न होते हैं ॥18॥

केचिद्विकल्पवसना आहुरात्मानमात्मनः
दैवमन्येऽपरे कर्म स्वभावमपरे प्रभुम् 19

जो लोग किसी भी प्रकार के द्वैत को स्वीकार नहीं करते, वे अपन-आप ही अपने दुःख का कारण बतलाते हैं। कोई प्रारब्ध को कारण बतलाते हैं, तो कोई कर्म को। कुछ लोग स्वभाव को, तो कुछ लोग ईश्वर को दुःख का कारण मानते हैं ।।19।।

अप्रतर्क्यादनिर्देश्यादिति केष्वपि निश्चयः
अत्रानुरूपं राजर्षे विमृश स्वमनीषया 20

किन्हीं-किन्हीं का ऐसा भी निश्चय है कि दुःख का कर्ण न तो तर्क के द्वारा जाना जा सकता है और न वाणी के द्वारा बतलाया जा सकता है। राजर्षे ! अब इन्मों कौन-सा मत ठीक है, यह आप अपनी बुद्धि से ही विचार लीजिये ।।20।।

सूत उवाच
एवं धर्मे प्रवदति स सम्राड्द्विजसत्तमाः
समाहितेन मनसा विखेदः पर्यचष्ट तम् 21

सूतजी कहते हैं —– ऋषिश्रेष्ट शौनकजी ! धर्म का यह प्रवचन सुनकर सम्राट परीक्षित बहुत प्रसन्न हुए, उनका खेद मिट गया। उन्होंने शान्तचित्त होकर उनसे कहा —।।21।।

राजोवाच
धर्मं ब्रवीषि धर्मज्ञ धर्मोऽसि वृषरूपधृक्
यदधर्मकृतः स्थानं सूचकस्यापि तद्भवेत् 22

परीक्षित ने कहा —– धर्म का तत्त्व जाननेवाले वृषभदेव ! आप धर्म का उपदेश कर रहे हैं। अवश्य ही आप वृषभ के रूप में स्वयं धर्म हैं। ( आपने अपने को दुःख देनेवाले का नाम इसलिये नहीं बताया है कि ) अधर्म करनेवाले को जो नरकादि प्राप्त होते हैं, वे ही चुगली करनेवाले को भी मिलते हैं ।।22।।

अथवा देवमायाया नूनं गतिरगोचरा
चेतसो वचसश्चापि भूतानामिति निश्चयः 23

अथवा यही सिद्धांत निश्चित है कि प्राणियों के मन और वाणी से परमेश्वर की माया के स्वरुप का निरूपण नहीं किया जा सकता ।।23।।

तपः शौचं दया सत्यमिति पादाः कृते कृताः
अधर्मांशैस्त्रयो भग्नाः स्मयसङ्गमदैस्तव 24

धर्मदेव ! सत्ययुग में आपके चार चरण थे— तप, पवित्रता, दया और सत्य। इस समय अधर्म के अंश गर्व, आसक्ति और मद से तीन चरण नष्ट हो चुके हैं ।।24।।

इदानीं धर्म पादस्ते सत्यं निर्वर्तयेद्यतः
तं जिघृक्षत्यधर्मोऽयमनृतेनैधितः कलिः 25

अब आपका चौथा चरण केवल ‘सत्य’ ही बच रहा है। उसी के बलपर आप जी रहे हैं। असत्य से पुष्ट हुआ यह अधर्मरूप कलियुग उसे भी ग्रास कर लेना चाहता है ।।25।।

इयं च भूमिर्भगवता न्यासितोरुभरा सती
श्रीमद्भिस्तत्पदन्यासैः सर्वतः कृतकौतुका 26

ये गौं माता साक्षात् पृथ्वी हैं। भगवान् ने इनका भारी बोझ उतार दिया था और ये उनके राशी-राशी सौन्दर्य बिखेरनेवाले चरणचिन्हों से सर्वत्र उत्सवमयी हो गयी थीं।।26।।

शोचत्यश्रुकला साध्वी दुर्भगेवोज्झिता सती
अब्रह्मण्या नृपव्याजाः शूद्रा भोक्ष्यन्ति मामिति 27

जब ये उनसे बिछुड़ गयी हैं। वे साध्वी अभागिनी के समान नेत्रों में जल भरकर यह चिंता कर रही है कि  अब राजा का स्वाँग बनाकर ब्राह्मणद्रोही शुद्र मुझे भोगेंगे ।।27।।

इति धर्मं महीं चैव सान्त्वयित्वा महारथः
निशातमाददे खड्गं कलयेऽधर्महेतवे 28

महारथी परीक्षित ने इस प्रकार धर्म और पृथ्वी को सांत्वना दी। फिर उन्होंने अधर्म के कारणरूप कलियुग को मारने के लए तीक्ष्ण तलवार उठायी ।।28।।

तं जिघांसुमभिप्रेत्य विहाय नृपलाञ्छनम्
तत्पादमूलं शिरसा समगाद्भयविह्वलः 29

कलियुग ताड़ गया कि ये तो अब मुझे मार ही डालना चाहते हैं; अतः झटपट उसने अपने राजचिन्ह उतार डाले और भयविव्हल होकर उनके चरणों में अपना सर रख दिया ।।29।।

पतितं पादयोर्वीरः कृपया दीनवत्सलः
शरण्यो नावधीच्छ्लोक्य आह चेदं हसन्निव 30

परीक्षित बड़े यशस्वी, दीनवत्सल और शरणागतरक्षक थे। उन्होंने जब कलियुग को अपने पैरों पर पड़े देखा तो कृपा करके उसकों मारा नहीं, अपितु हँसते हुए-से उससे कहा ।।30।।

राजोवाच
न ते गुडाकेशयशोधराणां बद्धाञ्जलेर्वै भयमस्ति किञ्चित्
न वर्तितव्यं भवता कथञ्चन क्षेत्रे मदीये त्वमधर्मबन्धुः 31
     

परीक्षित बोले—- जब तू हाथ जोड़कर शरण आ गया, तब अर्जुन के यशस्वी वंश में उत्पन्न हुए किसी भी वीर से तुझे कोई बे नहीं है। परन्तु तू अधर्म का सहायक हैं, इसलिये तुझे मेरे राज्य में बिलकुल नहीं रहना चाहिये।।31।।

त्वां वर्तमानं नरदेवदेहेष्वनुप्रवृत्तोऽयमधर्मपूगः
लोभोऽनृतं चौर्यमनार्यमंहो ज्येष्ठा च माया कलहश्च दम्भः 32

तेरे राजाओं के शरीर में रहने से ही लोभ,झूठ,चोरी,दुष्टता, स्वधर्मत्याग,दरिद्रता,कपट,कलह,दम्भ और दूसरे पापों की बढ़ती हो रही है ।।32।।

न वर्तितव्यं तदधर्मबन्धो धर्मेण सत्येन च वर्तितव्ये
ब्रह्मावर्ते यत्र यजन्ति यज्ञैर्यज्ञेश्वरं यज्ञवितानविज्ञाः 33

अतः अधर्म के साथी ! इस ब्रह्मावर्त में तू एक क्षण के लिए भी न ठहरना; क्योंकि यह धर्म और सत्य का निवास स्थान है। इस क्षेत्र में यज्ञविधि दे जाननेवाले महात्मा यज्ञों के द्वारा यज्ञपुरुष भगवान् की आराधना करते रहते हैं ।।33।।

यस्मिन्हरिर्भगवानिज्यमान इज्यात्ममूर्तिर्यजतां शं तनोति
कामानमोघान्स्थिरजङ्गमानामन्तर्बहिर्वायुरिवैष आत्मा 34

इस देश में भगवान् श्रीहरि यज्ञों के द्वारा उनकी पूजा होती है और वे यज्ञ करनेवालों का कल्याण करते हैं। वे सर्वात्मा भगवान् वायु की भाँति समस्त चराचर जीवों के भीतर और बाहर एकरस स्थित रहते हुए उनकी कामनाओं को पूर्ण करते रहते हैं ।।34।।

सूत उवाच
परीक्षितैवमादिष्टः स कलिर्जातवेपथुः
तमुद्यतासिमाहेदं दण्डपाणिमिवोद्यतम् 35

सूतजी कहते हैं—- परीक्षित की यह आज्ञा सुनकर कलियुग सिहर उठा। यमराज के समान मारने के लिए उद्यत,हाथ में तलवार लिये हुए परीक्षित से वह बोला—।।35।।

कलिरुवाच
यत्र क्व वाथ वत्स्यामि सार्वभौम तवाज्ञया
लक्षये तत्र तत्रापि त्वामात्तेषुशरासनम् 36

कलि ने कहा— सार्वभौम ! आपकी आज्ञा से जहाँ कहीं भी मैं रहने का विचार करता हूँ, वहीं देखता हूँ कि आप धनुषपर बाण चढ़ाये खड़े हैं ।।36।।

तन्मे धर्मभृतां श्रेष्ठ स्थानं निर्देष्टुमर्हसि
यत्रैव नियतो वत्स्य आतिष्ठंस्तेऽनुशासनम् 37

धार्मिकशिरोमणे ! आप मुझे वह स्थान बतलाइये, जहाँ मैं आपकी आज्ञा का पालन करता हुआ स्थिर होकर रह सकूँ ।।37।।

सूत उवाच
अभ्यर्थितस्तदा तस्मै स्थानानि कलये ददौ
द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः 38

सूतजी कहते हैं—– कलियुग की प्रार्थना स्वीकार करके राजा परीक्षित ने उसे चार स्थान दिये—द्युत,मद्यपान,स्त्री-संग और हिंसा। इन स्थानों में क्रमशः असत्य, मद, आसक्ति और निर्दयता— ये चार प्रकार के अधर्म निवास करते हैं ।।38।।

पुनश्च याचमानाय जातरूपमदात्प्रभुः
ततोऽनृतं मदं कामं रजो वैरं च पञ्चमम् 39

उसने और भी स्थान माँगे। तब समर्थ परीक्षित ने उसे रहने के लिए एक और स्थान—‘सुवर्ण’ (धन) दिया। इस प्रकार कलियुग के पाँच स्थान हो गये झूठ,मद,काम,वैर और रजोगुण ।।39।।

अमूनि पञ्च स्थानानि ह्यधर्मप्रभवः कलिः
औत्तरेयेण दत्तानि न्यवसत्तन्निदेशकृत् 40

परीक्षित के दिये हुए इन्हीं पाँच स्थानों में अधर्म का मूल कारण कलि उनकी आज्ञाओं का पालन करता हुआ निवास करने लगा ।।40।।

अथैतानि न सेवेत बुभूषुः पुरुषः क्वचित् 
विशेषतो धर्मशीलो राजा लोकपतिर्गुरुः 41

इसलिये आत्मकल्याणकामी पुरुष को इन पाँचों स्थानों का सेवन कभी नहीं करना चाहिये। धार्मिक राजा, प्रजावर्ग के लौकिक नेता और धर्मोपदेष्टा गुरुओं को तो बड़ी सावधानी से इनका त्याग करना चाहिये ।।41।।

वृषस्य नष्टांस्त्रीन्पादान्तपः शौचं दयामिति
प्रतिसन्दध आश्वास्य महीं च समवर्धयत् 42

राजा परीक्षित ने इसके बाद वृषभरूप धर्म के तीनों चरण-तपस्या,शौच और दया जोड़ दिये और आश्वासन देकर पृथ्वी का संवर्धन किया ।।42।।

स एष एतर्ह्यध्यास्त आसनं पार्थिवोचितम्
पितामहेनोपन्यस्तं राज्ञारण्यं विविक्षता 43

वे ही महाराजा परीक्षित इस समय अपने राजसिंहासनपर,जिसे उनके पितामह महाराज युधिष्टिर ने वन में जाते समय उन्हें दिया था, विराजमान हैं ।।43।।

आस्तेऽधुना स राजर्षिः कौरवेन्द्रश्रियोल्लसन्
गजाह्वये महाभागश्चक्रवर्ती बृहच्छ्रवाः 44

वे परम यशस्वी सौभाग्यभाजन चक्रवर्ती सम्राट राजर्षि परीक्षित इस समय हस्तिनापुर में कौरव-कुल की राज्यलक्ष्मी से शोभायमान हैं ।।44।।

इत्थम्भूतानुभावोऽयमभिमन्युसुतो नृपः
यस्य पालयतः क्षौणीं यूयं सत्राय दीक्षिताः 45

अभिमन्युनन्दन राजा परीक्षित वास्तव में ऐसे ही प्रभावशाली हैं, जिनके शासनकाल में आपलोग इस दीर्घकालीन यज्ञ के लिये दीक्षित हुए हैं ।।45।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायाम् प्रथमस्कन्धे कलिनिग्रहो नाम सप्तदशोऽध्यायः ।।

 

Chapter Seventeen: Punishment and Reward of Kali

1. Suta Gosvami said: After reaching that place, Maharaja Pariksit observed that a lower-caste sudra, dressed like a king, was beating a cow and a bull with a club, as if they had no owner.

2. The bull was as white as a white lotus flower. He was terrified of the sudra who was beating him, and he was so afraid that he was standing on one leg, trembling and urinating.

3. Although the cow is beneficial because one can draw religious principles from her, she was now rendered poor and calfless. Her legs were being beaten by a sudra. There were tears in her eyes, and she was distressed and weak. She was hankering after some grass in the field.

4. Maharaja Pariksit, well equipped with arrows and bow and seated on a gold-embossed chariot,
spoke to him [the sudra] with a deep voice sounding like thunder.

5. Oh, who are you? You appear to be strong and yet you dare kill, within my protection, those who are helpless! By your dress you pose yourself to be a godly man [king], but by your deeds you are opposing the principles of the twice-born ksatriyas.

6. You rogue, do you dare beat an innocent cow because Lord Krsna and Arjuna, the carrier of the
Gandiva bow, are out of sight? Since you are beating the innocent in a secluded place, you are
considered a culprit and therefore deserve to be killed.

7. Then he [Maharaja Pariksit] asked the bull: Oh, who are you? Are you a bull as white as a white
lotus, or are you a demigod? You have lost three of your legs and are moving on only one. Are you
some demigod causing us grief in the form of a bull?

8. Now for the first time in a kingdom well protected by the arms of the kings of the Kuru dynasty, I see you grieving with tears in your eyes. Up till now no one on earth has ever shed tears because of royal negligence.

9. O son of Surabhi, you need lament no longer now. There is no need to fear this low-class sudra. And, O mother cow, as long as I am living as the ruler and subduer of all envious men, there is no cause for you to cry. Everything will be good for you.

10-11. O chaste one, the king’s good name, duration of life and good rebirth vanish when all kinds of living beings are terrified by miscreants in his kingdom. It is certainly the prime duty of the king to subdue first the sufferings of those who suffer. Therefore I must kill this most wretched man because he is violent against other living beings.

12. He [Maharaja Pariksit] repeatedly addressed and questioned the bull thus: O son of Surabhi, who has cut off your three legs? In the state of the kings who are obedient to the laws of the Supreme Personality of Godhead, Krsna, there is no one as unhappy as you.

13. O bull, you are offenseless and thoroughly honest; therefore I wish all good to you. Please tell me of the perpetrator of these mutilations, which blackmail the reputation of the sons of Prtha.

14. Whoever causes offenseless living beings to suffer must fear me anywhere and everywhere in the world. By curbing dishonest miscreants, one automatically benefits the offenseless.

15. An upstart living being who commits offenses by torturing those who are offenseless shall be directly uprooted by me, even though he be a denizen of heaven with armor and decorations.

16. The supreme duty of the ruling king is to give all protection to law-abiding persons and to chastise those who stray from the ordinances of the scriptures in ordinary times, when there is no emergency.

17. The personality of religion said: These words just spoken by you befit a person of the Pandava
dynasty. Captivated by the devotional qualities of the Pandavas, even Lord Krsna, the Personality of Godhead, performed duties as a messenger.

18. O greatest among human beings, it is very difficult to ascertain the particular miscreant who has caused our sufferings, because we are bewildered by all the different opinions of theoretical philosophers.

19. Some of the philosophers, who deny all sorts of duality, declare that one’s own self is responsible for his personal happiness and distress. Others say that superhuman powers are responsible, while yet others say that activity is responsible, and the gross materialists maintain that nature is the ultimate cause.

20. There are also some thinkers who believe that no one can ascertain the cause of distress by argumentation, nor know it by imagination, nor express it by words. O sage amongst kings, judge for yourself by thinking over all this with your own intelligence.

21. Suta Gosvami said: O best among the brahmanas, the Emperor Pariksit, thus hearing the personality of religion speak, was fully satisfied, and without mistake or regret he gave his reply.

22. The King said: O you, who are in the form of a bull! You know the truth of religion, and you are
speaking according to the principle that the destination intended for the perpetrator of irreligious acts is also intended for one who identifies the perpetrator. You are no other than the personality of religion.

23. Thus it is concluded that the Lord’s energies are inconceivable. No one can estimate them by
mental speculation or by word jugglery.

24. In the age of Satya [truthfulness] your four legs were established by the four principles of austerity, cleanliness, mercy and truthfulness. But it appears that three of your legs are broken due to rampant irreligion in the form of pride, lust for women, and intoxication.

25. You are now standing on one leg only, which is your truthfulness, and you are somehow or other hobbling along. But quarrel personified [Kali], flourishing by deceit, is also trying to destroy that leg.

26. The burden of the earth was certainly diminished by the Personality of Godhead and by others as well. When He was present as an incarnation, all good was performed because of His auspicious footprints.

27. Now she, the chaste one, being unfortunately forsaken by the Personality of Godhead, laments her future with tears in her eyes, for now she is being ruled and enjoyed by lower-class men who pose as rulers.

28. Maharaja Pariksit, who could fight one thousand enemies singlehandedly, thus pacified the personality of religion and the earth. Then he took up his sharp sword to kill the personality of Kali, who is the cause of all irreligion.

29. When the personality of Kali understood that the King was willing to kill him, he at once abandoned the dress of a king and, under pressure of fear, completely surrendered to him, bowing his head.

30. Maharaja Pariksit, who was qualified to accept surrender and worthy of being sung in history, did not kill the poor surrendered and fallen Kali, but smiled compassionately, for he was kind to the poor.

31. The King thus said: We have inherited the fame of Arjuna; therefore since you have surrendered yourself with folded hands you need not fear for your life. But you cannot remain in my kingdom, for you are the friend of irreligion.

32. If the personality of Kali, irreligion, is allowed to act as a man-god or an executive head, certainly irreligious principles like greed,  falsehood, robbery, incivility, treachery, misfortune,  cheating, quarrel and vanity will abound.

33. Therefore, O friend of irreligion, you do not deserve to remain in a place where experts perform sacrifices according to truth and religious principles for the satisfaction of the Supreme Personality of Godhead.

34. In all sacrificial ceremonies, although sometimes a demigod is worshiped, the Supreme Lord Personality of Godhead is worshiped because He is the Supersoul of everyone, and exists both inside
and outside like the air. Thus it is He only who awards all welfare to the worshiper.

35. Sri Suta Gosvami said: The personality of Kali, thus being ordered by Maharaja Pariksit, began to tremble in fear. Seeing the King before him like Yamaraja, ready to Kill him, Kali spoke to the King as follows.

36. O Your Majesty, though I may live anywhere and everywhere under your order, I shall but see you with bow and arrows wherever I look.

37. Therefore, O chief amongst the protectors of religion, please fix some place for me where I can live permanently under the protection of your government.

38. Suta Gosvami said: Maharaja Pariksit, thus being petitioned by the personality of Kali, gave him permission to reside in places where gambling, drinking, prostitution and animal slaughter were performed.

39. The personality of Kali asked for something more, and because of his begging, the King gave him permission to live where there is gold because wherever there is gold there is also falsity, intoxication, lust, envy and enmity.

40. Thus the personality of Kali, by the directions of Maharaja Pariksit, the son of Uttara, was allowed to live in those five places.

41. Therefore, whoever desires progressive well-being, especially kings, religionists, public leaders, brahmanas and sannyasis, should never come in contact with the four above-mentioned irreligious principles.

42. Thereafter the King reestablished the lost legs of the personality of religion [the bull], and by encouraging activities he sufficiently improved the condition of the earth.

43-44. The most fortunate Emperor Maharaja Pariksit, who was entrusted with the kingdom of
Hastinapura by Maharaja Yudhisthira when he desired to retire to the forest, is now ruling the world with great success due to his being glorified by the deeds of the kings of the Kuru dynasty.

45. Maharaja Pariksit, the son of Abhimanyu, is so experienced that by dint of his expert administration and patronage, it has been possible for you to perform a sacrifice such as this.