अहल्या उद्धार की कथा

अहल्या उद्धार की कथा! प्रसंग वाल्मीकि रामायण से है, और स्तुति रामचरितमानस से ,

प्रातःकाल जब राम और लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिलापुरी के वन उपवन आदि देखने के लिये निकले तो उन्होंने एक उपवन में एक निर्जन स्थान देखा। राम बोले, भगवन्! यह स्थान देखने में तो आश्रम जैसा दिखाई देता है किन्तु क्या कारण है कि यहाँ कोई ऋषि या मुनि दिखाई नहीं देते?

विश्वामित्र जी ने बताया, यह स्थान कभी महात्मा गौतम का आश्रम था। वे अपनी पत्नी अहिल्या के साथ यहाँ रह कर तपस्या करते थे। एक दिन जब गौतम ऋषि आश्रम के बाहर गये हुये थे तो उनकी अनुपस्थिति में इन्द्र ने गौतम के वेश में आकर अहिल्या से प्रणय याचना की।

यद्यपि अहिल्या ने इन्द्र को पहचान लिया था तो भी यह विचार करके कि मैं इतनी सुन्दर हूँ कि देवराज इन्द्र स्वयं मुझ से प्रणय याचना कर रहे हैं, अपनी स्वीकृति दे दी। जब इन्द्र अपने लोक लौट रहे थे तभी अपने आश्रम को वापस आते हुये गौतम ऋषि की दृष्टि इन्द्र पर पड़ी जो उन्हीं का वेश धारण किये हुये था। वे सब कुछ समझ गये और उन्होंने इन्द्र को शाप दे दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी पत्नी को शाप दिया कि रे दुराचारिणी! तू हजारों वर्ष तक केवल हवा पीकर कष्ट उठाती हुई यहाँ राख में पड़ी रहे।

जब राम इस वन में प्रवेश करेंगे तभी उनकी कृपा से तेरा उद्धार होगा। तभी तू अपना पूर्व शरीर धारण करके मेरे पास आ सकेगी। यह कह कर गौतम ऋषि इस आश्रम को छोड़कर हिमालय पर जाकर तपस्या करने लगे। इसलिये हे राम! अब तुम आश्रम के अन्दर जाकर अहिल्या का उद्धार करो।

विश्वामित्र जी की बात सुनकर वे दोनों भाई आश्रम के भीतर प्रविष्ट हुये। वहाँ तपस्या में निरत अहिल्या कहीं दिखाई नहीं दे रही थी, केवल उसका तेज सम्पूर्ण वातावरण में व्याप्त हो रहा था।

जब अहिल्या की दृष्टि राम पर पड़ी तो उनके पवित्र दर्शन पाकर एक बार फिर सुन्दर नारी के रूप में दिखाई देने लगी। उसके बाद अहिल्या हाथ जोड़कर प्रभुश्रीराम की स्तुति करने लगी।

*परसत पद पावन सोकनसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥
अति प्रेम अधीरा पुलक शरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥

भावार्थ:-श्री रामजी के पवित्र और शोक को नाश करने वाले चरणों का स्पर्श पाते ही सचमुच वह तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो गई। भक्तों को सुख देने वाले श्री रघुनाथजी को देखकर वह हाथ जोड़कर सामने खड़ी रह गई। अत्यन्त प्रेम के कारण वह अधीर हो गई। उसका शरीर पुलकित हो उठा, मुख से वचन कहने में नहीं आते थे। वह अत्यन्त बड़भागिनी अहल्या प्रभु के चरणों से लिपट गई और उसके दोनों नेत्रों से जल (प्रेम और आनंद के आँसुओं) की धारा बहने लगी॥

*धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।
अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥
मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥

भावार्थ:-फिर उसने मन में धीरज धरकर प्रभु को पहचाना और श्री रघुनाथजी की कृपा से भक्ति प्राप्त की। तब अत्यन्त निर्मल वाणी से उसने (इस प्रकार) स्तुति प्रारंभ की- हे ज्ञान से जानने योग्य श्री रघुनाथजी! आपकी जय हो! मैं (सहज ही) अपवित्र स्त्री हूँ, और हे प्रभो! आप जगत को पवित्र करने वाले, भक्तों को सुख देने वाले और रावण के शत्रु हैं। हे कमलनयन! हे संसार (जन्म-मृत्यु) के भय से छुड़ाने वाले! मैं आपकी शरण आई हूँ, (मेरी) रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए॥

*मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
देखेउँ भरि लोचन हरि भव मोचन इहइ लाभ संकर जाना॥
बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।
पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥

भावार्थ:-मुनि ने जो मुझे शाप दिया, सो बहुत ही अच्छा किया। मैं उसे अत्यन्त अनुग्रह (करके) मानती हूँ कि जिसके कारण मैंने संसार से छुड़ाने वाले श्री हरि (आप) को नेत्र भरकर देखा। इसी (आपके दर्शन) को शंकरजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभो! मैं बुद्धि की बड़ी भोली हूँ, मेरी एक विनती है। हे नाथ ! मैं और कोई वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि मेरा मन रूपी भौंरा आपके चरण-कमल की रज के प्रेमरूपी रस का सदा पान करता रहे॥

*जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।
सोई पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥
एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।
जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पति लोक अनंद भरी॥

भावार्थ:-जिन चरणों से परमपवित्र देवनदी गंगाजी प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजी ने सिर पर धारण किया और जिन चरणकमलों को ब्रह्माजी पूजते हैं, कृपालु हरि (आप) ने उन्हीं को मेरे सिर पर रखा। इस प्रकार (स्तुति करती हुई) बार-बार भगवान के चरणों में गिरकर, जो मन को बहुत ही अच्छा लगा, उस वर को पाकर गौतम की स्त्री अहल्या आनंद में भरी हुई पतिलोक को चली गई॥

*अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल।
तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥

भावार्थ:-प्रभु श्री रामचन्द्रजी ऐसे दीनबंधु और बिना ही कारण दया करने वाले हैं। तुलसीदासजी कहते हैं, हे शठ (मन)! तू कपट-जंजाल छोड़कर उन्हीं का भजन कर॥…..जयगुरु🙏

शबरी की कथा

शबरी का वास्तविक नाम श्रमणा बताया गया है। इन्होने शबर जाती में जन्म लिया जिस कारण इनका नाम शबरी पड़ गया। संतजन कहते है की इन्होने भगवान श्री राम का इतना सब्र किया की इनका नाम ही सबरी पड़ गया।

शबरी के पिता भीलों के राजा थे। शबरी को श्रीराम के प्रमुख भक्तों में गिना जाता है।

शबरी के पिता भीलों के राजा थे। शबरी जब विवाह के योग्य हुई तो उसके पिता ने एक दूसरे भील कुमार से उसका विवाह पक्का कर दिया और धूमधाम से विवाह की तैयारी की जाने लगी। विवाह के दिन सैकड़ों बकरे-भैंसे बलिदान के लिए लाए गए।

बकरे-भैंसे देखकर शबरी ने अपने पिता से पूछा- ‘ये सब जानवर यहां क्यों लाए गए हैं?’ पिता ने कहा- ‘तुम्हारे विवाह के उपलक्ष्य में इन सबकी बलि दी जाएगी।’

यह सुनकर बालिका शबरी को अच्छा नहीं लगा और सोचने लगी यह किस प्रकार का विवाह है, जिसमें इतने निर्दोष प्राणियों का वध किया जाएगा। यह तो पाप कर्म है, इससे तो विवाह न करना ही अच्छा है। ऐसा सोचकर वह रात्रि में उठकर जंगल में भाग जाती है।

दंडकारण्य में वह देखती है कि हजारों ऋषि-मुनि तप कर रहे हैं। बालिका शबरी अशिक्षित होने के साथ ही निचली जाति से थी। वह समझ नहीं पा रही थीं कि किस तरह वह इन ऋषि-मुनियों के बीच यहां जंगल में रहें जबकि मुझे तो भजन, ध्यान आदि कुछ भी नहीं आता।

लेकिन शबरी का हृदय पवित्र था और उसमें प्रभु के लिए सच्ची चाह थी, जिसके होने से सभी गुण स्वत: ही आ जाते हैं। वह रात्रि में जल्दी उठकर, जिधर से ऋषि निकलते, उस रास्ते को नदी तक साफ करती, कंकर-पत्थर हटाती ताकि ऋषियों के पैर सुरक्षित रहे। फिर वह जंगल की सूखी लकड़ियां बटोरती और उन्हें ऋषियों के यज्ञ स्थल पर रख देती। इस प्रकार वह गुप्त रूप से ऋषियों की सेवा करती थी।

(शबरी और गुरु मतंग ऋषि ) इन सब कार्यों को वह इतनी तत्परता से छिपकर करती कि कोई ऋषि देख न ले। यह कार्य वह कई वर्षों तक करती रही। अंत में मतंग ऋषि ने उस पर कृपा की।

जब मतंग ऋषि मृत्यु शैया पर थे तब उनके वियोग से ही शबरी व्याकुल हो गई। महर्षि ने उसे निकट बुलाकर समझाया- ‘बेटी! धैर्य से कष्ट सहन करती हुई साधना में लगी रहना। प्रभु राम एक दिन तेरी कुटिया में अवश्य आएंगे। प्रभु की दृष्टि में कोई दीन-हीन और अस्पृश्य नहीं है। वे तो भाव के भूखे हैं और अंतर की प्रीति पर रीझते हैं।’

महर्षि की मृत्यु के बाद शबरी अकेली ही अपनी कुटिया में रहती और प्रभु राम का स्मरण करती रहती थी। राम के आने की बांट जोहती शबरी प्रतिदिन कुटिया को इस तरह साफ करती थीं कि आज राम आएंगे। साथ ही रोज ताजे फल लाकर रखती कि प्रभु राम आएंगे तो उन्हें मैं यह फल खिलाऊंगी।

ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा॥
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए॥

उदार श्री रामजी उसे गति देकर शबरीजी के आश्रम में पधारे। शबरीजी ने श्री रामचंद्रजी को घर में आए देखा, तब मुनि मतंगजी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया॥

आज मेरे गुरुदेव का वचन पूरा हो गया। उन्होंने कहा था की राम आयेगे। और प्रभु आज आप आ गए। निष्ठा हो तो शबरी जैसी। बस गुरु ने एक बार बोल दिया की राम आयेगे। और विश्वास हो गया। हमे भगवान इसलिए नही मिलते क्योकि हमे अपने गुरु के वचनो पर भरोसा ही नही होता।

जब शबरी ने श्री राम को देखा तो आँखों से आंसू बहने लगे और चरणो से लिपट गई है। (सबरी परी चरन लपटाई)। मुह से कुछ बोल भी नही पा रही है चरणो में शीश नवा रही है। फिर सबरी ने दोनों भाइयो राम, लक्ष्मण जी के चरण धोये है।

कुटिया के अंदर गई है और बेर लाई है। वैसे रामचरितमानस में कंद-मूल लिखा हुआ है। लेकिन संतो ने कहा की सबरी ने तो रामजी को बेर ही खिलाये। सबरी एक बेर उठती है उसे चखती है। बेर मीठा निकलता है तो रामजी को देती है अगर बेर खट्टा होता है तो फेक देती है।

भगवन राम एकशब्द भी नही बोले की मैया क्या कर रही है। तू झूठे बेर खिला रही है। भगवान प्रेम में डूबे हुए है। बिना कुछ बोले बेर खा रहे है। माँ एकटक राम जी को निहार रही है।

भगवान ने बड़े प्रेम से बेर खाए और बार बार प्रशंसा की है। (प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि)॥ उसके बाद शबरी हाथ जोड़ कर कड़ी हो गई। सबरी बोली की प्रभु में किस प्रकार आपकी स्तुति करू?

मैं नीच जाति की और अत्यंत मूढ़ बुद्धि हूँ।(अधम जाति मैं जड़मति भारी)॥ जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मंदबुद्धि हूँ।

भगवन राम माँ की ये बात सुन नहीं पाये और बीच में ही रोक दिया- भगवन कहते है माँ मैं केवल एक भगति का ही नाता मानता हूँ।(मानउँ एक भगति कर नाता)

जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी यदि इंसान भक्ति न करे तो वह ऐसा लगता है , जैसे जलहीन बादल (शोभाहीन) दिखाई पड़ता है।

जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥

माँ में तुम्हे अपनी 9 प्रकार की भक्ति के बारे में बताता हु। जिसे भक्ति कहते है नवधा भक्ति ।

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥

भावार्थ:- मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम॥

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥

भावार्थ:- तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें॥

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥

भावार्थ:- मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना॥

सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥

भावार्थ:- सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना॥

नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥

भावार्थ:- नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो-॥

सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥

भावार्थ:- हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है॥

देखिये भगवान माँ को भक्ति के बारे में बताने से पहले भी कह सकते थे की माँ आपके अंदर सभी प्रकार की भक्ति है। लेकिन राम जानते थे अगर मैंने पहले बोल दिया तो माँ मुझे बीच में ही रोक देगी। और कहेगी बेटा मेरी बड़ाई नही सब आपकी कृपा का फल है। इसलिए भगवान ने पहले भक्ति के बारे में बताया और बाद में माँ को कहा- आपके अंदर सब प्रकार की भक्ति है।

सुंदरकांड से हर बाधा दूर

सुंदरकांड का पाठ हर प्रकार की बाधा और परेशानियों को खत्म कर देने में समर्थ है। सुंदरकांड का पाठ एक अचूक उपाय है संयम के साथ दीर्घकाल तक करते रहने से उसके प्रभाव दिखाई देने लगते हैं

‘सुंदरकांड’ ‘श्री रामचरित मानस’ का पंचम सोपान है। रामचरित मानस महर्षि वाल्मिकी द्वारा रचित ‘रामायण’ पर आधारित महाकाव्य है। महर्षि वाल्मिकी ने रामायण संस्कृत में लिखी थी जिससे आम आदमी तक सीधे उसकी पंहुच नहीं थी लेकिन तुलसीदास ने तत्कालीन आम बोलचाल की भाषा अवधी में इसकी रचना कर रामायण को घर-घर पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। लोगों की ज़बान पर मानस चढ़ने का एक कारण यह भी था कि आम बोलचाल की भाषा में होने के साथ-साथ इसमें गेयता है, एक लय है, एक गति है। वैसे तो रामचरित मानस में तुलसीदास ने प्रभु श्री राम के जीवन चरित का वर्णन किया है और पूरे मानस के नायक मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्री राम ही हैं। लेकिन सुंदरकांड में रामदूत, पवनपुत्र हनुमान का यशोगान किया गया है। इसलिये सुंदरकांड के नायक श्री हनुमान हैं।

सुंदरकांड का नित्यप्रति पाठ करना हर प्रकार से लाभदायक होता है। इसके अनंत लाभ हैं, लेकिन यह पाठ तभी फलदायी होता है, जब निर्धारित विधि-विधानों का पालन किया जाए।

सुंदरकांड का पाठ करने से पहले कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए। पाठ स्नान और स्वच्छ वस्त्र धारण करके करना चाहिए। सुंदरकांड का पाठ सुबह या शाम के चार बजे के बाद करें, दोपहर में 12 बजे के बाद पाठ न करें। पाठ करने से पहले चौकी पर हनुमानजी की फोटो अथवा मूर्ति रखें। घी का दीया जलाएं। भोग के लिए फल, गुड़-चना, लड्डू या कोई भी मिष्ठान अर्पित करें। पाठ के बीच में न उठें, न ही किसी से बोलें। सुंदरकांड प्रारंभ करने के पहले हनुमानजी व भगवान रामचंद्र जी का आवाहन जरूर करें। जब सुंदरकांड समाप्त हो जाए, तो भगवान को भोग लगाकर, आरती करें। तत्पश्चात उनकी विदाई भी करें।

विदाई

कथा विसर्जन होत है, सुनो वीर हनुमान,

जो जन जंह से आए हैं, ते तह करो पयान।

श्रोता सब आश्रम गए, शंभू गए कैलाश।

रामायण मम हृदय मह, सदा करहु तुम वास।

रामायण जसु पावन, गावहिं सुनहिं जे लोग।

राम भगति दृढ़ पावहिं, बिन विराग जपयोग।।

आप जब तक सुंदरकांड का पाठ करें, मांस-मदिरा का सेवन न करें। बह्मचर्य की स्थिति में रहें।

पाठ से विविध लाभ

सुंदरकांड का पाठ हर प्रकार की बाधा और परेशानियों को खत्म कर देने में समर्थ है। ज्योतिष के अनुसार भी सुंदरकांड एक अचूक उपाय है। इसका पाठ उन लोगों के लिए विशेष फलदायी होता है, जिनकी जन्मकुंडली में मंगल नीच का है, पाप ग्रहों से पीडि़त है, पाप ग्रहों से युक्त है या उनकी दृष्टि से दूषित हो रहा है। मंगल में अगर बल बहुत कमजोर हो, जातक के शरीर में रक्त विकार हो,आत्मविश्वास की बहुत कमी हो तथा यदि मंगल बहुत ही क्रूर हो, तो सुंदरकांड का पाठ राहत देता है। शनि की साढे़साती या ढैय्या में सुंदरकांड का पाठ परेशानियों को कम करता है। इसका पाठ करने से विद्यार्थियों को विशेष लाभ मिलता है। यह आत्मविश्वास में बढ़ोतरी करता है। इससे परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त होते हैं, बुद्धि कुशाग्र होती है। सुंदरकांड का पाठ मन को शांति और सुकून देता है। मानसिक परेशानियों और व्याधियों से यह छुटकारा प्रदान करता है। जिन लोगों के गृह में क्लेश है, उनको इसका पाठ अवश्य करना चाहिए। अगर घर का मुखिया इसका पाठ घर में रोज करता है, तो घर का वातावरण अच्छा रहता है। यह नकारात्मक शक्ति को दूर करने का अचूक उपाय है। जिनको बुरे सपने आते हों, रात को अनावश्यक डर लगता हो, उनको इसके पाठ से निश्चित रूप से आराम मिलता है। इसके पाठ से परिवार में संस्कार बने रहते हैं। भूत-प्रेत की छाया भी इसके पाठ से स्वतः ही दूर हो जाती है। घर के सदस्यों की रक्षा के लिए भी सुंदरकांड का पाठ बहुत लाभकारी है। सुंदरकांड का पाठ कर्ज के दलदल से निकालता है। मुकदमेबाजी में उलझे व्यक्ति यदि सुंदरकांड का पाठ करते हैं, तो उन्हें विजय मिलती है। सुंदरकांड के पाठ से व्यापार में आने वाली विघ्न-बाधाएं धीरे-धीरे कम होने लगती हैं। सुंदरकांड का पाठ संयम के साथ दीर्घकाल तक करते रहने से उसके प्रभाव दिखाई देने लगते हैं। पाठ करते समय मन में श्रद्धा भाव रखें।

आज का पंचांग

दिनाँक -: 06/02/2018,मंगलवार
फाल्गुन, कृष्ण पक्ष
षष्ठी
(समाप्ति काल)

तिथि—————षष्ठी08:00:53 तक
पक्ष—————————–कृष्ण
नक्षत्र————–चित्रा10:53:02
योग—————–शूल11:01:14
करण———–वाणिज08:00:53
करण———विष्टि भद्र20:17:00
वार————————-मंगलवार
माह————————–फाल्गुन
चन्द्र राशि———————- तुला
सूर्य राशि———————- मकर
रितु—————————-शिशिर
आयन———————उत्तरायण
संवत्सर———————हेम्लम्बी
संवत्सर (उत्तर)———–साधारण
विक्रम संवत—————–2074
विक्रम संवत (कर्तक)——-2074
शाका संवत——————1939

वृन्दावन
सूर्योदय—————–07:04:18
सूर्यास्त——————18:02:34
दिन काल—————10:58:15
रात्री काल————–13:01:06
चंद्रास्त——————11:01:28
चंद्रोदय——————23:59:20

लग्न—-मकर 23°6′ , 293°6′

सूर्य नक्षत्र———————-श्रवण
चन्द्र नक्षत्र———————-चित्रा
नक्षत्र पाया———————रजत

🚩💮🚩 पद, चरण 🚩💮🚩

री—-चित्रा 10:53:02

रू—-स्वाति 17:09:26

रे—-स्वाति 23:28:42

रो—-स्वाति 29:50:44

💮🚩💮 ग्रह गोचर 💮🚩💮

ग्रह =राशी , अंश ,नक्षत्र, पद
=======================
सूर्य=मकर 23 ° 06, श्रवण ,4 खो
चन्द्र=तुला 04 ° 38′ चित्रा ‘ 4 री
बुध=मकर 14 ° 50’ श्रवण ‘2 खू
शुक्र=मकर 29 ° 46’ धनिष्ठा , 2 गी
मंगल=वृश्चिक 12°24 ‘अनुराधा ‘3 नू
गुरु=तुला 27 ° 42′ विशाखा , 3 ते
शनि=धनु 11 ° 16’ मूल ‘4 भी
राहू=कर्क 20 ° 58 ‘आश्लेषा , 2 डू
केतु=मकर 20 ° 58 ‘ श्रवण, 4 खो

🚩💮🚩शुभा$शुभ मुहूर्त🚩💮🚩

राहू काल 15:18 – 16:40अशुभ
यम घंटा 09:49 – 11:11अशुभ
गुली काल 12:33 – 13:56अशुभ
अभिजित 12:11 -12:55शुभ
दूर मुहूर्त 09:16 – 09:59अशुभ
दूर मुहूर्त 23:15 – 23:59अशुभ

💮चोघडिया, दिन
रोग 07:04 – 08:27अशुभ
उद्वेग 08:27 – 09:49अशुभ
चाल 09:49 – 11:11शुभ
लाभ 11:11 – 12:33शुभ
अमृत 12:33 – 13:56शुभ
काल 13:56 – 15:18अशुभ
शुभ 15:18 – 16:40शुभ
रोग 16:40 – 18:03अशुभ

🚩चोघडिया, रात
काल 18:03 – 19:40अशुभ
लाभ 19:40 – 21:18शुभ
उद्वेग 21:18 – 22:55अशुभ
शुभ 22:55 – 24:33*शुभ
अमृत 24:33* – 26:11*शुभ
चाल 26:11* – 27:48*शुभ
रोग 27:48* – 29:26*अशुभ
काल 29:26* – 31:04*अशुभ

💮होरा, दिन
मंगल 07:04 – 07:59
सूर्य 07:59 – 08:54
शुक्र 08:54 – 09:49
बुध 09:49 – 10:44
चन्द्र 10:44 – 11:39
शनि 11:39 – 12:33
बृहस्पति 12:33 – 13:28
मंगल 13:28 – 14:23
सूर्य 14:23 – 15:18
शुक्र 15:18 – 16:13
बुध 16:13 – 17:08
चन्द्र 17:08 – 18:03

🚩होरा, रात
शनि 18:03 – 19:08
बृहस्पति 19:08 – 20:13
मंगल 20:13 – 21:18
सूर्य 21:18 – 22:23
शुक्र 22:23 – 23:28
बुध 23:28 – 24:33
चन्द्र 24:33* – 25:38
शनि 25:38* – 26:43
बृहस्पति 26:43* – 27:48
मंगल 27:48* – 28:53
सूर्य 28:53* – 29:59
शुक्र 29:59* – 31:04

नोट-– दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है।
प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है।
चर में चक्र चलाइये , उद्वेगे थलगार ।
शुभ में स्त्री श्रृंगार करे,लाभ में करो व्यापार ॥
रोग में रोगी स्नान करे ,काल करो भण्डार ।
अमृत में काम सभी करो , सहाय करो कर्तार ॥
अर्थात- चर में वाहन,मशीन आदि कार्य करें ।
उद्वेग में भूमि सम्बंधित एवं स्थायी कार्य करें ।
शुभ में स्त्री श्रृंगार ,सगाई व चूड़ा पहनना आदि कार्य करें ।
लाभ में व्यापार करें ।
रोग में जब रोगी रोग मुक्त हो जाय तो स्नान करें ।
काल में धन संग्रह करने पर धन वृद्धि होती है ।
अमृत में सभी शुभ कार्य करें ।

💮दिशा शूल ज्ञान——-उत्तर
परिहार-: आवश्यकतानुसार यदि यात्रा करनी हो तो घी अथवा गुड़ खाके यात्रा कर सकते है l
इस मंत्र का उच्चारण करें-:
शीघ्र गौतम गच्छत्वं ग्रामेषु नगरेषु च l
भोजनं वसनं यानं मार्गं मे परिकल्पय: ll

🚩अग्नि वास ज्ञान -:

15 + 6 + 3 + 1= 25 ÷ 4 = 1 शेष
पाताल पर अग्नि वास हवन के लिए अशुभ कारक है l

💮 शिव वास एवं फल -:

21 + 21 + 5 = 46 ÷ 7 = 4 शेष

सभायां = सन्ताप कारक

🚩भद्रावास एवं फल –:

 

 

प्रातः 09:01 से रात्रि 20:23

पाताल लोक = धन लाभ कारक

💮🚩💮शुभ विचार💮🚩💮

एकाकिना तपो द्वाभ्यां पठनं गायनं त्रिभिः ।
चतुर्भिर्गमनं क्षेत्रं पंचभिर्बहुभी रणम् ।।
।।चा o नी o।।

जब आप तप करते है तो अकेले करे.
अभ्यास करते है तो दुसरे के साथ करे.
गायन करते है तो तीन लोग करे.
कृषि चार लोग करे.
युद्ध अनेक लोग मिलकर करे.

🚩💮🚩सुभाषितानि🚩💮🚩

गीता -: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योगअo-13

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।,
अन्ये साङ्‍ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥,

उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान (जिसका वर्णन गीता अध्याय 6 में श्लोक 11 से 32 तक विस्तारपूर्वक किया है) द्वारा हृदय में देखते हैं, अन्य कितने ही ज्ञानयोग (जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 11 से 30 तक विस्तारपूर्वक किया है) द्वारा और दूसरे कितने ही कर्मयोग (जिसका वर्णन गीता अध्याय 2 में श्लोक 40 से अध्याय समाप्तिपर्यन्त विस्तारपूर्वक किया है) द्वारा देखते हैं अर्थात प्राप्त करते हैं॥,24॥,

💮🚩दैनिक राशिफल🚩💮

देशे ग्रामे गृहे युद्धे सेवायां व्यवहारके।
नामराशेः प्रधानत्वं जन्मराशिं न चिन्तयेत्।।
विवाहे सर्वमाङ्गल्ये यात्रायां ग्रहगोचरे।
जन्मराशेः प्रधानत्वं नामराशिं न चिन्तयेत्।।

🐏मेष
परीक्षा व साक्षात्कार आदि में सफलता मिलेगी। संपत्ति के कार्य बड़ा लाभ देंगे। उन्नति होगी। चिंता बनी रहेगी।

🐂वृष
मनपसंद भोजन का आनंद मिलेगा। बौद्धिक कार्य सफल रहेंगे। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। प्रसन्नता रहेगी। यात्रा से लाभ होगा।

👫मिथुन
विवाद से क्लेश होगा। बुरी खबर मिलने से तनाव रहेगा। जल्दबाजी न करें। स्वास्थ्य का पाया कमजोर रहेगा। रोग व चोट से बचें।

🦀कर्क
व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। वस्तुएं संभालकर रखें। मेहनत का फल मिलेगा। घर-बाहर प्रसन्नता रहेगी। धन प्राप्ति सुगम होगी।

🐅सिंह
उत्साहवर्धक सूचना प्राप्त होगी। सगे-संबंधियों से मेल बढ़ेगा। व्यवसाय ठीक चलेगा। धनार्जन होगा। पार्टी व पिकनिक का आनंद मिलेगा।

🙍🏻कन्या
व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। रोजगार प्राप्ति के प्रयास सफल रहेंगे। अप्रत्याशित लाभ हो सकता है। विद्यार्थी वर्ग सफलता हासिल करेगा।

⚖तुला
व्ययवृद्धि से तनाव रहेगा। दूसरों से अपेक्षा न करें। विवाद न करें। जोखिम व जमानत के कार्य टालें। धैर्य रखें।

🦂वृश्चिक
रुका हुआ धन प्राप्त होगा। व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। धन प्राप्ति के अवसर बढ़ेंगे। जोखिम न उठाएं। शत्रु परास्त होंगे।

🏹धनु
कार्यस्थल पर परिवर्तन संभव है। योजना फलीभूत होगी। यात्रा से लाभ होगा। स्वास्थ्य का ध्यान रखें। जोखिम व जमानत के कार्य टालें।

🐊मकर
पूजा-पाठ में मन लगेगा। स्वास्थ्य का पाया कमजोर रहेगा। कोर्ट-कचहरी में अनुकूलता रहेगी। धनार्जन होगा। मेहनत का फल प्राप्त होगा।

🍯कुंभ
वाहन व मशीनरी के प्रयोग में सावधानी रखें। कीमती वस्तुएं संभालकर रखें। कुसंगति से हानि होगी। जोखिम न उठाएं।

🐟मीन
राजकीय बाधा दूर होकर लाभ की स्थिति बनेगी। जीवनसाथी से सहयोग मिलेगा। घर-बाहर प्रसन्नता रहेगी। मान-सम्मान मिलेगा।

🙏आपका दिन मंगलमय हो🙏

आज का पंचांग

 

दिनाँक -: 03/02/2018,शनिवार
फाल्गुन, कृष्ण पक्ष
तृतीया
(समाप्ति काल)

तिथि————तृतीया10:36:03 तक
पक्ष—————————–कृष्ण
नक्षत्र—–पूर्वाफाल्गुनी11:23:34
योग————अतिगंड16:19:58
करण———विष्टि भद्र10:36:03
करण—————भाव21:41:36
वार————————–शनिवार
माह————————–फाल्गुन
चन्द्र राशि——— सिंह17:05:41
चन्द्र राशि———————-कन्या
सूर्य राशि———————- मकर
रितु—————————-शिशिर
आयन———————उत्तरायण
संवत्सर———————हेम्लम्बी
संवत्सर (उत्तर)———–साधारण
विक्रम संवत—————–2074
विक्रम संवत (कर्तक)——-2074
शाका संवत——————1939

वृन्दावन
सूर्योदय—————–07:06:05
सूर्यास्त——————18:00:15
दिन काल—————10:54:10
रात्री काल————–13:05:15
चंद्रास्त——————09:06:36
चंद्रोदय——————21:06:57

लग्न—- मकर 20°3′ , 290°3′

सूर्य नक्षत्र———————-श्रवण
चन्द्र नक्षत्र————पूर्वा फाल्गुनी
नक्षत्र पाया———————रजत

🚩💮🚩 पद, चरण 🚩💮🚩

टू—-पूर्वा फाल्गुनी 11:23:31

टे—-उत्तरा फाल्गुनी 17:05:41

टो—-उत्तरा फाल्गुनी 22:50:22

पा—-उत्तरा फाल्गुनी 28:37:42

💮🚩💮 ग्रह गोचर 💮🚩💮

ग्रह =राशी , अंश ,नक्षत्र, पद
=======================
सूर्य=मकर 20 ° 03, श्रवण ,4 खो
चन्द्र=सिंह 24°13′ पू o फा o ‘4 टू
बुध=मकर 09°58’ उ o षा o ‘4 जी
शुक्र=मकर 26 ° 00’ धनिष्ठा , 1 गा
मंगल=वृश्चिक 10°34 ‘अनुराधा ‘3 नू
गुरु=तुला 27 ° 25′ विशाखा , 3 ते
शनि=धनु 10 ° 58’ मूल ‘4 भी
राहू=कर्क 21 ° 04 ‘आश्लेषा , 2 डू
केतु=मकर 21 ° 04 ‘ श्रवण, 4 खो

🚩💮🚩शुभा$शुभ मुहूर्त🚩💮🚩

राहू काल 09:50 – 11:11अशुभ
यम घंटा 13:55 – 15:17अशुभ
गुली काल 07:06 – 08:28अशुभ
अभिजित 12:11 -12:55शुभ
दूर मुहूर्त 08:33 – 09:17अशुभ

💮चोघडिया, दिन
काल 07:06 – 08:28अशुभ
शुभ 08:28 – 09:50शुभ
रोग 09:50 – 11:11अशुभ
उद्वेग 11:11 – 12:33अशुभ
चाल 12:33 – 13:55शुभ
लाभ 13:55 – 15:17शुभ
अमृत 15:17 – 16:38शुभ
काल 16:38 – 18:00अशुभ

🚩चोघडिया, रात
लाभ 18:00 – 19:38शुभ
उद्वेग 19:38 – 21:17अशुभ
शुभ 21:17 – 22:55शुभ
अमृत 22:55 – 24:33*शुभ
चाल 24:33* – 26:11*शुभ
रोग 26:11* – 27:49*अशुभ
काल 27:49* – 29:27*अशुभ
लाभ 29:27* – 31:06*शुभ

💮होरा, दिन
शनि 07:06 – 08:01
बृहस्पति 08:01 – 08:55
मंगल 08:55 – 09:50
सूर्य 09:50 – 10:44
शुक्र 10:44 – 11:39
बुध 11:39 – 12:33
चन्द्र 12:33 – 13:28
शनि 13:28 – 14:22
बृहस्पति 14:22 – 15:17
मंगल 15:17 – 16:11
सूर्य 16:11 – 17:06
शुक्र 17:06 – 18:00

🚩होरा, रात
बुध 18:00 – 19:06
चन्द्र 19:06 – 20:11
शनि 20:11 – 21:17
बृहस्पति 21:17 – 22:22
मंगल 22:22 – 23:27
सूर्य 23:27 – 24:33
शुक्र 24:33* – 25:38
बुध 25:38* – 26:44
चन्द्र 26:44* – 27:49
शनि 27:49* – 28:55
बृहस्पति 28:55* – 30:00
मंगल 30:00* – 31:06

नोट— दिन और रात्रि के चौघड़िया का आरंभ क्रमशः सूर्योदय और सूर्यास्त से होता है।
प्रत्येक चौघड़िए की अवधि डेढ़ घंटा होती है।
चर में चक्र चलाइये , उद्वेगे थलगार ।
शुभ में स्त्री श्रृंगार करे,लाभ में करो व्यापार ॥
रोग में रोगी स्नान करे ,काल करो भण्डार ।
अमृत में काम सभी करो , सहाय करो कर्तार ॥
अर्थात- चर में वाहन,मशीन आदि कार्य करें ।
उद्वेग में भूमि सम्बंधित एवं स्थायी कार्य करें ।
शुभ में स्त्री श्रृंगार ,सगाई व चूड़ा पहनना आदि कार्य करें ।
लाभ में व्यापार करें ।
रोग में जब रोगी रोग मुक्त हो जाय तो स्नान करें ।
काल में धन संग्रह करने पर धन वृद्धि होती है ।
अमृत में सभी शुभ कार्य करें ।

💮दिशा शूल ज्ञान——-पूर्व
परिहार-: आवश्यकतानुसार यदि यात्रा करनी हो तो लौंग अथवा काली इलायची खाके यात्रा कर सकते है l
इस मंत्र का उच्चारण करें-:
शीघ्र गौतम गच्छत्वं ग्रामेषु नगरेषु च l
भोजनं वसनं यानं मार्गं मे परिकल्पय: ll

🚩अग्नि वास ज्ञान –:

15 + 3 + 7 + 1= 26 ÷ 4 = 2 शेष
आकाश पर अग्नि वास हवन के लिए अशुभ कारक है l

💮 शिव वास एवं फल -:

18 + 18 + 5 = 41 ÷ 7 = 6 शेष

क्रीड़ायां = शोक ,दुःख कारक

🚩भद्रावास एवं फल -:

प्रातः 10:35 तक समाप्त

पाताल लोक = धन लाभ कारक

💮🚩 विशेष जानकारी 🚩💮

चतुर्थी व्रत ,चन्द्रोदय रात्रि 21:09 पर

💮🚩💮शुभ विचार💮🚩💮

किं तया क्रियते धेन्वा या न दोग्ध्री न गर्भिणी ।
कोऽर्थः पुत्रेण जातेन यो न विद्वान्न भक्तिमान् ।।
।।चा o नी o।।

वह गाय किस काम की जो ना तो दूध देती है ना तो बच्चे को जन्म देती है. उसी प्रकार उस बच्चे का जन्म किस काम का जो ना ही विद्वान हुआ ना ही भगवान् का भक्त हुआ.

🚩💮🚩सुभाषितानि🚩💮🚩

गीता -: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योगअo-13

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्‌ ।,
कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥,

प्रकृति में (प्रकृति शब्द का अर्थ गीता अध्याय 7 श्लोक 14 में कही हुई भगवान की त्रिगुणमयी माया समझना चाहिए) स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।, (सत्त्वगुण के संग से देवयोनि में एवं रजोगुण के संग से मनुष्य योनि में और तमो गुण के संग से पशु आदि नीच योनियों में जन्म होता है।,)॥,21॥

💮🚩दैनिक राशिफल🚩💮*

देशे ग्रामे गृहे युद्धे सेवायां व्यवहारके।
नामराशेः प्रधानत्वं जन्मराशिं न चिन्तयेत्।।
विवाहे सर्वमाङ्गल्ये यात्रायां ग्रहगोचरे।
जन्मराशेः प्रधानत्वं नामराशिं न चिन्तयेत्।।

🐏मेष
विद्यार्थी वर्ग सफलता हासिल करेगा। पार्टी व पिकनिक का आनंद मिलेगा। प्रतिद्वंद्वी सक्रिय रहेंगे। व्यवसाय ठीक चलेगा।

🐂वृष
शत्रुभय रहेगा। भागदौड़ रहेगी। शोक समाचार मिल सकता है। वाणी पर नियंत्रण रखें। पुराना रोग उभर सकता है।

👫मिथुन
प्रयास सफल रहेंगे। मान-सम्मान मिलेगा। शत्रु परास्त होंगे। पुराना रोग उभर सकता है। बेचैनी रहेगी। जोखिम न लें।

🦀कर्क
शुभ समाचार मिलेंगे। चोट व रोग से बचें। वाणी पर नियंत्रण रखें। परिवार की चिंता रहेगी। धनार्जन होगा। विरोधी सक्रिय रहेंगे।

🐅सिंह
रोजगार प्राप्ति के प्रयास सफल रहेंगे। अप्रत्याशित लाभ हो सकता है। व्यावसायिक यात्रा सफल रहेगी। प्रसन्नता रहेगी।

🙍🏻कन्या
फालतू खर्च होगा। विरोधी सक्रिय रहेंगे। बुद्धि का प्रयोग करें। विवाद न करें। पुराना रोग उभर सकता है। जल्दबाजी न करें।

तुला
बकाया वसूली के प्रयास सफल रहेंगे। यात्रा, निवेश व नौकरी मनोनुकूल लाभ देंगे। चोट व रोग से बाधा संभव है।

🦂वृश्चिक
बेचैनी रहेगी। नई योजना बनेगी। कार्यप्रणाली में सुधार होगा। मान-सम्मान मिलेगा। वस्तुएं संभालकर रखें। यात्रा से लाभ होगा।

🏹धनु
भय, पीड़ा, चिंता व तनाव का माहौल रहेगा। पूजा-पाठ में मन लगेगा। कोर्ट व कचहरी में अनुकूलता रहेगी। लाभ होगा।

🐊मकर
यात्रा में सावधानी रखें। चोट, चोरी व विवाद आदि से हानि संभव है। जोखिम व जमानत के कार्य टालें। धैर्य रखें।

🍯कुंभ
जीवनसाथी से सहयोग मिलेगा। कानूनी अड़चन दूर होगी। धनार्जन होगा। लेन-देन में सावधानी रखें। कष्ट संभव है।

🐟मीन
भूमि व भवन संबंधी योजना बनेगी। उन्नति के मार्ग प्रशस्त होंगे। आय के स्रोत बढ़ेंगे। विवेक का प्रयोग करें।

🙏आपका दिन मंगलमय हो🙏

रावण बाली की मित्रता

अगस्त्य मुनि ने कहना जारी रखा, “पिता की आज्ञा पाकर कैकसी विश्रवा के पास गई और उन्हें अपने अभिप्राय से अवगत कराया। उस समय भयंकर आँधी चल रही थी। आकाश में मेघ गरज रहे थे। कैकसी का अभिप्राय जानकर विश्रवा ने कहा कि भद्रे! तुम इस कुबेला में आई हो। मैं तुम्हारी इच्छा तो पूरी कर दूँगा परन्तु इससे तुम्हारी सन्तान दुष्ट स्वभाव वाली और क्रूरकर्मा होगी। मुनि की बात सुनकर कैकसी उनके चरणों में गिर पड़ी और बोली कि भगवन्! आप ब्रह्मवादी महात्मा हैं। आपसे मैं ऐसे दुराचारी सन्तान पाने की आशा नहीं करती। अतः आप मुझ पर कृपा करें। कैकसी के वचन सुनकर मुनि विश्रवा ने कहा कि अच्छा तो तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र सदाचारी और धर्मात्मा होगा।

“इस प्रकार कैकसी के दस मुख वाले पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम दशग्रीव रखा गया। उसके पश्चात् कुम्भकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण के जन्म हुये। दशग्रीव और कुम्भकर्ण अत्यन्त दुष्ट थे, किन्तु विभीषण धर्मात्मा प्रकृति का था। दशग्रीव ने अपने भाइयों सहित ब्रह्माजी की तपस्या की। ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर दशग्रीव ने माँगा कि मैं गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओं के लिये अवध्य हो जाऊँ। ब्रह्मा जी ने ‘तथास्तु’ कहकर उसकी इच्छा पूरी कर दी। विभीषण ने धर्म में अविचल मति का और कुम्भकर्ण ने वर्षों तक सोते रहने का वरदान पाया।

“फिर दशग्रीव ने लंका के राजा कुबेर को विवश किया कि वह लंका छोड़कर अपना राज्य उसे सौंप दे। अपने पिता विश्रवा के समझाने पर कुबेर ने लंका का परित्याग कर दिया और रावण अपनी सेना, भाइयों तथा सेवकों के साथ लंका में रहने लगा। लंका में जम जाने के बाद अपने बहन शूर्पणखा का विवाह कालका के पुत्र दानवराज विद्युविह्वा के साथ कर दिया। उसने स्वयं दिति के पुत्र मय की कन्या मन्दोदरी से विवाह किया जो हेमा नामक अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न हुई थी। विरोचनकुमार बलि की पुत्री वज्रज्वला से कुम्भकर्ण का और गन्धर्वराज महात्मा शैलूष की कन्या सरमा से विभीषण का विवाह हुआ। कुछ समय पश्चात् मन्दोदरी ने मेघनाद को जन्म दिया जो इन्द्र को परास्त कर संसार में इन्द्रजित के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

“सत्ता के मद में रावण उच्छृंखल हो देवताओं, ऋषियों, यक्षों और गन्धर्वों को नाना प्रकार से कष्ट देने लगा। एक बार उसने कुबेर पर चढ़ाई करके उसे युद्ध में पराजित कर दिया और अपनी विजय की स्मृति के रूप में कुबेर के पुष्पक विमान पर अधिकार कर लिया। उस विमान का वेग मन के समान तीव्र था। वह अपने ऊपर बैठे हुये लोगों की इच्छानुसार छोटा या बड़ा रूप धारण कर सकता था। विमान में मणि और सोने की सीढ़ियाँ बनी हुई थीं और तपाये हुये सोने के आसन बने हुये थे। उस विमान पर बैठकर जब वह ‘शरवण’ नाम से प्रसिद्ध सरकण्डों के विशाल वन से होकर जा रहा था तो भगवान शंकर के पार्षद नन्दीश्वर ने उसे रोकते हुये कहा कि दशग्रीव! इस वन में स्थित पर्वत पर भगवान शंकर क्रीड़ा करते हैं, इसलिये यहाँ सभी सुर, असुर, यक्ष आदि का आना निषिद्ध कर दिया गया है। नन्दीश्वर के वचनों से क्रुद्ध होकर रावण विमान से उतरकर भगवान शंकर की ओर चला। उसे रोकने के लिये उससे थोड़ी दूर पर हाथ में शूल लिये नन्दी दूसरे शिव की भाँति खड़े हो गये। उनका मुख वानर जैसा था। उसे देखकर रावण ठहाका मारकर हँस पड़ा। इससे कुपित हो नन्दी बोले कि दशानन! तुमने मेरे वानर रूप की अवहेलना की है, इसलिये तुम्हारे कुल का नाश करने के लिये मेरे ही समान पराक्रमी रूप और तेज से सम्पन्न वानर उत्पन्न होंगे। रावण ने इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया और बोला कि जिस पर्वत ने मेरे विमान की यात्रा में बाधा डाली है, आज मैं उसी को उखाड़ फेंकूँगा। यह कहकर उसने पर्वत के निचले भाग में हाथ डालकर उसे उठाने का प्रयत्न किया। जब पर्वत हिलने लगा तो भगवान शंकर ने उस पर्वत को अपने पैर के अँगूठे से दबा दिया। इससे रावण का हाथ बुरी तरह से दब गया और वह पीड़ा से चिल्लाने लगा। जब वह किसी प्रकार से हाथ न निकाल सका तो रोत-रोते भगवान शंकर की स्तुति और क्षमा प्रार्थना करने लगा। इस पर भगवान शंकर ने उसे क्षमा कर दिया और उसके प्रार्थाना करने पर उसे एक चन्द्रहास नामक खड्ग भी दिया।”

अगस्त्य मुनि ने कथा को आगे बढ़ाया, “एक दिन हिमालय प्रदेश में भ्रमण करते हुये रावण ने ब्रह्मर्षि कुशध्वज की कन्या वेदवती को तपस्या करते देखा। वह उस पर मुग्ध हो गया और उसके पास आकर उसका परिचय तथा अविवाहित रहने का कारण पूछा। वेदवती ने अपने परिचय देने के पश्चात् बताया कि मेरे पिता विष्णु से मेरा विवाह करना चाहते थे। इससे क्रुद्ध होकर मेरी कामना करने वाले दैत्यराज शम्भु ने सोते में उनका वध कर दिया। उनके मरने पर मेरी माता भी दुःखी होकर चिता में प्रविष्ट हो गई। तब से मैं अपने पिता के इच्छा पूरी करने के लिये भगवान विष्णु की तपस्या कर रही हूँ। उन्हीं को मैंने अपना पति मान लिया है।

“पहले रावण ने वेदवती को बातों में फुसलाना चाहा, फिर उसने जबरदस्ती करने के लिये उसके केश पकड़ लिये। वेदवती ने एक ही झटके में पकड़े हुये केश काट डाले। फिर यह कहती हुई अग्नि में प्रविष्ट हो गई कि दुष्ट! तूने मेरा अपमान किया है। इस समय तो मैं यह शरीर त्याग रही हूँ, परन्तु तेरा विनाश करने के मैं अयोनिजा कन्या के रूप में जन्म लेकर किसी धर्मात्मा की पुत्री बनूँगी। अगले जन्म में वह कन्या कमल के रूप में उत्पन्न हुई। उस सुन्दर कान्ति वाली कमल कन्या को एक दिन रावण अपने महलों में ले गया। उसे देखकर ज्योतिषियों ने कहा कि राजन्! यदि यह कमल कन्या आपके घर में रही तो आपके और आपके कुल के विनाश का कारण बनेगी। यह सुनकर रावण ने उसे समुद्र में फेंक दिया। वहाँ से वह भूमि को प्राप्त होकर राजा जनक के यज्ञमण्डप के मध्यवर्ती भूभाग में जा पहुँची। वहाँ राजा द्वारा हल से जोती जाने वाली भूमि से वह कन्या फिर प्राप्त हुई। वही वेदवती सीता के रूप में आपकी पत्नी बनी और आप स्वयं सनातन विष्णु हैं। इस प्रकार आपके महान शत्रु रावण को वेदवती ने पहले ही अपने शाप से मार डाला। आप तो उसे मारने में केवल निमित्तमात्र थे।

“अनेक राजा महाराजाओं को पराजित करता हुआ दशग्रीव इक्ष्वाकु वंश के राजा अनरण्य के पास पहुँचा जो अयोध्या पर राज्य करते थे। उसने उन्हें भी द्वन्द युद्ध करने अथवा पराजय स्वीकार करने के लिये ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ किन्तु ब्रह्माजी के वरदान के कारण रावण उनसे पराजित न हो सका। जब अनरण्य का शरीर बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो गया तो रावण इक्ष्वाकु वंश का अपमान और उपहास करने लगा। इससे कुपित होकर अनरण्य ने उसे शाप दिया कि तूने अपने व्यंगपूर्ण शब्दों से इक्ष्वाकु वंश का अपमान किया है, इसलिये मैं तुझे शाप देता हूँ कि महात्मा इक्ष्वाकु के इसी वंश में दशरथनन्दन राम का जन्म होगा जो तेरा वध करेंगे। यह कहकर राजा स्वर्ग सिधार गये।

“रावण की उद्दण्डता में कमी नहीं आई। राक्षस या मनुष्य जिसको भी वह शक्तिशाली पाता, उसी के साथ जाकर युद्ध करने करने लगता। एक बार उसने सुना कि किष्किन्धापुरी का राजा वालि बड़ा बलवान और पराक्रमी है तो वह उसके पास युद्ध करने के लिये जा पहुँचा। वालि की पत्नी तारा, तारा के पिता सुषेण, युवराज अंगद और उसके भाई सुग्रीव ने उसे समझाया कि इस समय वालि नगर से बाहर सन्ध्योपासना के लिये गये हुये हैं। वे ही आपसे युद्ध कर सकते हैं। और कोई वानर इतना पराक्रमी नहीं है जो आपके साथ युद्ध कर सके। इसलिये आप थोड़ी देर उनकी प्रतीक्षा करें। फिर सुग्रीव ने कहा कि राक्षसराज! सामने जो शंख जैसे हड्डियों के ढेर लगे हैं वे वालि के साथ युद्ध की इच्छा से आये आप जैसे वीरों के ही हैं। वालि ने इन सबका अन्त किया है। यदि आप अमृत पीकर आये होंगे तो भी जिस क्षण वालि से युद्ध करेंगे, वह क्षण आपके जीवन का अन्तिम क्षण होगा। यदि आपको मरने की बहुत जल्दी हो तो आप दक्षिण सागर के तट पर चले जाइये। वहीं आपको वालि के दर्शन हो जायेंगे।

“सुग्रीव के वचन सुनकर रावण विमान पर सवार हो तत्काल दक्षिण सागर में उस स्थान पर जा पहुँचा जहां वालि सन्ध्या कर रहा था। उसने सोचा कि मैं चुपचाप वालि पर आक्रमण कर दूँगा। वालि ने रावण को आते देख लिया परन्तु वह तनिक भी विचलित नहीं हुआ और वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करता रहा। ज्योंही उसे पकड़ने के लिये रावण ने पीछे से हाथ बढ़ाया, सतर्क वालि ने उसे पकड़कर अपनी काँख में दबा लिया और आकाश में उड़ चला। रावण बार-बार वालि को अपने नखों से कचोटता रहा किन्तु वालि ने उसकी कोई चिन्ता नहीं की। तब उसे छुड़ाने के लिये रावण के मन्त्री और अनुचर उसके पीछे शोर मचाते हुये दौड़े परन्तु वे वालि के पास तक न पहुँच सके। इस प्रकार वालि रावण को लेकर पश्चिमी सागर के तट पर पहुँचा। वहाँ उसने सन्ध्योपासना पूरी की। फिर वह दशानन को लिये हुये किष्किन्धापुरी लौटा। अपने उपवन में एक आसन पर बैठकर उसने रावण को अपनी काँख से निकालकर पूछा कि अब कहिये आप कौन हैं और किसलिये आये हैं?

“रावण ने उत्तर दिया कि मैं लंका का राजा रावण हूँ। आपके साथ युद्ध करने के लिये आया था। वह युद्ध मुझे प्राप्त हो चुका है। मैंने आपका अद्भुत बल देख लिया। अब मैं अग्नि की साक्षी देकर आपसे मित्रता करना चाहता हूँ। फिर दोनों ने अग्नि की साक्षी देकर एक दूसरे से मित्रता स्थापित की।”