श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – बीसवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Twenty

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: विंश अध्यायः

श्लोक 1-38

महाराज पृथु की यज्ञशाला में श्रीविष्णु भगवान् का प्रादुर्भाव

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! महाराज पृथु के निन्यानबे यज्ञों से यज्ञभोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् विष्णु को भी बड़ा सन्तोष हुआ। उन्होंने इन्द्र के सहित वहाँ उपस्थित होकर उनसे कहा। श्रीभगवान् ने कहा- राजन! (इन्द्र ने) तुम्हारे सौ अश्वमेध पूरे करने के संकल्प में विघ्न डाला है। अब ये तुमसे क्षमा चाहते हैं, तुम इन्हें क्षमा कर दो। नरदेव! जो श्रेष्ठ मानव साधु और सद्बुद्धि-सम्पन्न होते हैं, वे दूसरे जीवों से द्रोह नहीं करते; क्योंकि यह शरीर ही आत्मा नहीं है। यदि तुम-जैसे लोग भी मेरी माया से मोहित हो जायें, तो समझना चाहिये कि बहुत दिनों तक की हुई ज्ञानीजनों की सेवा से केवल श्रम ही हाथ लगा। ज्ञानवान् पुरुष इस शरीर को अविद्या, वासना और कर्मों का ही पुतला समझकर इसमें आसक्त नहीं होता। इस प्रकार जो इस शरीर में ही आसक्त नहीं है, यह विवेकी पुरुष इससे उत्पन्न हुए घर, पुत्र और धन आदि में भी किस प्रकार ममता रख सकता है। यह आत्मा एक, शुद्ध, स्वयंप्रकाश, निर्गुण, गुणों का आश्रयस्थान, सर्वव्यापक, आवरणशून्य, सबका साक्षी एवं अन्य आत्मा से रहित है; अतएव शरीर से भिन्न है। जो पुरुष इस देहस्थित आत्मा को इस प्रकार शरीर से भिन्न जानता है, वह प्रकृति से सम्बन्ध रखते हुए भी उसके गुणों से लिप्त नहीं होता; क्योंकि उसकी स्थिति मुझ परमात्मा में रहती है। राजन्! जो पुरुष किसी प्रकार की कामना न रखकर अपने वर्णाश्रम के धर्मों द्वारा नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक मेरी आराधना करता है, उसका चित्त धीरे-धीरे शुद्ध हो जाता है। चित्त शुद्ध होने पर उसका विषयों से सम्बन्ध नहीं रहता तथा उसे तत्त्वज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। फिर तो वह मेरी समतारूप स्थिति को प्राप्त हो जाता है। यही परम शान्ति, ब्रह्म अथवा कैवल्य है। जो पुरुष यह जानता है कि शरीर, ज्ञान, क्रिया और मन का साक्षी होने पर भी कूटस्थ आत्मा उनसे निर्लिप्त ही रहता है, वह कल्याणमय मोक्षपद प्राप्त कर लेता है। राजन्! गुणप्रवाहरूप आवाहन तो भूत, इन्द्रिय, इन्द्रियाभिमानी देवता और चिदाभास- इन सबकी समष्टिरूप परिच्छिन्न लिंग शरीर का ही हुआ करता है; इसका सर्वसाक्षी आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है। मुझमें दृढ़ अनुराग रखने वाले बुद्धिमान् पुरुष सम्पत्ति और विपत्ति प्राप्त होने पर कभी हर्ष-शोकादि विकारों के वशीभूत नहीं होते। इसलिये वीरवर! तुम उत्तम, मध्यम और अधम पुरुषों में समान भाव रखकर सुख-दुःख को भी एक-सा समझो तथा मन और इन्द्रियों को जीतकर मेरे ही द्वारा जुटाये हुए मन्त्री आदि समस्त राजकीय पुरुषों की सहायता से सम्पूर्ण लोकों की रक्षा करो। राजा का कल्याण प्रजा पालन में ही है। इससे उसे परलोक में प्रजा के पुण्य का छठा भाग मिलता है। इसके विपरीत जो राजा प्रजा की रक्षा तो नहीं करता; किंतु उससे कर वसूल करता जाता है, उसका सारा पुण्य तो प्रजा छीन लेती है और बदले में उसे प्रजा के पाप का भागी होना पड़ता है। ऐसा विचार कर यदि तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणों की सम्मति और पूर्वपरम्परा से प्राप्त हुए धर्म को ही मुख्यतः अपना लो और कहीं भी आसक्त न होकर इस पृथ्वी का न्यायपूर्वक पालन करते रहो तो सब लोग तुमसे प्रेम करेंगे और कुछ ही दिनों में तुम्हें घर बैठे ही सनकादि सिद्धों के दर्शन होंगे।

राजन्! तुम्हारे गुणों ने और स्वभाव ने मुझको वश में कर लिया है। अतः तुम्हे जो इच्छा हो, मुझसे वर माँग लो। उन क्षमा आदि गुणों से रहित यज्ञ, तप अथवा योग के द्वारा मुझको पाना सरल नहीं है, मैं तो उन्हीं के हृदय में रहता हूँ जिनके चित्त में समता रहती है।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! सर्वलोकगुरु श्रीहरि के इस प्रकार कहने पर जगद्विजयी महाराज पृथु ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की

देवराज इन्द्र अपने कर्म से लज्जित होकर उनके चरणों पर गिरना ही चाहते थे कि राजा ने उन्हें प्रेमपूर्वक हृदय से लगा लिया और मनोमालिन्य निकाल दिया। फिर महाराज पृथु ने विश्वात्मा भक्तवत्सल भगवान् का पूजन किया और क्षण-क्षण में उमड़ते हुए भक्तिभाव में निमग्न होकर प्रभु के चरणकमल पकड़ लिये। श्रीहरि वहाँ से जाना चाहते थे; किन्तु पृथु के प्रति जो उनका वात्सल्यभाव था, उसने उन्हें रोक लिया। वे अपने कमलदल के समान नेत्रों से उनकी ओर देखते ही रह गये, वहाँ से जा न सके।

आदिराज महाराज पृथु भी नेत्रों में जल भर आने के कारण न तो भगवान् का दर्शन ही कर सके और न तो कण्ठ गद्गद हो जाने से कुछ बोल ही सके। उन्हें हृदय से आलिगन कर पकड़े रहे और हाथ जोड़े ज्यों-के-त्यों खड़े रह गये। प्रभु अपने चरणकमलों से पृथ्वी को स्पर्श किये खड़े थे; उनका कराग्रभाग गरुड़ जी के ऊँचे कंधे पर रखा हुआ था। महाराज पृथु नेत्रों के आँसू पोंछकर अतृप्त दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए इस प्रकार कहने लगे।

महाराज पृथु बोले- मोक्षपति प्रभो! आप वर देने वाले ब्रह्मादि देवताओं को भी वर देने में समर्थ हैं। कोई भी बुद्धिमान् पुरुष आपसे देहाभिमानियों के भोगने योग्य विषयों को कैसे माँग सकता है? वे तो नारकी जीवों को भी मिलते ही हैं। अतः मैं इन तुच्छ विषयों को आपसे नहीं माँगता। मुझे तो उस मोक्षपद की भी इच्छा नहीं है, जिसमें महापुरुषों के हृदय से उनके मुख द्वारा निकला हुआ आपके चरणकमलों का मकरन्द नहीं है-जहाँ आपकी कीर्ति-कथा सुनने का सुख नहीं मिलता। इसलिये मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप मुझे दस हजार कान दे दीजिये, जिनसे मैं आपके लीलागुणों को सुनता ही रहूँ।

पुण्यकीर्ति प्रभो! आपके चरणकमल-मकरन्दरूपी अमृत-कणों को लेकर महापुरुषों के मुख से जो वायु निकलती है, उसी में इतनी शक्ति होती है कि वह तत्त्व को भूले हुए हम कुयोगियों को पुनः तत्त्वज्ञान करा देती है। अतएव हमें दूसरे वरों की कोई आवश्यकता नहीं है।

उत्तम कीर्ति वाले प्रभो! सत्संग में आपके मंगलमय सुयश को दैववश एक बार भी सुन लेने पर कोई पशुबुद्धिपुरुष भले ही तृप्त हो जाये; गुणग्राही उसे कैसे छोड़ सकता है? सब प्रकार के पुरुषार्थों की सिद्धि के लिये स्वयं लक्ष्मी जी भी आपके सुयश को सुनना चाहती हैं। अब लक्ष्मी जी के समान मैं भी अत्यन्त उत्सुकता से आप सर्वगुणधाम पुरुषोत्तम की सेवा ही करना चाहता हूँ। किन्तु ऐसा न हो कि एक ही पति की सेवा प्राप्त करने की होड़ होने के कारण आपके चरणों में ही मन को एकाग्र करने वाले हम दोनों में कलह छिड़ जाये।

जगदीश्वर! जगज्जननी लक्ष्मी जी के हृदय में मेरे प्रति विरोधभाव होने की संभावना तो है ही; क्योंकि जिस आपके सेवाकार्य में उनका अनुराग है, उसी के लिये मैं भी लालायित हूँ। किन्तु आप दीनों पर दया करते हैं, उनके तुच्छ कर्मों को भी बहुत करके मानते हैं। इसलिये मुझे आशा है कि हमारे झगड़े में भी आप मेरा ही पक्ष लेंगे। आप तो अपने स्वरूप में ही रमण करते हैं; आपको भला, लक्ष्मी जी से भी क्या लेना है। इसी से निष्काम महात्मा ज्ञान हो जाने के बाद भी आपके भजन करते हैं। आप में माया के कार्य अहंकारदि का सर्वथा अभाव है। भगवन्! मुझे तो आपके चरणकमलों का निरन्तर चिन्तन करने के सिवा सत्पुरुषों का कोई और प्रयोजन ही नहीं जान पड़ता। मैं भी बिना किसी इच्छा के आपका भजन करता हूँ, आपने जो मुझसे कहा कि ‘वर माँग’ सो आपकी इस वाणी को तो मैं संसार को मोह में डालने वाली ही मानता हूँ। यही क्या, आपकी वेदरूपा वाणी ने भी तो जगत् को बाँध रखा है। यदि उस वेदवाणीरूप रस्सी से लोग बँधे न होते, तो वे मोहवश सकाम कर्म क्यों करते? प्रभो! आपकी माया से ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप आपसे विमुख होकर अज्ञानवश अन्य स्त्री-पुत्रादि की इच्छा करता है। फिर भी जिस प्रकार पिता पुत्र की प्रार्थना कि अपेक्षा न रखकर अपने-आप ही पुत्र का कल्याण करता है, उसी प्रकार आप भी हमारी इच्छा की अपेक्षा न करके हमारे हित के लिये स्वयं ही प्रयत्न करें। श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- आदिराज पृथु के इस प्रकार स्तुति करने पर सर्वसाक्षी श्रीहरि ने उनसे कहा, ‘राजन्! तुम्हारी मुझमे भक्ति हो। बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम्हारा चित्त इस प्रकार मुझमें लगा हुआ है। ऐसा होने पर तो पुरुष सहज में ही मेरी उस माया को पार कर लेता है, जिसको छोड़ना या जिसके बन्धन से छूटना अत्यन्त कठिन है। अब तुम सावधानी से मेरी आज्ञा का पालन करते रहो। प्रजापालक नरेश! जो पुरुष मेरी आज्ञा का पालन करता है, उसका सर्वत्र मंगल होता है’। श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इस प्रकार भगवान् ने राजर्षि पृथु के सारगर्भित वचनों का आदर किया। फिर पृथु ने उनकी पूजा की और प्रभु उन पर सब प्रकार कृपा कर वहाँ से चलने को तैयार हुए। महाराज पृथु ने वहाँ जो देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, सिद्ध, चारण, नाग, किन्नर, अप्सरा, मनुष्य और पक्षी आदि अनेक प्रकार के प्राणी एवं भगवान् के पार्षद आये थे, उन सभी का भगवदबुद्धि से भक्तिपूर्वक वाणी और धन के द्वारा हाथ जोड़कर पूजन किया। इसके बाद वे सब अपने-अपने स्थानों को चले गये। भगवान् अच्युत भी राजा पृथु एवं उनके पुरोहितों का चित्त चुराते हुए अपने धाम को सिधारे। तदनन्तर अपना स्वरूप दिखाकर अन्तर्धान हुए अव्यक्तस्वरूप देवाधिदेव भगवान् को नमस्कार करके राजा पृथु भी अपनी राजधानी में चले आये।

Chapter Twenty: Lord Vishnu’s Appearance in the Sacrificial Arena

1. The great sage Maitreya continued: My dear Vidura, being very much satisfied by the performance of ninety-nine horse sacrifices, the Supreme Personality of Godhead, Lord Visnu, appeared on the scene. Accompanying Him was King Indra. Lord Vishnu then began to speak.

2. Lord Vishnu, the Supreme Personality of Godhead, said: My dear King Prthu, Indra, the King of heaven, has disturbed your execution of one hundred sacrifices. Now he has come with Me to be forgiven by you. Therefore excuse him.

3. O King, one who is advanced in intelligence and eager to perform welfare activities for others is considered best amongst human beings. An advanced human being is never malicious to others. Those with advanced intelligence are always conscious that this material body is different from the soul.

4. If a personality like you, who are so much advanced because of executing the instructions of the previous acaryas, is carred away by the influence of My material energy, then all your advancement may be considered simply a waste of time.

5. Those who are in full knowledge of the bodily conception of life, who know that this body is composed of nescience, desires and activities resulting from illusion, do not become addicted to the body.

6. How can a highly learned person who has absolutely no affinity for the bodily conception of life be affected by the bodily conception in regard to house, children, wealth and similar other bodily productions?

7. The individual soul is one, Pure, nonmaterial and self-effulgent. He is the reservoir of all good qualities, and He is all-pervading. He is without material covering, and He is the witness of all activities.He is completely distinguished from other living entities, and He is transcendental to all embodied souls.

8. Although within the material nature, one who is thus situated in full knowledge of the Paramatma and atma is never affected by the modes of material nature, for he is always situated in My transcendental loving service.

9. The Supreme Personality of Godhead, Lord Visnu, continued: My dear King Prthu, when one situated in his occupational duty engages in My loving service without motive for material gain, he gradually becomes very satisfied within.

10. When the heart is cleansed of all material contamination, the devotee’s mind becomes broader and transparent, and he can see things equally. At that stage of life there is peace, and one is situated equally with Me as sac-cid-ananda-vigraha.

11. Anyone who knows that this material body, made of the five gross elements, the sense organs, the working senses and the mind, is simply supervised by the fixed soul is eligible to be liberated from material bondage.

12. Lord Vishnu told King Prthu: My dear King, the constant change of this material world is due to the interaction of the three modes of material nature. The five elements, the senses, the demigods who control the senses, as well as the mind, which is agitated by the spirit soul–all these taken together comprise the body. Since the spirit soul is completely different from this combination of gross and subtle
material elements, My devotee who is connected with Me in intense friendship and affection, being completely in knowledge, is never agitated by material happiness and distress.

13. My dear heroic King, please keep yourself always equipoised and treat people equally, whether they are greater than you, in the intermediate stage or lower than you. Do not be disturbed by temporary distress or happiness. Fully control your mind and senses. In this transcendental position, try to execute your duty as king in whatever condition of life you may be posted by My arrangement, for your only duty here is to give protection to the citizens of your kingdom.

14. To give protection to the general mass of people who are citizens of the state is the prescribed occupational duty for a king. By acting in that way, the king in his next life shares one sixth of the result of the pious activities of the citizens. But a king or executive head of state who simply collects taxes from the citizens but does not give them proper protection as human beings has the results of his own pious activities taken away by the citizens, and in exchange for his not giving protection he becomes liable to punishment for the impious activities of his subjects.

15. Lord Vishnu continued: My dear King Prthu, if you continue to protect the citizens according to the instructions of the learned brahmana authorities, as they are received by the disciplic succession–by hearing–from master to disciple, and if you follow the religious principles laid down by them, without attachment to ideas manufactured by mental concoction, then every one of your citizens will be happy
and will love you, and very soon you will be able to see such already liberated personalities as the four Kumaras [Sanaka, Sanatana, Sanandana and Sanat-kumara].

16. My dear King, I am very captivated by your elevated qualities and excellent behavior, and thus I am very favorably inclined toward you. You may therefore ask from Me any benediction you like. One who does not possess elevated qualities and behavior cannot possibly achieve My favor simply by performance of sacrifices, severe austerities or mystic yoga. But I always remain equipoised in the heart of one who is also equipoised in all circumstances.

17. The great saint Maitreya continued: My dear Vidura, in this way Maharaja Prthu, the conqueror of the entire world, accepted the instructions of the Supreme Personality of Godhead on his head.

18. As King Indra was standing by, he became ashamed of his own activities and fell down before King Prthu to touch his lotus feet. But Prthu Maharaja immediately embraced him in great ecstasy and gave up all envy against him for his having stolen the horse meant for the sacrifice.

19. King Prthu abundantly worshiped the lotus feet of the Supreme Personality of Godhead, who was so merciful to him. While worshiping the lotus feet of the Lord, Prthu Maharaja gradually increased his ecstasy in devotional service.

20. The Lord was just about to leave, but because He was so greatly inclined toward the behavior of King Prthu, He did not depart. Seeing the behavior of Maharaja Prthu with His lotus eyes, He was detained because He is always the well-wisher of His devotees.

21. The original king, Maharaja Prthu, his eyes full of tears and his voice faltering and choked up, could neither see the Lord very distinctly nor speak to address the Lord in any way. He simply embraced the Lord within his heart and remained standing in that way with folded hands.

22. The Supreme Personality of Godhead stood with His lotus feet almost touching the ground while He rested the front of His hand on the raised shoulder of Garuda, the enemy of the snakes. Maharaja Prthu, wiping the tears from his eyes, tried to look upon the Lord, but it appeared that the King was not fully satisfied by looking at Him. Thus the King offered the following prayers.

23. My dear Lord, You are the best of the demigods who can offer benedictions. Why, therefore, should any learned person ask You for benedictions meant for living entities bewildered by the modes of nature? Such benedictions are available automatically, even in the lives of living entities suffering in
hellish conditions. My dear Lord, You can certainly bestow merging into Your existence, but I do not wish to have such a benediction.

24. My dear Lord, I therefore do not wish to have the benediction of merging into Your existence, a benediction in which there is no existence of the nectarean beverage of Your lotus feet. I want the benediction of at least one million ears, for thus I may be able to hear about the glories of Your lotus feet from the mouths of Your pure devotees.

25. My dear Lord, You are glorified by the selected verses uttered by great personalities. Such glorification of Your lotus feet is just like saffron particles. When the transcendental vibration from the mouths of great devotees carries the aroma of the saffron dust of Your lotus feet, the forgetful living entity gradually remembers his eternal relationship with You. Devotees thus gradually come to the right
conclusion about the value of life. My dear Lord, I therefore do not need any other benediction but the opportunity to hear from the mouth of Your pure devotee.

26. My dear highly glorified Lord, if one, in the association of pure devotees, hears even once the glories of Your activities, he does not, unless he is nothing but an animal, give up the association of devotees, for no intelligent person would be so careless as to leave their association. The perfection of chanting and hearing about Your glories was accepted even by the goddess of fortune, who desired to
hear of Your unlimited activities and transcendental glories.

27. Now I wish to engage in the service of the lotus feet of the Supreme Personality of Godhead and to serve just like the goddess of fortune, who carries a lotus flower in her hand, because His Lordship, the Supreme Personality of Godhead, is the reservoir of all transcendental qualities. I am afraid that the
goddess of fortune and I would quarrel because both of us would be attentively engaged in the same service.

28. My dear Lord of the universe, the goddess of fortune, Laksmi, is the mother of the universe, and yet I think that she may be angry with me because of my intruding upon her service and acting on that very platform to which she is so much attached. Yet I am hopeful that even though there is some misunderstanding, You will take my part, for You are very much inclined to the poor and You always magnify even insignificant service unto You. Therefore even though she becomes angry, I think that there is no harm for You, because You are so self-sufficient that You can do without her.

29. Great saintly persons who are always liberated take to Your devotional service because only by devotional service can one be relieved from the illusions of material existence. O my Lord, there is no reason for the liberated souls to take shelter at Your lotus feet except that such souls are constantly thinking of Your feet.

30. My dear Lord, what You have said to Your unalloyed devotee is certainly very much bewildering. The allurements You offer in the Vedas are certainly not suitable for pure devotees. People in general, bound by the sweet words of the Vedas, engage themselves again and again in fruitive activities, enamored by the results of their actions.

31. My Lord, due to Your illusory energy, all living beings in this material world have forgotten their real constitutional position, and out of ignorance they are always desirous of material happiness in the form of society, friendship and love. Therefore, please do not ask me to take some material benefits from
You, but as a father, not waiting for the son’s demand, does everything for the benefit of the son, please bestow upon me whatever You think best for me.

32. The great sage Maitreya continued by saying that the Lord, the seer of the universe, after hearing Prthu Maharaja’s prayer, addressed the King: My dear King, may you always be blessed by engaging in My devotional service. Only by such purity of purpose, as you yourself very intelligently express, can one cross over the insurmountable illusory energy of maya.

33. My dear King, O protector of the citizens, henceforward be very careful to execute My orders and not be misled by anything. Anyone who lives in that way, simply carrying out My orders faithfully, will always find good fortune all over the world.

34. The great saint Maitreya told Vidura: The Supreme Personality of Godhead amply appreciated the meaningful prayers of Maharaja Prthu. Thus, after being properly worshiped by the King, the Lord blessed him and decided to depart.

35-36. King Prthu worshiped the demigods, the great sages, the inhabitants of Pitrloka, the inhabitants of Gandharvaloka and those of Siddhaloka, Caranaloka, Pannagaloka, Kinnaraloka, Apsaroloka, the earthly planets and the planets of the birds. He also worshiped many other living entities who presented
themselves in the sacrificial arena. With folded hands he worshiped all these, as well as the Supreme Personality of Godhead and the personal associates of the Lord, by offering sweet words and as much wealth as possible. After this function, they all went back to their respective abodes, following in the footsteps of Lord Vishnu.

37. The infallible Supreme Personality of Godhead, having captivated the minds of the King and the priests who were present, returned to His abode in the spiritual sky.

38. King Prthu then offered his respectful obeisances unto the Supreme Personality of Godhead, who is the Supreme Lord of all demigods. Although not an object of material vision, the Lord revealed Himself to the sight of Maharaja Prthu. After offering obeisances to the Lord, the King returned to his home.

After the death of King Vena there was no king, and the thieves and rogues increased their crooked activities. All the citizens suffered. At that time to fulfill the desires of the great sages, Lord Vishnu in His partial representation appeared from the body of Vena as King Prthu.
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श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – उन्नीसवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Nineteen

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – उन्नीसवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Nineteen

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: एकोनविंश अध्यायः

श्लोक 1-42

महाराज पृथु के सौ अश्वमेध यज्ञ

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! महाराज मनु के ब्रह्मावर्त क्षेत्र में, जहाँ सरस्वती नदी पूर्वमुखी होकर बहती है, राजा पृथु ने सौ अश्वमेध यज्ञों की दीक्षा ली। यह देखकर भगवान् इन्द्र को विचार हुआ कि इस प्रकार तो पृथु के कर्म मेरे कर्मों की अपेक्षा भी बढ़ जायेंगे। इसलिये वे उनके यज्ञमहोत्सव को सहन न कर सके। महाराज पृथु के यज्ञ में सबके अन्तरात्मा सर्वलोकपूज्य जगदीश्वर भगवान् हरि ने यज्ञेश्वर रूप से साक्षात् दर्शन दिया था। उनके साथ ब्रह्मा, रुद्र तथा अपने-अपने अनुचरों के सहित लोकपालगण भी पधारे थे। उस समय गन्धर्व, मुनि और अप्सराएँ प्रभु की कीर्ति गा रहे थे। सिद्ध, विद्याधर, दैत्य, दानव, यक्ष, सुनन्द-नन्दादि भगवान् के प्रमुख पार्षद और जो सर्वदा भगवान् की सेवा के लिये उत्सुक रहते हैं- वे कपिल, नारद, दत्तात्रेय एवं सनकादि योगेश्वर भी उनके साथ आये थे। भारत! उस यज्ञ में यज्ञसामग्रियों को देने वाली भूमि ने कामधेनुरूप होकर यजमान की सारी कामनाओं को पूर्ण किया था। नदियाँ दाख और ईख आदि सब प्रकार के रसों को बहा लाती थीं तथा जिनके मधु चूता रहता था- ऐसे बड़े-बड़े वृक्ष दूध, दही, अन्न और घृत आदि तरह-तरह की सामग्रियों समर्पण करते थे। समुद्र बहुत-सी रत्नराशियाँ, पर्वत भक्ष्य, भोज्य, चोष्य और लेह्य- चार प्रकार के अन्न तथा लोकपालों के सहित सम्पूर्ण लोक तरह-तरह के उपहार उन्हें समपर्ण करते थे। महाराज पृथु तो एकमात्र श्रीहरि को ही अपना प्रभु मानते थे। उनकी कृपा से उस यज्ञानुष्ठान में उनका बड़ा उत्कर्ष हुआ। किन्तु यह बात देवराज इन्द्र को सहन न हुई और उन्होंने उसमें विघ्न डालने की भी चेष्टा की। जिस समय महाराज पृथु अन्तिम यज्ञ द्वारा भगवान् यज्ञपति की आराधना कर रहे थे, इन्द्र ने ईर्ष्यावश गुप्तरूप से उनके यज्ञ का घोड़ा हर लिया। इन्द्र ने अपनी रक्षा के लिये कवचरूप से पाखण्ड वेष धारण कर लिया था, जो अधर्म में धर्म का भ्रम उत्पन्न करने वाला है- जिसका आश्रय लेकर पापी पुरुष भी धर्मात्मा-सा जान पड़ता है। इस वेष में वे घोड़े को लिये बड़ी शीघ्रता से आकाश मार्ग से जा रहे थे कि उन पर भगवान् अत्रि की दृष्टि पड़ गयी। उनके कहने से महाराज पृथु का महारथी पुत्र इन्द्र को मारने के लिये उनके पीछे दौड़ा और बड़े क्रोध से बोला, ‘अरे खड़ा रहा! खड़ा रह’। इन्द्र सिर पर जटाजूट और शरीर में भस्म धारण किये हुए थे। उनका ऐसा वेष देखकर पृथुकुमार ने उन्हें मूर्तिमान् धर्म समझा, इसलिये उन पर बाण नहीं छोड़ा। जब वह इन्द्र पर वार किये बिना ही लौट आया, तब महर्षि अत्रि ने पुनः उसे इन्द्र को मारने के लिये आज्ञा दी- ‘वत्स! इस देवताधम इन्द्र ने तुम्हारे यज्ञ में विघ्न डाला है, तुम इसे मार डालो’। अत्रि मुनि के इस प्रकार उत्साहित करने पर पृथुकुमार क्रोध में भर गया। इन्द्र बड़ी तेजी से आकाश में जा रहे थे। उनके पीछे वह इस प्रकार दौड़ा, जैसे रावण के पीछे जटायु। स्वर्गपति इन्द्र उसे पीछे आते देख, उस वेष और घोड़े को छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये और वह वीर अपना यज्ञपशु लेकर पिता की यज्ञशाला में लौट आया। शक्तिशाली विदुर जी! उसके इस अद्भुत पराक्रम को देखकर महर्षियों ने उसका नाम विजिताश्व रखा।

यज्ञपशु को चषाल और यूप में बाँध दिया गया था। शक्तिशाली इन्द्र ने घोर अन्धकार फैला दिया और उसी में छिपकर वे फिर उस घोड़े को उसकी सोने की जंजीर समेत ले गये। अत्रि मुनि ने फिर उन्हें आकाश में तेजी से जाते दिखा दिया, किन्तु उनके पास कपाल और खट्वांग देखकर पृथुपुत्र ने उनके मार्ग में कोई बाधा न डाली। तब अत्रि ने राजकुमार को फिर उकसाया और उसने गुस्से में भरकर इन्द्र को लक्ष्य बनाकर अपना बाण चढ़ाया। यह देखते ही देवराज उस वेष और घोडों को छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये। वीर विजिताश्व अपना घोड़ा लेकर पिता की यज्ञशाला में लौट गया। तब से इन्द्र के उस निन्दित वेष को मन्दबुद्धि पुरुषों ने ग्रहण कर लिया। इन्द्र ने अश्वहरण की इच्छा से जो-जो रूप धारण किये थे, वे पाप के खण्ड होने के कारण पाखण्ड कहलाये। यहाँ ‘खण्ड’ शब्द चिह्न का वाचक है। इस प्रकार पृथु के यज्ञ का विध्वंस करने के लिये यज्ञपशु चुराते समय इन्द्र ने जिन्हें कई बार ग्रहण करके त्यागा था, उन ‘नग्न’, ‘रक्ताम्बर’ तथा ‘कापालिक’ आदि पाखण्डपूर्ण आचारों में मनुष्यों की बुद्धि प्रायः मोहित हो जाती है; क्योंकि ये नास्तिकमत देखने में सुन्दर हैं और बड़ी-बड़ी युक्तियों से अपने पक्ष का समर्थन करते हैं। वास्तव में उपधर्ममात्र हैं। लोग भ्रमवश धर्म मानकर उनमें आसक्त हो जाते हैं।

इन्द्र की इस कुचाल का पता लगने पर परम पराक्रमी महाराज पृथु को बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने अपना धनुष उठाकर उस पर बाण चढ़ाया। उस समय क्रोधावेश के कारण उनकी ओर देखा नहीं जाता था। जब ऋत्विजों ने देखा कि असह्य पराक्रमी महाराज पृथु इन्द्र का वध करने को तैयार हैं, तब उन्हें रोकते हुए कहा, ‘राजन्! आप तो बड़े बुद्धिमान् हैं, यज्ञदीक्षा ले लेने पर शास्त्रविहित यज्ञपशु को छोड़कर और किसी का वध करना उचित नहीं है। इस यज्ञ कार्य में विघ्न डालने वाला आपका शत्रु इन्द्र तो आपके सुयश से ही ईर्ष्यावश निस्तेज हो रहा है। हम अमोघ आवाहन-मन्त्रों द्वारा उसे यहीं बुला लेते हैं और बलात् अग्नि में हवन किये देते हैं’।

विदुर जी! यजमान से इस प्रकार सलाह करके उसके याजकों ने क्रोधपूर्वक इन्द्र का आवाहन किया। वे स्रुवा द्वारा आहुति डालना ही चाहते थे कि ब्रह्मा जी ने वहाँ आकर उन्हें रोक दिया। वे बोले, ‘याजको! तुम्हें इन्द्र का वध नहीं करना चाहिये, यह यज्ञसंज्ञक इन्द्र तो भगवान् की ही मूर्ति है। तुम यज्ञ द्वारा जिन देवताओं की आराधना कर रहे हो, वे इन्द्र के ही तो अंग हैं और उसे तुम यज्ञ द्वारा मारना चाहते हो। पृथु के इस यज्ञानुष्ठान में विघ्न डालने के लिये इन्द्र ने जो पाखण्ड फैलाया है, वह धर्म का उच्छेदन करने वाला है। इस बात पर तुम ध्यान दो, अब उससे अधिक विरोध मत करो; नहीं तो वह और भी पाखण्ड मार्गों का प्रचार करेगा। अच्छा, परमयशस्वी महाराज पृथु के निन्यानबे ही यज्ञ रहने दो।’

फिर राजर्षि पृथु से कहा, ‘राजन्! आप तो मोक्षधर्म के जानने वाले हैं; अतः अब आपको इन यज्ञानुष्ठानों की आवश्यकता नहीं है। आपका मंगल हो! आप और इन्द्र-दोनों की पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीहरि के शरीर हैं; इसलिये अपने ही स्वरूपभूत इन्द्र के प्रति आपको क्रोध नहीं करना चाहिये। आपका यह यज्ञ निर्विघ्न समाप्त नहीं हुआ-इसके लिये आप चिन्ता न करें। हमारी बात आप आदरपूर्वक स्वीकार कीजिये। देखिये, जो मनुष्य विधाता के बिगाड़े हुए काम को बनाने का विचार करता है, उसका मन अत्यन्त क्रोध में भरकर भयंकर मोह में फँस जाता है। बस, इस यज्ञ को बंद कीजिये। इसी के कारण इन्द्र के चलाये हुए पाखण्डों से धर्म का नाश हो रहा है; क्योंकि देवताओं में बड़ा दुराग्रह होता है।

जरा देखिये तो, जो इन्द्र घोड़े को चुराकर आपके यज्ञ में विघ्न डाल रहा था, उसी के रचे हुए इन मनोहर पाखण्डों की ओर सारी जनता खिंचती चली जा रही है। आप साक्षात् विष्णु के अंश हैं। वेन के दुराचार से धर्म लुप्त हो रहा था, उस समयोचित धर्म की रक्षा के लिये ही आपने उसके शरीर से अवतार लिया है। अतः प्रजापालक पृथु जी! अपने इस अवतार का उद्देश्य विचार कर आप भृगु आदि विश्वरचयिता मुनीश्वरों का संकल्प पूर्ण कीजिये। यह प्रचण्ड पाखण्ड-पथरूप इन्द्र की माया अधर्म की जननी है। आप इसे नष्ट कर डालिये’।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- लोकगुरु भगवान् ब्रह्मा जी के इस प्रकार समझाने पर प्रबल पराक्रमी महराज पृथु ने यज्ञ का आग्रह छोड़ दिया और इन्द्र के साथ प्रीतिपूर्वक सन्धि भी कर ली। इसके पश्चात् जब वे यज्ञान्त स्नान करके निवृत्त हुए, तब उनके यज्ञों से तृप्त हुए देवताओं ने उन्हें अभीष्ट वर दिये। आदिराज पृथु ने अत्यन्त श्रद्धापूर्वक ब्राह्मणों को दक्षिणाएँ दीं तथा ब्राह्मणों ने उनके सत्कार से सन्तुष्ट होकर उन्हें अमोघ आशीर्वाद दिये। वे कहने लगे, ‘महाबाहो! आपके बुलाने से जो पितर, देवता, ऋषि और मनुष्यादि आये थे, उन सभी का आपने दान-मान से खूब सत्कार किया’।

Chapter Nineteen: King Prthu’s One Hundred Horse Sacrifices

1. The great sage Maitreya continued: My dear Vidura, King Prthu initiated the performance of one hundred horse sacrifices at the spot where the River Sarasvati flows towards the east. This piece of land is known as Brahmavarta, and it was controlled by Svayambhuva Manu.

2. When the most powerful Indra, the King of heaven, saw this, he considered the fact that King Prthu was going to exceed him in fruitive activities. Thus Indra could not tolerate the great sacrificial ceremonies performed by King Prthu.

3. The Supreme Personality of Godhead, Lord Visnu, is present in everyone’s heart as the Supersoul, and He is the proprietor of all planets and the enjoyer of the results of all sacrifices. He was personally present at the sacrifices made by King Prthu.

4. When Lord Vishnu appeared in the sacrificial arena, Lord Brahma, Lord Shiva and all the chief
predominating personalities of every planet, as well as their followers, came with Him. When He
appeared on the scene, the residents of Gandharvaloka, the great sages, and the residents of Apsaroloka all praised Him.

5. The Lord was accompanied by the residents of Siddhaloka and Vidyadhara-loka, all the descendants of Diti, and the demons and the Yaksas. He was also accompanied by His chief associates, headed by Sunanda and Nanda.

6. Great devotees, who were always engaged in the service of the Supreme Personality of Godhead, as well as the great sages named Kapila, Narada and Dattatreya, and masters of mystic powers, headed by Sanaka Kumara, all attended the great sacrifice with Lord Vishnu.

7. My dear Vidura, in that great sacrifice the entire land came to be like the milk-producing kama-dhenu, and thus, by the performance of yajna, all daily necessities for life were supplied.

8. The flowing rivers supplied all kinds of tastes–sweet, pungent, sour, etc.–and very big trees supplied fruit and honey in abundance. The cows, having eaten sufficient green grass, supplied profuse quantities of milk, curd, clarified butter and similar other necessities.

9. King Prthu was presented with various gifts from the general populace and predominating deities of all planets. The oceans and seas were full of valuable jewels and pearls, and the hills were full of chemicals and fertilizers. Four kinds of edibles were produced profusely.

10. King Prthu was dependent on the Supreme Personality of Godhead, who is known as Adhoksaja. Because King Prthu Performed so many sacrifices, he was superhumanly enhanced by the mercy of the Supreme Lord. King Prthu’s opulence, however, could not be tolerated by the King of heaven, Indra,who tried to impede the progress of his opulence.

11. When Prthu Maharaja was performing the last horse sacrifice [asvamedha-yajna], King Indra, invisible to everyone, stole the horse intended for sacrifice. He did this because of his great envy of King Prthu.

12. When King Indra was taking away the horse, he dressed himself to appear as a liberated person. Actually this dress was a form of cheating, for it falsely created an impression of religion. When Indra went into outer space in this way, the great sage Atri saw him and understood the whole situation.

13. When the son of King Prthu was informed by Atri of King Indra’s trick, he immediately became very angry and followed Indra to kill him, calling, “Wait! Wait!”

14. King Indra was fraudulently dressed as a sannyasi, having knotted his hair on his head and
smeared ashes all over his body. Upon seeing such dress, the son of King Prthu considered Indra a religious man and pious sannyasi. Therefore he did not release his arrows.

15. When Atri Muni saw that the son of King Prthu did not kill Indra but returned deceived by him, Atri Muni again instructed him to kill the heavenly King because he thought that Indra had become the lowliest of all demigods due to his impeding the execution of King Prthu’s sacrifice.

16. Being thus informed, the grandson of King Vena immediately began to follow Indra, who was fleeing through the sky in great haste. He was very angry with him, and he chased him just as the king of the vultures chased Ravana.

17. When Indra saw that the son of Prthu was chasing him, he immediately abandoned his false dress and left the horse. Indeed, he disappeared from that very spot, and the great hero, the son of Maharaja Prthu, returned the horse to his father’s sacrificial arena.

18. My dear Lord Vidura, when the great sages observed the wonderful prowess of the son of King Prthu, they all agreed to give him the name Vijitasva.

19. My dear Vidura, Indra, being the King of heaven and very powerful, immediately brought a dense darkness upon the sacrificial arena. Covering the whole scene in this way, he again took away the horse, which was chained with golden shackles near the wooden instrument where animals were sacrificed.

20. The great sage Atri again pointed out to the son of King Prthu that Indra was fleeing through the sky. The great hero, the son of Prthu, chased him again. But when he saw that Indra was carrying in his hand a staff with a skull at the top and was again wearing the dress of a sannyasi, he still chose not to kill him.

21. When the great sage Atri again gave directions, the son of King Prthu became very angry and placed an arrow on his bow. Upon seeing this, King Indra immediately abandoned the false dress of a sannyasi and, giving up the horse, made himself invisible.

22. Then the great hero, Vijitasva, the son of King Prthu, again took the horse and returned to his
father’s sacrificial arena. Since that time, certain men with a poor fund of knowledge have adopted the dress of a false sannyasi. It was King Indra who introduced this.

23. Whatever different forms Indra assumed as a mendicant because of his desire to seize the horse were symbols of atheistic philosophy.

24-25. In this way, King Indra, in order to steal the horse from King Prthu’s sacrifice, adopted several orders of sannyasa. Some sannyasis go naked, and sometimes they wear red garments and pass under the name of kapalika. These are simply symbolic representations of their sinful activities. These so-called sannyasis are very much appreciated by sinful men because they are all godless atheists and very expert in putting forward arguments and reasons to support their case. We must know, however, that they are only passing as adherents of religion and are not so in fact. Unfortunately, bewildered
persons accept them as religious, and being attracted to them, they spoil their life.

26. Maharaja Prthu, who was celebrated as very powerful, immediately took up his bow and arrows and prepared to kill Indra himself, because Indra had introduced such irregular sannyasa orders.

27. When the priests and all the others saw Maharaja Prthu very angry and prepared to kill Indra, they requested him: O great soul, do not kill him, for only sacrificial animals can be killed in a sacrifice. Such are the directions given by sastra.

28. Dear King, Indra’s powers are already reduced due to his attempt to impede the execution of your sacrifice. We shall call him by Vedic mantras which were never before used, and certainly he will come. Thus by the power of our mantra, we shall cast him into the fire because he is your enemy.

29. My dear Vidura, after giving the King this advice, the priests who had been engaged in performing the sacrifice called for Indra, the King of heaven, in a mood of great anger. When they were just ready to put the oblation in the fire, Lord Brahma appeared on the scene and forbade them to start the sacrifice.

30. Lord Brahma addressed them thus: My dear sacrificial performers, you cannot kill Indra, the King of heaven. It is not your duty. You should know that Indra is as good as the Supreme Personality of Godhead. Indeed, he is one of the most powerful assistants of the Personality of Godhead. You are trying to satisfy all the demigods by the performance of this yajna, but you should know that all these demigods are but parts and parcels of Indra, the King of heaven. How, then, can you kill him in this great sacrifice?

31. In order to make trouble and impede the performance of King Prthu’s great sacrifice, King Indra has adopted some means that in the future will destroy the clear path of religious life. I draw your attention to this fact. If you oppose him any further, he will further misuse his power and introduce many other irreligious systems.

32. “Let there be only ninety-nine sacrificial performances for Maharaja Prthu,” Lord Brahma concluded. Lord Brahma then turned towards Maharaja Prthu and informed him that since he was thoroughly aware of the path of liberation, what was the use in performing more sacrifices?

33. Lord Brahma continued: Let there be good fortune to both of you, for you and King Indra are both part and parcel of the Supreme Personality of Godhead. Therefore you should not be angry with King Indra, who is nondifferent from you.

34. My dear King, do not be agitated and anxious because your sacrifices have not been properly
executed due to providential impediments. Kindly take my words with great respect. We should always remember that if something happens by providential arrangement, we should not be very sorry. The more we try to rectify such reversals, the more we enter into the darkest region of materialistic thought.

35. Lord Brahma continued: Stop the performance of these sacrifices, for they have induced Indra to introduce so many irreligious aspects. You should know very well that even amongst the demigods there are many unwanted desires.

36. Just see how Indra, the King of heaven, was creating a disturbance in the midst of the sacrifice by stealing the sacrificial horse. These attractive sinful activities he has introduced will be carried out by the people in general.

37. O King Prthu, son of Vena, you are the part-and-parcel expansion of Lord Visnu. Due to the
mischievous activities of King Vena, religious principles were almost lost. At that opportune moment you descended as the incarnation of Lord Visnu. Indeed, for the protection of religious principles you have appeared from the body of King Vena.

38. O protector of the people in general, please consider the purpose of your being incarnated by Lord Vishnu. The irreligious principles created by Indra are but mothers of so many unwanted religions. Please therefore stop these imitations immediately.

39. The great sage Maitreya continued: When King Prthu was thus advised by the supreme teacher, Lord Brahma, he abandoned his eagerness to perform yajnas and with great affection concluded a peace with King Indra.

40. After this, Prthu Maharaja took his bath, which is customarily taken after the performance of a yajna, and received the benedictions and due blessings of the demigods, who were very pleased by his glorious activities.

41. With great respect, the original king, Prthu, offered all kinds of rewards to the brahmanas present at the sacrifice. Since all these brahmanas were very much satisfied, they gave their heartfelt blessings to the King.

42. All the great sages and brahmanas said: O mighty King, by your invitation all classes of living entities have attended this assembly. They have come from Pitrloka and the heavenly planets, and great sages as well as common men have attended this meeting. Now all of them are very much satisfied by your dealings and your charity towards them.

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – अट्ठारहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Eighteen

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – अट्ठारहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Eighteen

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: अष्टादश अध्यायः

श्लोक 1-32

पृथ्वी-दोहन

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इस समय महाराज पृथु के होठ क्रोध से काँप रहे थे। उनकी इस प्रकार स्तुति कर पृथ्वी ने अपने हृदय को विचारपूर्वक समाहित किया और डरते-डरते उनसे कहा। ‘प्रभो! आप अपना क्रोध शान्त कीजिये और मैं जो प्रार्थना करती हूँ, उसे ध्यान देकर सुनिये।

बुद्धिमान् पुरुष भ्रमर के समान सभी जगह से सार ग्रहण कर लेते हैं। तत्त्वदर्शी मुनियों ने इस लोक और परलोक में मनुष्यों का कल्याण करने के लिये कृषि, अग्निहोत्र आदि बहुत-से उपाय निकाले और काम में लिये हैं। उन प्राचीन ऋषियों के बताये हुए उपायों का इस समय भी जो पुरुष श्रद्धापूर्वक भलीभाँति आचरण करता है, वह सुगमता से अभीष्ट फल प्राप्त कर लेता है। परन्तु जो अज्ञानी पुरुष उनका अनादर करके अपने मनःकल्पित उपायों का आश्रय लेता है, उसके सभी उपाय और प्रयत्न बार-बार निष्फल होते रहते हैं।

राजन्! पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने जिन धान्य आदि को उत्पन्न किया था, मैंने देखा कि यम-नियमादि व्रतों का पालन न करने वाले दुराचारी लोग ही उन्हें खाये जा रहे हैं। लोकरक्षक! आप लोगों ने मेरा पालन और आदर करना छोड़ दिया; इसलिये सब लोग चोरों के समान हो गये हैं। इसी से यज्ञ के लिये ओषधियों को मैंने अपने में छिपा लिया। अब अधिक समय हो जाने से अवश्य ही वे धान्य मेरे उदर में जीर्ण हो गये हैं; आप उन्हें पूर्वाचार्यो के बतलाये हुए उपाय से निकाल लीजिये। लोकपालक वीर! यदि आपको समस्त प्राणियों के अभीष्ट एवं बल की वृद्धि करने वाले अन्न की आवश्यकता है तो आप मेरे योग्य बछड़ा, दोहनपात्र और दुहने वाले की व्यवस्था कीजिये; मैं उस बछड़े के स्नेह से पिन्हाकर दूध के रूप में आपको सभी अभीष्ट वस्तुएँ दे दूँगी।

राजन्! एक बात और है; आपको मुझे समतल करना होगा, जिससे कि वर्षा-ऋतु बीत जाने पर भी मेरे ऊपर इन्द्र का बरसाया हुआ जल सर्वत्र बना रहे-मेरे भीतर की आर्द्रता सूखने न पावे। यह आपके लिये बहुत मंगलकारक होगा’।

पृथ्वी के कहे हुए ये प्रिय और हितकारी वचन स्वीकार कर महाराज पृथु ने स्वयाम्भुव मनु को बछड़ा बना अपने हाथ में ही समस्त धान्यों को दुह लिया। पृथु के समान अन्य विज्ञजन भी सब जगह से सार ग्रहण कर लेते हैं, अतः उन्होंने भी पृथु जी के द्वारा वश में की हुई वसुन्धरा से अपनी-अपनी अभीष्ट वस्तुएँ दुह लीं। ऋषियों ने बृहस्पति जी को बछड़ा बनाकर इन्द्रिय (वाणी, मन और श्रोत्र) रूप पात्र में पृथ्वीदेवी से वेदरूप पवित्र दूध दुहा। देवताओं ने इन्द्र को बछड़े के रूप में कल्पना कर सुवर्णमय पात्र में अमृत, वीर्य (मनोबल), ओज (इन्द्रियबल) और शारीरिक बलरूप दूध दुहा। दैत्य और दानवों ने असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद जी को वत्स बनाकर लोहे के पात्र में मदिरा और आसव (ताड़ी आदि) रूप दूध दुहा। गन्धर्व और अप्सराओं ने विश्वावसु को बछड़ा बनाकर कमलरूप पात्र में संगीतमाधुर्य और सौन्दर्य रूप दूध दुहा। श्राद्ध के अधिष्ठाता महाभाग पितृगण ने अर्यमा नाम के पित्रीश्वर को वत्स बनाया तथा मिट्टी के कच्चे पात्र में श्रद्धापूर्वक कव्य (पितरों को अर्पित किया जाने वाला अन्न) रूप दूध दुहा।

फिर कपिलदेव जी को बछड़ा बनाकर आकाशरूप पात्र में सिद्धों ने अणिमादि अष्टसिद्धि तथा विद्याधरों ने आकाशगमन आदि विद्याओं को दुहा।

किम्पुरुषादि अन्य मायावियों ने मय दानव को बछड़ा बनाया तथा अन्तर्धान होना, विचित्र रूप धारण कर लेना आदि संकल्पमयी मायाओं को दुग्ध रूप से दुहा।

इसी प्रकार यक्ष-राक्षस तथा भूत-पिशाचादि मांसाहारियों ने भूतनाथ रुद्र को बछड़ा बनाकर कपालरूप पात्र में रुधिरासवरूप दूध दुहा।

बिना फन वाले साँप, फन वाले साँप, नाग और बिच्छू आदि विषैले जन्तुओं ने तक्षक को बछड़ा बनाकर मुखरूप पात्र में विषरूप दूध दुहा। पशुओं ने भगवान् रुद्र के वाहन बैल को वत्स बनाकर वनरूप पात्र में तृणरूप दूध दुहा। बड़ी-बड़ी दाढ़ों वाले मांसभक्षी जीवों ने सिंहरूप बछड़े के द्वारा अपने शरीररूप पात्र में कच्चा मांसरूप दूध दुहा तथा गरुड़ जी को वत्स बनाकर पक्षियों ने कीट-पतंगादि चर और फलादि अचर पदार्थों को दुग्ध रूप से दुहा। वृक्षों ने वट को वत्स बनाकर अनेक प्रकार का रसरूप दूध दुहा और पर्वतों ने हिमालयरूप बछड़े के द्वारा अपने शिखररूप पात्रों में अनेक प्रकार की धातुओं को दुहा।

पृथ्वी तो सभी अभीष्ट वस्तुओं को देने वाली है और इस समय वह पृथु जी के अधीन थी। अतः उससे सभी ने अपनी-अपनी जाति के मुखिया को बछड़ा बनाकर अलग-अलग पात्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार के पदार्थों को दूध के रूप में दुह लिया।

कुरुश्रेष्ठ विदुर जी! इस प्रकार पृथु आदि सभी अन्न-भोजियों ने भिन्न-भिन्न दोहन-पात्र और वत्सों के द्वारा अपने-अपने विभिन्न अन्नरूप दूध पृथ्वी से दुहे। इससे महाराज पृथु ऐसे प्रसन्न हुए कि सर्वकामदुहा पृथ्वी के प्रति उनका पुत्री के समान स्नेह हो गया और उसे उन्होंने अपनी कन्या के रूप में स्वीकार कर लिया। फिर राजाधिराज पृथु ने अपने धनुष की नोक से पर्वतों को फोड़कर इस सारे भूमण्डल को प्रायः समतल कर दिया। वे पिता के समान अपनी प्रजा के पालन-पोषण की व्यवस्था में लगे हुए थे। उन्होंने इस समतल भूमि में प्रजावर्ग के लिये जहाँ-तहाँ यथायोग्य निवासस्थानों का विभाग किया। अनेकों गाँव, कस्बें, नगर, दुर्ग, अहीरों की बस्ती, पशुओं के रहने के स्थान, छावनियाँ, खानें, किसानों के गाँव और पहाड़ों की तलहटी के गाँव बसाये। महाराज पृथु से पहले इस पृथ्वीतल पर पुर-ग्रामादि का विभाग नहीं था; सब लोग अपने-अपने सुभीते के अनुसार बेखटे जहाँ-तहाँ बस जाते थे।

Chapter Eighteen: Prthu Maharaja Milks the Earth Planet

1. The great saint Maitreya continued to address Vidura: My dear Vidura, at that time, after the planet earth finished her prayers, King Prthu was still not pacified, and his lips trembled in great anger. Although the planet earth was frightened, she made up her mind and began to speak as follows in order to convince the King.

2. My dear Lord, please pacify your anger completely and hear patiently whatever I submit before you. Please turn your kind attention to this. I may be very poor, but a learned man takes the essence of knowledge from all places, just as a bumblebee collects honey from each and every flower.

3. To benefit all human society, not only in this life but in the next, the great seers and sages have prescribed various methods conducive to the prosperity of the people in general.

4. One who follows the principles and instructions enjoined by the great sages of the past can utilize these instructions for practical purposes. Such a person can very easily enjoy life and pleasures.

5. A foolish person who manufactures his own ways and means through mental speculation and does not recognize the authority of the sages who lay down unimpeachable directions is simply unsuccessful again and again in his attempts.

6. My dear King, the seeds, roots, herbs and grains, which were created by Lord Brahma in the past, are now being used by nondevotees, who are devoid of all spiritual understanding.

7. My dear King, not only are grains and herbs being used by nondevotees, but, as far as I am
concerned, I am not being properly maintained. Indeed, I am being neglected by kings who are not punishing these rascals who have turned into thieves by using grains for sense gratification.
Consequently I have hidden all these seeds, which were meant for the performance of sacrifice.

8. Due to being stocked for a very long time, all the grain seeds within me have certainly deteriorated. Therefore you should immediately arrange to take these seeds out by the standard process, which is recommended by the acaryas or sastras.

9-10. O great hero, protector of living entities, if you desire to relieve the living entities by supplying them sufficient grain, and if you desire to nourish them by taking milk from me, you should make arrangements to bring a calf suitable for this purpose and a pot in which the milk can be kept, as well as a milkman to do the work. Since I will be very much affectionate towards my calf, your desire to take milk from me will be fulfilled.

11. My dear King, may I inform you that you have to make the entire surface of the globe level. This will help me, even when the rainy season has ceased. Rainfall comes by the mercy of King Indra. Rainfall will remain on the surface of the globe, always keeping the earth moistened, and thus it will be auspicious for all kinds of production.

12. After hearing the auspicious and pleasing words of the planet earth, the King accepted them. He then transformed Svayambhuva Manu into a calf and milked all the herbs and grains from the earth in the form of a cow, keeping them in his cupped hands.

13. Others, who were as intelligent as King Prthu, also took the essence out of the earthly planet.
Indeed, everyone took this opportunity to follow in the footsteps of King Prthu and get whatever he desired from the planet earth.

14. All the great sages transformed Brhaspati into a calf, and making the senses into a pot, they milked all kinds of Vedic knowledge to purify words, mind and hearing.

15. All the demigods made Indra, the King of heaven, into a calf, and from the earth they milked the beverage soma, which is nectar. Thus they became very powerful in mental speculation and bodily and sensual strength.

16. The sons of Diti and the demons transformed Prahlada Maharaja, who was born in an asura family, into a calf, and they extracted various kinds of liquor and beer, which they put into a pot made of iron.

17. The inhabitants of Gandharvaloka and Apsaroloka made Visvavasu into a calf, and they drew the milk into a lotus flower pot. The milk took the shape of sweet musical art and beauty.

18. The fortunate inhabitants of Pitrloka, who preside over the funeral ceremonies, made Aryama into a calf. With great faith they milked kavya, food offered to the ancestors, into an unbaked earthen pot.

19. After this, the inhabitants of Siddhaloka, as well as the inhabitants of Vidyadhara-loka, transformed the great sage Kapila into a calf, and making the whole sky into a pot, they milked out specific yogic mystic powers, beginning with anima. Indeed, the inhabitants of Vidyadhara-loka acquired the art of flying in the sky.

20. Others also, the inhabitants of planets known as Kimpurusa-loka, made the demon Maya into a calf, and they milked out mystic powers by which one can disappear immediately from another’s vision and appear again in a different form.

21. Then the Yaksas, Raksasas, ghosts and witches, who are habituated to eating flesh, transformed Lord Shiva’s incarnation Rudra [Bhutanatha] into a calf and milked out  beverages made of blood and put them in a pot made of skulls.

22. Thereafter cobras and snakes without hoods, large snakes, scorpions and many other poisonous animals took poison out of the planet earth as their milk and kept this poison in snake holes. They made a calf out of Taksaka.

23-24. The four-legged animals like the cows made a calf out of the bull who carries Lord Siva and made a milking pot out of the forest. Thus they got fresh green grasses to eat. Ferocious animals like tigers transformed a lion into a calf, and thus they were able to get flesh for milk. The birds made a calf out of Garuda and took milk from the planet earth in the form of moving insects and nonmoving plants and grasses.

25. The trees made a calf out of the banyan tree, and thus they derived milk in the form of many
delicious juices. The mountains transformed the Himalayas into a calf, and they milked a variety of minerals into a pot made of the peaks of hills.

26. The planet earth supplied everyone his respective food. During the time of King Prthu, the earth was fully under the control of the King. Thus all the inhabitants of the earth could get their food supply by creating various types of calves and putting their particular types of milk in various pots.

27. My dear Vidura, chief of the Kurus, in this way King Prthu and all the others who subsist on food created different types of calves and milked out their respective eatables. Thus they received their various foodstuffs, which were symbolized as milk.

28. Thereafter King Prthu was very satisfied with the planet earth, for she sufficiently supplied all food to various living entities. Thus he developed an affection for the planet earth, just as if she were his own daughter.

29. After this, the king of all kings, Maharaja Prthu, leveled all rough places on the surface of the globe by breaking up the hills with the strength of his bow. By his grace the surface of the globe almost became flat.

30. To all the citizens of the state, King Prthu was as good as a father. Thus he was visibly engaged in giving them proper subsistence and proper employment for subsistence. After leveling the surface of the globe, he earmarked different places for residential quarters, inasmuch as they were desirable.

31. In this way the King founded many types of villages, settlements and towns and built forts,
residences for cowherdsmen, stables for the animals, and places for the royal camps, mining places, agricultural towns and mountain villages.

32. Before the reign of King Prthu there was no planned arrangement for different cities, villages,
pasturing grounds, etc. Every thing was scattered, and everyone constructed his residential quarters according to his own convenience. However, since King Prthu plans were made for towns and villages.

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – सत्रहवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Seventeen

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – सत्रहवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Seventeen

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: सप्तदश अध्यायः

श्लोक 1-36

महाराज पृथु का पृथ्वी पर कुपित होना और पृथ्वी के द्वारा उनकी स्तुति करना

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- इस प्रकार जब वन्दीजन ने महराज पृथु के गुण और कर्मों का बखान करके उनकी प्रशंसा की, तब उन्होंने भी उनकी बड़ाई करके तथा उन्हें मनचाही वस्तुएँ देकर सन्तुष्ट किया। उन्होंने ब्राह्मणादि चारों वर्णों, सेवकों, मन्त्रियों, पुरोहितों, पुरवासियों, देशवासियों, भिन्न-भिन्न व्यवसायियों तथा अन्यान्य आज्ञानुवर्तियों का भी सत्कार किया।

विदुर जी ने पूछा- ब्रह्मन्! पृथ्वी तो अनेक रूप धारण कर सकती है, उसने गौ का रूप ही क्यों धारण किया? और जब महाराज पृथु ने उसे दुहा, तब बछड़ा कौन बना? और दुहने का पात्र क्या हुआ? पृथ्वी देवी तो पहले स्वभाव से ही ऊँची-नीची थी। उसे उन्होंने समतल किस प्रकार किया और इन्द्र उनके यज्ञसम्बन्धी घोड़े को क्यों हर ले गये? ब्रह्मज्ञानियों में श्रेष्ठ भगवान् सनत्कुमार जी से ज्ञान और विज्ञान प्राप्त करके वे राजर्षि किस गति को प्राप्त हुए? पृथुरूप से सर्वेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण ने ही अवतार ग्रहण किया था; अतः पुण्यकीर्ति श्रीहरि के उस पृथु-अवतार से सम्बन्ध रखने वाले जो और भी पवित्र-चरित्र हों, वे सभी आप मुझसे कहिये। मैं आपका और श्रीकृष्णचन्द्र का बड़ा अनुरक्त भक्त हूँ।

श्रीसूत जी कहते हैं- जब विदुर जी ने भगवान् वासुदेव की कथा कहने के लिये इस प्रकार प्रेरणा की, तब श्रीमैत्रेय जी प्रसन्नचित्त से उनकी प्रशंसा करते हुए कहने लगे।

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! ब्राह्मणों ने महाराज पृथु का राज्याभिषेक करके उन्हें प्रजा का रक्षक उद्घोषित किया। इन दिनों पृथ्वी अन्नहीन हो गयी थी, इसलिये भूख के कारण प्रजाजनों के शरीर सूखकर काँटे हो गये थे। ‘राजन्! जिस प्रकार कोटर में सुलगती हुई आग से पेड़ जल जाता है, उसी प्रकार हम पेट की भीषण ज्वाला से जले जा रहे हैं। आप शरणागतों की रक्षा करने वाले हैं और हमारे अन्नदाता प्रभु बनाये गये हैं, इसलिये हम आपकी शरण में आये हैं। आप समस्त लोकों की रक्षा करने वाले हैं, आप ही हमारी जीविका के भी स्वामी हैं। अतः राजराजेश्वर! आप हम क्षुधापीड़ितों को शीघ्र ही अन्न देने का प्रबन्ध कीजिये; ऐसा न हो कि अन्न मिलने से पहले ही हमारा अन्त हो जाये’।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- कुरुवर! प्रजा का करुणक्रन्दन सुनकर महाराज पृथु बहुत देर तक विचार करते रहे। अन्त में उन्हें अन्नाभाव का कारण मालूम हो गया। ‘पृथ्वी ने स्वयं ही अन्न एवं औषधादि को अपने भीतर छिपा लिया है’ अपनी बुद्धि से इस बात का निश्चय करके उन्होंने अपना धनुष उठाया और त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकर के समान अत्यन्त क्रोधित होकर पृथ्वी को लक्ष्य बनाकर बाण चढ़ाया। उन्हें शस्त्र उठाये देख पृथ्वी काँप उठी और जिस प्रकार व्याध के पीछा करने पर हरिणी भागती है, उसी प्रकार वह डरकर गौ का रूप धारण करके भागने लगी। यह देखकर महाराज पृथु की आँखें क्रोध से लाल हो गयीं। वे जहाँ-तहाँ पृथ्वी गयी, वहाँ-वहाँ धनुष पर बाण चढ़ाये उसके पीछे लगे रहे। दिशा, विदिशा, स्वर्ग, पृथ्वी और अन्तरिक्ष में जहाँ-जहाँ भी वह दौड़कर जाती, वहीं उसे महाराज पृथु हथियार उठाये अपने पीछे दिखायी देते। जिस प्रकार मनुष्य को मृत्यु से कोई नहीं बचा सकता, उसी प्रकार उसे त्रिलोकी में वेनपुत्र पृथु से बचाने वाला कोई भी न मिला।

तब वह अत्यन्त भयभीत होकर दुःखित चित्त से पीछे की ओर लौटी और महाभाग पृथु जी से कहने लगी- ‘धर्म के तत्त्व को जानने वाले शरणागतवत्सल राजन्! आप तो सभी प्राणियों की रक्षा करने में तत्पर हैं, आप मेरी भी रक्षा कीजिये। मैं अत्यन्त दीन और निरपराध हूँ, आप मुझे क्यों मरना चाहते हैं? इसके सिवा आप तो धर्मज्ञ माने जाते हैं; फिर मुझ स्त्री का वध आप कैसे कर सकेंगे? स्त्रियाँ कोई अपराध करें, तो साधारण जीव भी उन पर हाथ नहीं उठाते; फिर आप जैसे करुणामय और दीनवत्सल तो ऐसा कर ही कैसे सकते हैं? मैं तो सुदृढ़ नौका के समान हूँ, सारा जगत् मेरे ही आधार पर स्थित हैं। मुझे तोड़कर आप अपने को और अपनी प्रजा को जल के ऊपर कैसे रखेंगे?

महाराज पृथु ने कहा- पृथ्वी! तू मेरी आज्ञा का उल्लंघन करने वाली है। तू यज्ञ में देवतारूप से भाग लेती है, किन्तु उसके बदले में हमें अन्न नहीं देती; इसलिये आज मैं तुझे मार डालूँगा। तू जो प्रतिदिन हरी-हरी घास खा जाती है और अपने थन का दूध नहीं देती- ऐसी दुष्टता करने पर तुझे दण्ड देना अनुचित नहीं कहा जा सकता। तू नासमझ है, तूने पूर्वकाल में ब्रह्मा जी के उत्पन्न किये हुए अन्नादि के बीजों को अपने में लीन कर लिया है, और अब मेरी भी परवा न करके उन्हें अपने गर्भ से निकालती नहीं। अब मैं अपने बाणों से तुझे छिन्न-भिन्न कर तेरे मेदे से इन क्षुधातुर और दीन प्रजाजनों का करुण-क्रन्दन शान्त करूँगा। जो दुष्ट अपना ही पोषण करने वाला तथा अन्य प्राणियों के प्रति निर्दय हो- वह पुरुष, स्त्री अथवा नपुंसक कोई भी हो- उसे मारना राजाओं के लिये न मारने के ही समान है। तू बड़ी गर्वीली और मदोन्मत्ता है; इस समय माया से ही यह गौ का रूप बनाये हुए है। मैं बाणों से तेरे टुकड़े-टुकड़े करके अपने योगबल से प्रजा को धारण करूँगा।

इस समय पृथु काल की भाँति क्रोधमयी मूर्ति धारण किये हुए थे। उनके ये शब्द सुनकर धरती काँपने लगी और उसने अत्यन्त विनीतभाव से हाथ जोड़कर कहा।

पृथ्वी ने कहा- आप साक्षात् परमपुरुष हैं तथा अपनी माया से अनेक प्रकार के शरीर धारणकर गुणमय जान पड़ते हैं; वास्तव में आत्मानुभव के द्वारा आप अधिभूत, अध्यात्म और अधिदैवसम्बन्धी अभिमान और उससे उत्पन्न हुए राग-द्वेषादि से सर्वथा रहित हैं। मैं आपको बार-बार नमस्कार करती हूँ। आप सम्पूर्ण जगत् के विधाता हैं; आपने ही यह त्रिगुणात्मक सृष्टि रची है और मुझे समस्त जीवों का आश्रय बनाया है। आप सर्वथा स्वतन्त्र हैं। प्रभो! अब आप ही अस्त्र-शस्त्र लेकर मुझे मारने को तैयार हो गये, तब मैं और किसकी शरण में जाऊँ?

कल्प के आरम्भ में आपने-अपने आश्रित रहने वाली अनिर्वचिया माया से ही इस चराचर जगत् की रचना की थी और उस माया के ही द्वारा आप इसका पालन करने के लिये तैयार हुए हैं। आप धर्मपरायण हैं; फिर भी मुझ गोरूपधारिणी को किस प्रकार मारना चाहते हैं? आप एक होकर भी मायावश अनेक रूप जान पड़ते हैं तथा आपने स्वयं ब्रह्मा को रचकर उनसे विश्व की रचना करायी है। आप साक्षात् सर्वेश्वर हैं, आपकी लीलाओं को अजितेन्द्रिय लोग कैसे जान सकते हैं? उनकी बुद्धि तो आपकी दुर्जय माया से विक्षिप्त हो रही है। आप ही पंचभूत, इन्द्रिय, उनके अधिष्ठातृ देवता, बुद्धि और अहंकाररूप अपनी शक्तियों के द्वारा क्रमशः जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और संहार करते हैं। भिन्न-भिन्न कार्यों के लिये समय-समय पर आपकी शक्तियों का आविर्भाव-तिरोभाव हुआ करता है। आप साक्षात् परमपुरुष और जगाद्विधाता हैं, आपको मेरा नमस्कार है।

अजन्मा प्रभो! आप ही अपने रचे हुए भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप जगत् की स्थिति के लिये आदिवराह रूप होकर मुझे रसातल से जल के बाहर लाये थे। इस प्रकार एक बार तो मेरा उद्धार करके आपने धराधर नाम पाया था; आज वही आप वीरमूर्ति से जल के ऊपर नौका के समान स्थित मेरे ही आश्रय रहने वाली प्रजा की रक्षा करने के अभिप्राय से पैने-पैने बाण चढ़ाकर दूध न देने के अपराध में मुझे मारना चाहते हैं। इस त्रिगुणात्मक सृष्टि की रचना करने वाली आपकी माया से मेरे-जैसे साधारण जीवों के चित्त मोहग्रस्त हो रहे हैं। मुझ-जैसे लोग तो आपके भक्तों की लीलाओं का भी आशय नहीं समझ सकते, फिर आपकी किसी क्रिया का उद्देश्य न समझें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। अतः जो इन्द्रिय-संयमादि के द्वारा वीरोचित यज्ञ का विस्तार करते हैं, ऐसे आपके भक्तों को भी नमस्कार है।

Chapter Seventeen: Maharaja Prthu Becomes Angry at the Earth

1. The great sage Maitreya continued: In this way the reciters who were glorifying Maharaja Prthu
readily described his qualities and chivalrous activities. At the end, Maharaja Prthu offered them various presentations with all due respect and worshiped them adequately.

2. King Prthu thus satisfied and offered all respect to all the leaders of the brahmanas and other castes, to his servants, to his ministers and to the priests, citizens, general countrymen, people from other communities, admirers and others, and thus they all became happy.

3. Vidura inquired from the great sage Maitreya: My dear brahmana, since mother earth can appear in different shapes, why did she take the shape of a cow? And when King Prthu milked her, who became the calf, and what was the milking pot?

4. The surface of the earth is by nature low in some places and high in others. How did King Prthu level the surface of the earth, and why did the King of heaven, Indra, steal the horse meant for the sacrifice ?

5. The great saintly King, Maharaja Prthu, received knowledge from Sanat-kumara, who was the greatest Vedic scholar. After receiving knowledge to be applied practically in his life, how did the saintly King attain his desired destination?

6-7. Prthu Maharaja was a powerful incarnation of Lord Krishna’s potencies; consequently any narration concerning his activities is surely very pleasing to hear, and it produces all good fortune. As far as I am concerned, I am always your devotee as well as a devotee of the Lord, who is known as Adhoksaja. Please therefore narrate all the stories of King Prthu, who, in the form of the son of King Vena, milked the cow-shaped earth.

8. Suta Gosvami continued: When Vidura became inspired to hear of the activities of Lord Krsna in His various incarnations, Maitreya, also being inspired and being very pleased with Vidura, began to praise him. Then Maitreya spoke as follows.

9. The great sage Maitreya continued: My dear Vidura, at the time King Prthu was enthroned by the great sages and brahmanas and declared to be the protector of the citizens, there was a scarcity of food grains. The citizens actually became skinny due to starvation. Therefore they came before the King and informed him of their real situation.

10-11. Dear King, just as a tree with a fire burning in the hollow of the trunk gradually dries up, we are drying up due to the fire of hunger in our stomachs. You are the protector of surrendered souls, and you have been appointed to give employment to us. Therefore we have all come to you for protection. You are not only a king, but the incarnation of God as well. Indeed, you are the king of all kings. You can give us all kinds of occupational engagements, for you are the master of our livelihood. Therefore, O king of all kings, please arrange to satisfy our hunger by the proper distribution of food grains. Please take care of us, lest we soon die for want of food.

12. After hearing this lamentation and seeing the pitiable condition of the citizens, King Prthu
contemplated this matter for a long time to see if he could find out the underlying causes.

13. Having arrived at a conclusion, the King took up his bow and arrow and aimed them at the earth, exactly like Lord Siva, who destroys the whole world out of anger.

14. When the earth saw that King Prthu was taking his bow and arrow to kill her, she became very much afraid and began to tremble. She then began to flee, exactly like a deer, which runs very swiftlywhen followed by a 15. Seeing this, Maharaja Prthu became very angry, and his eyes became as red as the early-morning sun. Placing an arrow on his bow, he chased the cow-shaped earth wherever she would run.

16. The cow-shaped earth ran here and there in outer space between the heavenly planets and the earth, and wherever she ran, the King chased her with his bow and arrows.

17. Just as a man cannot escape the cruel hands of death, the cow-shaped earth could not escape the hands of the son of Vena. At length the earth, fearful, her heart aggrieved, turned back in helplessness.

18. Addressing the great, opulent King Prthu as the knower of religious principles and shelter of the surrendered, she said: Please save me. You are the protector of all living entities. Now you are situated as the King of this planet.

19. The cow-shaped earth continued to appeal to the King: I am very poor and have not committed any sinful activities. I do not know why you want to kill me. Since you are supposed to be the knower of all religious principles, why are you so envious of me, and why are you so anxious to kill a woman?

20. Even if a woman does commit some sinful activity, no one should place his hand upon her. And what to speak of you, dear King, who are so merciful. You are a protector, and you are affectionate to the poor.

21. The cow-shaped earth continued: My dear King, I am just like a strong boat, and all the
paraphernalia of the world is standing upon me. If you break me to pieces, how can you protect yourself and your subjects from drowning?

22. King Prthu replied to the earthly Planet: My dear earth, you have disobeyed my orders and rulings.In the form of a demigod you accepted your share of the yajnas we performed, but in return you have not produced sufficient food grains. For this reason I must kill you.

23. Although you are eating green grass every day, you are not filling your milk bag so we can utilize your milk. Since you are willfully committing offenses, it cannot be said that you are not punishable due to your assuming the form of a cow.

24. You have so lost your intelligence that, despite my orders, you do not deliver the seeds of herbs and grains formerly created by Brahma and now hidden within yourself.

25. Now, with the help of my arrows, I shall cut you to pieces and with your flesh satisfy the hunger-stricken citizens, who are now crying for want of grains. Thus I shall satisfy the crying citizens of my kingdom.

26. Any cruel person–be he a man, woman or impotent eunuch–who is only interested in his personal maintenance and has no compassion for other living entities may be killed by the king. Such killing can never be considered actual killing.

27. You are very much puffed up with pride and have become almost insane. Presently you have
assumed the form of a cow by your mystic powers. Nonetheless I shall cut you into small pieces like grain, and I will uphold the entire population by my personal mystic powers.

28. At this time Prthu Maharaja became exactly like Yamaraja, and his whole body appeared very
angry. In other words, he was anger personified. After hearing him, the planet earth began to tremble.She surrendered, and with folded hands began to speak as follows.

29. The planet earth spoke: My dear Lord, O Supreme Personality of Godhead, You are transcendental in Your position, and by Your material energy You have expanded Yourself in various forms and species of life through the interaction of the three modes of material nature. Unlike some other masters, You always remain in Your transcendental position and are not affected by the material creation, which is subject to different material interactions. Consequently You are not bewildered by material activities.

30. The planet earth continued: My dear Lord, You are the complete conductor of the material creation.You have created this cosmic manifestation and the three material qualities, and therefore You have created me, the planet earth, the resting place of all living entities. Yet You are always fully independent, my Lord. Now that You are present before me and ready to kill me with Your weapons, let me know where I should go to take shelter, and tell me who can give me protection.

31. In the beginning of creation You created all these moving and nonmoving living entities by Your inconceivable energy. Through this very same energy You are now prepared to protect the living entities. Indeed, You are the supreme protector of religious principles. Why are You so anxious to kill me, even though I am in the form of a cow?

32. My dear Lord, although You are one, by Your inconceivable potencies You have expanded Yourself in many forms. Through the agency of Brahma, You have created this universe. You are therefore directly the Supreme Personality of Godhead. Those who are not sufficiently experienced cannot understand Your transcendental activities because these persons are covered by Your illusory energy.

33. My dear Lord, by Your own potencies You are the original cause of the material elements, as well as the performing instruments (the senses), the workers of the senses (the controlling demigods), the intelligence and the ego, as well as everything else. By Your energy You manifest this entire cosmic creation, maintain it and dissolve it. Through Your energy alone everything is sometimes manifest and sometimes not manifest. You are therefore the Supreme Personality of Godhead, the cause of all
causes. I offer my respectful obeisances unto You.

34. My dear Lord, You are always unborn. Once, in the form of the original boar, You rescued me from the waters in the bottom of the universe. Through Your own energy You created all the physical elements, the senses and the heart, for the maintenance of the world.

35. My dear Lord, in this way You once protected me by rescuing me from the water, and consequently Your name has been famous as Dharadhara–He who holds the planet earth. Yet at the present moment, in the form of a great hero, You are about to kill me with sharpened arrows. I am, however, just like a boat on the water, keeping everything afloat.

36. My dear Lord, I am also the creation of one of Your energies, composed of the three modes of
material nature. Consequently I am bewildered by Your activities. Even the activities of Your devotees cannot be understood, and what to speak of Your pastimes. Thus everything appears to us to be contradictory and wonderful.

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – सोलहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Sixteen

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – सोलहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Sixteen

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: षोडश अध्यायः

श्लोक 1-27

वन्दीजन द्वारा महाराज पृथु की स्तुति

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- महाराज पृथु ने जब इस प्रकार कहा, तब उनके वचनामृत का आस्वादन करके सूत आदि गायक लोग बड़े प्रसन्न हुए। फिर वे मुनियों की प्रेरणा से उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगे। ‘आप साक्षात् देवप्रवर श्रीनारायण ही हैं’, जो अपनी माया से अवतीर्ण हुए हैं; हम आपकी महिमा का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं। आपने जन्म तो राजा वेन के मृतक शरीर से लिया है, किन्तु आपके पौरुषों का वर्णन करने में साक्षात् ब्रह्मादि की बुद्धि भी चकरा जाती है। तथापि आपके कथामृत के आस्वादन में आदर-बुद्धि रखकर मुनियों के उपदेश के अनुसार उन्हीं की प्रेरणा से हम आपके परम प्रशंसनीय कर्मों का कुछ विस्तार करना चाहते हैं, आप साक्षात् श्रीहरि के कलावतार हैं और आपकी कीर्ति बड़ी उदार है।

‘ये धर्मधारियों में श्रेष्ठ महाराज पृथु लोक को धर्म में प्रवृत्त करके धर्ममर्यादा की रक्षा करेंगे तथा उसके विरोधियों को दण्ड देंगे। ये अकेले ही समय-समय पर प्रजा के पालन, पोषण और अनुरंजन आदि कार्य के अनुसार अपने शरीर में भिन्न-भिन्न लोकपालों की मूर्ति को धारण करेंगे तथा यज्ञ आदि के प्रचार द्वरा स्वर्गलोक और वृष्ठि की व्यवस्था द्वारा भूलोक- दोनों का ही हित साधन करेंगे। ये सूर्य के समान अलौकिक, महिमान्वित, प्रतापवान् और समदर्शी होंगे। जिस प्रकार सूर्य देवता आठ महीने तपते रहकर जल खींचते हैं और वर्षा-ऋतु में उसे उड़ेल देते हैं, उसी प्रकार ये कर आदि के द्वारा कभी धन-संचय करेंगे और कभी उसका प्रजा के हित के लिये व्यय कर डालेंगे। ये बड़े दयालु होंगे। यदि कभी कोई दीनपुरुष इनके मस्तक पर पैर भी रख देगा, तो भी ये पृथ्वी के समान उसके इस अनुचित व्यवहार को सदा सहन करेंगे।

कभी वर्षा न होगी और प्रजा के प्राण संकट में पड़ जायेंगे, तो ये राजवेषधारी श्रीहरि इन्द्र की भाँति जल बरसाकर अनायास ही उसकी रक्षा कर लेंगे। ये अपने अमृतमय मुखचन्द्र की मनोहर मुस्कान और प्रेमभरी चितवन से सम्पूर्ण लोकों को आनन्दमग्न कर देंगे। इनकी गति को कोई समझ न सकेगा, इनके कार्य भी गुप्त होंगे तथा उन्हें सम्पन्न करने का ढंग भी बहुत गम्भीर होगा। इनका धन सदा सुरक्षित रहेगा। ये अनन्त माहात्म्य और गुणों के एकमात्र आश्रय होंगे। इस प्रकार मनस्वी पृथु साक्षात् वरुण के ही समान होंगे।

‘महाराज पृथु वेनरूप अरणि के मन्थन से प्रकट हुए अग्नि के समान हैं। शत्रुओं के लिये ये अत्यन्त दुर्धर्ष और दुःसह होंगे। ये उनके समीप रहने पर भी, सेनादि से सुरक्षित रहने के कारण, बहुत दूर रहने वाले-से होंगे। शत्रु कभी इन्हें हरा न सकेंगे। जिस प्रकार प्राणियों के भीतर रहने वाला प्राणरूप सूत्रात्मा शरीर के भीतर-बाहर के समस्त व्यापारों को देखते रहने पर भी उदासीन रहता है, उसी प्रकार ये गुप्तचरों के द्वारा प्राणियों के गुप्त और प्रकट सभी प्रकार के व्यापार देखते हुए भी अपनी निन्दा और स्तुति आदि के प्रति उदासीनवत् रहेंगे। ये धर्ममार्ग में स्थित रहकर अपने शत्रु के पुत्र को भी, दण्डनीय न होने पर, कोई न दण्ड ने देंगे और दण्डनीय होने पर तो अपने पुत्र को भी दण्ड देंगे। भगवान् सूर्य मानसोत्तर पर्वत तक जितने प्रदेश को अपनी किरणों से प्रकाशित करते हैं, उस सम्पूर्ण क्षेत्र में इनका निष्कण्टक राज्य रहेगा। ये अपने कार्यों से सब लोकों को सुख पहुँचावेंगे- उनका रंजन करेंगे; इससे उन मनोरंजनात्मक व्यापारों के कारण प्रजा इन्हें ‘राजा’ कहेगी। ये बड़े दृशसंकल्प, सत्यप्रतिज्ञ, ब्राह्मण भक्त, वृद्धों की सेवा करने वाले, शरणागतवत्सल, सब प्राणियों को मान देने वाले और दीनों पर दया करने वाले होंगे।

ये परस्त्री में माता के समान भक्ति रखेंगे, पत्नी को अपने आधे अंग के समान मानेंगे, प्रजा पर पिता के समान प्रेम रखेंगे और और ब्रह्मवादियों के सेवक होंगे। दूसरे प्राणी इन्हें उतना ही चाहेंगे, जितना अपने शरीर को। ये सुहृदों के आनन्द को बढ़ायेंगे। ये सर्वदा वैराग्यवान् पुरुषों से विशेष प्रेम करेंगे और दुष्टों को दण्डपाणि यमराज के समान सदा दण्ड देने के लिये उद्यत रहेंगे। ‘तीनों गुणों के अधिष्ठाता और निर्विकार साक्षात् श्रीनारायण ने ही इनके रूप में अपने अंश से अवतार लिया है, जिनमें पण्डित लोग अविद्यावश प्रतीत होने वाले इस नानात्व को मिथ्या ही समझते हैं। ये अद्वितीय वीर और एकच्छत्र सम्राट् होकर अकेले ही उदयाचलपर्यन्त समस्त भूमण्डल की रक्षा करेंगे तथा अपने जयशील रथ पर चढ़कर धनुष हाथ में लिये सूर्य के समान सर्वत्र प्रदक्षिणा करेंगे। उस समय जहाँ-तहाँ सभी लोकपाल और पृथ्वीपाल इन्हें भेंटे समर्पण करेंगे, उनकी स्त्रियाँ इनका गुणगान करेंगी और इन आदिराज को साक्षात् श्रीहरि ही समझेंगी। ये प्रजापालक राजाधिराज होकर प्रजा के जीवन-निर्वाह के लिये गोरूपधारिणी पृथ्वी का दोहन करेंगे और इन्द्र के समान अपने धनुष के कोनों से बातों-की-बात में पर्वतों को तोड़-फोड़कर पृथ्वी को समतल कर देंगे। रणभूमि में कोई भी इनका वेग नहीं सह सकेगा। जिस समय वे जंगल में पूँछ उठाकर विचरते हुए सिंह के समान अपने ‘आजगव’ धनुष का टंकार करते हुए भूमण्डल में विचरेंगे, उस समय सभी दुष्टजन इधर-उधर छिप जायेंगे। ये सरस्वती के उद्गम स्थान पर सौ अश्वमेध यज्ञ करेंगे। तब अन्तिम यज्ञानुष्ठान के समय इन्द्र इनके घोड़े को हरकर ले जायेंगे। अपने महल के बगीचे में इनकी एक बार भगवान् सनत्कुमार से भेंट होगी। अकेले उनकी भक्तिपूर्वक सेवा करके ये उस निर्मल ज्ञान को प्राप्त करेंगे, जिससे परब्रह्म की प्राप्ति होती है। इस प्रकार जब इनके पराक्रम जनता के सामने आ जायेंगे, अब ये परमपराक्रमी महाराज जहाँ-तहाँ अपने चरित्र की ही चर्चा सुनेंगे। इनकी आज्ञा का विरोध कोई भी न कर सकेगा तथा ये सारी दिशाओं को जीतकर और अपने तेज से प्रजा के क्लेशरूप काँटे को निकालकर सम्पूर्ण भूमण्डल के शासक होंगे। उस समय देवता और असुर भी इनके विपुल प्रभाव का वर्णन करेंगे’।

Chapter Sixteen: Praise of King Prthu by the Professional Reciters

1. The great sage Maitreya continued: While King Prthu thus spoke, the humility of his nectarean
speeches pleased the reciters very much. Then again they continued to praise the King highly with exalted prayers, as they had been instructed by the great sages.

2. The reciters continued: Dear King, you are a direct incarnation of the Supreme Personality of
Godhead, Lord Visnu, and by His causeless mercy you have descended on this earth. Therefore it is not possible for us to actually glorify your exalted activities. Although you have appeared through the body of King Vena, even great orators and speakers like Lord Brahma and other demigods cannot exactly describe the glorious activities of Your Lordship.

3. Although we are unable to glorify you adequately, we nonetheless have a transcendental taste for glorifying your activities. We shall try to glorify you according to the instructions received from authoritative sages and scholars. Whatever we speak, however, is always inadequate and very insignificant. Dear King, because you are a direct incarnation of the Supreme Personality of Godhead, all your activities are liberal and ever laudable.

4. This King, Maharaja Prthu, is the best amongst those who are following religious principles. As such, he will engage everyone in the pursuit of religious principles and give those principles all protection. He will also be a great chastiser to the irreligious and atheistic.

5. This King alone, in his own body, will be able in due course of time to maintain all living entities and keep them in a pleasant condition by manifesting himself as different demigods to perform various departmental activities. Thus he will maintain the upper planetary system by inducing the populace to perform Vedic sacrifices. In due course of time he will also maintain this earthly planet by discharging
proper rainfall.

6. This King Prthu will be as powerful as the sun-god, and just as the sun-god equally distributes his sunshine to everyone, King Prthu will distribute his mercy equally. Similarly, just as the sun-god evaporates water for eight months and, during the rainy season, returns it profusely, this King will also exact taxes from the citizens and return these monies in times of need.

7. This King Prthu will be very, very kind to all citizens. Even though a poor person may trample over the King’s head by violating the rules and regulations, the King, out of his causeless mercy, will be forgetful and forgiving. As a protector of the world, he will be as tolerant as the earth itself.

8. When there is no rainfall and the citizens are in great danger due to the scarcity of water, this royal Personality of Godhead will be able to supply rains exactly like the heavenly King Indra. Thus he will very easily be able to protect the citizens from drought.

9. This King, Prthu Maharaja, by virtue of his affectionate glances and beautiful moonlike face, which is always smiling with great affection for the citizens, will enhance everyone’s peaceful life.

10. The reciters continued: No one will be able to understand the policies the King will follow. His
activities will also be very confidential, and it will not be possible for anyone to know how he will make every activity successful. His treasury will always remain unknown to everyone. He will be the reservoir of unlimited glories and good qualities, and his position will be maintained and covered just as Varuna, the deity of the seas, is covered all around by water.

11. King Prthu was born of the dead body of King Vena as fire is produced from arani wood. Thus King Prthu will always remain just like fire, and his enemies will not be able to approach him. Indeed, he will be unbearable to his enemies, for although staying very near him, they will never be able to approach him but will have to remain as if far away. No one will be able to overcome the strength of King Prthu.

12. King Prthu will be able to see all the internal and external activities of every one of his citizens. Still no one will be able to know his system of espionage, and he himself will remain neutral regarding all matters of glorification or vilification paid to him. He will be exactly like air, the life force within the body, which is exhibited internally and externally but is always neutral to all affairs.

13. Since this King will always remain on the path of piety, he will be neutral to both his son and the son of his enemy. If the son of his enemy is not punishable, he will not punish him, but if his own son is punishable, he will immediately punish him.

14. Just as the sun-god expands his shining rays up to the Arctic region without impedance, the
influence of King Prthu will cover all tracts of land up to the Arctic region and will remain undisturbed as long as he lives.

15. This King will please everyone by his practical activities, and all of his citizens will remain very
satisfied. Because of this the citizens will take great satisfaction in accepting him as their ruling king.

16. The King will be firmly determined and always situated in truth. He will be a lover of the brahminical culture and will render all service to old men and give shelter to all surrendered souls. Giving respect to all, he will always be merciful to the poor and innocent.

17. The King will respect all women as if they were his own mother, and he will treat his own wife as the other half of his body. He will be just like an affectionate father to his citizens, and he will treat himself as the most obedient servant of the devotees, who always preach the glories of the Lord.

18. The King will consider all embodied living entities as dear as his own self, and he will always be increasing the pleasures of his friends. He will intimately associate with liberated persons, and he will be a chastising hand to all impious persons.

19. This King is the master of the three worlds, and he is directly empowered by the Supreme
Personality of Godhead. He is without change, and he is an incarnation of the Supreme known as a saktyavesa-avatara. Being a liberated soul and completely learned, he sees all material varieties as meaningless because their basic principle is nescience.

20. This King, being uniquely powerful and heroic, will have no competitor. He will travel around the globe on his victorious chariot, holding his invincible bow in his hand and appearing exactly like the sun, which rotates in its own orbit from the south.

21. When the King travels all over the world, other kings, as well as the demigods, will offer him all kinds of presentations. Their queens will also consider him the original king, who carries in His hands the emblems of club and disc, and will sing of his fame, for he will be as reputable as the Supreme Personality of Godhead.

22. This King, this protector of the citizens, is an extraordinary king and is equal to the Prajapati
demigods. For the living facility of all citizens, he will milk the earth, which is like a cow. Not only that, but he will level the surface of the earth with the pointed ends of his bow, breaking all the hills exactly as King Indra, the heavenly King, breaks mountains with his powerful thunderbolt.

23. When the lion travels in the forest with its tail turned upward, all menial animals hide themselves. Similarly, when King Prthu will travel over his kingdom and vibrate the string of his bow, which is made of the horns of goats and bulls and is irresistible in battle, all demoniac rogues and thieves will hide themselves in all directions.

24. At the source of the River Sarasvati, this King will perform one hundred sacrifices known as
asvamedha. In the course of the last sacrifice, the heavenly King Indra will steal the sacrificial horse.

25. This King Prthu will meet Sanat-kumara, one of the four Kumaras, in the garden of his palace
compound. The King will worship him with devotion and will be fortunate to receive instructions by which one can enjoy transcendental bliss.

26. In this way when the chivalrous activities of King Prthu come to be known to the people in general, King Prthu will always hear about himself and his uniquely powerful activities.

27. No one will be able to disobey the orders of Prthu Maharaja. After conquering the world, he will completely eradicate the threefold miseries of the citizens. Then he will be recognized all over the world.  At that time both the suras and the asuras will undoubtedly glorify his magnanimous activities.

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – पंद्रहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Fifteenth

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – पंद्रहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Fifteenth

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: पंचदश अध्यायः

श्लोक 1-26

महाराज पृथु का आविर्भाव और राज्याभिषेक

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इसके बाद ब्राह्मणों ने पुत्रहीन राजा वेन की भुजाओं का मन्थन किया, तब उनसे एक स्त्री-पुरुष का जोड़ा प्रकट हुआ। ब्रह्मवादी ऋषि उस जोड़े को उत्पन्न हुआ देख और उसे भगवान् का अंश जान बहुत प्रसन्न हुए और बोले।

ऋषियों ने कहा- यह पुरुष भगवान् विष्णु की विश्वपालिनी कला से प्रकट हुआ है और वह स्त्री उन परमपुरुष की अनपायिनी (कभी अलग न होने वाली) शक्ति लक्ष्मी जी का अवतार है। इनमें से जो पुरुष है, वह अपने सुयश का प्रथन-विस्तार करने के कारण परमयशस्वी ‘पृथु’ नामक सम्राट् होगा। राजाओं में यही सबसे पहला होगा। यह सुन्दर दाँतों वाली एवं गुण और आभूषणों को भी विभूषित करने वाली सुन्दरी इन पृथु को ही अपना पति बनायेगी। इसका नाम अर्चि होगा। पृथु के रूप में साक्षात् श्रीहरि के अंश ने ही संसार की रक्षा के लिये अवतार लिया है और अर्चि के रूप में, निरन्तर भगवान् की सेवा में रहने वाली उनकी नित्य सहचरी श्रीलक्ष्मी जी ही प्रकट हुई हैं।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! उस समय ब्राह्मण लोग पृथु की स्तुति करने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्वों ने गुणगान किया, सिद्धों ने पुष्पों की वर्षा की, अप्सराएँ नाचने लगीं। आकाश में शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभि आदि बाजे बजने लगे। समस्त देवता, ऋषि और पितर अपने-अपने लोकों से वहाँ आये। जगद्गुरु ब्रह्मा जी देवता और देवेश्वरों के साथ पधारे। उन्होंने वेनकुमार पृथु के दाहिने हाथ में भगवान् विष्णु की हस्तरेखाएँ और चरणों में कमल का चिह्न देखकर उन्हें श्रीहरि का ही अंश समझा; क्योंकि जिसके हाथ में दूसरी रेखाओं से बिना कटा हुआ चक्र का चिह्न होता है, वह भगवान् का ही अंश होता है।

वेदवादी ब्राह्मणों ने महाराज पृथु के अभिषेक का आयोजन किया। सब लोग उसकी सामग्री जुटाने में लग गये। उस समय नदी, समुद्र, पर्वत, सर्प, गौ, पक्षी, मृग, स्वर्ग, पृथ्वी तथा अन्य सब प्राणियों ने भी उन्हें तरह-तरह के उपहार भेंट किये। सुन्दर वस्त्र और आभूषणों से अलंकृत महाराज पृथु का विधिवत् राज्याभिषेक हुआ। उस समय अनेकों अलंकारों से सजी हुई महारानी अर्चि के साथ वे दूसरे अग्निदेव के सदृश जान पड़ते थे।

वीर विदुर जी! उन्हें कुबेर ने बड़ा ही सुन्दर सोने का सिंहासन दिया तथा वरुण ने चन्द्रमा के समान श्वेत और प्रकाशमय छत्र दिया, जिससे निरन्तर जल की फुहियाँ झरती रहती थीं।

वायु ने दो चँवर, धर्म ने कीर्तिमयी माला, इन्द्र ने मनोहर मुकुट, यम ने दमन करने वाला दण्ड, ब्रह्मा ने वेदमय कवच, सरस्वती ने सुन्दर हार, विष्णु भगवान् ने सुदर्शन चक्र, विष्णुप्रिया लक्ष्मी जी ने अविचल सम्पत्ति, रुद्र ने दस चन्द्राकर चिह्नों से युक्त कोषवाली तलवार, अम्बिका जी ने सौ चन्द्राकर चिह्नों वाली ढाल, चन्द्रमा ने अमृतमय अश्व, त्वष्टा (विश्वकर्मा) ने सुन्दर रथ, अग्नि ने बकरे और गौ के सींगों का बना हुआ सुदृढ़ धनुष, सूर्य ने तेजोमय बाण, पृथ्वी ने चरणस्पर्श-मात्र से अभीष्ट स्थान पर पहुँचा देने वाली योगमयी पादुकाएँ, आकाश के अभिमानी द्यौ देवता ने नित्य नूतन पुष्पों की माला, आकाशविहारी सिद्ध-गन्धर्वादी ने नाचने-गाने, बजाने और अन्तर्धान हो जाने की शक्तियाँ, ऋषियों ने अमोघ आशीर्वाद, समुद्र ने अपने से उत्पन्न हुआ शंख तथा सातों समुद्र, पर्वत और नदियों ने उनके रथ के लिये बरोक-टोक मार्ग उपहार में दिये। इसके पश्चात् सूत, मागध और वन्दीजन उनकी स्तुति करने के लिये उपस्थित हुए। तब उन स्तुति करने वालों का अभिप्राय समझकर वेनपुत्र परमप्रतापी महाराज पृथु ने हँसते हुए मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा।

पृथु ने कहा- सौम्य सूत, मागध और वन्दीजन! अभी तो लोक में मेरा कोई भी गुण प्रकट नहीं हुआ। फिर तुम किन गुणों को लेकर मेरी स्तुति करोगे? मेरे विषय में तुम्हारी वाणी व्यर्थ नहीं होनी चाहिये। इसलिये मुझसे भिन्न किसी और की स्तुति करो।

मृदुभाषियों! कालान्तर में जब मेरे अप्रकट गुण प्रकट हो जायें, तब भरपेट अपनी मधुर वाणी से मेरी स्तुति कर लेना। देखो, शिष्टपुरुष पवित्रकीर्ति श्रीहरि के गुणानुवाद के रहते हुए तुच्छ मनुष्यों की स्तुति नहीं किया करते। महान् गुणों को धारण करने में समर्थ होने पर भी ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष है, जो उसके न रहने पर भी केवल सम्भावनामात्र से स्तुति करने वालों द्वारा अपनी स्तुति करायेगा? यदि यह विद्याभ्यास करता तो इसमें अमुक-अमुक गुण हो जाते-इस प्रकार की स्तुति से तो मनुष्य की वंचना की जाती है। वह मन्दमति यह नहीं समझता कि इस प्रकार तो लोग उसका उपहास ही कर रहे हैं। जिस प्रकार लज्जाशील उदारपुरुष अपने किसी निन्दित पराक्रम की चर्चा होनी बुरी समझते हैं; उसी प्रकार लोकविख्यात समर्थ पुरुष अपनी स्तुति को भी निन्दित मानते हैं।

सूतगण! अभी हम अपने श्रेष्ठ कर्मों के द्वारा लोक में अप्रसिद्ध ही हैं; हमने अब तक कोई भी ऐसा काम नहीं किया है, जिसकी प्रशंसा की जा सके। तब तुम लोगों से बच्चों के समान अपनी कीर्ति का किस प्रकार गान करावें?

Chapter Fifteen: King Prthu’s Appearance and Coronation

1. The great sage Maitreya continued: My dear Vidura, thus the brahmanas and the great sages again churned the two arms of King Vena’s dead body. As a result a male and female couple came out of his arms.

2. The great sages were highly learned in Vedic knowledge. When they saw the male and female born of the arms of Vena’s body, they were very pleased, for they could understand that the couple was an expansion of a plenary portion of Visnu, the Supreme Personality of Godhead.

3. The great sages said: The male is a plenary expansion of the power of Lord Visnu, who maintains the entire universe, and the female is a plenary expansion of the goddess of fortune, who is never separated from the Lord.

4. Of the two, the male will be able to expand his reputation throughout the world. His name will be Prthu. Indeed, he will be the first among kings.

5. The female has such beautiful teeth and beautiful qualities that she will actually beautify the ornaments she wears. Her name will be Arci. In the future she will accept King Prthu as her husband.

6. In the form of King Prthu, the Supreme Personality of Godhead has appeared through a part of His potency to protect the people of the world. The goddess of fortune is the constant companion of the Lord, and therefore she has incarnated partially as Arci to become King Prthu’s queen.

7. The great sage Maitreya continued: My dear Viduraji, at that time all the brahmanas highly praised and glorified King Prthu, and the best singers of Gandharvaloka chanted his glories. The inhabitants of Siddhaloka showered flowers, and the beautiful women in the heavenly planets danced in ecstasy.

8. Conchshells, bugles, drums and kettledrums vibrated in outer space. Great sages, forefathers and personalities from the heavenly planets all came to earth from various planetary systems.

9-10. Lord Brahma, the master of the entire universe, arrived there accompanied by all the demigods and their chiefs. Seeing the lines of Lord Visnu’s palm on King Prthu’s right hand and impressions of lotus flowers on the soles of his feet, Lord Brahma could understand that King Prthu was a partial representation of the Supreme Personality of Godhead. One whose palm bears the sign of a disc, as well as other such lines, should be considered a partial representation or incarnation of the Supreme
Lord.

11. The learned brahmanas, who were very attached to the Vedic ritualistic ceremonies, then arranged for the King’s coronation. People from all directions collected all the different paraphernalia for the ceremony. Thus everything was complete.

12. All the rivers, seas, hills, mountains, serpents, cows, birds, animals, heavenly planets, the earthly planet and all other living entities collected various presentations, according to their ability, to offer the King.

13. Thus the great King Prthu, exquisitely dressed with garments and ornaments, was coronated and placed on the throne. The King and his wife, Arci, who was also exquisitely ornamented, appeared exactly like fire.

14. The great sage continued: My dear Vidura, Kuvera presented the great King Prthu with a golden throne. The demigod Varuna presented him with an umbrella that constantly sprayed fine particles of water and was as brilliant as the moon.

15. The demigod of air, Vayu, presented King Prthu with two whisks [camaras] of hair; the King of religion, Dharma, presented him with a flower garland which would expand his fame; the King of heaven, Indra, presented him with a valuable helmet; and the superintendent of death, Yamaraja, presented him with a sceptor with which to rule the world.

16. Lord Brahma presented King Prthu with a protective garment made of spiritual knowledge. Bharati [Sarasvati], the wife of Brahma, gave him a transcendental necklace. Lord Vishnu presented him with a Sudarsana disc, and Lord Vishnu’s wife, the goddess of fortune, gave him imperishable opulences.

17. Lord Shiva presented him with a sword within a sheath marked with ten moons, and his wife, the goddess Durga, presented him with a shield marked with one hundred moons. The moon-demigod presented him with horses made of nectar, and the demigod Visvakarma presented him with a very beautiful chariot.

18. The demigod of fire, Agni, presented him with a bow made of the horns of goats and cows. The sun-god presented him with arrows as brilliant as sunshine. The predominating deity of Bhurloka presented him with slippers full of mystic power. The demigods from outer space brought him presentations of flowers again and again.

19. The demigods who always travel in outer space gave King Prthu the arts to perform dramas, sing songs, play musical instruments and disappear at his will. The great sages also offered him infallible blessings. The ocean offered him a conchshell produced from the ocean.

20. The seas, mountains and rivers gave him room to drive his chariot without impediments, and a suta, a magadha and a vandi offered prayers and praises. They all presented themselves before him to perform their respective duties.

21. Thus when the greatly powerful King Prthu, the son of Vena, saw the professionals before him, to congratulate them he smiled, and with the gravity of the vibrating sounds of clouds he spoke as follows.

22. King Prthu said: O gentle suta, magadha and other devotee offering prayers, the qualities of which you have spoken are not distinct in me. Why then should you praise me for all these qualities when I do not shelter these features? I do not wish for these words meant for me to go in vain, but it is better that they be offered to someone else.

23. O gentle reciters, offer such prayers in due course of time, when the qualities of which you have spoken actually manifest themselves in me. The gentle who offer prayers to the Supreme Personality of Godhead do not attribute such qualities to a human being, who does not actually have them.

24. How could an intelligent man competent enough to possess such exalted qualities allow his followers to praise him if he did not actually have them? Praising a man by saying that if he were educated he might have become a great scholar or great personality is nothing but a process of cheating. A foolish person who agrees to accept such praise does not know that such words simply insult him.

25. As a person with a sense of honor and magnanimity does not like to hear about his abominable actions, a person who is very famous and powerful does not like to hear himself praised.

26. King Prthu continued: My dear devotees, headed by the suta, just now I am not very famous for my personal activities because I have not done anything praiseworthy you could glorify. Therefore how could I engage you in praising my activities exactly like children?

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – चौदहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Fourteenth

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – चौदहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Fourteenth

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: चतुर्दश अध्यायः

श्लोक 1- 46

राजा वेन की कथा

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- वीरवर विदुर जी! सभी लोकों की कुशल चाहने वाले भृगु आदि मुनियों ने देखा कि अंग के चले जाने से अब पृथ्वी की रक्षा करने वाला कोई नहीं रह गया है, सब लोग पशुओं के समान उच्छ्रंखल होते जा रहे हैं। तब उन्होंने माता सुनीथा की सम्मति से, मन्त्रियों के सहमत न होने पर भी वेन को भूमण्डल के राजपद पर अभिषिक्त कर दिया। वेन बड़ा कठोर शासक था। जब चोर-डाकुओं ने सुना कि वही राजसिंहासन पर बैठा है, तब सर्प से डरे हुए चूहों के समान वे सब तुरंत ही जहाँ-तहाँ छिप गये।

राज्यासन पाने पर वेन आठों लोकपालों की ऐश्वर्यकला के कारण उन्मत्त हो गया और अभिमानवश अपने को ही सबसे बड़ा मानकर महापुरुषों का अपमान करने लगा। वह ऐश्वर्यमद से अंधा हो रथ पर चढ़कर निरंकुश गजराज के समान पृथ्वी और आकाश को कँपाता हुआ सर्वत्र विचरने लगा। ‘कोई भी द्विजातिय वर्ण का पुरुष कभी प्रकार का यज्ञ, दान और हवन न करे’ अपने राज्य में यह ढिंढोरा पिटवाकर उसने सारे धर्म-कर्म बंद करवा दिये। दुष्ट वेन का ऐसा अत्याचार देख सारे ऋषि-मुनि एकत्र हुए और संसार पर संकट आया समझकर करुणावश आपस में कहने लगे- ‘अहो! जैसे दोनों ओर जलती हुई लकड़ी के बीच में रहने वाले चीटी आदि जीव महान् संकट में पड़ जाते हैं, वैसे ही इस समय सारी प्रजा एक ओर राजा के और दूसरी ओर चोर-डाकुओं के अत्याचार से महान् संकट में पड़ रही है। हमने अराजकता के भय से ही अयोग्य होने पर भी वेन को राजा बनाया था; किन्तु अब उससे भी प्रजा को भय हो गया। ऐसी अवस्था में प्रजा को किस प्रकार सुख-शान्ति मिल सकती है? सुनीथा की कोख से उत्पन्न हुआ यह वेन स्वभाव से ही दुष्ट है। परन्तु साँप को दूध पिलाने के समान इसको पालना, पालने वालों के लिये अनर्थ का कारण हो गया। हमने इसे प्रजा की रक्षा करने के लिये नियुक्त किया था, यह आज उसी को नष्ट करने पर तुला हुआ है। इतना सब होने पर भी हमें इसे समझाना अवश्य चाहिये; ऐसा करने से इसके किये हुए पाप हमें स्पर्श नहीं करेंगे। हमने जान-बूझकर दुराचारी वेन को राजा बनाया था। किन्तु यदि समझाने पर भी यह हमारी बात नहीं मानेगा, तो लोक के धिक्कार से दग्ध हुए इस दुष्ट को हम अपने तेज से भस्म कर देंगे।’ ऐसा विचार करके मुनि लोग वेन के पास गये और अपने क्रोध को छिपाकर उसे प्रिय वचनों से समझाते हुए इस प्रकार कहने लगे।

मुनियों ने कहा- राजन्! हम आपसे जो बात कहते हैं, उस पर ध्यान दिजिय। इससे आपकी आयु, श्री, बल और कीर्ति की वृद्धि होगी। तात! यदि मनुष्य मन, वाणी, शरीर और बुद्धि से धर्म का आचरण करे, तो उसे स्वर्गादि शोकरहित लोकों की प्राप्ति होती है। यदि उसका निष्कामभाव हो, तब तो वही धर्म उसे अनन्त मोक्षपद पर पहुँचा देता है। इसलिये वीरवर! प्रजा का कल्याणरूप वह धर्म आपके कारण नष्ट नहीं होना चाहिये। धर्म के नष्ट होने से राजा भी ऐश्वर्य से च्युत हो जाता है। जो राजा दुष्ट मन्त्री और चोर आदि से अपनी प्रजा की रक्षा करते हुए न्यायाकूल रहता है, वह इस लोक में और परलोक में दोनों जगह सुख पाता है।

जिसके राज्य अथवा नगर में वर्णाश्रम-धर्मों का पालन करने वाले पुरुष स्वधर्मपालन के द्वारा भगवान् यज्ञपुरुष की आरधना करते हैं, महाभाग! अपनी आज्ञा का पालन करने वाले उस राजा से भगवान् प्रसन्न रहते हैं; क्योंकि वे ही सारे विश्व की आत्मा तथा सम्पूर्ण भूतों के रक्षक हैं। भगवान् ब्रह्मादि जगदीश्वरों के भी ईश्वर हैं, उनके प्रसन्न होने पर कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रह जाती। तभी तो इन्द्रादि लोकपालों के सहित समस्त लोक उन्हें बड़े आदर से पूजपोहार समर्पण करते हैं।

राजन्! भगवान् श्रीहरि समस्त लोक, लोकपाल और यज्ञों के नियन्ता है; वे वेदत्रयीरूप, द्रव्यरूप और तपःस्वरूप हैं। इसलिये आपके जो देशवासी आपकी उन्नति के लिये अनेक प्रकार के यज्ञों से भगवान् का यजन करते हैं, आपको उनके अनुकूल ही रहना चाहिये। जब आपके राज्य में ब्राह्मण लोग यज्ञों का अनुष्ठान करेंगे, तब उनकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान् के अंशस्वरूप देवता आपको मनचाहा फल देंगे। अतः वीरवर! आपको यज्ञादि धर्मानुष्ठान बंद करके देवताओं का तिरस्कार नहीं करना चाहिये।

वेन ने कहा–- तुम लोग बड़े मूर्ख हो! खेद है, तुमने अधर्म में ही धर्मबुद्धि कर रखी है। तभी तो तुम जीविका देने वाले मुझ साक्षात् पति को छोड़कर किसी दूसरे जारपति की उपासना करते हो। जो लोग मूर्खतावश राजारूप परमेश्वर का अनादर करते हैं, उन्हें न तो इस लोक में सुख मिलता है और न परलोक में ही। अरे! जिसमें तुम लोगों की इतनी भक्ति है, वह यज्ञपुरुष है कौन? यह तो ऐसी ही बात हुई जैसे कुलटा स्त्रियाँ अपने विवाहिता पति से प्रेम न करके किसी परपुरुष में आसक्त हो जायें। विष्णु, ब्रह्मा, महादेव, इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, मेघ, कुबेर, चन्द्रमा, पृथ्वी, अग्नि और वरुण तथा इनके अतिरिक्त जो दूसरे वर और शाप देने में समर्थ देवता हैं, वे सब-के-सब राजा के शरीर में रहते हैं; इसलिये राजा सर्वदेवमय है और देवता उसके अंशमात्र हैं। इसलिये ब्राह्मणों! तुम मत्सरता छोड़कर अपने सभी कर्मों द्वारा एक मेरा ही पूजन करो और और मुझी को बलि समर्पण करो। भला मेरे सिवा और कौन अग्रपूजा का अधिकारी हो सकता है।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- –इस प्रकार विपरीत बुद्धि होने के कारण वह अत्यन्त पापी और कुमार्गगामी हो गया था। उसका पुण्य क्षीण हो चुका था, इसलिये मुनियों के बहुत विनयपूर्वक प्रार्थना करने पर भी उसने उनकी बात पर ध्यान न दिया।

कल्याणरूप विदुर जी! अपने को बड़ा बुद्धिमान् समझने वाले वेन ने जब उन मुनियों का इस प्रकार अपमान किया, तब अपनी माँग को व्यर्थ हुई देख वे उस पर अत्यन्त कुपित हो गये। ‘मार डालो! इस स्वभाव से ही दुष्ट पापी को मार डालो! यह यदि जीता रह गया तो कुछ ही दिनों में संसार को अवश्य भस्म कर डालेगा। यह दुराचारी किसी प्रकार राजसिंहासन के योग्य नहीं है, क्योंकि यह निर्जलज्ज साक्षात् यज्ञपति श्रीविष्णु भगवान् की निन्दा करता है। अहो! जिनकी कृपा से इसे ऐसा ऐश्वर्य मिला, उन श्रीहरि की निन्दा अभागे वेन को छोड़कर और कौन कर सकता है’? इस प्रकार अपने छिपे हुए क्रोध को प्रकट कर उन्होंने उसे मारने का निश्चय कर लिया। वह तो भगवान् की निन्दा करने के कारण पहले ही मर चुका था, इसलिये केवल हुंकारों से ही उन्होंने उसका काम तमाम कर दिया।

जब मुनिगण अपने-अपने आश्रमों को चले गये, तब इधर वेन की शोकाकुल माता सुनीथा मन्त्रादि के बल से तथा अन्य युक्तियों से अपने पुत्र के शव की रक्षा करने लगी।

एक दिन वे मुनिगण सरस्वती के पवित्र जल में स्नान कर अग्निहोत्र से निवृत्त हो नदी के तीर पर बैठे हुए हरिचर्चा कर रहे थे। उन दिनों लोकों में आतंक फैलाने वाले बहुत-से उपद्रव होते देखकर वे आपस में कहने लगे, ‘आजकल पृथ्वी का कोई रक्षक नहीं है; इसलिये चोर-डाकुओं के कारण उसका कुछ अमंगल तो नहीं होने वाला है? ऋषि लोग ऐसा विचार कर ही रहे थे कि उन्होंने सब दिशाओं में धावा करने वाले चोरों और डाकुओं के कारण उठी हुई बड़ी भारी धूल देखी। देखते ही वे समझ गये कि राजा वेन के मर जाने के कारण देश में अराजकता फैल गयी है, राज्य शक्तिहीन हो गया है और चोर-डाकू बढ़ गये हैं; यह सारा उपद्रव लोगों का धन लूटने वाले तथा एक-दूसरे के खून के प्यासे लुटेरों का ही है।

अपने तेज से अथवा तपोबल से लोगों को ऐसी कुप्रवृत्ति से रोकने में समर्थ होने पर भी ऐसा करने में हिंसादि दोष देखकर उन्होंने इसका कोई निवारण नहीं किया। फिर सोचा कि ‘ब्राह्मण यदि समदर्शी और शान्तस्वभाव भी हो तो भी दोनों की उपेक्षा करने से उसका तप उसी प्रकार नष्ट हो जाता है, जैसे फूटे हुए घड़े में से जल बह जाता है। फिर राजर्षि अंग का वंश भी नष्ट नहीं होना चाहिये, क्योंकि इसमें अनेक अमोघ-शक्ति और भगवत्परायण राजा हो चुके हैं’।

ऐसा निश्चय कर उन्होंने मृत राजा की जाँघ को बड़े जोर से मथा तो उसमें से एक बौना पुरुष उत्पन्न हुआ। वह कौए के समान काला था; उसके सभी अंग और खासकर भुजाएँ बहुत छोटी थीं, जबड़े बहुत बड़े, टाँगे छोटी, नाक चपटी, नेत्र लाल और केश ताँबे के-से रंग के थे। उसने बड़ी दीनता और नम्रताभाव से पूछा कि ‘मैं क्या करूँ?’ तो ऋषियों ने कहा- ‘निषीद (बैठ जा)।’ इसी से वह ‘निषाद’ कहलाया। उसने जन्म लेते ही राजा वेन के भयंकर पापों को अपने ऊपर ले लिया, इसीलिये उसके वंशधर नैषाद भी हिंसा, लूट-पाट आदि पापकर्मों में रत रहते हैं; अतः वे गाँव और नगर में न टिककर वन और पर्वतों में ही निवास करते हैं।

Chapter Fourteen: The Story of King Vena

1. The great sage Maitreya continued: O great hero Vidura, the great sages, headed by Bhrgu, were always thinking of the welfare of the people in general. When they saw that in the absence of King Anga there was no one to protect the interests of the people, they understood that without a ruler the people would become independent and nonregulated.

2. The great sages then called for the Queen Mother, Sunitha, and with her permission they installed Vena on the throne as master of the world. All the ministers, however, disagreed with this.

3. It was already known that Vena was very severe and cruel; therefore, as soon as all the thieves and rogues in the state heard of his ascendance to the royal throne, they became very much afraid of him. Indeed, they hid themselves here and there as rats hide themselves from snakes.

4. When the King ascended to the throne, he became all-powerful with eight kinds of opulences.  Consequently he became too proud. By virtue of his false prestige, he considered himself to be greater than anyone. Thus he began to insult great personalities.

5. When he became overly blind due to his opulences, King Vena mounted a chariot and, like an uncontrolled elephant, began to travel through the kingdom, causing the sky and earth to tremble wherever he went.

6. All the twice-born [brahmanas] were forbidden henceforward to perform any sacrifice, and they were also forbidden to give charity or offer clarified butter. Thus King Vena sounded kettledrums throughout the countryside. In other words, he stopped all kinds of religious rituals.

7. Therefore all the great sages assembled together and, after observing cruel Vena’s atrocities, concluded that a great danger and catastrophe was approaching the people of the world. Thus out of compassion they began to talk amongst themselves, for they themselves were the performers of the sacrifices.

8. When the great sages consulted one another, they saw that the people were in a dangerous position from both directions. When a fire blazes on both ends of a log, the ants in the middle are in a very dangerous situation. Similarly, at that time the people in general were in a dangerous position due to an irresponsible king on one side and thieves and rogues on the other.

9. Thinking to save the state from irregularity, the sages began to consider that it was due to a political crisis that they made Vena king although he was not qualified. But alas, now the people were being disturbed by the king himself. Under such circumstances, how could the people be happy?

10. The sages began to think within themselves: Because he was born from the womb of Sunitha, King Vena is by nature very mischievous. Supporting this mischievous king is exactly like maintaining a snake with milk. Now he has become a source of all difficulties.

11. We appointed this Vena king of the state in order to give protection to the citizens, but now he has become the enemy of the citizens. Despite all these discrepancies, we should at once try to pacify him. By doing so, we may not be touched by the sinful results caused by him.

12. The saintly sages continued thinking: Of course we are completely aware of his mischievous nature.Yet nevertheless we enthroned Vena. If we cannot persuade King Vena to accept our advice, he will be
condemned by the public, and we will join them. Thus by our prowess we shall burn him to ashes.

13. The great sages, having thus decided, approached King Vena. Concealing their real anger, they pacified him with sweet words and then spoke as follows.

14. The great sages said: Dear King, we have come to give you good advice. Kindly hear us with great attention. By doing so, your duration of life and your opulence, strength and reputation will increase.

15. Those who live according to religious principles and who follow them by words, mind, body and intelligence are elevated to the heavenly kingdom, which is devoid of all miseries. Being thus rid of the material influence, they achieve unlimited happiness in life.

16. The sages continued: O great hero, for this reason you should not be the cause of spoiling the spiritual life of the general populace. If their spiritual life is spoiled because of your activities, you will certainly fall down from your opulent and royal position.

17. The saintly persons continued: When the king protects the citizens from the disturbances of
mischievous ministers as well as from thieves and rogues, he can, by virtue of such pious activities, accept taxes given by his subjects. Thus a pious king can certainly enjoy himself in this world as well as in the life after death.

18. The king is supposed to be pious in whose state and cities the general populace strictly observes the system of eight social orders of varna and asrama, and where all citizens engage in worshiping the Supreme Personality of Godhead by their particular occupations.

19. O noble one, if the king sees that the Supreme Personality of Godhead, the original cause of the cosmic manifestation and the Supersoul within everyone, is worshiped, the Lord will be satisfied.

20. The Supreme Personality of Godhead is worshiped by the great demigods, controllers of universal affairs. When He is satisfied, nothing is impossible to achieve. For this reason all the demigods, presiding deities of different planets, as well as the inhabitants of their planets, take great pleasure in offering all kinds of paraphernalia for His worship.

21. Dear King, the Supreme Personality of Godhead, along with the predominating deities, is the enjoyer of the results of all sacrifices in all planets. The Supreme Lord is the sum total of the three Vedas, the owner of everything, and the ultimate goal of all austerity. Therefore your countrymen should engage in performing various sacrifices for your elevation. Indeed, you should always direct them towards the offering of sacrifices.

22. When all the brahmanas engage in performing sacrifices in your kingdom, all the demigods, who are plenary expansions of the Lord, will be very much satisfied by their activities and will give you your desired result. Therefore, O hero, do not stop the sacrificial performances. If you stop them, you will
disrespect the demigods.

23. King Vena replied: You are not at all experienced. It is very much regrettable that you are maintaining something which is not religious and are accepting it as religious. Indeed, I think you are giving up your real husband, who maintains you, and are searching after some paramour to worship.

24. Those who, out of gross ignorance, do not worship the king, who is actually the Supreme
Personality of Godhead, experience happiness neither in this world nor in the world after death.

25. You are so much devoted to the demigods, but who are they? Indeed, your affection for these demigods is exactly like the affection of an unchaste woman who neglects her married life and gives all attention to her paramour.

26-27. Lord Vishnu; Lord Brahma; Lord Shiva; Lord Indra; Vayu, the master of air; Yama, the
superintendent of death; the sun-god; the director of rainfall; Kuvera, the treasurer; the moon-god; the predominating deity of the earth; Agni, the fire-god; Varuna, the lord of waters, and all others who are great and competent to bestow benedictions or to curse, all abide in the body of the king. For this reason the king is known as the reservoir of all demigods, who are simply parts and parcels of the king’s
body.

28. King Vena continued: For this reason, O brahmanas, you should abandon your envy of me, and, by your ritualistic activities, you should worship me and offer me all paraphernalia. If you are intelligent, you should know that there is no personality superior to me, who can accept the first oblations of all sacrifices.

29. The great sage Maitreya continued: Thus the King, who became unintelligent due to his sinful life and deviation from the right path, became actually bereft of all good fortune. He could not accept the requests of the great sages, which the sages put before him with great respect, and therefore he was condemned.

30. My dear Vidura, all good fortune unto you. The foolish King, who thought himself very learned, thus insulted the great sages, and the sages, being brokenhearted by the King’s words, became very angry at him.

31. All the great saintly sages immediately cried: Kill him! Kill him! He is the most dreadful, sinful person. If he lives, he will certainly turn the whole world into ashes in no time.

32. The saintly sages continued: This impious, impudent man does not deserve to sit on the throne at all. He is so shameless that he even dared insult the Supreme Personality of Godhead, Lord Visnu.

33. But for King Vena, who is simply inauspicious, who would blaspheme the Supreme Personality of Godhead, by whose mercy one is awarded all kinds of fortune and opulence?

34. The great sages, thus manifesting their covert anger, immediately decided to kill the King. King Vena was already as good as dead due to his blasphemy against the Supreme Personality of Godhead. Thus without using any weapons, the sages killed King Vena simply by high-sounding words.

35. After all the sages returned to their respective hermitages, the mother of King Vena, Sunitha, became very much aggrieved because of her son’s death. She decided to preserve the dead body of her son by the application of certain ingredients and by chanting mantras [mantra-yogena].

36. Once upon a time, the same saintly persons, after taking their bath in the River Sarasvati, began to perform their daily duties by offering oblations into the sacrificial fires. After this, sitting on the bank of the river, they began to talk about the transcendental person and His pastimes.

37. In those days there were various disturbances in the country that were creating a panic in society. Therefore all the sages began to talk amongst themselves: Since the King is dead and there is no protector in the world, misfortune may befall the people in general on account of rogues and thieves.

38. When the great sages were carrying on their discussion in this way, they saw a dust storm arising from all directions. This storm was caused by the running of thieves and rogues, who were engaged in plundering the citizens.

39-40. Upon seeing the dust storm, the saintly persons could understand that there were a great deal of irregularities due to the death of King Vena. Without government, the state was devoid of law and order, and consequently there was a great uprising of murderous thieves and rogues, who were plundering the riches of the people in general. Although the great sages could subdue the disturbance by their powers–just as they could kill the King–they considered it improper on their part to do so. Thus they did not attempt to stop the disturbance.

41. The great sages began to think that although a brahmana is peaceful and impartial because he is equal to everyone, it is still not his duty to neglect poor humans. By such neglect, a brahmana’s spiritual power diminishes, just as water kept in a cracked pot leaks out.

42. The sages decided that the descendants of the family of the saintly King Anga should not be
stopped, for in this family the semen was very powerful and the children were prone to become
devotees of the Lord.

43. After making a decision, the saintly persons and sages churned the thighs of the dead body of King Vena with great force and according to a specific method. As a result of this churning, a dwarf-like person was born from King Vena’s body.

44. This person born from King Vena’s thighs was named Bahuka, and his complexion was as black as a crow’s. All the limbs of his body were very short, his arms and legs were short, and his jaws were large. His nose was flat, his eyes were reddish, and his hair copper-colored.

45. He was very submissive and meek, and immediately after his birth he bowed down and inquired, “Sirs, what shall I do?” The great sages replied, “Please sit down [nisida].” Thus Nisada, the father of the Naisada race, was born.

46. After his [Nisada’s] birth, he immediately took charge of all the resultant actions of King Vena’s sinful activities. As such, this Naisada class are always engaged in sinful activities like stealing, plundering and hunting. Consequently they are only allowed to live in the hills and forests.

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – तेरहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Thirteen

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – तेरहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Thirteen

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: त्रयोदश अध्यायः

श्लोक 1-49

ध्रुववंश का वर्णन, राजा अंग का चरित्र

श्रीसूत जी कहते हैं- शौनक जी! श्रीमैत्रेय मुनि के मुख से ध्रुव जी के विष्णुपद पर आरूढ़ होने का वृत्तान्त सुनकर विदुर जी के हृदय में भगवान् विष्णु की भक्ति का उद्रेक हो आया और उन्होंने फिर मैत्रेय जी से प्रश्न करना आरम्भ किया।

विदुर जी ने पूछा- भगवत्परायण मुने! ये प्रचेता कौन थे? किसके पुत्र थे? किसके वंश में प्रसिद्ध थे और इन्होंने कहाँ यज्ञ किया था? भगवान् के दर्शन से कृतार्थ नारद जी परम भागवत हैं- ऐसा मैं मानता हूँ। उन्होंने पांचरात्र का निर्माण करके श्रीहरि की पूजा पद्धतिरूप क्रियायोग का उपदेश किया है। जिस समय प्रचेतागण स्वधर्म का आचरण करते हुए भगवान् यज्ञेश्वर की आराधना कर रहे थे, उसी समय भक्तप्रवर नारद जी ने ध्रुव का गुणगान किया था। ब्रह्मन्! उस स्थान पर उन्होंने भगवान् की जिन-जिन लीला-कथाओं का वर्णन किया था, वे सब पूर्णरूप से मुझे सुनाइये; मुझे उनके सुनने की बड़ी इच्छा है।

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! महाराज ध्रुव के वन चले जाने पर उनके पुत्र उत्कल ने अपने पिता के सार्वभौम वैभव और राज्यसिंहासन को अस्वीकार कर दिया। वह जन्म से ही शान्तचित्त, आसक्तिशून्य और समदर्शी था; तथा सम्पूर्ण लोकों को अपनी आत्मा में और अपनी आत्मा को सपूर्ण लोकों में स्थित देखता था। उसके अन्तःकरण का वासनारूप मल अखण्ड योगाग्नि से भस्म हो गया था। इसलिये वह अपनी आत्मा को विशुद्ध बोधरस के साथ अभिन्न, आनन्दमय और सर्वत्र व्याप्त देखता था। सब प्रकार के भेद से रहित प्रशान्त ब्रह्म को ही वह अपना स्वरूप समझता था; तथा अपनी आत्मा से भिन्न कुछ भी नहीं देखता था। वह अज्ञानियों को रास्ते आदि साधारण स्थानों में बिना लपट की आग के समान मूर्ख, अंधा, बहिरा, पागल अथवा गूँगा-सा प्रतीत होता था- वास्तव में ऐसा था नहीं। इसलिये कुल के बड़े-बूढ़े तथा मन्त्रियों ने उसे मूर्ख और पागल समझकर उसके छोटे भाई भ्रमिपुत्र वत्सर को राजा बनाया।

वत्सर की प्रेयसी भार्या स्वर्वीथि के गर्भ से पुष्पार्ण, तिग्मकेतु, इष, ऊर्ज, वसु और जय नाम के छः पुत्र हुए। पुष्पार्ण के प्रभा और दोषा नाम की दो स्त्रियाँ थीं; उनमें से प्रभा के प्रातः, मध्यन्दिन और सायं- ये तीन पुत्र हुए। दोषा के प्रदोष, निशीथ और वयुष्ट- ये तीन पुत्र हुए। वयुष्ट ने अपनी भार्या पुष्करिणी से सर्वतेजा नाम का पुत्र उत्पन्न किया। उसकी पत्नी आकूति से चक्षुः नामक पुत्र हुआ। चाक्षुष मन्वन्तर में वही मनु हुआ। चक्षु मनु की स्त्री नड्वला से पुरु, कुत्स, त्रित, द्युम्न, सत्यवान्, ऋत, व्रत, अग्निष्टोम, अतिरात्र, प्रद्युम्न, शिबि और उल्मुक- ये बारह सत्त्वगुणी बालक उत्पन्न हुए। इसमें उल्मुक ने अपनी पत्नी पुष्करिणी से अंग, सुमना, ख्याति, क्रतु, अंगिरा और गय- ये छः उत्तम पुत्र उत्पन्न किये। अंग की पत्नी सुनीथा ने क्रूरकर्मा वेन को जन्म दिया, जिसकी दुष्टता से उद्विग्न होकर राजर्षि अंग नगर छोड़कर चले गये थे।

प्यारे विदुर जी! मुनियों के वाक्य वज्र के समान अमोघ होते हैं; उन्होंने कुपित होकर वेन को शाप दिया और जब वह मर गया, तब कोई राजा न रहने के कारण लोक में लुटेरों के द्वारा प्रजा को बहुत कष्ट होने लगा। यह देखकर उन्होंने वेन की दाहिन भुजा का मन्थन किया, जिससे भगवान् विष्णु के अंशावतार आदि सम्राट् महाराज पृथु प्रकट हुए।

विदुर जी ने पूछा- ब्रह्मन्! महाराज अंग तो बड़े शीलसम्पन्न, साधुस्वभाव, ब्राह्मण-भक्त और महात्मा थे। उनके वेन जैसा दुष्ट पुत्र कैसे हुआ, जिसके कारण दुःखी होकर उन्हें नगर छोड़ना पड़ा। राजदण्डधारी वेन का भी ऐसा क्या अपराध था, जो धर्मज्ञ मुनीश्वरों ने उसके प्रति शापरूप ब्रह्मदण्ड का प्रयोग किया। प्रजा का कर्तव्य है कि वह प्रजापालक राजा से कोई पाप बन जाये तो भी उसका तिरस्कार न करे; क्योंकि वह अपने प्रभाव से आठ लोकपालों के तेज को धारण करता है। ब्रह्मन्! आप भूत-भविष्य की बातें जानने वालों में सर्वश्रेष्ठ हैं, इसलिये आप मुझे सुनीथा के पुत्र वेन की सब करतूतें सुनाइये। मैं आपका श्रद्धालु भक्त हूँ।

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- विदुर जी! एक बार राजर्षि अंग ने अश्वमेध महायज्ञ का अनुष्ठान किया। उसमें वेदवादी ब्राह्मणों के आवाहन करने पर भी देवता लोग अपना भाग लेने नहीं आये। तब ऋत्विजों ने विस्मित होकर यजमान अंग से कहा- ‘राजन्! हम आहुतियों के रूप में आपका जो घृत आदि पदार्थ हवन कर रहे हैं, उसे देवता लोग स्वीकार नहीं करते। हम जानते हैं आपकी होम-सामग्री दूषित नहीं है; आपने उसे बड़ी श्रद्धा से जुटाया है तथा वेदमन्त्र भी किसी प्रकार बलहीन नहीं हैं; क्योंकि उनका प्रयोग करने वाले ऋत्विज् गण याजकोचित सभी नियमों का पूर्णतया पालन करते हैं। हमें ऐसी कोई बात नहीं दीखती कि इस यज्ञ में देवताओं का किंचित् भी तिरस्कार हुआ है- फिर भी कर्माध्यक्ष देवता लोग क्यों अपना भाग नहीं ले रहे हैं?

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- ऋत्विजों की बात सुनकर यजमान अंग बहुत उदास हुए। तब उन्होंने याजकों की अनुमति से मौन तोड़कर सदस्यों से पूछा। ‘सदस्यों! देवता लोग आवाहन करने पर भी यज्ञ में नहीं आ रहे हैं और न सोमपात्र ही ग्रहण करते हैं; आप बतलाइये मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है?

सदस्यों ने कहा- राजन्! इस जन्म में तो आपसे तनिक भी अपराध नहीं हुआ; हाँ पूर्वजन्म का एक अपराध अवश्य है, जिसके कारण आप ऐसे सर्वगुण-सम्पन्न होने पर भी पुत्रहीन हैं। आपका कल्याण हो! इसलिये पहले आप सुपुत्र प्राप्त करने का कोई उपाय कीजिये। यदि आप पुत्र की कामना से यज्ञ करेंगे, तो भगवान् यज्ञेश्वर आपको अवश्य पुत्र प्रदान करेंगे। जब सन्तान के लिये साक्षात् यज्ञपुरुष श्रीहरि का आवाहन किया जायेगा, तब देवता लोग स्वयं ही अपना-अपना यज्ञ-भाग ग्रहण करेंगे। भक्त जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है, श्रीहरि उसे वही-वही पदार्थ देते है। उनकी जिस प्रकार आराधना की जाती है उसी प्रकार उपासक को फल भी मिलता है।

इस प्रकार राजा अंग को पुत्र प्राप्ति कराने का निश्चय कर ऋत्विजों ने पशु में यज्ञरूप से रहने वाले श्रीविष्णु भगवान् के पूजन के लिये पुरोडश नामक चरु समर्पण किया। अग्नि में आहुति डालते ही अग्निकुण्ड से सोने के हार और शुभ्र वस्त्रों से विभूषित एक पुरुष प्रकट हुए; वे एक स्वर्णपात्र में सिद्ध खीर लिये हुए थे। उदार बुद्धि राजा अंग ने याजकों की अनुमति से अपनी अंजलि में वह खीर ले ली और उसे स्वयं सूँघकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी पत्नी को दे दिया। पुत्रहीना रानी ने वह पुत्रप्रदायिनी खीर खाकर अपने पति के सहवास से गर्भ धारण किया। उससे यथा समय उसके एक पुत्र हुआ।

वह बालक बाल्यावस्था से ही अधर्म के वंश में उत्पन्न हुए अपने नाना मृत्यु का अनुगामी था (सुनीथा मृत्यु की ही पुत्री थी); इसलिये वह भी अधार्मिक ही हुआ। वह दुष्ट वेन धनुष-बाण चढ़ाकर वन में जाता और व्याध के समान बेचारे भोले-भाले हरिणों की हत्या करता। उसे देखते ही पुरवासी लोग ‘वेन आया! वेन आया!’ कहकर पुकार उठते। वह ऐसा क्रूर और निर्दयी था कि मैदान में खेलते हुए अपनी बराबरी के बालकों को पशुओं की भाँति बलात् मार डालता। वेन की ऐसी दुष्ट प्रकृति देखकर महाराज अंग ने उसे तरह-तरह से सुधारने की चेष्टा की; परन्तु वे उसे सुमार्ग पर लाने में समर्थ न हुए। इससे उन्हें बड़ा ही दुःख हुआ। (वे मन-ही-मन कहने लगे-) ‘जिन गृहस्थों के पुत्र नहीं हैं, उन्होंने अवश्य ही पूर्वजन्म में श्रीहरि की आराधना की होगी; इसी से उन्हें कुपूत की करतूतों से होने वाले असह्य क्लेश नहीं सहने पड़ते। जिसकी करनी से माता-पिता का सारा सुयश मिट्टी में मिल जाये, उन्हें अधर्म का भागी होना पड़े, सबसे विरोध हो जाये, कभी न छूटने वाली चिन्ता मोल लेनी पड़े और घर भी दुःखदायी हो जाये-ऐसी नाममात्र की सन्तान के लिये कौन समझदार पुरुष ललचावेगा? वह तो आत्मा के लिये एक प्रकार का मोहमय बन्धन ही है। मैं तो सपूत की अपेक्षा कुपूत को ही अच्छा समझता हूँ; क्योंकि सपूत को छोड़ने में बड़ा क्लेश होता है। कुपूत घर को नरक बना देता है, इसलिये उससे सहज ही छुटकारा हो जाता है’। इस प्रकार सोचते-सोचते महाराज अंग को रात में नींद नहीं आयी। उनका चित्त गृहस्थी से विरक्त हो गया। वे आधी रात के समय बिछौने से उठे। इस समय वेन की माता नींद में बेसुध पड़ी थी। राजा ने सबका मोह छोड़ दिया और उसी समय किसी को भी मालूम न हो, इस प्रकार चुपचाप उस महान् ऐश्वर्य से भरे राजमहल से निकलकर वन को चल दिये। महाराज विरक्त होकर घर से निकल गये हैं, यह जानकर सभी प्रजाजन, पुरोहित, मन्त्री और सुहृद्गण आदि अत्यन्त शोकाकुल होकर पृथ्वी पर उनकी खोज करने लगे। ठीक वैसे ही, जैसे योग का यथार्थ रहस्य न जानने वाले पुरुष अपने हृदय में छिपे हुए भगवान् को बाहर खोजते हैं। जब उन्हें अपने स्वामी का कहीं पता न लगा, तब वे निराश होकर नगर में लौट आये और वहाँ जो मुनिजन एकत्रित हुए थे, उन्हें यथावत् प्रणाम करके उन्होंने आँखों में आँसू भरकर महाराज के न मिलने का वृत्तान्त सुनाया।

Chapter Thirteen: Description of the Descendants of Dhruva Maharaja

1. Suta Gosvami, continuing to speak to all the rsis, headed by Saunaka, said: After hearing Maitreya Risi describe Dhruva Maharaja’s ascent to Lord Vishnu’s abode, Vidura became very much enlightened in devotional emotion, and he inquired from Maitreya as follows.

2. Vidura inquired from Maitreya: O greatly advanced devotee, who were the Pracetas? To which family did they belong? Whose sons were they, and where did they perform the great sacrifices?

3. Vidura continued: I know that the great sage Narada is the greatest of all devotees. He has compiled the pancaratrika procedure of devotional service and has directly met the Supreme Personality of Godhead.

4. While all the Pracetas were executing religious rituals and sacrificial ceremonies and thus worshiping the Supreme Personality of Godhead for His satisfaction, the great sage Narada described the transcendental qualities of Dhruva Maharaja.

5. My dear brahmana, how did Narada Muni glorify the Supreme Personality of Godhead, and what pastimes were described in that meeting? I am very eager to hear of them. Kindly explain fully about that glorification of the Lord.

6. The great sage Maitreya replied: My dear Vidura, when Maharaja Dhruva departed for the forest, his son, Utkala, did not desire to accept the opulent throne of his father, which was meant for the ruler of all the lands of this planet.

7. From his very birth, Utkala was fully satisfied and unattached to the world. He was equipoised, for he could see everything resting in the Supersoul and the Supersoul present in everyone’s heart.

8-9. By expansion of his knowledge of the Supreme Brahman, he had already attained liberation from the bondage of the body. This liberation is known as nirvana. He was situated in transcendental bliss, and he continued always in that blissful existence, which expanded more and more. This was possible for him by continual practice of bhakti-yoga, which is compared to fire because it burns away all dirty, material things. He was always situated in his constitutional position of self-realization, and he could not
see anything else but the Supreme Lord and himself engaged in discharging devotional service.

10. Utkala appeared to the less intelligent persons on the road to be foolish, blind, dumb, deaf and mad, although actually he was not so. He remained like fire covered with ashes, without blazing flames.

11. For this reason the ministers and all the elderly members of the family thought Utkala to be without intelligence and, in fact, mad. Thus his younger brother, named Vatsara, the son of Bhrami, was elevated to the royal throne, and he became king of the world.

12. King Vatsara had a very dear wife whose name was Svarvithi, and she gave birth to six sons, named Pusparna, Tigmaketu, Isa, Urja, Vasu and Jaya.

13. Pusparna had two wives, named Prabha and Dosa. Prabha had three sons, named Pratar,
Madhyandinam and Sayam.

14. Dosa had three sons–Pradosa, Nisitha and Vyusta. Vyusta’s wife was named Puskarini, and she gave birth to a very powerful son named Sarvateja.

15-16. Sarvateja’s wife, Akuti, gave birth to a son named Caksusa, who became the sixth Manu at the end of the Manu millennium. Nadvala, the wife of Caksusa Manu, gave birth to the following faultless sons: Puru, Kutsa, Trita, Dyumna, Satyavan, Rta, Vrata, Agnistoma, Atiratra, Pradyumna, Sibi and Ulmuka.

17. Of the twelve sons, Ulmuka begot six sons in his wife Puskarini. They were all very good sons, and their names were Anga, Sumana, Khyati, Kratu, Angira and Gaya.

18. The wife of Anga, Sunitha, gave birth to a son named Vena, who was very crooked. The saintly
King Anga was very disappointed with Vena’s bad character, and he left home and kingdom and went out to the forest.

19-20. My dear Vidura, when great sages curse, their words are as invincible as a thunderbolt. Thus when they cursed King Vena out of anger, he died. After his death, since there was no king, all the rogues and thieves flourished, the kingdom became unregulated, and all the citizens suffered greatly. On seeing this, the great sages took the right hand of Vena as a churning rod, and as a result of their churning, Lord Visnu in His partial representation made His advent as King Prthu, the original emperor of the world.

21. Vidura inquired from the sage Maitreya: My dear brahmana, King Anga was very gentle. He had high character and was a saintly personality and lover of brahminical culture. Mow is it that such a great soul got a bad son like Vena, because of whom he became indifferent to his kingdom and left it?

22. Vidura also inquired: How is it that the great sages, who were completely conversant with religious principles, desired to curse King Vena, who himself carried the rod of punishment, and thus awarded him the greatest punishment [brahma-sapa]?

23. It is the duty of all citizens in a state never to insult the king, even though he sometimes appears to have done something very sinful. Because of his prowess, the king is always more influential than all other ruling chiefs.

24. Vidura requested Maitreya: My dear brahmana, you are well conversant with all subjects, both past and future. Therefore I wish to hear from you all the activities of King Vena. I am your faithful devotee, so please explain this.

25. Sri Maitreya replied: My dear Vidura, once the great King Anga arranged to perform the great
sacrifice known as asvamedha. All the expert brahmanas present knew how to invite the demigods, but in spite of their efforts, no demigods participated or appeared in that sacrifice.

26. The priests engaged in the sacrifice then informed King Anga: O King, we are properly offering the clarified butter in the sacrifice, but despite all our efforts the demigods do not accept it.

27. O King, we know that the paraphernalia to perform the sacrifice is well collected by you with great faith and care and is not polluted. Our chanting of the Vedic hymns is also not deficient in any way, for all the brahmanas and priests present here are expert and are executing the performances properly.

28. Dear King, we do not find any reason that the demigods should feel insulted or neglected in any way, but still the demigods who are witnesses for the sacrifice do not accept their shares. We do not know why this is so.

29. Maitreya explained that King Anga, after hearing the statements of the priests, was greatly aggrieved. At that time he took permission from the priests to break his silence and inquired from all the priests who were present in the sacrificial arena.

30. King Anga addressed the priestly order: My dear priests, kindly tell me what offense I have committed. Although invited, the demigods are neither taking part in the sacrifice nor accepting their shares.

31. The head priests said: O King, in this life we do not find any sinful activity, even within your mind, so you are not in the least offensive. But we can see that in your previous life you performed sinful activities due to which, in spite of your having all qualifications, you have no son.

32. O King, we wish all good fortune for you. You have no son, but if you pray at once to the Supreme Lord and ask for a son, and if you execute the sacrifice for that purpose, the enjoyer of the sacrifice, the Supreme Personality of Godhead, will fulfill your desire.

33. When Hari, the supreme enjoyer of all sacrifices, is invited to fulfill your desire for a son, all the demigods will come with Him and take their shares in the sacrifice.

34. The performer of the sacrifices [under karma-kanda activities] achieves the fulfillment of the desire for which he worships the Lord.

35. Thus for the sake of a son for King Anga, they decided to offer oblations to Lord Visnu, who is
situated in the hearts of all living entities.

36. As soon as the oblation was offered in the fire, a person appeared from the fire altar wearing a golden garland and a white dress. He was carrying a golden pot filled with rice boiled in milk.

37. The King was very liberal, and after taking permission from the priests, he took the preparation in his joined palms, and after smelling it he offered a portion to his wife.

38. Although the Queen had no son, after eating that food, which had the power to produce a male child, she became pregnant by her husband, and in due course of time she gave birth to a son.

39. That boy was born partially in the dynasty of irreligion. His grandfather was death personified, and the boy grew up as his follower; he became a greatly irreligious person.

40. After fixing his bow and arrow, the cruel boy used to go to the forest and unnecessarily kill innocent deer, and as soon as he came all the people would cry, “Here comes cruel Vena! Here comes cruel Vena!”

41. The boy was so cruel that while playing with young boys of his age he would kill them very
mercilessly, as if they were animals meant for slaughter.

42. After seeing the cruel and merciless behavior of his son, Vena, King Anga punished him in different ways to reform him, but was unable to bring him to the path of gentleness. He thus became greatly aggrieved.

43. The King thought to himself: Persons who have no son are certainly fortunate. They must have worshiped the Lord in their previous lives so that they would not have to suffer the unbearable
unhappiness caused by a bad son.

44. A sinful son causes a person’s reputation to vanish. His irreligious activities at home cause irreligion and quarrel among everyone, and this creates only endless anxiety.

45. Who, if he is considerate and intelligent, would desire such a worthless son? Such a son is nothing but a bond of illusion for the living entity, and he makes one’s home miserable.

46. Then the King thought: A bad son is better than a good son because a good son creates an
attachment for home, whereas a bad son does not. A bad son creates a hellish home from which an intelligent man naturally becomes very easily detached.

47. Thinking like that, King Anga could not sleep at night. He became completely indifferent to
household life. Once, therefore, in the dead of night, he got up from bed and left Vena’s mother [his wife], who was sleeping deeply. He gave up all attraction for his greatly opulent kingdom, and, unseen by anyone, he very silently gave up his home and opulence and proceeded towards the forest.

48. When it was understood that the King had indifferently left home, all the citizens, priests, ministers, friends, and people in general were greatly aggrieved. They began to search for him all over the world, just as a less experienced mystic searches out the Supersoul within himself.

49. When the citizens could not find any trace of the King after searching for him everywhere, they were very disappointed, and they returned to the city, where all the great sages of the country assembled because of the King’s absence. With tears in their eyes the citizens offered respectful obeisances and informed the sages in full detail that they were unable to find the King anywhere.

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – बारहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – ChapterTwelfth

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – बारहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – ChapterTwelfth

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: द्वादश अध्यायः

श्लोक 1-52 का हिन्दी अनुवाद

ध्रुव जी को कुबेर का वरदान और विष्णुलोक की प्राप्ति

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! ध्रुव का क्रोध शान्त हो गया है और वे यक्षों के वध से निवृत्त हो गये हैं, यह जानकर भगवान् कुबेर वहाँ आये। उस समय यक्ष, चारण और किन्नर लोग उनकी स्तुति कर रहे थे। उन्हें देखते ही ध्रुव जी हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब कुबेर ने कहा:

श्रीकुबेर जी बोले- शुद्धहृदय क्षत्रियकुमार! तुमने अपने दादा के उपदेश से ऐसा दुस्त्यज वैर त्याग कर दिया; इससे मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूँ। वास्तव में न तुमने यक्षों को मारा है और न यक्षों ने तुम्हारे भाई को। समस्त जीवों की उत्पत्ति और विनाश का कारण तो एकमात्र काल ही है। यह मैं-तू आदि मिथ्या बुद्धि तो जीव को अज्ञानवश स्वप्न के समान शरीरादि को ही आत्मा मानने से उत्पन्न होती है। इसी से मनुष्य को बन्धन एवं दुःखादि विपरीत अवस्थाओं की प्राप्ति होती है।

ध्रुव! अब तुम जाओ, भगवान् तुम्हारा मंगल करें। तुम संसारपास से मुक्त होने के लिये सब जीवों में समदृष्टि रखकर सर्वभूतात्मा भगवान् श्रीहरि का भजन करो। वे संसारपाश का छेदन करने वाले हैं तथा संसार की उत्पत्ति आदि के लिये अपनी त्रिगुणात्मिक मायाशक्ति से युक्त होकर भी वास्तव में उससे रहित हैं। उनके चरणकमल ही सबके लिये भजन करने योग्य हैं। प्रियवर! हमने सुना है, तुम सर्वदा भगवान् कमलनाभ के चरणकमलों के समीप रहने वाले हो; इसलिये तुम अवश्य ही वर पाने योग्य हो। ध्रुव! तुम्हें जिस वर की इच्छा हो, मुझसे निःसंकोच एवं निःशंक होकर माँग लो।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! यक्षराज कुबेर ने जब इस प्रकार वर माँगने के लिये आग्रह किया, तब महाभागवत महामति ध्रुव जी ने उनसे यही माँगा कि मुझे श्रीहरि की अखण्ड स्मृति बनी रहे, जिससे मनुष्य सहज ही दुस्तर संसार सागर को पार कर जाता है। इडविडा के पुत्र कुबेर जी ने बड़े प्रसन्न मन से उन्हें भगवत्स्मृति प्रदान की। फिर उनके देखते-ही-देखते वे अन्तर्धान हो गये। इसके पश्चात् ध्रुव जी भी अपनी राजधानी को लौट आये। वहाँ रहते हुए उन्होंने बड़ी-बड़ी दक्षिणा वाले यज्ञों से भगवान् यज्ञपुरुष की आराधना की; भगवान् ही द्रव्य, क्रिया और देवता-सम्बन्धी समस्त कर्म और उसके फल हैं तथा वे ही कर्मफल के दाता भी हैं। सर्वोपाधिशून्य सर्वात्मा श्रीअच्युत में प्रबल वेगयुक्त भक्तिभाव रखते हुए ध्रुव जी अपने में और समस्त प्राणियों में सर्वव्यापक श्रीहरि को ही विराजमान देखने लगे।ध्रु

ध्रुव जी बड़े ही शील सम्पन्न, ब्राह्मणभक्त, दीनवत्सल और धर्ममर्यादा के रक्षक थे; उनकी प्रजा उन्हें साक्षात् पिता के समान मानती थी। इस प्रकार तरह-तरह के ऐश्वर्य भोग से पुण्य का और भोगों के त्यागपूर्वक यज्ञादि कर्मों के अनुष्ठान से पाप का क्षय करते हुए उन्होंने छत्तीस हजार वर्ष तक पृथ्वी का शासन किया। जितेन्द्रिय महात्मा ध्रुव ने इसी तरह अर्थ, धर्म और काम के सम्पादन में बहुत-से वर्ष बिताकर अपने पुत्र उत्कल को राजसिंहासन सौंप दिया। इस सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच को अविद्यारचित स्वप्न और गन्धर्वनगर के समान माया से अपने में ही कल्पित मानकर और यह समझकर कि शरीर, स्त्री, पुत्र, मित्र, सेना, भरापूरा खजाना, जनाने महल, सुरम्य विहार भूमि और समुद्रपर्यन्त भूमण्डल का राज्य- ये सभी काल के गाल में पड़े हुए हैं, वे बदरिकाश्रम को चले गये।

वहाँ उन्होंने पवित्र जल में स्नान कर इन्द्रियों को विशुद्ध (शान्त) किया। फिर स्थिर आसन से बैठकर प्राणायाम द्वारा वायु को वश में किया। तदनन्तर मन के द्वारा इन्द्रियों को बाह्य विषयों से हटाकर मन को भगवान् के स्थूल विराट्स्वरूप में स्थिर कर दिया। उसी विराट्रूप का चिन्तन करते-करते अन्त में ध्याता और ध्येय के भेद से शून्य निर्विकल्प समाधि में लीन हो गये और उस अवस्था में विराट्रूप का भी परित्याग कर दिया। इस प्रकार भगवान् श्रीहरि के प्रति निरन्तर भक्तिभाव का प्रवाह चलते रहने से उनके नेत्रों में बार-बार आनन्दाश्रुओं की बाढ़-सी आ जाती थी। इससे उनका हृदय द्रवीभूत हो गया और शरीर में रोमांच हो आया। फिर देहाभिमान गलित हो जाने से उन्हें ‘मैं ध्रुव हूँ’ इसकी स्मृति भी न रही।

इसी समय ध्रुव जी ने आकाश से एक बड़ा ही सुन्दर विमान उतरते देखा। वह अपने प्रकाश से दसों-दिशाओं को आलोकित कर रहा था; मानो पूर्णिमा का चन्द्र ही उदय हुआ हो। उसमें दो श्रेष्ठ पार्षद गदाओं का सहारा लिये खड़े थे। उनके चार भुजाएँ थीं, सुन्दर श्याम शरीर था, किशोर अवस्था थी और अरुण कमल के समान नेत्र थे। वे सुन्दर वस्त्र, किरीट, हार, भुजबन्ध और अति मनोहर कुण्डल धारण किये हुए थे। उन्हें पुण्यश्लोक श्रीहरि के सेवक जान ध्रुव जी हड़बड़ाहट में पूजा आदि का क्रम भूलकर सहसा खड़े हो गये और ये भगवान् के पार्षदों में प्रधान हैं-ऐसा समझकर उन्होंने श्रीमधुसूदन के नामों का कीर्तन करते हुए उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया। ध्रुव जी का मन भगवान् के चरणकमलों में तल्लीन हो गया और वे हाथ जोडकर बड़ी नम्रता से सिर नीचा किये खड़े रह गये। तब श्रीहरि के प्रिय पार्षद सुनन्द और नन्द ने उनके पास जाकर मुसकराते हुए कहा।

सुनन्द और नन्द कहने लगे- राजन्! आपका कल्याण हो, आप सावधान होकर हमारी बात सुनिये। आपने पाँच वर्ष की अवस्था में ही तपस्या करके सर्वेश्वर भगवान् को प्रसन्न कर लिया था। हम उन्हीं निखिल जगन्नियन्ता सारंगपाणि भगवान् विष्णु के सेवक हैं और आपको भगवान् के धाम में ले जाने के लिये यहाँ आये हैं। आपने अपनी भक्ति के प्रभाव से विष्णुलोक का अधिकार प्राप्त किया है, जो औरों के लिये बड़ा दुर्लभ है। परमज्ञानी सप्तर्षि भी वहाँ तक नहीं पहुँच सके, वे नीचे से केवल उसे देखते रहते हैं। सूर्य और चन्द्रमा आदि ग्रह, नक्षत्र एवं तारागण भी उसकी प्रदक्षिणा किया करते हैं। चलिये, आप उसी विष्णुधाम में निवास कीजिये। प्रियवर! आज तक आपके पूर्वज तथा और कोई भी उस पद पर कभी नहीं पहुँच सके। भगवान् विष्णु का वह परमधाम सारे संसार में वन्दनीय है, आप वहाँ चलकर विराजमान हों। आयुष्मन्! यह श्रेष्ठ विमान पुण्यश्लोक शिखामणि श्रीहरि ने आपके लिये ही भेजा है, आप इस पर चढ़ने योग्य हैं।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- भगवान् के प्रमुख पार्षदों के ये अमृतमय वचन सुनकर परम भागवत ध्रुव जी ने स्नान किया, फिर सन्ध्या-वन्दनादि नित्य-कर्म से निवृत्त हो मांगलिक अलंकारादि धारण किये। बदरिकाश्रम में रहने वाले मुनियों को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद लिया। इसके बाद उस श्रेष्ठ विमान की पूजा और प्रदक्षिणा की और पार्षदों को प्रणाम कर सुवर्ण के समान कान्तिमान् दिव्यरूप धारण कर उस पर चढ़ने को तैयार हुए।

इतने में ही ध्रुव जी ने देखा कि काल मूर्तिमान् होकर उनके सामने खड़ा है। तब वे मृत्यु के सिर पर पैर रखकर उस समय अद्भुत विमान पर चढ़ गये। उस समय आकाश में दुन्दुभि, मृदंग और ढोल आदि बाजे बजने लगे, श्रेष्ठ गन्धर्व गान करने लगे और फूलों की वर्षा होने लगी। विमान पर बैठकर ध्रुव जी ज्यों-ही भगवान् के धाम को जाने के लिये तैयार हुए, त्यों-ही उन्हें माता सुनीति का स्मरण हो आया। वे सोचने लगे, ‘क्या मैं बेचारी माता को छोड़कर अकेला ही दुर्लभ वैकुण्ठधाम को जाऊँगा? नन्द और सुनन्द ने ध्रुव के हृदय की बात जानकर उन्हें दिखलाया कि देवी सुनीति आगे-आगे दूसरे विमान पर जा रही हैं। उन्होंने क्रमशः सूर्य आदि सभी ग्रह देखे। मार्ग में जहाँ-तहाँ विमानों पर बैठे हुए देवता उनकी प्रशंसा करते हुए फूलों की वर्षा करते जाते थे।

उस दिव्य विमान पर बैठकर ध्रुव जी त्रिलोकी को पारकर सप्तर्षिमण्डल से भी ऊपर भगवान् विष्णु के नित्यधाम में पहुँचे। इस प्रकार उन्होंने अविचल गति प्राप्त की। यह दिव्य धाम अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है, इसी के प्रकाश से तीनों लोक प्रकाशित हैं। इसमें जीवों पर निर्दयता करने वाले पुरुष नहीं जा सकते। यहाँ तो उन्हीं की पहुँच होती है, जो दिन-रात प्राणियों के कल्याण के लिये शुभ कर्म ही करते रहते हैं। जो शान्त, समदर्शी, शुद्ध और सब प्राणियों को प्रसन्न रखने वाले हैं तथा भगवद्भक्तों को ही अपना एकमात्र सच्चा सुहृद मानते हैं- ऐसे लोग सुगमता से ही इस भगवद्धाम को पाप्त कर लेते हैं। इस प्रकार उत्तानपाद के पुत्र भगवत्परायण श्रीध्रुव जी तीनों लोकों के ऊपर उसकी निर्मल चूड़ामणि के समान विराजमान हुए।

कुरुनन्दन! जिस प्रकार दायँ चलाने के समय खम्भे के चारों ओर बैल घूमते हैं, उसी प्रकार यह गम्भीर वेग वाला ज्योतिश्चक्र उस अविनाशी लोक के आश्रय ही निरन्तर घूमता रहता है। उसकी महिमा देखकर देवर्षि नारद ने प्रचेताओं की यज्ञशाला में वीणा बजाकर ये तीन श्लोक गाये थे।

नारद जी ने कहा- इसमें सन्देह नहीं, पतिपरायणा सुनीति के पुत्र ध्रुव ने तपस्या द्वारा अद्भुत शक्ति संचित करके जो गति पायी है, उसे भागवतधर्मों की आलोचना करके वेदवाणी मुनिगण भी नहीं पा सकते; फिर राजाओं की तो बात ही क्या है। अहो! वे पाँच वर्ष की अवस्थाओं में ही सौतेली माता के वाग्बाणों से मर्माहत होकर दुःखी हृदय से वन में चले गये और मेरे उपदेश के अनुसार आचरण करके ही उन अजेय प्रभु को जीत लिया, जो केवल अपने भक्तों के गुणों से ही वश में होते हैं। ध्रुव जी ने तो पाँच-छः वर्ष की अवस्था में कुछ दिनों की तपस्या से ही भगवान् को प्रसन्न करके उनका परमपद प्राप्त कर लिया; किन्तु उनके अधिकृत किये हुए इस पद को भूमण्डल में कोई दूसरा क्षत्रिय क्या वर्षो तक तपस्या करके भी पा सकता है?

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! तुमने मुझसे उदारकीर्ति ध्रुव जी के चरित्र के विषय में पूछा था, सो मैंने तुम्हें वह पूरा-का-पूरा सुना दिया। साधुजन इस चरित्र की बड़ी प्रशंसा करते हैं। यह धन, यश और आयु की वृद्धि करने वाला, परम पवित्र और अत्यत्न मंगलमय है। इससे स्वर्ग और अविनाशी पद भी प्राप्त हो सकता है। यह देवत्व की प्राप्ति कराने वाला, बड़ा ही प्रशंसनीय और समत पापों का नाश करने वाला है। भगवद्भक्त ध्रुव के इस पवित्र चरित्र को जो श्रद्धापूर्वक बार-बार सुनते हैं, उन्हें भगवान् की भक्ति प्राप्त होती है, जिससे उनके सभी दुःखों का नाश हो जाता है। इसे श्रवण करने वाले को शीलादि गुणों की प्राप्ति होती है, जो महत्त्व चाहते हैं, उन्हें महत्त्व की प्राप्ति कराने वाला स्थान मिलता है, जो तेज चाहते हैं, उन्हें तेज प्राप्त होता है और मनस्वियों का मान बढ़ता है।

पवित्रकीर्ति ध्रुव जी के इस महान् चरित्र का प्रातः और सायंकाल ब्रह्माणादि द्विजातियों के समान में एकाग्रचित्त से कीर्तन करना चाहिये। भगवान् के परम पवित्र चरणों की शरण में रहने वाला जो पुरुष इसे निष्कामभाव से पूर्णिमा, अमावस्या, द्वादशी, श्रवण नक्षत्र, तिथिक्षय, व्यतीपात, संक्रान्ति अथवा रविवार के दिन श्रद्धालु पुरुषों को सुनाता है, वह स्वयं अपने आत्मा में ही सन्तुष्ट रहने लगता है और सिद्ध हो जाता है। यह साक्षात् भगवद्विषयक अमृतमय ज्ञान है; जो लोग भगवन्मार्ग के मर्म से अनभिज्ञ हैं- उन्हें जो कोई इसे प्रदान करता है, उस दीनवत्सल कृपालु पुरुष पर देवता अनुग्रह करते हैं। ध्रुव जी के कर्म सर्वत्र प्रसिद्ध और परम पवित्र हैं; वे अपनी बाल्यावस्था में ही माता के घर और खिलौनों का मोह छोड़कर श्रीविष्णु भगवान् की शरण में चले गये थे। कुरुनन्दन! उनका यह पवित्र चरित्र मैंने तुम्हें सुना दिया।

Chapter Twelve: Dhruva Maharaja Goes Back to Godhead

1. The great sage Maitreya said: My dear Vidura, Dhruva Maharaja’s anger subsided, and he
completely ceased killing Yaksas. When Kuvera, the most blessed master of the treasury, learned this news, he appeared before Dhruva. While being worshiped by Yaksas, Kinnaras and Caranas, he spoke to Dhruva Maharaja, who stood before him with folded hands.

2. The master of the treasury, Kuvera, said: O sinless son of a ksatriya, I am very glad to know that under the instruction of your grandfather you have given up your enmity, although it is very difficult to avoid. I am very pleased with you.

3. Actually, you have not killed the Yaksas, nor have they killed your brother, for the ultimate cause of generation and annihilation is the eternal time feature of the Supreme Lord.

4. Misidentification of oneself and others as “I” and “you” on the basis of the bodily concept of life is a product of ignorance. This bodily concept is the cause of repeated birth and death, and it makes us go on continuously in material existence.

5. My dear Dhruva, come forward. May the Lord always grace you with good fortune. The Supreme Personality of Godhead, who is beyond our sensory perception, is the Supersoul of all living entities,and thus all entities are one, without distinction. Begin, therefore, to render service unto the transcendental form of the Lord, who is the ultimate shelter of all living entities.

6. Engage yourself fully, therefore, in the devotional service of the Lord, for only He can deliver us from this entanglement of materialistic existence. Although the Lord is attached to His material potency, He is aloof from her activities. Everything in this material world is happening by the inconceivable potency of the Supreme Personality of Godhead.

7. My dear Dhruva Maharaja, son of Maharaja Uttanapada, we have heard that you are constantly engaged in transcendental loving service to the Supreme Personality of Godhead, who is known for His lotus navel. You are therefore worthy to take all benedictions from us. Please, therefore, ask without hesitation whatever benediction you want from me.

8. The great sage Maitreya continued: My dear Vidura, when thus asked to accept a benediction from Kuvera the Yaksaraja [King of the Yaksas], Dhruva Maharaja, that most elevated pure devotee, who was an intelligent and thoughtful king, begged that he might have unflinching faith in and remembrance of the Supreme Personality of Godhead, for thus a person can cross over the ocean of nescience very easily, although it is very difficult for others to cross.

9. The son of Idavida, Lord Kuvera, was very pleased, and happily he gave Dhruva Maharaja the benediction he wanted. Thereafter he disappeared from Dhruva’s presence, and Dhruva Maharaja returned to his capital city.

10. As long as he remained at home, Dhruva Maharaja performed many great ceremonial sacrifices in order to please the enjoyer of all sacrifices, the Supreme Personality of Godhead. Prescribed ceremonial sacrifices are especially meant to please Lord Visnu, who is the objective of all such sacrifices and who awards the resultant benedictions.

11. Dhruva Maharaja rendered devotional service unto the Supreme, the reservoir of everything, with unrelenting force. While carrying out his devotional service to the Lord, he could see that everything is situated in Him only and that He is situated in all living entities. The Lord is called Acyuta because He never fails in His prime duty, to give protection to His devotees.

12. Dhruva Maharaja was endowed with all godly qualities; he was very respectful to the devotees of the Supreme Lord and very kind to the poor and innocent, and he protected religious principles. With all these qualifications, he was considered to be the direct father of all the citizens.

13. Dhruva Maharaja ruled over this planet for thirty-six thousand years; he diminished the reactions of pious activities by enjoyment, and by practicing austerities he diminished inauspicious reactions.

14. The self-controlled great soul Dhruva Maharaja thus passed many, many years favorably executing three kinds of worldly activities, namely religiosity, economic development and satisfaction of all
material desires. Thereafter he handed over the charge of the royal throne to his son.

15. Srila Dhruva Maharaja realized that this cosmic manifestation bewilders living entities like a dream or phantasmagoria because it is a creation of the illusory, external energy of the Supreme Lord.

16. Thus Dhruva Maharaja, at the end, left his kingdom, which extended all over the earth and was bounded by the great oceans. He considered his body, his wives, his children, his friends, his army, his rich treasury, his very comfortable palaces and his many enjoyable pleasure-grounds to be creations of the illusory energy. Thus in due course of time he retired to the forest in the Himalayas known as
Badarikasrama.

17. In Badarikasrama Dhruva Maharaja’s senses became completely purified because he bathed
regularly in the crystal-clear purified water. He fixed his sitting position and by yogic practice controlled the breathing process and the air of life; in this way his senses were completely withdrawn. Then he concentrated his mind on the arca-vigraha form of the Lord, which is the exact replica of the Lord and, thus meditating upon Him, entered into complete trance.

18. Because of his transcendental bliss, incessant tears flowed from his eyes, his heart melted, and there was shivering and standing of the hairs all over his body. Thus transformed, in a trance of devotional service, Dhruva Maharaja completely forgot his bodily existence, and thus he immediately became liberated from material bondage.

19. As soon as the symptoms of his liberation were manifest, he saw a very beautiful airplane coming down from the sky, as if the brilliant full moon were coming down, illuminating all the ten directions.

20. Dhruva Maharaja saw two very beautiful associates of Lord Visnu in the plane. They had four hands and a blackish bodily luster, they were very youthful, and their eyes were just like reddish lotus flowers. They held clubs in their hands, and they were dressed in very attractive garments with helmets and were decorated with necklaces, bracelets and earrings.

21. Dhruva Maharaja, seeing that these uncommon personalities were direct servants of the Supreme Personality of Godhead, immediately stood up. But, being puzzled, in hastiness he forgot how to receive them in the proper way. Therefore he simply offered obeisances with folded hands and chanted
and glorified the holy names of the Lord.

22. Dhruva Maharaja was always absorbed in thinking of the lotus feet of Lord Krsna. His heart was full with Krishna. When the two confidential servants of the Supreme Lord, who were named Nanda and Sunanda, approached him, smiling happily, Dhruva stood with folded hands, bowing humbly. They then addressed him as follows.

23. Nanda and Sunanda, the two confidential associates of Lord Visnu, said: Dear King, let there be all good fortune unto you. Please attentively hear what we shall say. When you were only five years old, you underwent severe austerities, and you thereby greatly satisfied the Supreme Personality of Godhead.

24. We are representatives of the Supreme Personality of Godhead, the creator of the whole universe, who carries in His hand the bow named Sarnga. We have been specifically deputed to take you to the spiritual world.

25. To achieve Visnuloka is very difficult, but by your austerity you have conquered. Even the great rsis and demigods cannot achieve this position. Simply to see the supreme abode [the Visnu planet], the sun and moon and all the other planets, stars, lunar mansions and solar systems are circumambulating it. Now please come; you are welcome to go there.

26. Dear King Dhruva, neither your forefathers nor anyone else before you ever achieved such a
transcendental planet. The planet known as Visnuloka, where Lord Vishnu personally resides, is the highest of all. It is worshipable by the inhabitants of all other planets within the universe. Please come with us and live there eternally.

27. O immortal one, this unique airplane has been sent by the Supreme Personality of Godhead, who is worshiped by selected prayers and who is the chief of all living entities. You are quite worthy to board such a plane.

28. The great sage Maitreya continued: Maharaja Dhruva was very dear to the Supreme Personality of Godhead. When he heard the sweet speeches of the Lord’s chief associates in the Vaikuntha planet, he immediately took his sacred bath, dressed himself with suitable ornaments, and performed his daily spiritual duties. Thereafter he offered his respectful obeisances to the great sages present there and accepted their blessings.

29. Before getting aboard, Dhruva Maharaja worshiped the airplane, circumambulated it, and also offered obeisances to the associates of Visnu. In the meantime he became as brilliant and illuminating as molten gold. He was thus completely prepared to board the transcendental plane.

30. When Dhruva Maharaja was attempting to get on the transcendental plane, he saw death
personified approach him. Not caring for death, however, he took advantage of the opportunity to put his feet on the head of death, and thus he got up on the airplane, which was as big as a house.

31. At that time drums and kettledrums resounded from the sky, the chief Gandharvas began to sing and other demigods showered flowers like torrents of rain upon Dhruva Maharaja.

32. Dhruva was seated in the transcendental airplane, which was just about to start, when he
remembered his poor mother, Suniti. He thought to himself, “How shall I go alone to the Vaikuntha
planet and leave behind my poor mother?”

33. The great associates of Vaikunthaloka, Nanda and Sunanda, could understand the mind of Dhruva Maharaja, and thus they showed him that his mother, Suniti, was going forward in another plane.

34. While Dhruva Maharaja was passing through space, he gradually saw all the planets of the solar system, and on the path he saw all the demigods in their airplanes showering flowers upon him like rain.

35. Dhruva Maharaja thus surpassed the seven planetary systems of the great sages who are known as saptarsi. Beyond that region, he achieved the transcendental situation of permanent life in the planet where Lord Vishnu lives.

36. The self-effulgent Vaikuntha planets, by whose illumination alone all the illuminating planets within this material world give off reflected light, cannot be reached by those who are not merciful to other living entities. Only persons who constantly engage in welfare activities for other living entities can reach
the Vaikuntha planets.

37. Persons who are peaceful, equipoised, cleansed and purified, and who know the art of pleasing all other living entities, keep friendship only with devotees of the Lord; they alone can very easily achieve the perfection of going back home, back to Godhead.

38. In this way, the fully Krishna conscious Dhruva Maharaja, the exalted son of Maharaja Uttanapada, attained the summit of the three statuses of planetary systems.

39. Saint Maitreya continued: My dear Vidura, descendant of Kuru, as a herd of bulls circumambulates a central pole on their right side, all the luminaries within the universal sky unceasingly circumambulate the abode of Dhruva Maharaja with great force and speed.

40. After observing the glories of Dhruva Maharaja, the great sage Narada, playing his vina, went to the sacrificial arena of the Pracetas and very happily chanted the following three verses.

41. The great sage Narada said: Simply by the influence of his spiritual advancement and powerful austerity, Dhruva Maharaja, the son of Suniti, who was devoted to her husband, acquired an exalted position not possible to attain even for the so-called Vedantists or strict followers of the Vedic principles, not to speak of ordinary human beings.

42. The great sage Narada continued: Just see how Dhruva Maharaja, aggrieved at the harsh words of his stepmother, went to the forest at the age of only five years and under my direction underwent austerity. Although the Supreme Personality of Godhead is unconquerable, Dhruva Maharaja defeated him with the specific qualifications possessed by the Lord’s devotees.

43. Dhruva Maharaja attained an exalted position at the age of only five or six years, after undergoing austerity for six months. Alas, a great ksatriya cannot achieve such a position even after undergoing austerities for many, many years.

44. The great sage Maitreya continued: My dear Vidura, whatever you have asked from me about the great reputation and character of Dhruva Maharaja I have explained to you in all detail. Great saintly persons and devotees very much like to hear about Dhruva Maharaja.

45. By hearing the narration of Dhruva Maharaja one can fulfill desires for wealth, reputation and
increased duration of life. It is so auspicious that one can even go to a heavenly planet or attain
Dhruvaloka, which was achieved by Dhruva Maharaja, just by hearing about him. The demigods also become pleased because this narration is so glorious, and it is so powerful that it can counteract all the results of one’s sinful actions.

46. Anyone who hears the narration of Dhruva Maharaja, and who repeatedly tries with faith and
devotion to understand his pure character, attains the pure devotional platform and executes pure devotional service. By such activities one can diminish the threefold miserable conditions of material life.

47. Anyone who hears this narration of Dhruva Maharaja acquires exalted qualities like him. For anyone who desires greatness, prowess or influence, here is the process by which to acquire them, and for thoughtful men who want adoration, here is the proper means.

48. The great sage Maitreya recommended: One should chant of the character and activities of Dhruva Maharaja both in the morning and in the evening, with great attention and care, in a society of brahmanas or other twice-born persons.

49-50. Persons who have completely taken shelter of the lotus feet of the Lord should recite this narration of Dhruva Maharaja without taking remuneration. Specifically, recitation is recommended on the full moon or dark moon day, on the day after Ekadasi, on the appearance of the Sravana star, at the end of a particular tithi, or the occasion of Vyatipata, at the end of the month, or on Sunday. Such recitation should of course be performed before a favorable audience. When recitation is performed this
way, without professional motive, the reciter and audience become perfect.

51. The narration of Dhruva Maharaja is sublime knowledge for the attainment of immortality. Persons unaware of the Absolute Truth can be led to the path of truth. Those who out of transcendental kindness take on the responsibility of becoming master-protectors of the poor living entities automatically gain the interest and blessings of the demigods.

52. The transcendental activities of Dhruva Maharaja are well known all over the world, and they are very pure. In childhood Dhruva Maharaja rejected all kinds of toys and playthings, left the protection of his mother and seriously took shelter of the Supreme Personality of Godhead, Visnu. My dear Vidura, I therefore conclude this narration, for I have described to you all its details.

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – दसवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Ten

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – दसवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Ten

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: दशम अध्यायः

श्लोक 1-30

उत्तम का मारा जाना, ध्रुव का यक्षों के साथ युद्ध

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! ध्रुव ने प्रजापति शिशुमार की पुत्री भ्रमि के साथ विवाह किया, उससे उनके कल्प और वत्सर नाम के दो पुत्र हुए। महाबली ध्रुव की दूसरी स्त्री वायुपुत्री इला थी। उससे उनके उत्कल नाम के पुत्र और एक कन्यारत्न का जन्म हुआ। उत्तम का अभी विवाह नहीं हुआ था कि एक दिन शिकार खेलते समय उसे हिमालय पर्वत पर एक बलवान् यक्ष ने मार डाला। उसके साथ उसकी माता भी परलोक सिधार गयी। ध्रुव ने जब भाई के मारे जाने का समाचार सुना तो वे क्रोध, शोक और उद्वेग से भरकर एक विजयप्रद रथ पर सवार हो यक्षों के देश में जा पहुँचे। उन्होंने उत्तर दिशा में जाकर हिमालय की घाटी में यक्षों से भरी हुई अलकापुरी देखी, उसमें अनेकों भूत-प्रेत-पिशाचादि रुद्रानुचर रहते थे। विदुर जी! वहाँ पहुँचकर महाबाहु ध्रुव ने अपना शंख बजाया तथा सम्पूर्ण आकाश और दिशाओं को गुँजा दिया। उस शंखध्वनि से यक्ष-पत्नियाँ बहुत ही डर गयीं, उनकी आँखें भय से कातर हो उठीं। वीरवर विदुर जी! महाबलवान् यक्षवीरों को वह शंखनाद सहन न हुआ। इसलिये वे तरह-तरह के अस्त्र-शस्त्र लेकर नगर के बाहर निकल आये और ध्रुव पर टूट पड़े। महारथी ध्रुव प्रचण्ड धनुर्धर थे। उन्होंने एक ही साथ उनमें से प्रत्येक को तीन-तीन बाण मारे। उन सभी ने जब अपने-अपने मस्तकों में तीन-तीन बाण लगे देखे, तब उन्हें यह विश्वास हो गया कि हमारी हार अवश्य होगी। वे ध्रुव जी के इस अद्भुत पराक्रम की प्रशंसा करने लगे। फिर जैसे सर्प किसी के पैरों का आघात नहीं सहते, उसी प्रकार ध्रुव के इस पराक्रम को न सहकर उन्होंने भी उनके बाणों के जवाब में एक ही साथ उनसे दूने- छः-छः बाण छोड़े। यक्षों की संख्या तेरह अच्युत (1,30,000) थी। उन्होंने ध्रुव जी का बदला लेने के लिये अत्यन्त कुपित होकर रथ और सारथी के सहित उन पर परिघ, खड्ग, प्रास, त्रिशूल, फरसा, शक्ति, ऋष्टि, भुशुण्डी तथा चित्र-विचित्र पंखदार बाणों की वर्षा की। इस भीषण शस्त्रवर्षा से ध्रुव जी बिलकुल ढक गये। तब लोगों को उनका दीखना वैसे ही बंद हो गया, जैसे भारी वर्षा से पर्वत का। उस समय जो सिद्धगण आकाश में स्थित होकर यह दृश्य देख रहे थे, वे सब हाय-हाय करके कहने लगे- ‘आज यक्ष सेनारूप समुद्र में डूबकर यह मानव-सूर्य अस्त हो गया’। यक्ष लोग अपनी विजय की घोषणा करते हुए युद्ध क्षेत्र में सिंह की तरह गरजने लगे। इसी बीच में ध्रुव जी का रथ एकाएक वैसे ही प्रकट हो गया, जैसे कुहरे में से सूर्य भगवान् निकल आते हैं। ध्रुव जी ने अपने दिव्य धनुष की टंकार करके शत्रुओं के दिल दहला दिये और फिर प्रचण्ड बाणों की वर्षा करके उनके अस्त्र-शस्त्रों को इस प्रकार छिन्न-भिन्न कर दिया, जैसे आँधी बादलों को तितर-बितर कर देती है।

उनके धनुष से छूटे हुए तीखे तीर यक्ष-राक्षसों के कवचों को भेदकर इस प्रकार उनके शरीरों में घुस गये, जैसे इन्द्र के छोड़े हुए वज्र पर्वतों में प्रवेश कर गये थे। विदुर जी! महाराज ध्रुव के बाणों से कटे हुए यक्षों के सुन्दर कुण्डलमण्डित मस्तकों से, सुनहरी तालवृक्ष के समान जाँघों से, वलयविभूषित बाहुओं से, हार, भुजबन्ध, मुकुट और बहुमूल्य पगड़ियों से पटी हुई वह वीरों के मन को लुभाने वाली समरभूमि बड़ी शोभा पा रही थी। जो यक्ष किसी प्रकार जीवित बचे, वे क्षत्रियप्रवर ध्रुव जी के बाणों से प्रायः अंग-अंग छिन्न-भिन्न हो जाने के कारण युद्धक्रीड़ा में सिंह से परास्त हुए गजराज के समान मैदान छोड़कर भाग गये। नरश्रेष्ठ ध्रुव जी ने देखा कि उस विस्तृत रणभूमि में अब एक भी शत्रु अस्त्र-शस्त्र लिये उनके सामने नहीं है, तो उनकी इच्छा अलकापुरी देखने की हुई; किन्तु वे पुरी के भीतर नहीं गये। ‘ये मायावी क्या करना चाहते हैं, इस बात का मनुष्य को पता नहीं लग सकता’। सारथि से इस प्रकार कहकर वे उस विचित्र रथ में बैठे रहे तथा शत्रु के नवीन आक्रमण की आशंका से सावधान हो गये। इतने में ही उन्हें समुद्र की गर्जना के समान आँधी का भीषण शब्द सुनायी दिया तथा दिशाओं में उठती हुई धूल भी दिखायी दी। एक क्षण में ही सारा आकाश मेघमाला से घिर गया। सब ओर भयंकर गड़गड़ाहट के साथ बिजली चमकने लगी। निष्पाप विदुर जी! उन बादलों से खून, कफ, पीब, विष्ठा, मूत्र एवं चर्बी की वर्षा होने लगी और ध्रुव जी के आगे आकाश से बहुत-से धड़ गिरने लगे। फिर आकाश में एक पर्वत दिखायी दिया और सभी दिशाओं में पत्थरों की वर्षा के साथ गदा, परिघ, तलवार और मूसल गिरने लगे। उन्होंने देखा कि बहुत-से सर्प वज्र की तरह फुफकार मारते रोषपूर्ण नेत्रों से आग की चिनगारियाँ उगलते आ रहे हैं; झुंड-के-झुंड मतवाले हाथी, सिंह और बाघ भी दौड़े चले आ रहे हैं। प्रलयकाल के समान भयंकर समुद्र अपनी उत्ताल तरंगों से पृथ्वी को सब ओर से डूबाता हुआ बड़ी भीषण गर्जना के साथ उनकी ओर बढ़ रहा है। क्रूरस्वभाव असुरों ने अपनी आसुरी माया से ऐसे ही बहुत-से कौतुक दिखलाये, जिनसे कायरों के मन काँप सकते थे। ध्रुव जी पर असुरों ने अपनी दुस्तर माया फैलायी है, यह सुनकर वहाँ कुछ मुनियों ने आकर उनके लिये मंगल कामना की। मुनियों ने कहा- उत्तानपादनन्दन ध्रुव! शरणागत-भयभंजन सारंगपाणि भगवान् नारायण तुम्हारे शत्रुओं का संहार करे। भगवान् का तो नाम ही ऐसा है, जिसके सुनने और कीर्तन करने मात्र से मनुष्य दुस्तर मृत्यु के मुख से अनायास ही बच जाता है।

Chapter Ten: Dhruva Maharaja’s Fight With the Yaksas

1. The great sage Maitreya said: My dear Vidura, thereafter Dhruva Maharaja married the daughter of Prajapati Sisumara, whose name was Bhrami, and two sons named Kalpa and Vatsara were born of her.

2. The greatly powerful Dhruva Maharaja had another wife, named Ila, who was the daughter of the demigod Vayu. By her he begot a son named Utkala and a very beautiful daughter.

3. Dhruva Maharaja’s younger brother Uttama, who was still unmarried, once went on a hunting
excursion and was killed by a powerful Yaksa in the Himalaya Mountains. Along with him, his mother, Suruci, also followed the path of her son [she died].

4. When Dhruva Maharaja heard of the killing of his brother Uttama by the Yaksas in the Himalaya
Mountains, being overwhelmed with lamentation and anger, he got on his chariot and went out for
victory over the city of the Yaksas, Alakapuri.
5. Dhruva Maharaja went to the northern direction of the Himalayan range. In a valley he saw a city full of ghostly persons who were followers of Lord Shiva.

6. Maitreya continued: My dear Vidura, as soon as Dhruva Maharaja reached Alakapuri, he immediately blew his conchshell, and the sound reverberated throughout the entire sky and in every direction. The wives of the Yaksas became very much frightened. From their eyes it was apparent that they were full of anxiety.

7. O hero Vidura, the greatly powerful heroes of the Yaksas, unable to tolerate the resounding vibration of the conchshell of Dhruva Maharaja, came forth from their city with weapons and attacked Dhruva.

8. Dhruva Maharaja, who was a great charioteer and certainly a great bowman also, immediately began to kill them by simultaneously discharging arrows three at a time.

9.When the heroes of the Yaksas saw that all their heads were being thus threatened by Dhruva Maharaja, they could very easily understand their awkward position, and they concluded that they would certainly be defeated. But, as heroes, they lauded the action of Dhruva.

10. Just like serpents, who cannot tolerate being trampled upon by anyone’s feet, the Yaksas, being intolerant of the wonderful prowess of Dhruva Maharaja, threw twice as many arrows–six from each of their soldiers–and thus they very valiantly exhibited their prowess.

11-12. The Yaksa soldiers were 130,000 strong, all greatly angry and all desiring to defeat the
wonderful activities of Dhruva Maharaja. With full strength they showered upon Maharaja Dhruva, along with his chariot and charioteer, various types of feathered arrows, parighas [iron bludgeons], nistrimsas [swords], prasasulas [tridents], parasvadhas [lances], saktis [pikes], rstis [spears] and bhusundi weapons.

13. Dhruva Maharaja was completely covered by an incessant shower of weapons, just as a mountain is covered by incessant rainfall.

14. All the Siddhas from the higher planetary systems were observing the fight from the sky, and when they saw that Dhruva Maharaja had been covered by the incessant arrows of the enemy, they roared tumultuously, “The grandson of Manu, Dhruva, is now lost!” They cried that Dhruva Maharaja was just like the sun and that now he had set within the ocean of the Yaksas.

15. The Yaksas, being temporarily victorious, exclaimed that they had conquered Dhruva Maharaja. But in the meantime Dhruva’s chariot suddenly appeared, just as the sun suddenly appears from within foggy mist.

16. Dhruva Maharaja’s bow and arrows twanged and hissed, causing lamentation in the hearts of his enemies. He began to shoot incessant arrows, shattering all their different weapons, just as the blasting wind scatters the assembled clouds in the sky.

17. The sharp arrows released from the bow of Dhruva Maharaja pierced the shields and bodies of the enemy, like the thunderbolts released by the King of heaven, which dismantle the bodies of the mountains.

18-19. The great sage Maitreya continued: My dear Vidura, the heads of those who were cut to pieces by the arrows of Dhruva Maharaja were decorated very beautifully with earrings and turbans. The legs of their bodies were as beautiful as golden palm trees, their arms were decorated with golden bracelets and armlets, and on their heads there were very valuable helmets bedecked with gold. All these ornaments lying on that battlefield were very attractive and could bewilder the mind of a hero.

20. The remaining Yaksas who somehow or other were not killed had their limbs cut to pieces by the arrows of the great warrior Dhruva Maharaja. Thus they began to flee, just as elephants flee when defeated by a lion.

21. Dhruva Maharaja, the best of human beings, observed that in that great battlefield not one of the opposing soldiers was left standing with proper weapons. He then desired to see the city of Alakapuri, but he thought to himself, “No one knows the plans of the mystic Yaksas.”

22. In the meantime, while Dhruva Maharaja, doubtful of his mystic enemies, was talking with his charioteer, they heard a tremendous sound, as if the whole ocean were there, and they found that from the sky a great dust storm was coming over them from all directions.

23. Within a moment the whole sky was overcast with dense clouds, and severe thundering was heard. There was glittering electric lightning and severe rainfall.

24. My dear faultless Vidura, in that rainfall there was blood, mucus, pus, stool, urine and marrow falling heavily before Dhruva Maharaja, and there were trunks of bodies falling from the sky.

25. Next, a great mountain was visible in the sky, and from all directions hailstones fell, along with
lances, clubs, swords, iron bludgeons and great pieces of stone.

26. Dhruva Maharaja also saw many big serpents with angry eyes, vomiting forth fire and coming to devour him, along with groups of mad elephants, lions and tigers.

27. Then, as if it were the time of the dissolution of the whole world, the fierce sea with foaming waves and great roaring sounds came forward before him.

28. The demon Yaksas are by nature very heinous, and by their demoniac power of illusion they can create many strange phenomena to frighten one who is less intelligent.

29. When the great sages heard that Dhruva Maharaja was overpowered by the illusory mystic tricks of the demons, they immediately assembled to offer him auspicious encouragement.

30. All the sages said: Dear Dhruva, O son of King Uttanapada, may the Supreme Personality of
Godhead known as Sarngadhanva, who relieves the distresses of His devotees, kill all your threatening enemies. The holy name of the Lord is as powerful as the Lord Himself. Therefore, simply by chanting and hearing the holy name of the Lord, many men can be fully protected from fierce death without difficulty. Thus a devotee is saved.