गंगावतरण और रामजन्म की कथा

राजासगर ने अश्वमेघ यज्ञ किया, यज्ञ का घोड़ा इन्द्र चुरा कर ले गये और कपिलदेव के आश्रम वो घोड़ा बाँध दिया और वहाँ से अंतर्धान हो गये, सगर के पुत्रों ने जमीन को इतना खोदा कि सागर बना दिया, इसका नाम पहले समुद्र ही था, लेकिन सगर के पुत्रों ने इसे खोदकर इतना चौड़ा बना दिया, इसलिये इसका नाम सागर पड गया।

घोड़े को ढुंढते ढुंढते आगे बढ़े तो देखा कि वहीं घोड़ा कपिल मुनि के आश्रम में बँधा हुआ है, सगर पुत्रों ने कपिल मुनि को ही चोर समझ कर मारने दौड़े, कपिलदेव की आँखे खुलते ही सब जलकर भस्म हो गये, दुसरी माता के पुत्र के असमंजन ने भगवान् कपिल से प्रार्थना कि, हे प्रभु! मेरे भाई अबोध थे, उनके किये का हमें बहुत अफसोस है, हमें क्षमा करें और उन सभी के मुक्ति के लिए रास्ता बतायें।

महात्मा कपिल ने कहा- भगवान् वामन के चरणों से प्रकट जो गंगा है यदि उस गंगा का जल इन्हें स्पर्श हो जाये तो मुक्ति संभव है, अंशुमान ने ब्रह्मलोक से गंगाजी को उतार कर लाने के लिये बहुत तपश्चर्या की परन्तु गंगाजी का उन्हें दर्शन नहीं हुआ, बाद में उनके पुत्रों ने भी गंगाजी को लाने के लिये उग्र तपस्या की, वे भी सफल नहीं हो सके।

उनके पश्चात् उनके पुत्र भगीरथ की तपस्या से प्रसन्न होकर माँ गंगा दो-तीन शर्त मनवाकर आयीं, गंगाजी ब्रह्माजी के कमण्डलु से निकलकर पहले ध्रुव लोक में आयी, फिर सप्तऋषि मंडल में आयी, वहाँ से शिवजी की जटा में पधारी, फिर सुमेरू पर, फिर हिमालय पर, फिर हिमालय से निकलना आरम्भ किया, भगीरथ के साथ गंगा पधारी, सगर के पुत्रों की भस्म का स्पर्श किया उन्हें सदगति प्राप्त हुई।

महापराक्रमी भगीरथ के वंश में राजा खट्वांग हुए, फिर दीर्घबाहु हुए, फिर रघु हुए, रघु महाराज की कीर्ति बहुत फैली और सूर्यवंश रघुवंश के नाम से प्रसिद्ध हो गया, रघु के हुए दिलीप, दिलीप के हुए अज, अज राजा के पुत्र हुए दशरथजी, महाराज दशरथजी परम तपस्वी, तेजस्वी और महा पराक्रमी थे, वे अयोध्या में राज करते थे।

तीन पत्नियाँ होने पर भी राजा निःसंतान थे, वशिष्ठजी के पास गये, वशिष्ठजी ने कहा पुत्रकाष्टि यज्ञ करो, राजन्! इस यज्ञ से तुम्हारे चार पुत्र होंगे, राजा ने पुत्रकाष्टि यज्ञ किया तो यज्ञकुण्ड से क्षीर का चरू लेकर स्वयं अग्निदेव प्रकट हो गये और राजा से कहा- इन्हें अपनी रानीयों को खिला देना, आपके यहाँ दिव्य संतान होगी।

गुरु वशिष्ठजी की आज्ञा से बड़ी रानी कौशल्याजी को अर्धभाग और अर्ध भाग सुमित्राजी और कैकयीजी को बांट दिया, तीनों रानियाँ गर्भवती हो गयीं, पूरी अयोध्या नगरी को दुल्हन की तरह सजाया गया, सब लोगों के मन में आनन्द और उल्लास की लहर है।

नौमी तिथि मधुमास पुनीता। शुक्ल पक्ष अभिजित हरि प्रीता।

चैत्रमास के शुक्ल पक्ष की नौमी तिथि अभिजित मुहूर्त में दिन के ठीक बारह बजे श्री राघवेन्द्र प्रभु का प्राकट्य हुआ, बोलिये अवधेश कुमार रामजी लाला की जय! सशंख चक्रं सकिरीट कुण्डलं, सपीतवस्त्रं सरसीरूहेक्षणम्। सहारवक्षः स्थल कौस्तुभश्रियं नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्।।

ऐसी सुन्दर झाँकी, आप दर्शन करें! मंद-मंद स्मित हास्य कर रहे हैं, मुस्कुरा रहे हैं प्रभु, शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किये खड़े हैं, माता कौशल्याजी गद् गद् हो गयीं, लेकिन एक बात- किसी को भी पता नहीं, दशरथजी को भी पता नहीं, सैनिक, मंत्री किसी को भी पता नहीं प्रभु रामजी के प्राकट्य का, इसीलिये कहते हैं- “कौशल्या हितकारी“।

माता ने दर्शन किया, भगवान् ने कहा- आपको याद है, पूर्व जन्म में आपने तपस्या की थी और आपने कहा था- “चाहहुं तुमहिं समान सुत प्रभु सन कवन दुराव” तो मैंने आपसे कह दिया था- आप सरिस खोजहुँ कहाँ जाई। नृप तव तनय होहुँ मैं आई।। इसलिये आपका पुत्र बनकर आ गया, माता! बाहर बड़ी भीड़ लगी है, दुनियां मुझे देखने खड़ी है, आप जल्दी द्वार खोलो जल्दी दर्शन करेंगे सब, कौशल्याजी बोली- मैने आपको पुत्र बनकर आने को कहा था, आप तो पिताजी बनकर पधारे हैं, ये शंख, चक्र, गदा, पद्म लेकर क्यों पधारे हैं, ऐसा कोई बेटा होता है क्या?

रामजी बोले- माता! हम तो जहां कहीं पुत्र बनते हैं, ऐसे ही बनते हैं, आप हमको पुत्र बोलो हम आपको माता बोलें, हो गया बेटा। मैया बोली- ये तो ठीक है लेकिन चार हाथ का बेटा होता है क्या? भगवान् ने कहा- अच्छा माँ अब मैं आप कहो जैसे करू, अब माँ कह रही है और प्रभु मेकप कर रहे हैं।

मां ने कहा मनुष्य के चार हाथ नहीं होते, ये दो हाथ हटा दो, तो सज्जनों! रामजी ने दो हाथ हटा दिये, दो हाथ के हो गये प्रभु और मैया से बोले, अब तो पुत्र हो गया अब तो द्वार खोलिये। मैया बोली- जन्म लेते ही बच्चा छः फूट लम्बा थोड़े ही न होता है छोटे बन जाओ तो रामजी छोटे हो गये, मैया अब तो मैं छोटा हो गया, मैया ने कहा- कपड़े तो खोलो, रामजी ने कहा- माँ आप मुझे बहुत परेशान करती हो, कभी कहती हैं दो हाथ हटाओ, कभी आप कहती हैं छोटे हो जाओ, कभी आप कहती हैं नंगे हो जाओ, नंगे काहे को होवें?

माँ ने कहा बच्चे का जन्म होता है तो बच्चा तो बच्चा तो नंगा ही होता हैं। माता पुनि बोली सो मति डोली, तजहिं तात यह रूपा। कीजे शिशु लीला अति प्रियशीलां यह सुख परम अनूपा।। सो रामजी नंगे हो गये, जब छोटे से हो गये तो नंगे होने में क्या लगता है? हो गये नंगे, मैया ने पलना में सुला दिया, अब तो द्वार खोलो मैया, मुझे सब देखना चाहते हैं, मैया बोली- रोओ तो सही, भगवान् ने कहा रोए क्यों? मां ने कहा जब बच्चे का जन्म होता है तो बच्चा तो रोता है, तुम तो बूढ़े कि तरह हंस रहे हो।

सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होई बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरि पद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।

रामजी रोने लगे, रूदन करने लगे, आकाश मंडल में देवताओं की भीड़ लगी है दर्शन करने के लिये, बारह बजे चन्द्र सूर्य से कहता है आगे चलो, सूर्य कहता है नहीं जाता प्रभु मेरे वंश में आये हैं, मुझे दर्शन करने हैं, रामजी ने चन्द्रमा से कहा दुःखी क्यों होते हो? चन्द्रमा बोले- एक तो आपने दिन में अवतार लिया, वो भी सूर्यवंश में।

रामजी ने चन्द्रमा से कहा- चिन्ता क्यों करते हो? इस बार सूर्यवंश में आया हूं, अगली बार चन्द्र वंश में आऊँगा, इस बार दिन के बारह बजे आया, अगली बार रात्रि के बारह बजे आऊँगा, अभी भी तुम्हें प्रसन्नता नहीं है तो सुनो चन्द्रमाजी- आज से मेरे नाम के आगे तुम्हारा नाम जोड़ देता हूँ, अब तो राजी, लोग मुझे रामचन्द्र कहेंगे। श्री रामचन्द्रजी भगवान् की जय! जय श्री रामचन्द्रजी!..