श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – अट्ठारहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Eighteen

श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – अट्ठारहवां अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Eighteen

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: अष्टादश अध्यायः

श्लोक 1-32

पृथ्वी-दोहन

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इस समय महाराज पृथु के होठ क्रोध से काँप रहे थे। उनकी इस प्रकार स्तुति कर पृथ्वी ने अपने हृदय को विचारपूर्वक समाहित किया और डरते-डरते उनसे कहा। ‘प्रभो! आप अपना क्रोध शान्त कीजिये और मैं जो प्रार्थना करती हूँ, उसे ध्यान देकर सुनिये।

बुद्धिमान् पुरुष भ्रमर के समान सभी जगह से सार ग्रहण कर लेते हैं। तत्त्वदर्शी मुनियों ने इस लोक और परलोक में मनुष्यों का कल्याण करने के लिये कृषि, अग्निहोत्र आदि बहुत-से उपाय निकाले और काम में लिये हैं। उन प्राचीन ऋषियों के बताये हुए उपायों का इस समय भी जो पुरुष श्रद्धापूर्वक भलीभाँति आचरण करता है, वह सुगमता से अभीष्ट फल प्राप्त कर लेता है। परन्तु जो अज्ञानी पुरुष उनका अनादर करके अपने मनःकल्पित उपायों का आश्रय लेता है, उसके सभी उपाय और प्रयत्न बार-बार निष्फल होते रहते हैं।

राजन्! पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने जिन धान्य आदि को उत्पन्न किया था, मैंने देखा कि यम-नियमादि व्रतों का पालन न करने वाले दुराचारी लोग ही उन्हें खाये जा रहे हैं। लोकरक्षक! आप लोगों ने मेरा पालन और आदर करना छोड़ दिया; इसलिये सब लोग चोरों के समान हो गये हैं। इसी से यज्ञ के लिये ओषधियों को मैंने अपने में छिपा लिया। अब अधिक समय हो जाने से अवश्य ही वे धान्य मेरे उदर में जीर्ण हो गये हैं; आप उन्हें पूर्वाचार्यो के बतलाये हुए उपाय से निकाल लीजिये। लोकपालक वीर! यदि आपको समस्त प्राणियों के अभीष्ट एवं बल की वृद्धि करने वाले अन्न की आवश्यकता है तो आप मेरे योग्य बछड़ा, दोहनपात्र और दुहने वाले की व्यवस्था कीजिये; मैं उस बछड़े के स्नेह से पिन्हाकर दूध के रूप में आपको सभी अभीष्ट वस्तुएँ दे दूँगी।

राजन्! एक बात और है; आपको मुझे समतल करना होगा, जिससे कि वर्षा-ऋतु बीत जाने पर भी मेरे ऊपर इन्द्र का बरसाया हुआ जल सर्वत्र बना रहे-मेरे भीतर की आर्द्रता सूखने न पावे। यह आपके लिये बहुत मंगलकारक होगा’।

पृथ्वी के कहे हुए ये प्रिय और हितकारी वचन स्वीकार कर महाराज पृथु ने स्वयाम्भुव मनु को बछड़ा बना अपने हाथ में ही समस्त धान्यों को दुह लिया। पृथु के समान अन्य विज्ञजन भी सब जगह से सार ग्रहण कर लेते हैं, अतः उन्होंने भी पृथु जी के द्वारा वश में की हुई वसुन्धरा से अपनी-अपनी अभीष्ट वस्तुएँ दुह लीं। ऋषियों ने बृहस्पति जी को बछड़ा बनाकर इन्द्रिय (वाणी, मन और श्रोत्र) रूप पात्र में पृथ्वीदेवी से वेदरूप पवित्र दूध दुहा। देवताओं ने इन्द्र को बछड़े के रूप में कल्पना कर सुवर्णमय पात्र में अमृत, वीर्य (मनोबल), ओज (इन्द्रियबल) और शारीरिक बलरूप दूध दुहा। दैत्य और दानवों ने असुरश्रेष्ठ प्रह्लाद जी को वत्स बनाकर लोहे के पात्र में मदिरा और आसव (ताड़ी आदि) रूप दूध दुहा। गन्धर्व और अप्सराओं ने विश्वावसु को बछड़ा बनाकर कमलरूप पात्र में संगीतमाधुर्य और सौन्दर्य रूप दूध दुहा। श्राद्ध के अधिष्ठाता महाभाग पितृगण ने अर्यमा नाम के पित्रीश्वर को वत्स बनाया तथा मिट्टी के कच्चे पात्र में श्रद्धापूर्वक कव्य (पितरों को अर्पित किया जाने वाला अन्न) रूप दूध दुहा।

फिर कपिलदेव जी को बछड़ा बनाकर आकाशरूप पात्र में सिद्धों ने अणिमादि अष्टसिद्धि तथा विद्याधरों ने आकाशगमन आदि विद्याओं को दुहा।

किम्पुरुषादि अन्य मायावियों ने मय दानव को बछड़ा बनाया तथा अन्तर्धान होना, विचित्र रूप धारण कर लेना आदि संकल्पमयी मायाओं को दुग्ध रूप से दुहा।

इसी प्रकार यक्ष-राक्षस तथा भूत-पिशाचादि मांसाहारियों ने भूतनाथ रुद्र को बछड़ा बनाकर कपालरूप पात्र में रुधिरासवरूप दूध दुहा।

बिना फन वाले साँप, फन वाले साँप, नाग और बिच्छू आदि विषैले जन्तुओं ने तक्षक को बछड़ा बनाकर मुखरूप पात्र में विषरूप दूध दुहा। पशुओं ने भगवान् रुद्र के वाहन बैल को वत्स बनाकर वनरूप पात्र में तृणरूप दूध दुहा। बड़ी-बड़ी दाढ़ों वाले मांसभक्षी जीवों ने सिंहरूप बछड़े के द्वारा अपने शरीररूप पात्र में कच्चा मांसरूप दूध दुहा तथा गरुड़ जी को वत्स बनाकर पक्षियों ने कीट-पतंगादि चर और फलादि अचर पदार्थों को दुग्ध रूप से दुहा। वृक्षों ने वट को वत्स बनाकर अनेक प्रकार का रसरूप दूध दुहा और पर्वतों ने हिमालयरूप बछड़े के द्वारा अपने शिखररूप पात्रों में अनेक प्रकार की धातुओं को दुहा।

पृथ्वी तो सभी अभीष्ट वस्तुओं को देने वाली है और इस समय वह पृथु जी के अधीन थी। अतः उससे सभी ने अपनी-अपनी जाति के मुखिया को बछड़ा बनाकर अलग-अलग पात्रों में भिन्न-भिन्न प्रकार के पदार्थों को दूध के रूप में दुह लिया।

कुरुश्रेष्ठ विदुर जी! इस प्रकार पृथु आदि सभी अन्न-भोजियों ने भिन्न-भिन्न दोहन-पात्र और वत्सों के द्वारा अपने-अपने विभिन्न अन्नरूप दूध पृथ्वी से दुहे। इससे महाराज पृथु ऐसे प्रसन्न हुए कि सर्वकामदुहा पृथ्वी के प्रति उनका पुत्री के समान स्नेह हो गया और उसे उन्होंने अपनी कन्या के रूप में स्वीकार कर लिया। फिर राजाधिराज पृथु ने अपने धनुष की नोक से पर्वतों को फोड़कर इस सारे भूमण्डल को प्रायः समतल कर दिया। वे पिता के समान अपनी प्रजा के पालन-पोषण की व्यवस्था में लगे हुए थे। उन्होंने इस समतल भूमि में प्रजावर्ग के लिये जहाँ-तहाँ यथायोग्य निवासस्थानों का विभाग किया। अनेकों गाँव, कस्बें, नगर, दुर्ग, अहीरों की बस्ती, पशुओं के रहने के स्थान, छावनियाँ, खानें, किसानों के गाँव और पहाड़ों की तलहटी के गाँव बसाये। महाराज पृथु से पहले इस पृथ्वीतल पर पुर-ग्रामादि का विभाग नहीं था; सब लोग अपने-अपने सुभीते के अनुसार बेखटे जहाँ-तहाँ बस जाते थे।

Chapter Eighteen: Prthu Maharaja Milks the Earth Planet

1. The great saint Maitreya continued to address Vidura: My dear Vidura, at that time, after the planet earth finished her prayers, King Prthu was still not pacified, and his lips trembled in great anger. Although the planet earth was frightened, she made up her mind and began to speak as follows in order to convince the King.

2. My dear Lord, please pacify your anger completely and hear patiently whatever I submit before you. Please turn your kind attention to this. I may be very poor, but a learned man takes the essence of knowledge from all places, just as a bumblebee collects honey from each and every flower.

3. To benefit all human society, not only in this life but in the next, the great seers and sages have prescribed various methods conducive to the prosperity of the people in general.

4. One who follows the principles and instructions enjoined by the great sages of the past can utilize these instructions for practical purposes. Such a person can very easily enjoy life and pleasures.

5. A foolish person who manufactures his own ways and means through mental speculation and does not recognize the authority of the sages who lay down unimpeachable directions is simply unsuccessful again and again in his attempts.

6. My dear King, the seeds, roots, herbs and grains, which were created by Lord Brahma in the past, are now being used by nondevotees, who are devoid of all spiritual understanding.

7. My dear King, not only are grains and herbs being used by nondevotees, but, as far as I am
concerned, I am not being properly maintained. Indeed, I am being neglected by kings who are not punishing these rascals who have turned into thieves by using grains for sense gratification.
Consequently I have hidden all these seeds, which were meant for the performance of sacrifice.

8. Due to being stocked for a very long time, all the grain seeds within me have certainly deteriorated. Therefore you should immediately arrange to take these seeds out by the standard process, which is recommended by the acaryas or sastras.

9-10. O great hero, protector of living entities, if you desire to relieve the living entities by supplying them sufficient grain, and if you desire to nourish them by taking milk from me, you should make arrangements to bring a calf suitable for this purpose and a pot in which the milk can be kept, as well as a milkman to do the work. Since I will be very much affectionate towards my calf, your desire to take milk from me will be fulfilled.

11. My dear King, may I inform you that you have to make the entire surface of the globe level. This will help me, even when the rainy season has ceased. Rainfall comes by the mercy of King Indra. Rainfall will remain on the surface of the globe, always keeping the earth moistened, and thus it will be auspicious for all kinds of production.

12. After hearing the auspicious and pleasing words of the planet earth, the King accepted them. He then transformed Svayambhuva Manu into a calf and milked all the herbs and grains from the earth in the form of a cow, keeping them in his cupped hands.

13. Others, who were as intelligent as King Prthu, also took the essence out of the earthly planet.
Indeed, everyone took this opportunity to follow in the footsteps of King Prthu and get whatever he desired from the planet earth.

14. All the great sages transformed Brhaspati into a calf, and making the senses into a pot, they milked all kinds of Vedic knowledge to purify words, mind and hearing.

15. All the demigods made Indra, the King of heaven, into a calf, and from the earth they milked the beverage soma, which is nectar. Thus they became very powerful in mental speculation and bodily and sensual strength.

16. The sons of Diti and the demons transformed Prahlada Maharaja, who was born in an asura family, into a calf, and they extracted various kinds of liquor and beer, which they put into a pot made of iron.

17. The inhabitants of Gandharvaloka and Apsaroloka made Visvavasu into a calf, and they drew the milk into a lotus flower pot. The milk took the shape of sweet musical art and beauty.

18. The fortunate inhabitants of Pitrloka, who preside over the funeral ceremonies, made Aryama into a calf. With great faith they milked kavya, food offered to the ancestors, into an unbaked earthen pot.

19. After this, the inhabitants of Siddhaloka, as well as the inhabitants of Vidyadhara-loka, transformed the great sage Kapila into a calf, and making the whole sky into a pot, they milked out specific yogic mystic powers, beginning with anima. Indeed, the inhabitants of Vidyadhara-loka acquired the art of flying in the sky.

20. Others also, the inhabitants of planets known as Kimpurusa-loka, made the demon Maya into a calf, and they milked out mystic powers by which one can disappear immediately from another’s vision and appear again in a different form.

21. Then the Yaksas, Raksasas, ghosts and witches, who are habituated to eating flesh, transformed Lord Shiva’s incarnation Rudra [Bhutanatha] into a calf and milked out  beverages made of blood and put them in a pot made of skulls.

22. Thereafter cobras and snakes without hoods, large snakes, scorpions and many other poisonous animals took poison out of the planet earth as their milk and kept this poison in snake holes. They made a calf out of Taksaka.

23-24. The four-legged animals like the cows made a calf out of the bull who carries Lord Siva and made a milking pot out of the forest. Thus they got fresh green grasses to eat. Ferocious animals like tigers transformed a lion into a calf, and thus they were able to get flesh for milk. The birds made a calf out of Garuda and took milk from the planet earth in the form of moving insects and nonmoving plants and grasses.

25. The trees made a calf out of the banyan tree, and thus they derived milk in the form of many
delicious juices. The mountains transformed the Himalayas into a calf, and they milked a variety of minerals into a pot made of the peaks of hills.

26. The planet earth supplied everyone his respective food. During the time of King Prthu, the earth was fully under the control of the King. Thus all the inhabitants of the earth could get their food supply by creating various types of calves and putting their particular types of milk in various pots.

27. My dear Vidura, chief of the Kurus, in this way King Prthu and all the others who subsist on food created different types of calves and milked out their respective eatables. Thus they received their various foodstuffs, which were symbolized as milk.

28. Thereafter King Prthu was very satisfied with the planet earth, for she sufficiently supplied all food to various living entities. Thus he developed an affection for the planet earth, just as if she were his own daughter.

29. After this, the king of all kings, Maharaja Prthu, leveled all rough places on the surface of the globe by breaking up the hills with the strength of his bow. By his grace the surface of the globe almost became flat.

30. To all the citizens of the state, King Prthu was as good as a father. Thus he was visibly engaged in giving them proper subsistence and proper employment for subsistence. After leveling the surface of the globe, he earmarked different places for residential quarters, inasmuch as they were desirable.

31. In this way the King founded many types of villages, settlements and towns and built forts,
residences for cowherdsmen, stables for the animals, and places for the royal camps, mining places, agricultural towns and mountain villages.

32. Before the reign of King Prthu there was no planned arrangement for different cities, villages,
pasturing grounds, etc. Every thing was scattered, and everyone constructed his residential quarters according to his own convenience. However, since King Prthu plans were made for towns and villages.

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श्रीमद्भागवत – तृतीय स्कंध – अट्ठारहवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Three – Chapter Eighteen

श्रीमद्भागवत महापुराण: तृतीय स्कन्ध: अष्टादश अध्यायः

श्लोक 1-26 का हिन्दी अनुवाद

हिरण्याक्ष के साथ वराह भगवान् का युद्ध

श्रीमैत्रेय जी ने कहा- तात! वरुण जी की यह बात सुनकर वह मदोन्मत्त दैत्य बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने उनके इस कथन पर कि ‘तू उनके हाथ से मारा जायेगा’ कुछ भी ध्यान नहीं दिया और चट नारद जी से श्रीहरि का पता लगाकर रसातल में पहुँच गया। वहाँ उसने विश्वविजयी वराह भगवान् को अपनी दाढ़ों की नोक पर पृथ्वी को ऊपर की ओर ले जाते हुए देखा। वे अपने लाल-लाल चमकीले नेत्रों से उसके तेज को हरे लेते थे। उन्हें देखकर वह खिलखिलाकर हँस पड़ा और बोला, ‘अरे! यह जंगली पशु यहाँ जल में कहाँ से आया’। फिर वराह जी से कहा, ‘रे नासमझ! इधर आ, इस पृथ्वी को छोड़ दे; इसे विश्वविधाता ब्रह्मा जी ने हम रसातलवासियों के हवाले कर दिया है। रे सूकररूपधारी सुराधम! मेरे देखते-देखते तू इसे लेकर कुशलपूर्वक नहीं जा सकता। तू माया से लुक-छिपकर ही दैत्यों को जीत लेता और मार डालता है। क्या इसी से हमारे शत्रुओं ने हमारा नाश कराने के लिये तुझे पाला है? मूढ़! तेरा बल तो योगमाया ही है और कोई पुरुषार्थ तुझमें थोड़े ही है। आज तुझे समाप्त कर मैं अपने बन्धुओं का शोक दूर करूँगा। जब मेरे हाथ से छूटी हुई गदा के प्रहार से सिर फट जाने के कारण तू मर जायेगा, तब तेरी आराधना करने वाले जो देवता और ऋषि हैं, वे सब भी जड़ कटे हुए वृक्षों की भाँति स्वयं ही नष्ट हो जायँगे’। हिरण्याक्ष भगवान् को दुर्वचन-बाणों से छेदे जा रहा था; परन्तु उन्होंने दाँत की नोक पर स्थित पृथ्वी को भयभीत देखकर वह चोट सह ली तथा जल से उसी प्रकार बाहर निकल आये, जैसे ग्राह की चोट खाकर हथिनी सहित गजराज। जब उसकी चुनौती का कोई उत्तर न देकर वे जल से बाहर आने लगे, तब ग्राह जैसे गज का पीछा करता है, उसी प्रकार पीले केश और तीखी दाढ़ों वाले उस दैत्य ने उनका पीछा किया तथा वज्र के समान कड़ककर वह कहने लगा, ‘तुझे भागने में लज्जा नहीं आती? सच है, असत् पुरुषों के लिये कौन-सा काम न करने योग्य है? भगवान् ने पृथ्वी को ले जाकर जल के ऊपर व्यवहार योग्य स्थान में स्थित कर दिया और उसमें अपनी आधारशक्ति का संचार किया। उस समय हिरण्याक्ष के सामने ही ब्रह्मा जी ने उनकी स्तुति की और देवताओं ने फूल बरसाये। तब श्रीहरि ने बड़ी भारी गदा लिये अपने पीछे आ रहे हिरण्याक्ष से, जो सोने के आभूषण और अद्भुत कवच धारण किये था तथा अपने कटुवाक्यों से उन्हें निरन्तर मर्माहत कर रहा था, अत्यन्त क्रोधपूर्वक हँसते हुए कहा। श्रीभगवान् ने कहा- अरे! सचमुच ही हम जंगली जीव हैं, जो तुझ-जैसे ग्रामसिंहों (कुत्तों) को ढूँढ़ते फिरते हैं। दुष्ट! वीर पुरुष तुझ-जैसे मृत्युपाश में बँधे हुए अभागे जीवों की आत्मश्लाघा पर ध्यान नहीं देते। हाँ, हम रसातलवासियों की धरोहर चुराकर और लज्जा छोड़कर तेरी गदा के भय से यहाँ भाग आये हैं। हममें ऐसी सामर्थ्य ही कहाँ कि तेरे-जैसे अद्वितीय वीर के सामने युद्ध में ठहर सकें। फिर भी हम जैसे-तैसे तेरे सामने खड़े हैं; तुझ-जैसे बलवानों से वैर बाँधकर हम जा भी कहाँ सकते हैं?

तू पैदल वीरों का सरदार है, इसलिये अब निःशंक होकर-उधेड़-बुन छोड़कर हमारा अनिष्ट करने का प्रयत्न कर और हमें मारकर अपने भाई-बन्धुओं के आँसू पोंछ। अब इसमें देर न कर। जो अपनी प्रतिज्ञा का पालन नहीं करता, वह असभ्य है-भले आदमियों में बैठने लायक नहीं है। मैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! जब भगवान् ने रोष से उस दैत्य का इस प्रकार खूब उपहास और तिरस्कार किया, वह पकड़कर खेलाये जाते हुए सर्प के समान क्रोध से तिलमिला उठा। वह खीझकर लम्बी-लम्बी साँसें लेने लगा, उसकी इन्द्रियाँ क्रोध से क्षुब्ध हो उठीं और उस दुष्ट दैत्य ने बड़े वेग से लपककर भगवान् पर गदा का प्रहार किया। किन्तु भगवान् ने अपनी छाती पर चलाई हुई शत्रु की गदा के प्रहार को कुछ टेढ़े होकर बचा लिया-ठीक वैसे ही, जैसे योगसिद्ध पुरुष मृत्यु के आक्रमण से अपने को बचा लेता है। फिर जब वह क्रोध से होठ चबाता अपनी गदा लेकर बार-बार घुमाने लगा, तब श्रीहरि कुपित होकर बड़े वेग से उसकी ओर झपटे। सौम्यस्वभाव विदुर जी! तब प्रभु ने शत्रु की दायीं भौंह पर गदा की चोट की, किन्तु गदायुद्ध में कुशल हिरण्याक्ष ने उसे बीच में ही अपनी गदा पर ले लिया। इस प्रकार श्रीहरि और हिरण्याक्ष एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से अत्यन्त क्रुद्ध होकर आपस में अपनी भारी गदाओं से प्रहार करने लगे। उस समय उन दोनों में ही जीतने की होड़ लग गयी, दोनों के ही अंग गदाओं की चोटों से घायल हो गये थे, अपने अंगों के घावों से बहने वाले रुधिर की गन्ध से दोनों का क्रोध बढ़ रहा था और वे दोनों ही तरह-तरह के पैतरे बदल रहे थे। इस प्रकार गौ के लिये आपस में लड़ने वाले दो साँडों के समान उन दोनों में एक-दूसरे को जीतने की इच्छा से बड़ा भयंकर युद्ध हुआ। विदुर जी! जब इस प्रकार हिरण्याक्ष और माया से वराह रूप धारण करने वाले भगवान् यज्ञमूर्ति पृथ्वी के लिये द्वेष बाँधकर युद्ध करने लगे, तब उसे देखने वहाँ ऋषियों के सहित ब्रह्मा जी आये। वे हजारों ऋषियों से घिरे हुए थे। जब उन्होंने देखा कि वह दैत्य बड़ा शूरवीर है, उसमें भय नाम भी नहीं है, वह मुकाबला करने में भी समर्थ है और उसके पराक्रम को चूर्ण करना बड़ा कठिन काम है, तब वे भगवान् आदिसूकररूप नारायण से इस प्रकार कहने लगे। श्रीब्रह्मा जी ने कहा- देव! मुझसे वर पाकर यह दुष्ट दैत्य बड़ा प्रबल हो गया है। इस समय यह आपके चरणों की शरण में रहने वाले देवताओं, ब्राह्मणों, गौओं तथा अन्य निरपराध जीवों को बहुत ही हानि पहुँचाने वाला, दुःखदायी और भयप्रद हो रहा है। इसकी जोड़ का और कोई योद्धा नहीं है, इसलिये यह महाकण्टक अपना मुकाबला करने वाले वीर की खोज में समस्त लोकों में घूम रहा है। यह दुष्ट बड़ा ही मायावी, घमण्डी और निरंकुश है। बच्चा जिस प्रकार क्रुद्ध हुए साँप से खेलता है; वैसे ही आप इससे खिलवाड़ न करें। देव! अच्युत! जब तक यह दारुण दैत्य अपनी बल-वृद्धि वेला को पाकर प्रबल हो, उससे पहले-पहले ही आप अपनी योगमाया को स्वीकार करके इस पापी को मार डालिये। प्रभो! देखिये, लोकों का संहार करने वाली सन्ध्या की भयंकर वेला आना ही चाहती है। सर्वात्मन्! आप उससे पहले ही इस असुर को मारकर देवताओं को विजय प्रदान कीजिये। इस समय अभिजित् नामक मंगलमय मुहूर्त का भी योग आ गया है। अतः अपन सुहृद् हम लोगों के कल्याण के लिये शीघ्र ही इस दुर्जय दैत्य से निपट लीजिये। प्रभो! इसकी मृत्यु आपके ही हाथ बदी है। हम लोगों के बड़े भाग्य हैं। अब आप युद्ध में बलपूर्वक इसे मारकर लोकों को शान्ति प्रदान कीजिये।

Chapter Eighteen: The Battle Between Lord Boar and the Demon Hiranyaksa

1. Maitreya continued: The proud and falsely glorious Daitya paid little heed to the words of Varuna. O dear Vidura, he learned from Narada the whereabouts of the Supreme Personality of Godhead and hurriedly betook himself to the depths of the ocean.

2. He saw there the all-powerful Personality of Godhead in His boar incarnation, bearing the earth upward on the ends of His tusks and robbing him of his splendor with His reddish eyes. The demon laughed: Oh, an amphibious beast!

3. The demon addressed the Lord: O best of the demigods, dressed in the form of a boar, just hear me. This earth is entrusted to us, the inhabitants of the lower regions, and You cannot take it from my presence and not be hurt by me.

4. You rascal, You have been nourished by our enemies to kill us, and You have killed some demons by remaining invisible. O fool, Your power is only mystic, so today I shall enliven my kinsmen by killing you.

5. The demon continued: When You fall dead with Your skull smashed by the mace hurled by my arms, the demigods and sages who offer You oblations and sacrifice in devotional service will also automatically cease to exist, like trees without roots.

6. Although the Lord was pained by the shaftlike abusive words of the demon, He bore the pain. But seeing that the earth on the ends of His tusks was frightened, He rose out of the water just as an elephant emerges with its female companion when assailed by an alligator.

7. The demon, who had golden hair on his head and fearful tusks, gave chase to the Lord while He was rising from the water, even as an alligator would chase an elephant. Roaring like thunder, he said: Are You not ashamed of running away before a challenging adversary? There is nothing reproachable for shameless creatures!

8. The Lord placed the earth within His sight on the surface of the water and transferred to her His own energy in the form of the ability to float on the water. While the enemy stood looking on, Brahma, the creator of the universe, extolled the Lord, and the other demigods rained flowers on Him.

9. The demon, who had a wealth of ornaments, bangles and beautiful golden armor on his body,
chased the Lord from behind with a great mace. The Lord tolerated his piercing ill words, but in order to reply to him, He expressed His terrible anger.

10. The Personality of Godhead said: Indeed, We are creatures of the jungle, and We are searching
after hunting dogs like you. One who is freed from the entanglement of death has no fear from the loose talk in which you are indulging, for you are bound up by the laws of death.

11. Certainly We have stolen the charge of the inhabitants of Rasatala and have lost all shame.
Although bitten by your powerful mace, I shall stay here in the water for some time because, having created enmity with a powerful enemy, I now have no place to go.

12. You are supposed to be the commander of many foot soldiers, and now you may take prompt steps to overthrow Us. Give up all your foolish talk and wipe out the cares of your kith and kin by slaying Us. One may be proud, yet he does not deserve a seat in an assembly if he fails to fulfill his promised word.

13. Sri Maitreya said: The demon, being thus challenged by the Personality of Godhead, became angry and agitated, and he trembled in anger like a challenged cobra.

14. Hissing indignantly, all his senses shaken by wrath, the demon quickly sprang upon the Lord and dealt Him a blow with his powerful mace.

15. The Lord, however, by moving slightly aside, dodged the violent mace-blow aimed at His breast by the enemy, just as an accomplished yogi would elude death.

16. The Personality of Godhead now exhibited His anger and rushed to meet the demon, who bit his lip in rage, took up his mace again and began to repeatedly brandish it about.

17. Then with His mace the Lord struck the enemy on the right of his brow, but since the demon was expert in fighting, O gentle Vidura, he protected himself by a maneuver of his own mace.

18. In this way, the demon Haryaksa and the Lord, the Personality of Godhead, struck each other with their huge maces, each enraged and seeking his own victory.

19. There was keen rivalry between the two combatants; both had sustained injuries on their bodies from the blows of each other’s pointed maces, and each grew more and more enraged at the smell of blood on his person. In their eagerness to win, they performed maneuvers of various kinds, and their contest looked like an encounter between two forceful bulls for the sake of a cow.

20. O descendant of Kuru, Brahma, the most independent demigod of the universe, accompanied by his followers, came to see the terrible fight for the sake of the world between the demon and the Personality of Godhead, who appeared in the form of a boar.

21. After arriving at the place of combat, Brahma, the leader of thousands of sages and
transcendentalists, saw the demon, who had attained such unprecedented power that no one could fight with him. Brahma then addressed Narayana, who was assuming the form of a boar for the first time.

22-23. Lord Brahma said: My dear Lord, this demon has proved to be a constant pinprick to the demigods, the brahmanas, the cows and innocent persons who are spotless and always dependent upon worshiping Your lotus feet. He has become a source of fear by unnecessarily harassing them. Since he has attained a boon from me, he has become a demon, always searching for a proper combatant, wandering all over the universe for this infamous purpose.

24. Lord Brahma continued: My dear Lord, there is no need to play with this serpentine demon, who is always very skilled in conjuring tricks and is arrogant, self-sufficient and most wicked.

25. Brahma continued: My dear Lord, You are infallible. Please kill this sinful demon before the
demoniac hour arrives and he presents another formidable approach favorable to him. You can kill him by Your internal potency without doubt.

26. My Lord, the darkest evening, which covers the world, is fast approaching. Since You are the Soul of all souls, kindly kill him and win victory for the demigods.

श्रीमद्भागवत – प्रथम स्कंध – अट्ठारहवाँ अध्याय

श्रीमद्भागवत – प्रथम स्कंध – अट्ठारहवाँ अध्याय

राजा परीक्षित को श्रृंगी ऋषि का शाप

सूत उवाच:-
यो वै द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टो न मातुरुदरे मृतः
अनुग्रहाद्भगवतः कृष्णस्याद्भुतकर्मणः 1

सूतजी कहते हैं —– अदभुत कर्मा भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से राजा परीक्षित अपनी माता की कोख में अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से जल जाने पर भी मरे नहीं ।।1।।

ब्रह्मकोपोत्थिताद्यस्तु तक्षकात्प्राणविप्लवात्
न सम्मुमोहोरुभयाद्भगवत्यर्पिताशयः 2

जिस समय ब्राह्मण के शाप से उन्हें डसने के लिये तक्षक आया, उस समय वे प्राणनाथ के महान भय से भयभीत नहीं हुए; क्योंकि उन्होंने अपना चित्त भगवान् श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित कर रखा था ।।2।।

उत्सृज्य सर्वतः सङ्गं विज्ञाताजितसंस्थितिः
वैयासकेर्जहौ शिष्यो गङ्गायां स्वं कलेवरम् 3

उन्होंने सबकी आसक्ति छोड़ दी, गंगातटपर जाकर श्रीशुकदेवजी से उपदेश ग्रहण किया और इस प्रकार भगवान् के स्वरुप को जानकार अपने शरीर को त्याग दिया ।।3।।

नोत्तमश्लोकवार्तानां जुषतां तत्कथामृतम्
स्यात्सम्भ्रमोऽन्तकालेऽपि स्मरतां तत्पदाम्बुजम् 4

जो लोग भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाकथा कहते रहते हैं, उस कथामृत का पान करते रहते हैं, उन्हें अन्तकाल में भी मोह नही होता ।।4।।

तावत्कलिर्न प्रभवेत्प्रविष्टोऽपीह सर्वतः
यावदीशो महानुर्व्यामाभिमन्यव एकराट् 5

जबतक पृथ्वी पर अभिमन्युनन्दन महाराज परीक्षित सम्राट रहे, तबतक चारों ओर व्याप्त हो जानेपर भी कलियुग का कुछ भी प्रभाव नहीं था ।।5।।

यस्मिन्नहनि यर्ह्येव भगवानुत्ससर्ज गाम्
तदैवेहानुवृत्तोऽसावधर्मप्रभवः कलिः 6

वैसे तो जिस दिन, जिस क्षण श्रीकृष्ण ने पृथ्वी का परित्याग किया, उसी समय पृथ्वी में अधर्म का मूलकारण कलियुग आ गया था ।।6।।

नानुद्वेष्टि कलिं सम्राट्सारङ्ग इव सारभुक्
कुशलान्याशु सिद्ध्यन्ति नेतराणि कृतानि यत् 7

भ्रमर के समान सारग्राही सम्राट परीक्षित कलियुग से कोई द्वेष नहीं रखते थे; क्योंकि इसमें यह एक बहुत बड़ा गुण हैं कि पूण्यकर्म तो संकल्पमात्र से ही फलीभूत हो जाते हैं, परन्तु पापकर्म का फल शरीर से करने पर ही मिलता है; संकल्पमात्र से नहीं ।।7।।

किं नु बालेषु शूरेण कलिना धीरभीरुणा
अप्रमत्तः प्रमत्तेषु यो वृको नृषु वर्तते 8

यह भेड़िया के समान बालकों के प्रति शूरवीर और धीर वीर पुरुषों के लिये बड़ा भीरु है। यह प्रमादी मनुष्यों को अपने वश में करने के लिए ही सदा सावधान रहता है ।।8।।

उपवर्णितमेतद्वः पुण्यं पारीक्षितं मया
वासुदेवकथोपेतमाख्यानं यदपृच्छत 9

शौनकादि ऋषियों ! आपलोगों को मैंने भगवान् की कथा से युक्त राजा परीक्षित का पवित्र चरित्र सुनाया। आपलोगों ने यही पूछा था ।। 9।।

या याः कथा भगवतः कथनीयोरुकर्मणः
गुणकर्माश्रयाः पुम्भिः संसेव्यास्ता बुभूषुभिः 10

भगवान् श्रीकृष्ण कीर्तन करनेयोग्य बहुत -सी लीलाओं से सम्बन्ध रखनेवाली जितनी भी कथाएँ हैं, कल्याणकामी पुरुषों को उन सबका सेवन करना चाहिये ।।10।।

ऋषय ऊचुः
सूत जीव समाः सौम्य शाश्वतीर्विशदं यशः
यस्त्वं शंससि कृष्णस्य मर्त्यानाममृतं हि नः 11

ऋषियों ने कहा —- सौम्यस्वाभाव सूतजी ! आप युग-युग जियें ; क्योंकि मृत्यु के प्रवाह में पड़े हुए हम लोगों को आप भगवान् श्रीकृष्ण की अमृतमयी उज्जवल कीर्ति का श्रवण कराते हैं ।।11।।

कर्मण्यस्मिन्ननाश्वासे धूमधूम्रात्मनां भवान्
आपाययति गोविन्द पादपद्मासवं मधु 12

यज्ञ करते -करते उसके धुएँ से हमलोगों का शरीर धूमिल हो गया है। फिर भी इस कर्म का कोई विश्वास नहीं हैं। इधर आप तो वर्तमान में ही भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र के चरणकमलों का मादक और मधुर मधु पिलाकर हमें तृप्त कर रहे हैं ।।12।।

तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम्
भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः 13

भगवत -प्रेमी भक्तों के लवमात्र के सत्संग से स्वर्ग एवं मोक्ष की की भी तुलना नहीं की जा सकती; फिर मनुष्यों के तुच्छ भोगों की तो बात ही क्या है ।।13।।

को नाम तृप्येद्रसवित्कथायां महत्तमैकान्तपरायणस्य
नान्तं गुणानामगुणस्य जग्मुर्योगेश्वरा ये भवपाद्ममुख्याः 14

ऐसा कौन रस -मर्मज्ञ होगा , जो महापुरुषों के एकमात्र जीवनसर्वस्व श्रीकृष्ण की लीला -कथाओं से तृप्त हो जाय ? समस्त प्राकृत गुणों से अतीत भगवान् के अचिन्त्य अनन्त कल्याणमय गुणगणों का पार तो ब्रह्मा,शंकर आदि बड़े -बड़े योगेश्वर भी नहीं पा सके ।।14।।

तन्नो भवान्वै भगवत्प्रधानो महत्तमैकान्तपरायणस्य
हरेरुदारं चरितं विशुद्धं शुश्रूषतां नो वितनोतु विद्वन् 15

विद्वन ! आप भगवान् को ही अपने जीवन का ध्रुवतारा मानते हैं। इसलिए आप सत्पुरुषों के एकमात्र आश्रय भगवान् के उदार और विशुद्ध चरित्रों का हम श्रद्धालु श्रोताओं के लिये विस्तार से वर्णन कीजिये ।।15।।

स वै महाभागवतः परीक्षिद्येनापवर्गाख्यमदभ्रबुद्धिः
ज्ञानेन वैयासकिशब्दितेन भेजे खगेन्द्रध्वजपादमूलम् 16
तन्नः परं पुण्यमसंवृतार्थमाख्यानमत्यद्भुतयोगनिष्ठम्
आख्याह्यनन्ताचरितोपपन्नं पारीक्षितं भागवताभिरामम् 17

भगवान् के परम प्रेमी महाबुद्धि परीक्षित ने श्रीशुकदेवजी के उपदेश किया हुए जी ज्ञान से मोक्षस्वरुप भगवान् के चरणकमलों को प्राप्त किया, आप कृपा करके उसी ज्ञान और परीक्षित के परम पवित्र उपाख्यान का वर्णन कीजिये; क्योंकि उसमें कोई बात छिपाकर नहीं कही गयी होगी और भगवत्प्रेमी की अद्भूत योगनिष्ठाका निरूपण किया गया होगा। उसमें पद -पदपर भगवान् श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन हुआ होगा। भगवान् के प्यारे भक्तों को वैसा प्रसंग सुनने में बड़ा रस मिलता है ।।16-17।।

सूत उवाच
अहो वयं जन्मभृतोऽद्य हास्म वृद्धानुवृत्त्यापि विलोमजाताः
दौष्कुल्यमाधिं विधुनोति शीघ्रं महत्तमानामभिधानयोगः 18

सूतजी कहते हैं —– अहो ! विलोम जाति में उत्पन्न होने पर भी महात्माओं की सेवा करने के कारन आज हमारा जन्म सफल हो गया। क्योंकि महापुरुषों के साथ बातचीत करनेमात्र से ही नीच कुल में उत्पन्न होने की मनोव्यथा शीघ्र ही मिट जाती है ।।18।।

कुतः पुनर्गृणतो नाम तस्य महत्तमैकान्तपरायणस्य
योऽनन्तशक्तिर्भगवाननन्तो महद्गुणत्वाद्यमनन्तमाहुः 19

फिर उन लोगों की तो बात ही क्या है, जो सत्पुरुषों के एकमात्र आश्रय भगवान् का नाम लेते हैं भगवान् की शक्ति अनन्त है, वे स्वयं अनन्त हैं। वास्तव में उनके गुणों की अनन्तता के कारण ही उन्हें अनंत कहा गया है ।।19।।

एतावतालं ननु सूचितेन गुणैरसाम्यानतिशायनस्य
हित्वेतरान्प्रार्थयतो विभूतिर्यस्याङ्घ्रिरेणुं जुषतेऽनभीप्सोः 20

भगवान् के गुणों की समता भी जब कोई नहीं कर सकता, तब उनसे बढ़कर तो कोई हो ही कैसे सकता है। उनके गुणों की यह विशेषता समझाने के लिये इतना कह देना ही पर्याप्त है कि लक्ष्मीजी अपने को प्राप्त करने की इच्छा से प्रार्थना करनेवाले ब्रह्मादि देवताओं को छोड़कर भगवान् के न चाहनेपर भी उनके चरणकमलों की रजका ही सेवन करती हैं ।।20।।

अथापि यत्पादनखावसृष्टं जगद्विरिञ्चोपहृतार्हणाम्भः
सेशं पुनात्यन्यतमो मुकुन्दात्को नाम लोके भगवत्पदार्थः 21

ब्रह्माजी ने भगवान् के चरणों का प्रक्षालन करने के लिये जो जल समर्पित किया था, वही उनके चरणनखों से निकलकर गंगाजी के रूप में प्रवाहित हुआ। यह जल महादेवजी सहित सारे जगत को पवित्र करता है। ऐसी अवस्था में त्रिभुवन में श्रीकृष्ण के अतिरिक्त ‘भगवान्’ शब्द का दूसरा और क्या अर्थ हो सकता है ।।21।।

यत्रानुरक्ताः सहसैव धीरा व्यपोह्य देहादिषु सङ्गमूढम्
व्रजन्ति तत्पारमहंस्यमन्त्यं यस्मिन्नहिंसोपशमः स्वधर्मः 22

जिनके प्रेम को प्राप्त करके धीर पुरुष बिना किसी हिचक के देह -गेह आदिकी दृढ आसक्ति को छोड़ देते हैं और उस अन्तिम परमहंस आश्रम को स्वीकार करते हैं, जिनमें किसी को कष्ट न पहुँचाना और सब ओर से उपशांत हो जाना ही स्वधर्म होता है ।।22।।

अहं हि पृष्टोऽर्यमणो भवद्भिराचक्ष आत्मावगमोऽत्र यावान्
नभः पतन्त्यात्मसमं पतत्त्रिणस्तथा समं विष्णुगतिं विपश्चितः 23

सूर्य के समान प्रकाशमान महात्माओं ! आपलोगों ने मुझसे जो कुछ पूछा हैं, वह मैं अपनी शक्ति के अनुसार सुनाता हूँ। जैसे पक्षी अपनी शक्ति के अनुसार आकाश में उड़ाते है, वैसे ही विद्वानलोग भी अपनी -अपनी बुद्धि के अनुसार ही श्रीकृष्ण की लीला का वर्णन करते हैं ।।23।।

एकदा धनुरुद्यम्य विचरन्मृगयां वने
मृगाननुगतः श्रान्तः क्षुधितस्तृषितो भृशम् 24

एक दिन राजा परीक्षित धनुष लेकर वन में शिकार खेलने गये हुए थे। हरिणों के पीछे दौड़ते -दौड़ते वे थक गये और उन्हें बड़े जोर की भूख और प्यास लगी ।। 24।।

जलाशयमचक्षाणः प्रविवेश तमाश्रमम्
ददर्श मुनिमासीनं शान्तं मीलितलोचनम् 25

जब कहीं उन्हें कोई जलाशय नहीं मिला, तब वे पास के ही एक ऋषि के आश्रम में घुस गये। उन्होंने देखा की वहाँ आँखे बंद करके शान्तभाव से एक मुनि आसनपर बैठे हुए हैं ।।25।।

प्रतिरुद्धेन्द्रियप्राण मनोबुद्धिमुपारतम्
स्थानत्रयात्परं प्राप्तं ब्रह्मभूतमविक्रियम् 26

इन्द्रिय,प्राण,मन और बुद्धि के निरुद्ध हो जाने से वे संसार से ऊपर उठ गये थे। जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं से रहित निर्विकार ब्रह्मरूप तुरीय पद में वे स्थित थे ।।26।।

विप्रकीर्णजटाच्छन्नं रौरवेणाजिनेन च
विशुष्यत्तालुरुदकं तथाभूतमयाचत 27

उनका शरीर बिखरी हुई जटाओं से और कृष्ण मृगचर्म से ढका हुआ था। राजा परीक्षित ने ऐसी ही अवस्था में उनसे जल माँगा, क्योंकि प्यास से उनका गला सूखा जा रहा था ।।27।।

अलब्धतृणभूम्यादिरसम्प्राप्तार्घ्यसूनृतः
अवज्ञातमिवात्मानं मन्यमानश्चुकोप ह 28

जब राजा को वहाँ बैठने के लिए तिनके का आसन भी न मिला, किसी ने उन्हें भूमिपर भी बैठने को न कहा — अघ्र्य  और आदरभरी मीठी बातें तो कहाँ से मिलतीं — तब अपने को अपमानित-सा मानकर वे क्रोध के वश हो गये ।। 28।।

अभूतपूर्वः सहसा क्षुत्तृड्भ्यामर्दितात्मनः
ब्राह्मणं प्रत्यभूद्ब्रह्मन्मत्सरो मन्युरेव च 29

शौनकजी ! वे भूख-प्यास से छटपटा रहे थे , इसलिये एकाएक उन्हें ब्राह्मण के प्रति ईष्र्या और क्रोध हो आया। उनके जीवन में इस प्रकार का यह पहला ही अवसर था।।29।।

स तु ब्रह्मऋषेरंसे गतासुमुरगं रुषा
विनिर्गच्छन्धनुष्कोट्या निधाय पुरमागतः 30

वहाँ से लौटते समय उन्होंने क्रोधवश धनुष की नोक से एक मर साँप उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया और अपनी राजधानी में चले आये।।30।।

एष किं निभृताशेष करणो मीलितेक्षणः
मृषासमाधिराहोस्वित्किं नु स्यात्क्षत्रबन्धुभिः 31

उनके मन में यह बात आयी कि इन्होंने जो अपने नेत्र बंद कर रखे हैं, सो क्या वास्तव में इन्होने अपनी सारी इन्द्रियवृत्तियों का निरोध कर लिया है अथवा इन राजाओं से हमारा क्या प्रयोजन है, यो सोचकर इन्होंने झूठ -मूठ समाधि का ढोंग रच रखा है ।।31।।

तस्य पुत्रोऽतितेजस्वी विहरन्बालकोऽर्भकैः
राज्ञाघं प्रापितं तातं श्रुत्वा तत्रेदमब्रवीत् 32

उन शमीक मुनि का पुत्र बड़ा तेजस्वी था। वह दुसरे ऋषिकुमारों के साथ पास ही खेल रहा था। जब उस बालक ने सुना की राजा ने मेरे पिता के साथ दुर्व्यवहार किया है, तब वह इस प्रकार कहने लगा ।।32।।

अहो अधर्मः पालानां पीव्नां बलिभुजामिव
स्वामिन्यघं यद्दासानां द्वारपानां शुनामिव 33

‘ये नरपति कहलाने वाले लोग उच्छिष्टभोजी कौओं के समान संड -मुसंड होकर कितना अन्याय करने लगे हैं ! ब्राह्मणों के दस होकर भी ये दरवाजे पर पहरा देनेवाले कुत्ते के समान अपने स्वामी का ही तिरस्कार करते हैं ।।33।।

ब्राह्मणैः क्षत्रबन्धुर्हि गृहपालो निरूपितः
स कथं तद्गृहे द्वाःस्थः सभाण्डं भोक्तुमर्हति 34

ब्राह्मणों ने क्षत्रियों को अपना द्वारपाल बनाया है। उन्हें द्वारपर रहकर रक्षा करनी चाहिये, घर में घुसकर स्वामी के बर्तनों में खाने का उसे अधिकार नहीं है ।।34।।

कृष्णे गते भगवति शास्तर्युत्पथगामिनाम्
तद्भिन्नसेतूनद्याहं शास्मि पश्यत मे बलम् 35

अतएव उन्मार्गगामीयों के शासक भगवान् श्रीकृष्ण के परमधाम पधार जानेपर इन मर्यादा तोड़नेवालों को आज मैं दंड देता हूँ। मेरा तपोबल देखो’ ।।35।।

इत्युक्त्वा रोषताम्राक्षो वयस्यानृषिबालकः
कौशिक्याप उपस्पृश्य वाग्वज्रं विससर्ज ह 36

अपने साथी बालकों से इस प्रकार कहकर क्रोध से लाल -लाल आँखोंवाले उस ऋषिकुमार ने कौशिकी नदी के जल से आचमन करके अपने वाणी -रुपी वज्र का प्रयोग किया ।।36।।

इति लङ्घितमर्यादं तक्षकः सप्तमेऽहनि
दङ्क्ष्यति स्म कुलाङ्गारं चोदितो मे ततद्रुहम् 37

‘कुलांगार परीक्षित ने मेरे पिता का का अपमान करके मर्यादा का उल्लघन किया है, इसलिये मेरी प्रेरणा से आज के सातवें दिन उसे तक्षक सर्प डस लेगा’।।37।।

ततोऽभ्येत्याश्रमं बालो गले सर्पकलेवरम्
पितरं वीक्ष्य दुःखार्तो मुक्तकण्ठो रुरोद ह 38

इसके बाद वह बालक अपने आश्रम पर आया और अपने पिता के गले में साँप देखकर उसे बड़ा दुःख हुआ तथा वह ढाड़ मारकर रोने लगा ।।38।।

स वा आङ्गिरसो ब्रह्मन्श्रुत्वा सुतविलापनम्
उन्मील्य शनकैर्नेत्रे दृष्ट्वा चांसे मृतोरगम् 39

विप्रवर शौनकजी ! शमीक मुनि ने अपने पुत्र का रोना -चिल्लना सुनकर धीरे-धीरे अपनी आँखे खोली और देखा कि उनके गले में एक मरा साँप पड़ा है ।।39।।

विसृज्य तं च पप्रच्छ वत्स कस्माद्धि रोदिषि
केन वा तेऽपकृतमित्युक्तः स न्यवेदयत् 40

उसे फेंककर उन्होंने अपने पुत्र से पूछा – ‘बेटा ! तुम क्यों रो रहे हो? किसने तुम्हारा अपकार किया है ?’ उनके इस प्रकार पूछने पर बालक ने सारा हाल कह दिया ।।40।।

निशम्य शप्तमतदर्हं नरेन्द्रं स ब्राह्मणो नात्मजमभ्यनन्दत्
अहो बतांहो महदद्य ते कृतमल्पीयसि द्रोह उरुर्दमो धृतः 41

ब्रह्मर्षि शमीक ने राजा के शाप की बात सुनकर अपने पुत्र का अभिनन्दन नही किया। उनकी दृष्टि में परीक्षित शाप के योग्य नहीं थे। उहोने कहा — ‘ओह, मुर्ख बालक ! तूने बड़ा पाप किया ! खेद है कि उनकी थोड़ी-सी गलती के लिए तूने उनको इतना बड़ा दण्ड दिया।।41।।

न वै नृभिर्नरदेवं पराख्यं सम्मातुमर्हस्यविपक्वबुद्धे
यत्तेजसा दुर्विषहेण गुप्ता विन्दन्ति भद्राण्यकुतोभयाः प्रजाः 42

तेरी बुद्धि अभी कच्ची है। तुझे भगवत्स्वरूप राजा को साधारण मनुष्यों के समान नहीं समझना चाहिए; क्योंकि राजा के दुस्सह तेज से सुरक्षित और निर्भय रहकर ही प्रजा अपना कल्याण सम्पादन करती है ।।42।।

अलक्ष्यमाणे नरदेवनाम्नि रथाङ्गपाणावयमङ्ग लोकः
तदा हि चौरप्रचुरो विनङ्क्ष्यत्यरक्ष्यमाणोऽविवरूथवत्क्षणात् 43

जिस समय राजा का रूप धारण करके भगवान् पृथ्वी पर नहीं दिखायी देंगे, उस समय चोर बढ़ जायँगे और अरक्षित भेड़ों के समान एक क्षण में ही लोगों का नाश हो जायगा ।।43।।

तदद्य नः पापमुपैत्यनन्वयं यन्नष्टनाथस्य वसोर्विलुम्पकात्
परस्परं घ्नन्ति शपन्ति वृञ्जते पशून्स्त्रियोऽर्थान्पुरुदस्यवो जनाः 44

राजा के नष्ट हो जानेपर धन आदि चुरानेवाले चोर जो पाप करेंगे, उसके साथ हमारा कोई सम्बन्ध न होनेपर भी वह हम पर भी लागू होगा। क्योंकि राजा के न रहनेपर लूटेरे बढ़ जाते हैं और वे आपस में मार -पीट , गाली -गलौज करते हैं , साथ ही पशु,स्त्री और धन -सम्पत्ति भी लूट लेते हैं ।। 44।।

तदार्यधर्मः प्रविलीयते नृणां वर्णाश्रमाचारयुतस्त्रयीमयः
ततोऽर्थकामाभिनिवेशितात्मनां शुनां कपीनामिव वर्णसङ्करः 45

उस समय मनुष्यों का वर्णाश्रमाचारयुक्त वैदिक आर्यधर्म लुप्त हो जाता है, अर्थ -लोभ और काम-वासना के विवश होकर लोग कुत्तों और बंदरो के समान वर्णसंकर हो जाते हैं ।।45।।

धर्मपालो नरपतिः स तु सम्राड्बृहच्छ्रवाः
साक्षान्महाभागवतो राजर्षिर्हयमेधयाट्
क्षुत्तृट्श्रमयुतो दीनो नैवास्मच्छापमर्हति 46

सम्राट परीक्षित तो बड़े ही यशस्वी और धर्मधुरन्धर हैं। उन्होंने बहुत -से अश्वमेघ यज्ञ किये हैं और वे भगवान् के परम प्यारे भक्त हैं; वे ही राजर्षि भूख -प्यास से व्याकुल होकर हमारे आश्रम पर आये थे, वे शाप के योग्य कदापि नहीं हैं ।।46।।

अपापेषु स्वभृत्येषु बालेनापक्वबुद्धिना
पापं कृतं तद्भगवान्सर्वात्मा क्षन्तुमर्हति 47

इस नासमझ बालक ने हमारे निष्पाप सेवक राजा का अपराध किया है, सर्वात्मा भगवान् कृपा करके इसे क्षमा करें ।।47।।

तिरस्कृता विप्रलब्धाः शप्ताः क्षिप्ता हता अपि
नास्य तत्प्रतिकुर्वन्ति तद्भक्ताः प्रभवोऽपि हि 48

भगवान् के भक्तों में भी बदला लेने की शक्ति होती है, परन्तु वे दूसरों के द्वारा किये हुए अपमान,धोखेबाजी,गाली -गलौज ,आक्षेप और मार -पीट का कोई बदला नहीं लेते ।।48।।

इति पुत्रकृताघेन सोऽनुतप्तो महामुनिः
स्वयं विप्रकृतो राज्ञा नैवाघं तदचिन्तयत् 49

महामुनि शमीक को पुत्र के  अपराध पर बड़ा पश्चताप हुआ। राजा परीक्षित ने जो उनका अपमान किया था, उस पर तो उन्होंने
ध्यान  ही नहीं दिया।।49।।

प्रायशः साधवो लोके परैर्द्वन्द्वेषु योजिताः
न व्यथन्ति न हृष्यन्ति यत आत्मागुणाश्रयः 50

महात्माओं का स्वभाव ही ऐसा होता है कि जगत में जब दुसरे लोग उन्हें सुख -दुःखादि द्वंद्वों में डाल देते हैं , तब भी वे प्रायः हर्षित या व्यथित नहीं होते; क्योंकि आत्मा का स्वरुप तो गुणों से सर्वथा परे है ।।50।।

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायाम् प्रथमस्कन्धे विप्रशापोपलम्भनं नामष्टादशोऽध्यायः ।।

Chapter Eighteen Maharaja Pariksit Cursed by a Brahmana Boy

1. Sri Suta Gosvami said: Due to the mercy of the Personality of Godhead, Sri Krishna, who acts
wonderfully, Maharaja Pariksit, though struck by the weapon of the son of Drona in his mother’s womb, could not be burned.

2. Furthermore, Maharaja Pariksit was always consciously surrendered to the Personality of Godhead, and therefore he was neither afraid nor overwhelmed by fear due to a snake-bird which was to bite him because of the fury of a brahmana boy.

3. Furthermore, after leaving all his associates, the King surrendered himself as a disciple to the son of Vyasa [Sukadeva Gosvami], and thus he was able to understand the actual position of the Personality of Godhead.

4. This was so because those who have dedicated their lives to the transcendental topics of the Personality of Godhead, of whom the Vedic hymns sing, and who are constantly engaged in remembering the lotus feet of the Lord, do not run the risk of having misconceptions even at the last moment of their lives.

5. As long as the great, powerful son of Abhimanyu remains the Emperor of the world, there is no chance that the personality of Kali will flourish.

6. The very day and moment the Personality of Godhead, Lord Sri Krsna, left this earth, the personality of Kali, who promotes all kinds of irreligious activities, came into this world.

7. Maharaja Pariksit was a realist, like the bees who only accept the essence [of a flower]. He knew perfectly well that in this age of Kali, auspicious things produce good effects immediately, whereas inauspicious acts must be actually performed [to render effects]. So he was never envious of the personality of Kali.

8. Maharaja Pariksit considered that less intelligent men might find the personality of Kali to be very powerful, but that those who are self-controlled would have nothing to fear. The King was powerful like a tiger and took care for the foolish, careless persons.

9. O sages, as you did ask me, now I have described almost everything regarding the narrations about Lord Krishna in connection with the history of the pious Maharaja Pariksit.

10. Those who are desirous of achieving complete perfection in life must submissively hear all topics that are connected with the transcendental activities and qualities of the Personality of Godhead, who acts wonderfully.

11. The good sages said: O grave Suta Gosvami! May you live many years and have eternal fame, for you are speaking very nicely about the activities of Lord Krishna, the Personality of Godhead. This is just like nectar for mortal beings like us.

12. We have just begun the performance of this fruitive activity, a sacrificial fire, without certainty of its result due to the many imperfections in our action. Our bodies have become black from the smoke, but we are factually pleased by the nectar of the lotus feet of the Personality of Godhead, Govinda, which you are distributing.

13. The value of a moment’s association with the devotee of the Lord cannot even be compared to the attainment of heavenly planets or liberation from matter, and what to speak of worldly benedictions in the form of material prosperity, which are for those who are meant for death.

14. The Personality of Godhead, Lord Krishna [Govinda], is the exclusive shelter for all great living beings, and His transcendental attributes cannot even be measured by such masters of mystic powers as Lord Shiva and Lord Brahma. Can anyone who is expert in relishing nectar [rasa] ever be fully
satiated by hearing topics about Him?

15. O Suta Gosvami, you are a learned and pure devotee of the Lord because the Personality of
Godhead is your chief object of service. Therefore please describe to us the pastimes of the Lord, which are above all material conception, for we are anxious to receive such messages.

16. O Suta Gosvami, please describe those topics of the Lord by which Maharaja Pariksit, whose intelligence was fixed on liberation, attained the lotus feet of the Lord, who is the shelter of Garuda, the king of birds. Those topics were vibrated by the son of Vyasa [Srila Sukadeva].

17. Thus please narrate to us the narrations of the Unlimited, for they are purifying and supreme. They were spoken to Maharaja Pariksit, and they are very dear to the pure devotees, being full of bhakti-yoga.

18. Sri Suta Gosvami said: O God, although we are born in a mixed caste, we are still promoted in birthright simply by serving and following the great who are advanced in knowledge. Even by
conversing with such great souls, one can without delay cleanse oneself of all disqualifications resulting from lower births.

19. And what to speak of those who are under the direction of the great devotees, chanting the holy name of the Unlimited, who has unlimited potency? The Personality of Godhead, unlimited in potency and transcendental by attributes, is called the ananta [Unlimited].

20. It is now ascertained that He [the Personality of Godhead] is unlimited and there is none equal to Him. Consequently no one can speak of Him adequately. Great demigods cannot obtain the favor of the goddess of fortune even by prayers, but this very goddess renders service unto the Lord, although He is unwilling to have such service.

21. Who can be worthy of the name of the Supreme Lord but the Personality of Godhead Sri Krishna? Brahmaji collected the water emanating from the nails of His feet in order to award it to Lord Shiva as a worshipful welcome. This very water [the Ganges] is purifying the whole universe, including Lord Shiva.

22. Self-controlled persons who are attached to the Supreme Lord Sri Krsna can all of a sudden give up the world of material attachment, including the gross body and subtle mind, and go away to attain the highest perfection of the renounced order of life, by which nonviolence and renunciation are
consequential.

23. O rsis, who are as powerfully pure as the sun, I shall try to describe to you the transcendental
pastimes of Visnu as far as my knowledge is concerned. As the birds fly in the sky as far as their capacity allows, so do the learned devotees describe the Lord as far as their realization allows.

24-25. Once upon a time Maharaja Pariksit, while engaged in hunting in the forest with bow and arrows,became extremely fatigued, hungry and thirsty while following the stags. While searching for a reservoir of water, he entered the hermitage of the well-known Samika Risi and saw the sage sitting silently with closed eyes.

26. The muni’s sense organs, breath, mind and intelligence were all restrained from material activities, and he was situated in a trance apart from the three [wakefulness, dream and unconsciousness],  having achieved a transcendental position qualitatively equal with the Supreme Absolute.

27. The sage, in meditation, was covered by the skin of a stag, and long, compressed hair was
scattered all over him. The King, whose palate was dry from thirst, asked him for water.

28. The King, not received by any formal welcome by means of being offered a seat, place, water and sweet addresses, considered himself neglected, and so thinking he became angry.

29. O brahmanas, the King’s anger and envy, directed toward the brahmana sage, were
unprecedented, being that circumstances had made him hungry and thirsty.

30. While leaving, the King, being so insulted, picked up a lifeless snake with his bow and angrily placed it on the shoulder of the sage. Then he returned to his palace.

31. Upon returning, he began to contemplate and argue within himself whether the sage had actually been in meditation, with senses concentrated and eyes closed, or whether he had just been feigning trance just to avoid receiving a lower ksatriya.

32. The sage had a son who was very powerful, being a brahmana’s son. While he was playing with inexperienced boys, he heard of his father’s distress, which was occasioned by the King. Then and there the boy spoke as follows.

33. [The brahmana’s son, Sringi, said:] O just look at the sins of the rulers who, like crows and
watchdogs at the door, perpetrate sins against their masters, contrary to the principles governing servants.

34. The descendants of the kingly orders are definitely designated as watchdogs, and they must keep themselves at the door. On what grounds can dogs enter the house and claim to dine with the master on the same plate?

35. After the departure of Lord Sri Krsna, the Personality of Godhead and supreme ruler of everyone, these upstarts have flourished, our protector being gone. Therefore I myself shall take up this matter and punish them. Just witness my power.

36. The son of the rsi, his eyes red-hot with anger, touched the water of the River Kausika while
speaking to his playmates and discharged the following thunderbolt of words.

37. The brahmana’s son cursed the King thus: On the seventh day from today a snake-bird will bite the most wretched one of that dynasty [Maharaja Pariksit] because of his having broken the laws of etiquette by insulting my father.

38. Thereafter, when the boy returned to the hermitage, he saw a snake on his father’s shoulder, and out of his grief he cried very loudly.

39. O brahmanas, the rsi, who was born in the family of Angira Muni, hearing his son crying, gradually opened his eyes and saw the dead snake around his neck.

40. He threw the dead snake aside and asked his son why he was crying, whether anyone had done him harm. On hearing this, the son explained to him what had happened.

41. The father heard from his son that the King had been cursed, although he should never have been condemned, for he was the best amongst all human beings. The rsi did not congratulate his son, but, on the contrary, began to repent, saying: Alas! What a great sinful act was performed by my son. He has awarded heavy punishment for an insignificant offense.

42. O my boy, your intelligence is immature, and therefore you have no knowledge that the king, who is the best amongst human beings, is as good as the Personality of Godhead. He is never to be placed on an equal footing with common men. The citizens of the state live in prosperity, being protected by his unsurpassable prowess.

43. My dear boy, the Lord, who carries the wheel of a chariot, is represented by the monarchical
regime, and when this regime is abolished the whole world becomes filled with thieves, who then at once vanquish the unprotected subjects like scattered lambs.

44. Due to the termination of the monarchical regimes and the plundering of the people’s wealth by rogues and thieves, there will be great social disruptions. People will be killed and injured, and animals and women will be stolen. And for all these sins we shall be responsible.

45. At that time the people in general will fall systematically from the path of a progressive civilization in respect to the qualitative engagements of the castes and the orders of society and the Vedic injunctions. Thus they will be more attracted to economic development for sense gratification, and as a result there will be an unwanted population on the level of dogs and monkeys.

46. The Emperor Pariksit is a pious king. He is highly celebrated and is a first-class devotee of the Personality of Godhead. He is a saint amongst royalty, and he has performed many horse sacrifices. When such a king is tired and fatigued, being stricken with hunger and thirst, he does not at all deserve to be cursed.

47. Then the rsi prayed to the all-pervading Personality of Godhead to pardon his immature boy, who had no intelligence and who committed the great sin of cursing a person who was completely free from all sins, who was subordinate and who deserved to be protected.

48. The devotees of the Lord are so forbearng that even though they are defamed, cheated, cursed, disturbed, neglected or even killed, they are never inclined to avenge themselves.

49. The sage thus regretted the sin committed by his own son. He did not take the insult paid by the King very seriously.

50. Generally the transcendentalists, even though engaged by others in the dualities of the material
world, are not distressed. Nor do they take pleasure [in worldly things], for they are transcendentally engaged.