धार्मिक विधि एवं निषेध

खूब तल-भुनकर बहुत अच्छा, स्वादिष्ट खाना भी बनाया हो तो भी उसे दो-तीन महीने के बच्चे को नहीं खिला देते। तंत्र के साथ भी ऐसा ही है, सबसे हजम नहीं होता, जबरन ठूंसने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। इसे कुछ ऐसे भी समझ सकते हैं कि कुत्ते-बिल्ली जैसे किसी जानवर से अगर बच्चा डरता हो तो उसे देखते ही वो मम्मी चिल्लाता माँ के पास भागेगा। जो मम्मी बच्चे के लिए प्यारी से होती है वही उस कुत्ते-बिल्ली के लिए भयावह हो जाती है क्या ? ये उतना मुश्किल सवाल नहीं है, मामूली सा एक्सपेरिमेंट कीजिये।

अपने बच्चों को दुलारती किसी निरीह दिखती बिल्ली के बच्चे को उठा लेने की कोशिश कीजियेगा, जवाब समझ आ जाएगा। तंत्र या वामाचार मुश्किल है क्योंकि इसमें कई पाबंदियां झेलनी पड़ती हैं। जैसे देवी तारा की उपासना में महाशंख की माला का प्रयोग होता है। इस माला का स्पर्श तुलसी, गोबर, गंगा-जल और शालिग्राम से कभी नहीं करना चाहिये। थोड़े समय पहले तक भारत के घरों में आंगन, सामने की सड़क को गोबर से लीपने की परंपरा थी। तुलसी घर में होगी ही। गंगाजल छिडके जाने और शालिग्राम की भी कई जगह संभावना रहती है। यानि तकनिकी मजबूरियों की वजह से तांत्रिक किसी गृहस्थ के घर में प्रवेश भी नहीं कर सकता।

देवी तारा, दस महाविद्याओं में से दूसरी होती है, उन्हें नीलसरस्वती, उग्रतारा, कामख्या आदि नामों से भी जाना जाता है। आदिशक्ति के इस स्वरुप की उपासना कौल तंत्र और बौद्ध वज्रायण में भी की जाती है। कम प्रचलित वाली कथाओं के हिसाब से एक बार जब देवताओं को शुम्भ और निशुम्भ ने पराजित कर के अमरावती से भगा दिया तो हिमालय पर वो देवी दुर्गा की उपासना कर रहे थे। उसी समय वहां मातंग ऋषि की पत्नी मातंगी आयीं। उन्होंने जब देवताओं से पूछा कि आप किसकी उपासना कर रहे हैं ?

देवताओं ने जवाब देने की कोशिश की, वो सही जवाब दे नहीं पाए। आखिर महासरस्वती मातंगी के शरीर से प्रकट हुई। सरस्वती जो मातंगी के शरीर से अलग हो गई थी, वो आठ भुजाओं वाली देवी गौर वर्ण कौशिकी थी। उनके अलग होने पर मातंगी का शरीर काला पड़ गया था और वो कालिका-उग्रतारा नाम की देवी हुई। तंत्र में सांध्यवंदना तारा को अर्पित होती है, सुबह की एकजाता, दोपहर की नीलसरस्वती, और संध्या की कामख्या के रूप को अर्पित होती है। तांत्रिक के हिसाब से शमशान वो जगह है जहाँ पञ्च तत्व, महाभूत’ या देह में विद्यमान स्थूल तत्त्व, चिद्-ब्रह्म में विलीन होते हैं।

तामसी गुण से सम्बद्ध रखने वाले देवी-देवता, देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान, विकार रहित हृदय या मन का प्रतिनिधित्व करता हैं। जहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि विकारों या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनती हैं। मन या हृदय भी वह श्मशान हैं, जहाँ इन समस्त विकारों का दाह होता हैं। अतः देवी काली-तारा अपने उपासकों के विकार शून्य हृदय पर ही वास करती हैं।

रुद्र्यामाला तंत्र के मुताबिक प्रजापति ब्रह्मा की आज्ञा से वसिष्ठ मुनि ने प्रागज्योतिषपुर में अपना आश्रम बनाया और कामख्या शक्ति पीठ के पास देवी तारा की मन्त्र साधना शुरू की। काफी लम्बे, बरसों के प्रयास के बाद भी जब मन्त्र सिद्ध नहीं हुआ, देवी भी प्रकट नहीं हुई। तो खीज कर वसिष्ठ मन्त्र को ही शापित करने चले, इतने में पार्वती अपने वज्रयोगिनी स्वरुप में वसिष्ठ के सामने आई और उनसे महाचीन जाकर साधना सीखने कहा। देवी की सलाह से जब वसिष्ठ बुद्ध के पास पहुंचे तो विष्णु अवतार को पंचमकार में लिप्त देखकर वो घृणा से भर उठे।

लेकिन वशिष्ठ को पंचमकार का अर्थ समझाते हुए वाम साधना में बुद्ध ने दीक्षित किया। लौटने पर द्वारक नदी के किनारे एक शमशान चुनकर वसिष्ठ ने साधना दोबारा की और देवी तारा सद्योजात शिव के साथ प्रकट हुई और वशिष्ठ को आशीर्वाद दिया। जिस स्थान पर वशिष्ठ ने ये उपासना की थी, वो जगह अब बीरभूम (बंगाल) में है। यहाँ के मंदिर में देवी तारा अपने आदिरूप में हैं जिसे चार भुजाओं वाले एक चांदी के उग्रतारा के आवरण से ढक कर रखा जाता है। इसे सिर्फ ब्रह्म मुहूर्त में देख सकते हैं।

देवी के तारा स्वरुप के भैरव का नाम अक्षोभ्य है। वो प्रत्यालीढ़ मुद्रा में खड़ी होती हैं, यानी योद्धाओं की तरह बायाँ पैर आगे शिव के अचेतन स्वरुप पर। देवी का वाहन गीदड़ या शव होता है। द्वितीय महाविद्या तारा की कृपा से साधक ज्ञानी हो जाता हैं। वाक् सिद्धि प्रदान करने से ये नील सरस्वती कही जाती हैं, सुख, मोक्ष प्रदान करने तथा उग्र आपत्ति हरण करने के कारण इन्हें ताराणी भी कहा जाता हैं। वशिष्ठ मुनि ने सबसे पहले देवी तारा कि आराधना की थी, इसलिए देवी ’वशिष्ठाराधिता’ के नाम से भी जानी जाती हैं।

देवी तारा ज्ञान और मोक्ष की देवी हैं, जितनी हिन्दुओं के लिए उपास्य हैं, उतनी ही बौद्ध तंत्र में भी उनकी मान्यता है। हाँ, फिर से याद दिला दें, गरिष्ठ भोजन मजबूत हाजमे वालों के लिए होता है, बच्चों के लिए नहीं।

आम तौर पर आयातित विचारधारा के लोग आपको सिखायेंगे कि धार्मिक पाबंदियां सभी की सभी स्त्रियों पर ही लागू होती हैं | लेकिन अगर आप आजीवन बड़े शहरों में नहीं रहे हैं, कस्बों-गावों में आना जाना है तो आपको पता होगा कि असलियत इसकी उल्टी है | ज्यादातर लोक परम्पराओं में पुरुषों पर निषेध लागू होता है |

कई त्योहारों में घर के आँगन में आने पे पाबन्दी होती है | वो इलाका अघोषित रूप से स्त्रियों का हो जाता है | शाम में अगर घर में दिया जलता हो तो वो आप नहीं जला सकते, आपके घर की काम वाली बाई जला दे तो चलेगा, आप पुरुष हैं, आप नहीं जलाएंगे | किसी काली मंदिर में पुरुष लाल चुन्नी या दुर्गा मंदिर में अकेले हों तो लाल कपड़ा नहीं चढ़ा सकते | ऐसे ही कई मंदिर भी हैं जहाँ पुरुषों का प्रवेश मना है |

जैसे स्त्रियों के लिए हनुमान के विग्रह को छूने से मनाही होती है वैसे ही पुरुषों के लिए दुर्गा की, काली की प्रतिमाओं पर दिख जाएगी | ये स्त्रियों पर पाबन्दी का वहम फैलाना इसलिए आसान होता है क्योंकि आप अपनी धार्मिक परम्पराओं के बारे में सीखते नहीं | पिछली पीढ़ी ने भी सेकुलरिज्म का ढ़ोंग शुरू होने के बाद से सिखाना बंद कर दिया ! करीब चालीस पचास साल में, तीन पीढ़ियों के फर्क में हम इतने मूर्ख हो गए कि हमें ठगा जा सके |

ये बिलकुल वैसा ही है जैसा अगर आपसे पूछा जाए कि पूजा में क्या क्या लगता है तो आप अपने अंदाजे से बताना शुरू कर दें | आप सोचेंगे पंडित जी को क्या क्या मंगाते देखा था तो याद आएगा अक्षत(कच्चे चावल), तुलसी पत्ते, दूब (लम्बी घास), बेलपत्र | तो आप यही सब मंगवा कर पूजा करने की बात आराम से सोच सकते हैं | लेकिन यहाँ एक छोटी सी दिक्कत है |

नार्चयेदक्षतेर्विष्णु, न तुलस्यागनाधिपम।
न दुर्व्ययजेद्देवी, बिल्वपत्रें न भास्करं।

यानि कि विष्णु की पूजा में अक्षत, गणपति को तुलसी, देवी को दूर्वा और सूर्य देव को बिल्वपत्र वर्जित है !

तो जिन किन्हीं भी महानुभावों की सलाह पर आप गणपति के विग्रह को डुबो कर उसपर तुलसी लगाने जा रहे हों, उनकी सलाह मत मानिए | जैसे टीवी के ऊपर कोई मैगनेट-चुम्बक या स्पीकर (जिसमें अन्दर बड़ा सा चुम्बक होता है) रखना मना होता है, बिलकुल वैसा ही समझ लीजिये | श्री गणेश के पास तुलसी नहीं रखते |

आनन्द कुमार

 

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