महाराज प्रद्योत

भारत के कुरु वंशी महाराज प्रद्योत जिनका राज्यकाल (1367-1317 BC) अखंड भारतवर्ष के सम्राट थे राजधानी महिष्मति थे
1367 -1317 (ई पू) था इन्होंने असुरों पर आक्रमण किया था और मिश्र अरब देशो पर विजय प्राप्त किया था । दिग्विजयी सम्राट महाराज प्रद्योत इतिहास विलुप्त योद्धा जिन्होंने असुरों का दमन कर विश्व विजय किया था अपने समय के भारतवर्ष के सर्वश्रेष्ठ सम्राट थे प्रचण्ड भुजदण्ड से जीते हुए अनेक राजा उनके चरणों में सिर झुकाते थे। महाराज प्रद्योत का शौर्य अवर्णनीय हैं महाराजा प्रद्योत ने अपने शौर्य- और अद्भुत तेज के साथ भारतभूमि की पावनधारा पर जन्मे इस शूरवीर ने सनातन धर्म ध्वजा को मिश्र अरब देशो पर लहराकर स्वर्णिम इतिहास रच डाले थे ।

दिग्विजयी सम्राट प्रद्योत सेन अभीर और प्रद्योत राजवंश की गौरवगाथा-

प्रद्योत राजवंश पौराणिक समय में उत्तर भारत का सबसे विशाल एवं शक्तिशाली साम्राज्य था जिसकी स्थापना माहिष्मती नरेश सम्राट सहस्त्रार्जुन के वंशज हैहयवंशी यादवों के वितिहोत्र शाखा के क्षत्रिय अभीर राजा महासेन चंद्र प्रद्योत ने करी थी।

अवन्ति नरेश सम्राट महासेन चंद्र प्रद्योत अपने समकालीन समस्त राजाओं में प्रमुख थे एवं इनके शासन के समय अवन्ति की उन्नति चरमोत्कर्ष पर थी।

1367 -1317 (ई पू) अवन्ति नरेश सम्राट प्रद्योत ने असुरों पर आक्रमण किया था और मिश्र अरब देशो पर विजय प्राप्त करी थी ।

दिग्विजयी सम्राट महाराज प्रद्योत इतिहास विलुप्त योद्धा जिन्होंने असुरों का दमन कर विश्व विजय किया था अपने समय के भारतवर्ष के सर्वश्रेष्ठ सम्राट थे प्रचण्ड भुजदण्ड से जीते हुए अनेक महाराजा उनके चरणों में सिर झुकाते थे।

सम्राट प्रद्योत का शौर्य अवर्णनीय हैं।

अपने शौर्य- और अद्भुत तेज के साथ आर्यवर्त की पावनधारा पर जन्मे इस शूरवीर ने आर्य धर्म ध्वजा को मिश्र अरब देशो पर लहराकर स्वर्णिम इतिहास रच डाले थे ।

अनगिनत महायुद्धों में से कुछ ख़ास युद्ध का वर्णन मिलता हैं ।

प्रथम युद्ध-: –

मिश्र के साम्राज्य के राजा थे फ़राओ अमेनोफ़िस चतुर्थ सन 1355 (ई.पू) इन्होने कोसला पर आक्रमण किया था सम्राट प्रद्योत ने आक्रमण का सफल्तापूर्वक प्रतिरोध कर के अमेनोफ़िस पर विजय पा कर भगवा ध्वज मिश्र पर लहराया था ।

द्वितीय युद्ध-: –

बेबीलोन (Babylon) के असुर साम्राज्य के शासक बुरना द्वितीय ने 1360 (ई.पू) सिंध पर आक्रमण किया था ।

सम्राट प्रद्योत ने असुर साम्राज्य का भयंकर नाश किया था तथा बेबीलोन पर विजय प्राप्त कर असुर साम्राज्य के असुरों को बंदी बनाया था ।

तृतीय युद्ध-:

सन 1363 (ई.पू) महाराज प्रद्योत ने ऐतिहासिक युद्ध लड़ें में एथेंस ग्रीस पर कब्ज़ा कर सेक्रोप्स द्वितीय को हराकर बन्दी बनाकर भारत लाये थे ।

सम्राट प्रद्योत ने अफ्रीका के काइरो को सेक्रोप्स से मुक्त करवाया था सेक्रोप्स ने अफ्रीका के राजा काइरो के लोगों को बंदी बनाकर पुरुषों से मजदूरी करवाते थे और उनकी औरतों को भोग की वस्तु के तरह भूखे सैनिको के बिच नग्न कर डाल देते थे इनसब से मुक्त कर एक नया जीवन दिया था सम्राट प्रद्योत ने काईरो वासियों को ।।

यही होती हैं भारतीय हिन्दू क्षत्रिय संस्कृति की पहचान दयाभाव , मानवता के रक्षक और मानवता के दुश्मनों का संघार करनेवाला।

चतुर्थ युद्ध-:

अश्शूर साम्राज्य अर्थात सीरिया के दानव अशुर पुज़ूर-अशुर तृतीय सन 1361 (ई.पू) ने त्रिकोणमलाई (वर्तमान में कवरत्ती के नाम से जाने जाते) पर हमला किया था।

अरब महासागर पर स्थित होने की वजह से विदेशी आक्रमणकारी इसी जगह पर आक्रमण करते थे।

सम्राट प्रद्योत ने आक्रमण का प्रतिरोध करते हुए कई पड़ोसी देशो को असुरों के अधीनता से मुक्त करवाया था पुज़ूर-अशुर के साम्राज्य के विनाश से सनातन धर्म ध्वजा सीरिया की भूमि पर लहराया ।

सम्राट प्रद्योत ने कई देशो पर विजय प्राप्त की।

पंचम युद्ध-:

अशुर-उबाल्लित प्रथम ने सन 1351 (ई.पू) विदर्भ राज्य पर ३ लाख की सेना के साथ आक्रमण कर अपने साम्राज्य पर काल को निमंत्रण दिया था ।

सम्राट महाबली प्रद्योत ने 12000 की सेना के साथ 3 लाख आक्रमणकारियों को हराया था ।

छठा युद्ध-:

थूत्मोसे द्वितीय को पराजित कर लेबानन , अरब पर भगवा परचम लहराया था सम्राट प्रद्योत ने ।

सप्तम युद्ध-:

अशुर दुगुल को धूल1 चटा कर इन देशो पर (अक्कड़ इसीन लार्सा निप्पुर अदाब अक्षक) अपना साम्राज्य स्थापित किया था ।

सम्राट प्रद्योत ने दिग्विजयी उपाधि प्राप्त थी एव 130 देश एवं अखंड आर्यवर्त के नरेश थे।

उनके भुजाबल के सामने उनके दुश्मन भी अपना शीश झुकाते थे।

सम्राट प्रद्योत सेन अभीर के मथुरा के यादवों से मधुर संबंध थे। सम्राट प्र्द्योत ने मथुरा से वैवाहिक संबंध भी स्थापित किये। मथुरा के तद्कालीन राजा का नाम आवंतीपुत्र इस बात का परिचायक है कि वह अवन्ती की राजकुमारी का पुत्र था।

राजा प्रद्योत तक्षशिला के राजा पुष्कर्सारिण और मलेच्छों के साथ संघर्षरत रहे।

हालांकि सम्राट प्रद्योत के बाद के शासक अपने पूर्वजों की कीर्ति स्थिर नहीं रख सके।

सम्राट प्रद्योत के पाल और गोपाल नामक दो पुत्र थे जिन्होंने प्रद्योत की मृत्यु के पश्चात अवन्ती पर शासन किया। परंतु पाल ने गोपाल की हत्या कर खुद राजा बना वह एक क्रूर शासक साबित हुआ।

राजा आर्यक-

राजा आर्यक (ऐतिहासिक नाम-इंद्रगुप्त) ने अपने पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेते हुए अपने क्रूर चाचा को मार कर उज्जैन के सिंहासन पर आसीन हुआ।

पुराणों के अनुसार प्रद्योत राजवंश का अंतिम शासक नन्दिवर्धन था।

1) The text is in a private collection and was published in: Arno Poebel (1955). “Second Dynasty of Isin According to a New King-List Tablet”. Assyriological Studies. University of Chicago Press (15).

2) Babylonia, c. 1000 – 748 B.C.”. In John Boardman; I. E. S. Edwards; N. G. L. Hammond; E. Sollberger. The Cambridge Ancient History (Volume 3, Part 1).

3) Grayson, Albert Kirk (1975). Assyrian and Babylonian Chronicles. Locust Valley, N.Y.

4) Leick, Gwendolyn (2003). Mesopotamia.

5) Kerényi, Karl, The Heroes of the Greeks (1959)

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