गोधासना गिरिजा-प्रतिमालक्षण

पार्वती की प्रतिमाएं प्राय: शिव सन्निधि में ही मिलती है। जहां शिव वहां शिवा, लेकिन उत्तर में प्रतिहार काल और पूर्व चौहान काल (7वीं से 11वीं सदी) में पार्वती की अनेकत्र स्वतंत्र प्रतिमाएं बनीं और देवी मंदिरों पर भी लगीं। इनमें अधिकांश प्रतिमाएं गोह पर सवार मिलती हैं। गोह यानी गोधा, गोरपड़ (घोरपड़) या गोयरी। कोशों में गोसाप् नाम है। अमरकोश में निहाका व गोधिका पर्याय हैं तो वराहमिहिर ने दारुमुख्याह्वा नाम दिया है। इसके गुण, लक्षण मनु ने दिए ही, आयुर्वेदिक निघंटुओं में भी हैं। जातकों में कथाएं है।

यह पर्वत विहारी जीव है, सरीसृप वर्ग का। कुल कोटि पर्वतों के जीवों में इसकी गणना होती है यानी पारियात्र या अरावली, विंध्याचल, सतपुड़ा, सह्याद्रि आदि में बारहों मास गोरपड़ या गोह दौड़ते भागते दिखाई दे जाती है और शिकारियों के निशाने पर भी रहती रही हैं।

बड़ी छिपकली जैसे आकार वाला, बेहद डरावना लेकिन भोला जीव – बादलों से आच्छादित अंबर तले जब हम उमस के मारे घमौरियां खुजाल रहे होते हैं तब गोह गगनमुखी होकर सिटी सी बजाती कूकती है। पर्वतीय गुहाओं में छिपना, रहना, दुबकना और पर्वतीय जीवों की क्रीड़ाओं को देखकर उनका संगी हो जाना गोह को रुचता है। पांव गद्दीदार और भित्ति पर भी ऐसे चिपकते हैं कि हम लटक जाएं तो न छूटें। सैनिकों ने दीवारें लांघने, चढ़ने के लिए गोह का इस्तेमाल किया है।

बहरहाल, वह पार्वती का वाहन क्यों है ? यह सवाल कम रोचक नहीं। इसका जवाब जनजातीय मान्यता में मिलना चाहिये क्योंकि पर्वत विहारियों ने ही हिमालय पुत्री को देखा होगा जो गोधा पर सवार समझी गई। वैसे देवियां दिव्य इस अर्थ में भी हुईं कि असंभव को संभव करती लगीं, अलभ्य को सुलभ कराने वाली लगीं। पर्वतीय प्रदेशों की देवियां वहां के जीवों पर ही सवार मानी गईं। यूं दुर्लभ देवी-देवताओं का लोक हमारे लिए अपनी कल्पनाओं के परिप्रेक्ष्य में ही होता है। गिरिजा को भी गोधा विहारी, गोधासना, गोधारूढ़ा माना गया। प्रतिमा शास्त्रों में पार्वती का लांछन, वाहन गोधा को माना गया लेकिन दुर्गा रूप होने पर सिंहस्थ भी कहा है।

हमारे यहां तो पार्वती के पर्याय के रूप में कन्याओं का नाम गोदीबाई या गोधीबेन रखा जाता है। महाराष्ट्र के पहाड़ी प्रदेशों में राष्ट्रकुल और शिलीहारों के काल में पार्वती को गोधारूढ़ा ही बनाया गया। यह आगे भी रहा।

गोधा पर गिरिजा के विहार की मान्यता भारत ही नहीं, कंबोडिया में भी रही है। सिमरिप के पास की पहाड़ियों से निकलने और बहने वाली नदी जिसे वहां गंगा तुल्य आदर प्राप्त है, के प्रवाह क्षेत्र में पहाड़ी भित्तियों पर गोधाओं का अंकन जब मैंने देखा तो चकित रह जाना पड़ा। मैंने मित्रों से कहा कि यहां भी गोधा-गिरिजा ! तो जवाब था यहां भी भारत और भारतीय संस्कृति की पहुंच पक्की ! सचमुच गिरिजा की यह मान्यता सुदूर अतीत से चली आई तो सुदूरवर्ती देशों तक भी पहुंची है।
जय जय।

श्रीकृष्ण जुगनू

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