गोधासना गिरिजा-प्रतिमालक्षण

पार्वती की प्रतिमाएं प्राय: शिव सन्निधि में ही मिलती है। जहां शिव वहां शिवा, लेकिन उत्तर में प्रतिहार काल और पूर्व चौहान काल (7वीं से 11वीं सदी) में पार्वती की अनेकत्र स्वतंत्र प्रतिमाएं बनीं और देवी मंदिरों पर भी लगीं। इनमें अधिकांश प्रतिमाएं गोह पर सवार मिलती हैं। गोह यानी गोधा, गोरपड़ (घोरपड़) या गोयरी। कोशों में गोसाप् नाम है। अमरकोश में निहाका व गोधिका पर्याय हैं तो वराहमिहिर ने दारुमुख्याह्वा नाम दिया है। इसके गुण, लक्षण मनु ने दिए ही, आयुर्वेदिक निघंटुओं में भी हैं। जातकों में कथाएं है।

यह पर्वत विहारी जीव है, सरीसृप वर्ग का। कुल कोटि पर्वतों के जीवों में इसकी गणना होती है यानी पारियात्र या अरावली, विंध्याचल, सतपुड़ा, सह्याद्रि आदि में बारहों मास गोरपड़ या गोह दौड़ते भागते दिखाई दे जाती है और शिकारियों के निशाने पर भी रहती रही हैं।

बड़ी छिपकली जैसे आकार वाला, बेहद डरावना लेकिन भोला जीव – बादलों से आच्छादित अंबर तले जब हम उमस के मारे घमौरियां खुजाल रहे होते हैं तब गोह गगनमुखी होकर सिटी सी बजाती कूकती है। पर्वतीय गुहाओं में छिपना, रहना, दुबकना और पर्वतीय जीवों की क्रीड़ाओं को देखकर उनका संगी हो जाना गोह को रुचता है। पांव गद्दीदार और भित्ति पर भी ऐसे चिपकते हैं कि हम लटक जाएं तो न छूटें। सैनिकों ने दीवारें लांघने, चढ़ने के लिए गोह का इस्तेमाल किया है।

बहरहाल, वह पार्वती का वाहन क्यों है ? यह सवाल कम रोचक नहीं। इसका जवाब जनजातीय मान्यता में मिलना चाहिये क्योंकि पर्वत विहारियों ने ही हिमालय पुत्री को देखा होगा जो गोधा पर सवार समझी गई। वैसे देवियां दिव्य इस अर्थ में भी हुईं कि असंभव को संभव करती लगीं, अलभ्य को सुलभ कराने वाली लगीं। पर्वतीय प्रदेशों की देवियां वहां के जीवों पर ही सवार मानी गईं। यूं दुर्लभ देवी-देवताओं का लोक हमारे लिए अपनी कल्पनाओं के परिप्रेक्ष्य में ही होता है। गिरिजा को भी गोधा विहारी, गोधासना, गोधारूढ़ा माना गया। प्रतिमा शास्त्रों में पार्वती का लांछन, वाहन गोधा को माना गया लेकिन दुर्गा रूप होने पर सिंहस्थ भी कहा है।

हमारे यहां तो पार्वती के पर्याय के रूप में कन्याओं का नाम गोदीबाई या गोधीबेन रखा जाता है। महाराष्ट्र के पहाड़ी प्रदेशों में राष्ट्रकुल और शिलीहारों के काल में पार्वती को गोधारूढ़ा ही बनाया गया। यह आगे भी रहा।

गोधा पर गिरिजा के विहार की मान्यता भारत ही नहीं, कंबोडिया में भी रही है। सिमरिप के पास की पहाड़ियों से निकलने और बहने वाली नदी जिसे वहां गंगा तुल्य आदर प्राप्त है, के प्रवाह क्षेत्र में पहाड़ी भित्तियों पर गोधाओं का अंकन जब मैंने देखा तो चकित रह जाना पड़ा। मैंने मित्रों से कहा कि यहां भी गोधा-गिरिजा ! तो जवाब था यहां भी भारत और भारतीय संस्कृति की पहुंच पक्की ! सचमुच गिरिजा की यह मान्यता सुदूर अतीत से चली आई तो सुदूरवर्ती देशों तक भी पहुंची है।
जय जय।

श्रीकृष्ण जुगनू

धार्मिक विधि एवं निषेध

खूब तल-भुनकर बहुत अच्छा, स्वादिष्ट खाना भी बनाया हो तो भी उसे दो-तीन महीने के बच्चे को नहीं खिला देते। तंत्र के साथ भी ऐसा ही है, सबसे हजम नहीं होता, जबरन ठूंसने की कोशिश भी नहीं करनी चाहिए। इसे कुछ ऐसे भी समझ सकते हैं कि कुत्ते-बिल्ली जैसे किसी जानवर से अगर बच्चा डरता हो तो उसे देखते ही वो मम्मी चिल्लाता माँ के पास भागेगा। जो मम्मी बच्चे के लिए प्यारी से होती है वही उस कुत्ते-बिल्ली के लिए भयावह हो जाती है क्या ? ये उतना मुश्किल सवाल नहीं है, मामूली सा एक्सपेरिमेंट कीजिये।

अपने बच्चों को दुलारती किसी निरीह दिखती बिल्ली के बच्चे को उठा लेने की कोशिश कीजियेगा, जवाब समझ आ जाएगा। तंत्र या वामाचार मुश्किल है क्योंकि इसमें कई पाबंदियां झेलनी पड़ती हैं। जैसे देवी तारा की उपासना में महाशंख की माला का प्रयोग होता है। इस माला का स्पर्श तुलसी, गोबर, गंगा-जल और शालिग्राम से कभी नहीं करना चाहिये। थोड़े समय पहले तक भारत के घरों में आंगन, सामने की सड़क को गोबर से लीपने की परंपरा थी। तुलसी घर में होगी ही। गंगाजल छिडके जाने और शालिग्राम की भी कई जगह संभावना रहती है। यानि तकनिकी मजबूरियों की वजह से तांत्रिक किसी गृहस्थ के घर में प्रवेश भी नहीं कर सकता।

देवी तारा, दस महाविद्याओं में से दूसरी होती है, उन्हें नीलसरस्वती, उग्रतारा, कामख्या आदि नामों से भी जाना जाता है। आदिशक्ति के इस स्वरुप की उपासना कौल तंत्र और बौद्ध वज्रायण में भी की जाती है। कम प्रचलित वाली कथाओं के हिसाब से एक बार जब देवताओं को शुम्भ और निशुम्भ ने पराजित कर के अमरावती से भगा दिया तो हिमालय पर वो देवी दुर्गा की उपासना कर रहे थे। उसी समय वहां मातंग ऋषि की पत्नी मातंगी आयीं। उन्होंने जब देवताओं से पूछा कि आप किसकी उपासना कर रहे हैं ?

देवताओं ने जवाब देने की कोशिश की, वो सही जवाब दे नहीं पाए। आखिर महासरस्वती मातंगी के शरीर से प्रकट हुई। सरस्वती जो मातंगी के शरीर से अलग हो गई थी, वो आठ भुजाओं वाली देवी गौर वर्ण कौशिकी थी। उनके अलग होने पर मातंगी का शरीर काला पड़ गया था और वो कालिका-उग्रतारा नाम की देवी हुई। तंत्र में सांध्यवंदना तारा को अर्पित होती है, सुबह की एकजाता, दोपहर की नीलसरस्वती, और संध्या की कामख्या के रूप को अर्पित होती है। तांत्रिक के हिसाब से शमशान वो जगह है जहाँ पञ्च तत्व, महाभूत’ या देह में विद्यमान स्थूल तत्त्व, चिद्-ब्रह्म में विलीन होते हैं।

तामसी गुण से सम्बद्ध रखने वाले देवी-देवता, देवी काली, तारा, भैरवी इत्यादि देवियाँ श्मशान भूमि को अपना निवास स्थान बनती हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से श्मशान, विकार रहित हृदय या मन का प्रतिनिधित्व करता हैं। जहाँ काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, स्वार्थ इत्यादि विकारों या व्यर्थ के आचरणों का दाह होता हैं देवी उसी स्थान को अपना निवास स्थान बनती हैं। मन या हृदय भी वह श्मशान हैं, जहाँ इन समस्त विकारों का दाह होता हैं। अतः देवी काली-तारा अपने उपासकों के विकार शून्य हृदय पर ही वास करती हैं।

रुद्र्यामाला तंत्र के मुताबिक प्रजापति ब्रह्मा की आज्ञा से वसिष्ठ मुनि ने प्रागज्योतिषपुर में अपना आश्रम बनाया और कामख्या शक्ति पीठ के पास देवी तारा की मन्त्र साधना शुरू की। काफी लम्बे, बरसों के प्रयास के बाद भी जब मन्त्र सिद्ध नहीं हुआ, देवी भी प्रकट नहीं हुई। तो खीज कर वसिष्ठ मन्त्र को ही शापित करने चले, इतने में पार्वती अपने वज्रयोगिनी स्वरुप में वसिष्ठ के सामने आई और उनसे महाचीन जाकर साधना सीखने कहा। देवी की सलाह से जब वसिष्ठ बुद्ध के पास पहुंचे तो विष्णु अवतार को पंचमकार में लिप्त देखकर वो घृणा से भर उठे।

लेकिन वशिष्ठ को पंचमकार का अर्थ समझाते हुए वाम साधना में बुद्ध ने दीक्षित किया। लौटने पर द्वारक नदी के किनारे एक शमशान चुनकर वसिष्ठ ने साधना दोबारा की और देवी तारा सद्योजात शिव के साथ प्रकट हुई और वशिष्ठ को आशीर्वाद दिया। जिस स्थान पर वशिष्ठ ने ये उपासना की थी, वो जगह अब बीरभूम (बंगाल) में है। यहाँ के मंदिर में देवी तारा अपने आदिरूप में हैं जिसे चार भुजाओं वाले एक चांदी के उग्रतारा के आवरण से ढक कर रखा जाता है। इसे सिर्फ ब्रह्म मुहूर्त में देख सकते हैं।

देवी के तारा स्वरुप के भैरव का नाम अक्षोभ्य है। वो प्रत्यालीढ़ मुद्रा में खड़ी होती हैं, यानी योद्धाओं की तरह बायाँ पैर आगे शिव के अचेतन स्वरुप पर। देवी का वाहन गीदड़ या शव होता है। द्वितीय महाविद्या तारा की कृपा से साधक ज्ञानी हो जाता हैं। वाक् सिद्धि प्रदान करने से ये नील सरस्वती कही जाती हैं, सुख, मोक्ष प्रदान करने तथा उग्र आपत्ति हरण करने के कारण इन्हें ताराणी भी कहा जाता हैं। वशिष्ठ मुनि ने सबसे पहले देवी तारा कि आराधना की थी, इसलिए देवी ’वशिष्ठाराधिता’ के नाम से भी जानी जाती हैं।

देवी तारा ज्ञान और मोक्ष की देवी हैं, जितनी हिन्दुओं के लिए उपास्य हैं, उतनी ही बौद्ध तंत्र में भी उनकी मान्यता है। हाँ, फिर से याद दिला दें, गरिष्ठ भोजन मजबूत हाजमे वालों के लिए होता है, बच्चों के लिए नहीं।

आम तौर पर आयातित विचारधारा के लोग आपको सिखायेंगे कि धार्मिक पाबंदियां सभी की सभी स्त्रियों पर ही लागू होती हैं | लेकिन अगर आप आजीवन बड़े शहरों में नहीं रहे हैं, कस्बों-गावों में आना जाना है तो आपको पता होगा कि असलियत इसकी उल्टी है | ज्यादातर लोक परम्पराओं में पुरुषों पर निषेध लागू होता है |

कई त्योहारों में घर के आँगन में आने पे पाबन्दी होती है | वो इलाका अघोषित रूप से स्त्रियों का हो जाता है | शाम में अगर घर में दिया जलता हो तो वो आप नहीं जला सकते, आपके घर की काम वाली बाई जला दे तो चलेगा, आप पुरुष हैं, आप नहीं जलाएंगे | किसी काली मंदिर में पुरुष लाल चुन्नी या दुर्गा मंदिर में अकेले हों तो लाल कपड़ा नहीं चढ़ा सकते | ऐसे ही कई मंदिर भी हैं जहाँ पुरुषों का प्रवेश मना है |

जैसे स्त्रियों के लिए हनुमान के विग्रह को छूने से मनाही होती है वैसे ही पुरुषों के लिए दुर्गा की, काली की प्रतिमाओं पर दिख जाएगी | ये स्त्रियों पर पाबन्दी का वहम फैलाना इसलिए आसान होता है क्योंकि आप अपनी धार्मिक परम्पराओं के बारे में सीखते नहीं | पिछली पीढ़ी ने भी सेकुलरिज्म का ढ़ोंग शुरू होने के बाद से सिखाना बंद कर दिया ! करीब चालीस पचास साल में, तीन पीढ़ियों के फर्क में हम इतने मूर्ख हो गए कि हमें ठगा जा सके |

ये बिलकुल वैसा ही है जैसा अगर आपसे पूछा जाए कि पूजा में क्या क्या लगता है तो आप अपने अंदाजे से बताना शुरू कर दें | आप सोचेंगे पंडित जी को क्या क्या मंगाते देखा था तो याद आएगा अक्षत(कच्चे चावल), तुलसी पत्ते, दूब (लम्बी घास), बेलपत्र | तो आप यही सब मंगवा कर पूजा करने की बात आराम से सोच सकते हैं | लेकिन यहाँ एक छोटी सी दिक्कत है |

नार्चयेदक्षतेर्विष्णु, न तुलस्यागनाधिपम।
न दुर्व्ययजेद्देवी, बिल्वपत्रें न भास्करं।

यानि कि विष्णु की पूजा में अक्षत, गणपति को तुलसी, देवी को दूर्वा और सूर्य देव को बिल्वपत्र वर्जित है !

तो जिन किन्हीं भी महानुभावों की सलाह पर आप गणपति के विग्रह को डुबो कर उसपर तुलसी लगाने जा रहे हों, उनकी सलाह मत मानिए | जैसे टीवी के ऊपर कोई मैगनेट-चुम्बक या स्पीकर (जिसमें अन्दर बड़ा सा चुम्बक होता है) रखना मना होता है, बिलकुल वैसा ही समझ लीजिये | श्री गणेश के पास तुलसी नहीं रखते |

आनन्द कुमार

 

सर्वश्रेष्ठ राजा राम

भारत भूमि पर पृथु से लेकर हरिश्चंद्र, मान्धाता और रघु से लेकर धर्मराज कृष्ण और युधिष्ठिर तक जितने राजा हुये उनकी संख्या सूची बनाना जितना कठिन है, उनमें “सबसे श्रेष्ठ कौन हैं” इसका उत्तर उतना ही आसान है। सबने एक स्वर में यही कहा है कि भारत- भूमि पर जन्में समस्त राजाओं में सबसे श्रेष्ठ “श्रीराम” थे। शुक्र-नीति में कहा गया है:-

“न राम सदृशो राजा भूमौ नीति मानभूत”

शुक्र-नीति में जो कहा गया है उसका दर्शन पूरे रामायण में कई बार होता है। वहां राम कई जगहों पर राजा के रूप में भी प्रस्तुत हैं और कई जगहों पर औरों को राज-काज की शिक्षा देते हुये भी प्रस्तुत हैं।

राम जब राजा बने तो “उन्होंने राजा और आदर्श राज्य कैसा हो” इसका आदर्श प्रस्तुत किया जिसे तुलसी बाबा ने लिखा है:-

“दैहिक दैविक भौतिक तापा, रामराज नहीं कहहूँ व्यापा”

और जब वो राजा नहीं थे तब भी उन्होंनें इसी राज्य-मर्यादा की शिक्षा अपने अनुजों और मित्रों को दी थी।

भरत चित्रकूट में जब राम से मिलने जातें हैं तो तत्कालीन अयोध्या नरेश भरत को राम राज-काल की जो शिक्षा देतें हैं वो आज के शासकों के लिये भी पाथेय है।

राम भरत से पूछ्तें हैं:-

● भरत ! तुम असमय में ही निद्रा के वशीभूत तो नहीं होते? समय पर जाग तो जाते हो न?

● सैनिकों को देने के लिये नियत किया हुआ समुचित वेतन और भत्ता तुम समय पर तो देते हो न? इसे देने में कोई विलंब तो नहीं करते? क्योंकि अगर सैनिकों को नियत समय पर वेतन, भत्ता न दिया जाये तो वो अपने स्वामी पर अत्यंत कुपित हो जातें हैं और इसके कारण बड़ा भारी अनर्थ हो जाता है।

● क्या तुम नीतिशास्त्र की आज्ञा के अनुसार चार या तीन मंत्रियों के साथ-सबको एकत्र करके अथवा सबसे अलग-अलग मिलकर सलाह करते हो?

● तुम राजकार्यों के विषय पर अकेले ही तो विचार नहीं करते?

● क्या तुम्हारी आय अधिक और व्यय बहुत कम है न? तुम्हारे खजाने के धन अपात्रों के हाथ में तो नहीं चला जाता?

● काम-काज में लगे हुये सारे मनुष्य तुम्हारे पास निडर होकर तो आतें हैं न?

● जंगल तुम्हारे राज्य में सुरक्षित तो हैं न?

● तुम्हारे राज्य में दूध देने वाली गौएँ तो अधिक संख्या में है न?

● क्या तुम्हारे राज्य में स्त्रियाँ भलीभांति सुरक्षित तो रहतीं हैं न?

● कृषि और गोरक्षा से आजीविका चलानेवाले सभी वैश्य तुम्हारे प्रीतिपात्र तो हैं न?

● तुम्हारे राज्य में सिंचाई व्यवस्था तो उत्तम है न?

● तुम नास्तिक ब्राह्मणों का तो संग नहीं करते? क्योंकि वो अज्ञानी होते हुये भी अपने को बहुत बड़ा ज्ञानी मानतें हैं।

● तुमने जिसे राजदूत के पद पर नियुक्त किया है, वह पुरुष अपने ही देश का निवासी, विद्वान, कुशल और प्रतिभाशाली तो है न? उसे जैसा निर्देश दिया गया हो वैसा ही वो दूसरे (राष्ट्राध्यक्ष) के सामने कहता है न?

● क्या तुम्हारे सारे अधिकारी और मंत्रीमंडल के लोग तुमसे प्रीति रखतें हैं? क्या वो तुम्हारे लिए एकचित्त होकर अपने प्राणों का उत्सर्ग करने के लिये तैयार रहतें हैं?

● क्या तुम अपने सेनानायकों को यथोचित सम्मान देते हो?

● वो लोग जो राजा के राज्य को हड़प लेने की इच्छा रखतें हो वैसे दुष्टों को अगर राजा नहीं मार डाता, वह स्वयम उसके हाथ से मारा जाता है।

● भरत ! जैसे पवित्र याजक पतित यजमान का तथा स्त्रियाँ कामचोर पुरुष का तिरस्कार कर देतीं हैं, उसी प्रकार प्रजा कठोरता पूर्वक अधिक कर लेने के कारण तुम्हारा अनादर तो नहीं करती.

● क्या तुमने अपने ही समान सुयोग्य व्यक्तियों को ही मंत्री बनाया है?

● क्या तुम अर्थशास्त्री सुधन्वा का सम्मान करते हो?

राम ने राजनीति संबंधी ये उपदेश सुग्रीव से लेकर लक्ष्मण तक सबको दिये थे। प्रभु कहतें हैं:-

● सामनीति के द्वारा न तो इस लोक में ही कीर्ति प्राप्त ही जा सकती है और न ही संग्राम में विजय हासिल होता है.

● यदि राजा दंड देने में प्रमाद कर जाये तो उन्हें दूसरे के किये हुए पाप भी भोगने पड़ते हैं.

● राजा को अपने सु-हृदयों की पहचान अवश्य होनी चहिये.

● सेवकों को कम वेतन देने वाला राजा नष्ट हो जाता है.

● जो राजा बड़ा अभिमानी हो, स्वयं को ही सर्वोपरि माने ऐसे राजा को संकटकाल में उसके अपने लोग ही मार डालतें हैं इसलिये राजा को इन दुर्गुणों से बचना चाहिये।

● जो राजा अपने उपकारी मित्रों के सामने की गई अपनी प्रतिज्ञा (वादा/ घोषणा) को झूठी कर देता है , उससे बढ़कर कोई क्रूर नहीं होता।

ऊपर प्रभु के जितने भी उपदेश हैं क्या उनमें से किसी एक के बारे में भी कोई कह सकता है कि अब वो प्रासंगिक नहीं रहा जबकि राजनीति विषयके ये उपदेश भगवान ने लाखों साल पहले दिये थे।

रामलला के राजनीति-विषयक उपदेशों का ये सार-संक्षेपण मात्र है। आज के समय में जो प्रासंगिक है उसी को आधार बनाकर और राम के उपदेशों से कुछ का चयन कर आपके सामने रखा है। हमारी वर्तमान पीढ़ी इस बात को समझे कि राम भारत के लिये क्या हैं।

रामराज्य का वर्णन करते हुए तुलसी कहतें हैं,

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

यानि, ‘रामराज्य’ में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसी को नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदों में बताई हुई नीति (मर्यादा) में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्म का पालन करते हैं।

ऐसा नहीं है कि रामराज्य में हर कोई धनपति हो गया था पर इसके बाबजूद जिस रामराज्य का वर्णन तुलसी ने किया है वहां वर्ग-संघर्ष जैसी कोई अवधारणा नहीं पनप सकती थी इसकी वजह थी कि वहां के मनुष्यों के बीच परस्पर प्रेम था, एक-दूसरे के प्रति आदर का भाव था, मालिक और मजदूर में भेद नहीं था, हर कार्य की सफलता का श्रेय स्वयं को नहीं सबको देने का भाव था।

संघ के द्वितीय सरसंघचालक पू० माधव सदाशिव गोलवलकर ने भी कहा था कि रिक्शे या ठेले वाले को ‘ऐ रिक्शावाले’ कहने की जगह अगर समाज उसे उसका नाम लेकर बुलायें तो उसमें कभी कम्युनिज्म और वर्ग-संघर्ष का भाव नहीं पनप सकता। ये सत्य कथन है कि प्रेम, आदर और मानवीय मूल्यों का सम्मान आर्थिक विषमता को गौण कर देता है, आर्थिक विषमता सामजिक विषमता नहीं बन पाती।

कोई मजदूर है, श्रम करता है तो उसके मन में इसके लिये कोई हीनताबोध नहीं हो, श्रम सम्माननीय है, गौरव-बोध कराती है रामकथा का एक बड़ा सन्देश ये भी है और राम ने इसे जीवन और अपने कर्मों से हमेशा सिद्ध किया।

राजकुल में जन्मे अवश्य पर इसे उन्होंने कभी भी श्रम से भागने का आधार नहीं बनाया। जब गुरुओं के साथ थे तो आश्रम की तमाम व्यवस्थाओं के साथ अपने गुरु के चरण दबाने जैसे कार्यों में राम हमेशा आगे रहे, जब वनवास काल में थे तब कुटिया बनाने से लेकर अन्य दूसरे काम दोनों भाई स्वयं ही करते थे और जब वापस अयोध्या आये, राजसिंहासन मिला तब भी ये संस्कार न तो उनमें लुप्त हुआ था न उनके परिवारजनों में।

तुलसी आदर्श रामराज्य के वर्णन में लिखतें हैं :-

जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी। बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी॥
निज कर गृह परिचरजा करई। रामचंद्र आयसु अनुसरई॥
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ। सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ॥
कौसल्यादि सासु गृह माहीं। सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं॥

यानि, यद्यपि घर में बहुत से दास और दासियाँ हैं और वे सभी सेवा की विधि में कुशल हैं, तथापि श्री सीताजी घर की सब सेवा अपने ही हाथों से करती हैं और श्री रामचंद्रजी की आज्ञा का अनुसरण करती हैं, कृपासागर श्री रामचंद्रजी जिस प्रकार से सुख मानते हैं, श्री सीता वही करती हैं, क्योंकि वे सेवा की विधि को जानने वाली हैं। घर में कौसल्या आदि सभी सासुओं की सीताजी सेवा करती हैं, उन्हें किसी बात का अभिमान और मद नहीं है।

बिना श्रम अगर कुछ हासिल हो जाये तो वो महत्त्वहीन हो जाता है और जो श्रम के नतीजे में मिले उससे सुखकर कुछ नहीं होता, राम के जीवन-चरित में इसे सिखाता हुआ एक प्रसंग है:-

जब दशरथ ने प्रभु को वनवास की आज्ञा दी तो वो एक-एक कर सबसे मिले फिर जितनी धन-संपत्ति और वस्त्राभूषण उनके पास थे सब दान करने के लिए महल से बाहर निकल आये। दान करते समय एक अस्सी वर्षीय बूढ़ा लाठी टेकता हुआ उनके पास याचक रूप में आया। राम ने पूछा, क्या चाहिए? उस वृद्ध ने गौ की मांग की, राम ने सामने मैदान की तरह अंगुली से इशारा करते हुए उस वृद्ध से कहा, बाबा आपके हाथ में जो लाठी है, उसे जितनी जोर से फेंक सकते हो फेंको। जहाँ जाकर लाठी गिरेगी, उससे इधर की सारी गौएँ आपकी। उस बूढ़े को समझ नहीं आया कि ये क्या कह रहे हैं राम, वो नकारात्मकता में सर हिलाते हुए कहने लगा, राम, मेरी उम्र इतनी नहीं है कि मुझसे ये लाठी फेंकी जायेगी। राम ने उसे उत्साहित करते हुए कहा, देखो बाबा ! लाठी जितनी दूर फेंकोगे उतनी गौएँ आपकी। उत्साह में भरे बूढ़े ने पूरे ताकत से लाठी घुमाकर फेंकी और वहां से काफी दूर जा गिरी। राम ने लाठी की सीमा के भीतर की सारी गायें उसे देकर ससम्मान विदा कर दिया।

ये सारी घटना लक्ष्मण भी देख रहे थे, उन्हें कुछ समझ नही आया तो उन्होंने राम से पूछा :- भैया, आप उसे यूं भी तो गौएँ दे सकते थे तो उससे ये श्रम क्यों करवाया? तब राम ने लक्ष्मण को समझाते हुए कहा कि अगर उस बूढ़े को दान में गौएँ मिलती तो वो उसे मुफ्त का माल समझकर अकर्मण्य हो जाते पर चूँकि अब उन्होंने इसे अपने श्रम से पाया है तो वो इसकी महत्ता और कीमत समझेंगे।

जब लंका विजय हुई तो विजय के उपलक्ष्य में प्रभु ने सब वानर-भालुओं को बुलाया, उनसे प्रेम से बात की और कहा, ये विजय मेरी नहीं है, न ही रावण वध अकेले मेरे बल का परिणाम था बल्कि ये विजय आप सबके बल से प्राप्त हुआ है और आज तीनों लोक आप सबका यशोगान गा रहा है। अपने इन सहयोगियों के प्रति राम ने तब भी आभार प्रकट करते हुए उन्हें विजय का श्रेय दिया था जब वो चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे, अपने कुल गुरु वशिष्ठ से सबका परिचय कराते हुए राम ने कहा था ,

“गुरुवर ! ये सब मेरे वो मित्र हैं जिन्होनें मेरे लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी, ये सब मुझे भरत से भी अधिक प्रिय हैं”

लंकाकाण्ड में आता है कि जब विभीषण के राज्याभिषेक की बात हो रही थी तब राम ने विभीषण के लंका चलने के अनुरोध को ये कहते हुए ठुकरा दिया था कि मैं पिता की आज्ञानुसार चौदह वर्ष पूर्व नगर में नहीं जा सकता पर आपके राज्याभिषेक के लिये मैं “अपने समान” सब वानरों को भेजता हूँ। राम ने वानरों को अपने समान बताया। राम की नज़र में हनुमान भी कोई सेवक नहीं थे, राम ने कई बार हनुमान को अपना पुत्र बताया है। वो हनुमान से कहतें हैं, “सुन सुत तोहि उरिन मैं नाहीं” यानि हे पुत्र ! सुन मैं तुझसे उरिन नहीं हो सकता।

इसलिये राम से अधिक समाजवादी, मजदूर-हितैषी और वर्ग-भेद को पाटने वाला कोई दुनिया के किसी किताब, किसी वृत से, किसी इतिहास ग्रन्थ से निकाल कर दिखा दे।

मालिक और मजदूर के संबंधों को समझना हो, श्रम के सम्मान को समझना हो, श्रम से आत्मगौरव का बोध जागरण करना हो, मजदूर यानि धर्मविरोध नहीं बल्कि धर्म के अनुपालन का भाव देखना हो, वर्ग-संघर्ष न जन्म ले इसके लिये भाषण और दर्शन देने की जगह स्वयं के जीवन को मिसाल बनाकर दिखाना हो तो रामचरित से सुंदर कुछ नहीं हो सकता।

देश के विकास और निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाने वाले लाखों मजदूरों के कठिन परिश्रम, दृढ़ निश्चय और निष्ठा का वास्तविक सम्मान तभी होगा जब हिंसा, वर्ग-संघर्ष, साम्राज्यवाद और नास्तिकता से मुक्त समाज बनेगा और ये व्यवहार में श्रीराम के अनुगमन के बिना संभव ही नहीं है।

माओवाद और मार्क्सवाद की आवश्यकता भ्रष्ट जार वाले रूस या महा-भ्रष्ट च्यांग काई शेक के चीन में रही होगी या है …अपने भारत में इनका स्थान केवल डस्टबिन में है।

अपने मामा के यहाँ से आने के बाद जब भरत को राम के वनवास की खबर मिलती है तो वो माता कौशल्या से मिलने जातें हैं। कौशल्या उनसे कहतीं हैं, “बेटा ! तुम राज्य चाहते थे न? सो यह निष्कंटक राज्य तुम्हें प्राप्त हो गया”।

यह सुनकर भरत को बड़ी पीड़ा हुई और वो खुद को अपराधी मानते हुये माँ कौशल्या के चरणों में गिर पड़े और माँ कौशल्या से कई बातें कहीं जिसमें भरत कहतें हैं:-

“अगर मेरी सम्मति से भैया श्रीराम ने वन को प्रस्थान किया है तो मैं आज ही सत्पुरुषों के लोक से, सत्पुरुषों की कीर्ति से और सत्पुरुषों द्वारा सेवित कर्म से शीघ्र ही नष्ट हो जाऊं”। इसके बाद भरत कहतें हैं:-

“अगर मेरी सम्मति से भैया श्रीराम ने वन को प्रस्थान किया है तो मुझे भी वही पाप लगे जो सेवक से भारी काम करवाकर उसे समुचित वेतन न देने वाले स्वामी को लगता है”

राम को वन भेजने के अपराध की सजा की तुलना भरत ने किससे की है अगर ये हमारे यहाँ के वामपंथी देख लेते तो मजदूरों की फ़िक्र में किसी मार्क्स और लेनिन की वाहियात किताबों की ओर देखने न जाते

हिन्दुओं से अधिक समाजवादी कौन है दुनिया में? हमें अपने मजदूरों और वंचितों के लिये किसी आयातित विचार की आवश्यकता नहीं है क्योंकि दुनिया में हिन्दू धर्म से अधिक समाजवाद किसी भी धर्म में नहीं है, किसी विचार में नहीं है और दुनिया में कोई भी व्यक्तित्व नहीं है जो हमारे पूर्वजों से अधिक समाजवादी हो।

अभिजीत सिंह