कालगणना परिचय

हम दैनिक व्यवहार में ईसाई संवत का प्रयोग करतें हैं इसलिये अगर कोई तिथियों के निरूपण में प्रतिपदा, द्वितीया, एकादशी जैसे शब्द प्रयोग करता है तो हमें उलझन हो जाती है। अपनी संस्कृति, अपनी कालगणना के बारे में थोड़ा-बहुत हम सबको जानना चाहिये और फिर आंग्ल तिथियों के साथ-साथ दैनिक व्यवहार में भी अपनाना चाहिये।

आज तिथियों के बारे में कुछ चर्चा करते हैं। हम जिसे तिथि कहतें हैं ज्योतिषशास्त्र की भाषा में वो चंद्रमा की एक कला है, गणितीय रूप में समझें तो तिथि का निरूपण सूर्य और चंद्रमा की पारस्परिक दूरी के आधार पर होता है जिसे डिग्री या अंश में मापा जाता है। हमारी धरती सूर्य के चारों ओर घूमती है वहीं चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर। इस भ्रमण के चलते पृथ्वी पर से देखने वाले को कभी सूर्य और चन्द्र एक ही अंश में दिखतें हैं तो कभी बिलकुल १८० डिग्री की दूरी पर। जब सूर्य और चन्द्र एक डिग्री पर आ जातें हैं उसके बाद अपनी तीव्र गति के चलते चंद्रमा तेज़ी से आगे भागता है और क्रमशः सूर्य और उसके बीच का अंतर बढ़ता चला जाता है। सूर्य और चंद्रमा के बीच १२ डिग्री का अंतर एक तिथि कहलाता है। एक चान्द्रमास में ३० तिथियाँ होतीं हैं अतः ३० तिथियों में ३६० डिग्री का अंतर आता है।

तिथि निरूपण बड़ा रोचक है, जैसे-

१. आंग्ल कैलेंडर में रात्रि बारह बजे के बाद तिथि बदल जाती है पर हमारे यहाँ तिथि का आरम्भ सूर्योदय से तय होता है।

२. तिथि का आरंभ सूर्योदय के पहले या बाद कभी भी हो सकता है पर सूर्योदय के समय जो तिथि रखती है उसे ही उस दिन की तिथि माना जाता है। मान लीजिये किसी दिन सूर्योदय के समय तृतीया तिथि है और सूर्योदय के आधे घंटे बाद तिथि बदल गई तो भी उस पूरे दिन की तिथि तृतीया ही मानी जायेगी।

३. कई बार ऐसा भी होता है कि सूर्य और चन्द्र की गति के प्रभाव से तिथि का मान बढ़ जाता है यानि मान लीजिये सूर्योदय से कुछेक मिनट पहले कोई तिथि आरम्भ हुई और वही तिथि दूसरे दिन के सूर्योदय के वक़्त भी है, यानि उस एक तिथि में दो बार सूर्योदय हुआ। उदाहरण के लिये आज त्रयोदशी है और ये आज सूर्य से थोड़ा पहले शुरू हुआ और यही तिथि कल के सूर्योदय के वक़्त भी रह जाता है तो पंचांग में आज यानि गुरुवार और कल यानि शुक्रवार दोनों ही दिन की तिथि त्रयोदशी हुई। यानि त्रयोदशी तिथि की वृद्धि हुई। इसे अधिदिन भी कहा जाता है।

४. कई बार इसका विपरीत भी होता है जैसे कोई तिथि आज सूर्योदय के ठीक बाद शुरू हुई और कल सूर्योदय के ठीक पहले ही खत्म हो गई यानि उस तिथि में कोई सूर्योदय हुआ ही नहीं, इसे तिथि क्षय कहा जाता है और पंचांग में इस तिथि का निरूपण नहीं होता। इस लिये अगर चौथी तिथि का क्षय हुआ है तो पंचांग में तृतीया के बाद सीधा पंचमी तिथि निरूपित रहेगा।

५. सूर्य और चंद्रमा दोनों अपनी-अपनी कक्षाओं में स्थित हैं पर चंद्रमा शीघ्रगामी है इसलिये ये जैसे ही सूर्य से १२ डिग्री दूर हो जाता है तो शुक्ल-पक्ष की प्रतिपदा तिथि पूरी हो जाती है और फिर ये दूरी जब तक २४ डिग्री रहती है द्वितीया तिथि मानी जाती है और फिर इसी तरह ये क्रम चलता है यानि दूरी ३६, ४८ डिग्री हो जाये तो क्रमशः तृतीया, चतुर्थी आदि तिथि पूर्ण होती है. चलते-चलते जब ये दूरी १५ वें दिन में १६८ डिग्री पहुँच जाती है तो पूर्णिमा शुरू जाती है जो इस दूरी के १८० डिग्री होने तक रहती है। रेखागणित वाले जानतें हैं कि १८० डिग्री का मतलब है एक सीध में होना यानि अब सूर्य और चंद्रमा एक सीध में यानि एक-दूसरे से विपरीत हैं इस स्थिति में चन्द्रमा अपने पूर्ण रूप में प्रकाशमान होता है। आपकी कुण्डली में अगर सूर्य और चंद्रमा सम-सप्तक हैं तो इसका अर्थ है कि आपका जन्म पूर्णिमा या उसके आसपास का है। इसके बाद फिर जब चन्द्रमा १८० डिग्री से आगे बढ़ता है तो अगले बारह अंशों तक कृष्णपक्ष की प्रतिपदा तिथि मानी जाती है और उसके बाद क्रमशः ये दूरी कम होते-होते पुनः पन्द्रह दिन बाद शून्य हो जाती है यानि चन्द्र और सूर्य की डिग्री का अंतर शून्य हो जाता है और ये तिथि होती है अमावस की। आपकी कुण्डली में अगर सूर्य और चंद्रमा साथ में बैठें हैं तो इसका अर्थ है कि आपका जन्म अमावस या उसके आसपास का है।

६. यदि सूर्य की गति सामान्य हो और चन्द्र की गति बढ़ जाये तो १२ अंश की दूरी तय करने में चंद्रमा कम समय लेगा पर यदि चन्द्रमा की गति मंद है तो यही दूरी वो अधिक समय में तय करेगा। पहली वाली स्थिति यानि जब चन्द्र की गति तीव्र हो तो हो सकता कि उस तिथि को सूर्योदय हो ही न और इसी तरह अगर चन्द्र की गति मंद है तो हो सकता है उस तिथि में दो बार सूर्योदय हो जाये।

अपनी कालगणना बड़ा रोचक तो है ही साथ ही हमें गौरव बोध कराने वाला भी है क्योंकि यह हमें बताता है कि हम केवल दो हज़ार साल की परिधि में सिमटे नहीं हैं बल्कि हमारी जड़ें काफी दूर तक हैं। इसलिए क्यों न हम आज नववर्ष से एक नई पहल करें।

हमलोग अपने दैनिक कार्य- व्यवहार में अपने पंचांग की तिथियों का प्रयोग करें।

अपनी संस्कृति के लिए कम से कम कुछ बेहतर तो हम कर ही सकते हैं तो क्यों न इस रूप में करें।

 

आक के विभिन्न उपयोग

बहुत सी चीजे प्रकति ने हमें दी है जो हमारे ही आस-पास मौजूद है परन्तु जानकारी के अभाव में हम उसकी विशेषताओं से अनजान है इसी में एक नाम है मदार ( आक ) का भी है .

आक के सभी अंग जड़, पत्ते, फूल एवं दूध औषधि के रूप में बहुत उपयोगी होते हैं। आक के जड़ की छाल तिक्त, पाचक, दीमक, वामक एवं बल्य रसायन युक्त होती है। इसके पत्तों एवं डंठलों में कैलॉट्रोपिन तथा कैलॉट्रोपेगिन रसायन पाए जाते हैं।

आक के सभी अंग मोम जैसी सफेद परत से ढंके रहते हैं। इसके सभी अंगों से सफेद दूध जैसा तरल पदार्थ निकलता है। जिसे आक का दूध कहते हैं। आक प्रायः दो प्रकार का होता है लाल तथा सफेद। लाल आक आसानी से सब जगह पाया जाता है। यों तो यह पौधा वर्ष भर फलता−फूलता है। परन्तु सर्दियों के मौसम में यह विशेष रूप से बढ़ता है।

चोट−मोच, जोड़ों की सूजन (शोथ) में आक के दूध में नमक मिलाकर लगाना चाहिए।

आक के दूध को हल्दी और तिल के साथ उबालकर मालिश करने से आम -वात, त्वचा रोग, दाद, छाजन आदि ठीक होता है।

आक की छाल के प्रयोग से पाचन संस्थान मजबूत होता है।

अतिसार और आव होने की स्थिति में भी आक की छाल लाभदायक सिद्ध होती है। इससे रोगी को वमन की आशंका भी कम होती है। मरोड़ के दस्त होने पर आक के जड़ की छाल 200 ग्राम, जीरा तथा जवाखार 100−100 ग्राम और अफीम 50 ग्राम सबको महीन चूर्ण करके पानी के साथ गीला करके छोटी−छोटी गोलियां बना लें। रोगी को एक−एक गोली दिन में तीन बार दें इससे तुरन्त लाभ होगा।

त्वचीय रोगों के इलाज में आक विशेष रूप से उपयोगी होता है। लगभग सभी त्वचा रोगों में आक की छाल को पानी में घिसकर प्रभावित भाग पर लगाया जाता है। यदि त्वचा पर खुजली अधिक हो तो छाल को नीम के तेल में घिसकर लगाया जा सकता है।

श्वेत कुष्ठ में भी इसके प्रयोग से फायदा मिलता है। आक के सूखे पत्तों का चूर्ण श्वेत कुष्ठ प्रभावित स्थानों पर लगाने से तुरन्त लाभ मिलता है। इस चूर्ण को किसी तेल या मलहम में मिलाकर भी लगाया जा सकता है।

बिच्छू के काटने पर विष उतारने के लिए आक की जड़ को पानी में पीसकर लेप लगाया जाता है।

कुत्ते के काट लेने पर दंश स्थान पर या काटने से बने घाव में आक का दूध अच्छी तरह भर देना चाहिए। इससे विष का प्रभाव खत्म हो जाता है और फिर कोई परेशानी नहीं होती।

आक के पत्तों का चूर्ण लगाने से पुराने से पुराना घाव भी ठीक हो जाता है। कांटा, फांस आदि चुभने पर आक के पत्ते में तेल चुपड़कर उसे गर्म करके बांधते हैं।

जीर्ण ज्वर के इलाज के लिए आक को कुचलकर लगभग बारह घंटे गर्म पानी में भिगो दे, इसके बाद इसे खूब रगड़−रगड़ कर कपड़े से छान कर इसका सेवन करें इससे शीघ्र फायदा पहुंचता है। मलेरिया के बुखार में इसकी छाल पान से खिलाते हैं।

किसी गुम चोट पर मोच के इलाज के लिए आक के पत्ते को सरसों के तेल में पकाकर उससे मालिश करनी चाहिए।

कान और कनपटी में गांठ निकलने एवं सूजन होने पर आक के पत्ते पर चिकनाई लगाकर हल्का गर्म करके बांधते हैं। कान में दर्द हो तो आक के सूखे पत्ते पर घी लगाकर, आग पर सेंककर उसका रस निकालकर ठंडा कर कान में एक बूंद डालें।

यदि आप सिर में फंगल संक्रमण के कारण होने वाली खुजली से परेशान हैं तो आप इसका अर्क (दुग्ध ) का स्थानिक प्रयोग करें और लाभ देखें।

मदार के पीले पके पत्तों पर घी चुपड़ कर धीमी आंच में गर्म कर उससे रस निकालकर दो से तीन बूँद कान में डालने से कान के रोगों में बड़ा ही लाभ मिलता है।

दांत के किसी भी प्रकार के दर्द में मदार के दूध में हल्का सैंधा नमक मिलाकर पीड़ा वाले स्थान पर लगा देने मात्र से दंतशूल में लाभ मिलता है।

आक के आठ से दस पत्तों में पांच से दस ग्राम काली मिर्च मिलाकर अच्छी तरह पीसकर ,थोड़ी हल्दी मिलाकर मंजन करने से दांत को मजबूती मिलती है।

आधे सिर के दर्द में पीले पड़े हुए मदार के एक से दो पत्तों के रस को नाक में टपका देने से लाभ मिलता है।

मदार के फूल को सुखाकर त्रिकटु (सौंठ ,मरीच और पिप्पली ) और यवक्षार के साथ मिलाकर बारिक पीस लें।अदरक स्वरस के साथ पीस लें और इसकी छोटी-छोटी गोलियां बना लें। बस तैयार हो गई गले की खरास के लिए चूसने वाली दवा इससे आपका गला ठीक रहता है और सूखी खांसी में भी लाभ मिलता है।

जौंडिस (कामला ) के रोगियों में मदार की एक कोपल को खाली पेट पान के पत्ते में रखकर चबाने से लाभ मिलता है।

यदि पुराना घाव जो ठीक न हो रहा हो या नाडी व्रण/भगंदर जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई हो तो मदार का दूध 5 से 10 मिली की मात्रा में 2.5 ग्राम दारुहरिद्रा के साथ मिलाकर रूई के बत्ती बनाकर घाव या नासूर पर लगाने मात्र से लाभ मिलता है।

हम क्या खाएं घास या मांस:

मनुष्य का बच्चा स्वभाव से मांस से प्रेम नहीं रखता।मनुष्य का बच्चा मांस खाना अपने माता पिता और दोस्तो से सीखता है।बिल्ली का बच्चा चूहे को देख कर ही उसको मारने दौड़ता है,मनुष्य का बच्चा फलों की ओर स्वाभाविक प्रेम रखता है।वह उन फलो पर टूटता है।मांस पर नहीं।मांस उसको उस समय तक प्रिय नहीं लगता जब तक उसको खिलाया ना जाए। उसका एक प्रमाण हैं।जो मांसाहारी नहीं है,उनके बच्चो को मांस देखकर ही घृणा होती हैं।किसी किसी बच्चो को तो मांस के टुकड़े देखकर ही वमन (उल्टी )हो जाती हैं।इससे सिद्ध है कि ईश्वर ने मनुष्य के हृदय में स्वाभाविक घृणा मांस की ओर से उत्पन्न कर दी है।मनुष्य मांस को विभत्स समझता है क्युकी इसकी उत्पत्ति मरे हुए जानवरो की लाशों से होता है ।क्या किसी पशु पक्षी का लाश भी कभी सभ्य मनुष्य का भोजन हो सकता है???कदापि नहीं। ओर तो आेर यदि आपके यहां कोई उत्सव हो और आप फल ,फूल,नारंगी आदि लटका देते हैं।उनसे शोभा बढ़ जाती हैं।मांसाहारी लोग भी फल फूल ही लटकाते है।वे बकरे की टांग या हिरन कि आंत ही लटकाते है।सभ्य देशों में मांस की दुकाने अलग रखी जाती हैं और उनके विभत्स दृश्यों को छिपाया जाता है।क्यो??इसलिए कि इतना क्रूर होने पर भी मनुष्य ने अभी तक मांस की ओर से स्वाभाविक घृणा का परित्याग नहीं किया।आप किसी दिन अपने कमरे या पंडाल को जानवरो की हड्डियों ,मृतक पशुओं के मांस पेशियों ,और उनके रक्त आदि से सजा कर देख लीजिए ,फिर अपने स्वभाव का अपने आप निर्णय कीजिए!!! वस्तुत: मांस खाने वाले इस स्वाभाविक वीभत्सता को पाक शाला सम्बन्धी चातुर्य से ढक लेते हैं,जिससे मनुष्य की साधारण घृणा मांस के प्रति जागृत न होवे। मै तो समझता हूं कि यदि किसी इंसान को पशुओं को स्वयं अपने हाथो से मार कर खाना पड़े तो करोड़ों मनुष्य स्वत: ही मांस खाना छोड़ देंगे।क्युकी विभत्स दृश्यों की कल्पना मात्र ही मांस से घृणा करने के लिए पर्याप्त है।मनुष्य की स्वाभाविक सभ्यता और मानवीय गुण जैसे प्रेम ,करुणा ,दया आदि यदि कृत्रिम उपायों से तिरोभूत ना कि जाए तो मांस खाना मनुष्य के लिए कठिन हो जाए।।।इस लिए अंग्रेजी के एक प्रसिद्ध विद्वान ने कहा था:

“If slaughter houses had glass walls , everyone would be a vegetarian!!!”

यदि बूचड़खाने और कसाई खाने की दीवारें शीशे और कांच की होती तो ,दुनिया में एक भी मांसाहारी व्यक्ति नहीं होता,सारे मनुष्य शाकाहारी होते।
क्युकी बूचड़खाने के विभत्स और क्रूरतम दृश्यों को देख पाना हर मनुष्य के लिए आसान काम नहीं।पशुओं के मुख से निकलने वाली चिखे और शोक तरंगे किसी भी मनुष्य का हृदय पिघला सकती हैं,उसे रुला सकती हैं।वह मनुष्य नहीं बल्कि कोई राक्षस ही होगा जिनका कि इन शोक पूर्ण दृश्यों और पशुओं पर बूचड़खाने व कसाई घर में किए जा रहे भीषण अत्याचारों को देख कर मन खिन्न और व्याकुल न हो।

मांसाहारी:

यदि मांस मनुष्य का स्वाभाविक भोजन न होता तो मांस को संसार के इतने लोग इतनी रुचि से क्यो खाते???
शाकाहारी: देखिए !यह उक्ति तो ठीक नहीं है।मनुष्य का स्वाभाविक भोजन तम्बाकू नहीं है,परंतु जिसको हुक्का,या सिगरेट पीने की लत लग जाती हैं, तो उसको एक मिनट भी उसके बिना चैन नहीं पड़ता।अफीम मनुष्य का स्वाभाविक भोजन नहीं,परंतु अफिमचियो को देखा होगा कि अफीम के बिना उनकी क्या दशा होती हैं।शराब सभ्य मनुष्यो का शीतल पेय नहीं है ,फिर भी जिनको शराब की लत लग जाती हैं ,वह कभी नहीं छूट ती ।ठीक उसी प्रकार जिसको मांस और रक्त का चस्का और स्वाद लग गया , वह जल्दी नहीं छूट सकता।मांस के निरंतर सेवन से उस मनुष्य की आत्मा दूषित और विकृत हो जाती हैं । मांस के सेवन से मनुष्य का वीर्य (sperm)और रज अंडा दूषित हो जाता है।वह कुतर्क द्वारा मांस को ही मनुष्य का सही भोजन सिद्ध करने का सदा विफल प्रयास करता रहता है।मनुष्य एक ऐसा प्राणी है ,जिसे प्रकृति का विरोध करने में आनंद आता है।प्रकृति को नष्ट करने में और प्रकृति के दूसरे संतानों और जीवो पर ज़ुल्मो सितम ढाने में आंनद लेता
है।मनुष्य नित्य यह सोचा करता है कि प्रकृति के विरुद्ध कैसे चला जाए,परन्तु प्रकृति भी ऐसे मांसाहारी मनुष्यो को इन दुष्ट और नीच कर्मो का दण्ड दिए बिना नहीं छोड़ती ,फिर भी मनुष्य मानता नहीं।इसको अनुकरण करना बहुत आता है।मांस तो गिद्ध,कुत्ते,शेर आदि हिंसक पशु पक्षियों का भोजन है,मनुष्य का नहीं।परन्तु फिर भी मनुष्य आज पशुओं से भी नीचे गिर चुका है।कभी वह कुत्ते का अनुकरण ,तो कभी बिल्ली का अनुकरण ,तो कभी शेर चिते का अनुकरण करता है और मूर्खो की तरह कहता फिरता है कि जीव ही जीव का आहार है।ऐसे मांसाहारी व्यक्ति उल जुलुल तर्क देते हैं कि देखो बकरी घास खाती हैं और बकरी को अंत में शेर ।इस लिए हमको इससे मांस खाना चाहिए।परन्तु ऐसे लोग विदेशी पाश्चात्य सभ्यता और शिक्षा के रंग में रंगे हुए हैं।इनसे पुच्छो की क्या वे भी शेर आदि की तरह हिंसक पशु बनना पसंद करेगे या मनुष्य की तरह मनुष्य बनना पसंद करेगे।देखो तुम्हारे दो हाथ है और दो पैर ।उनके चार है।उनके मुख और दांतो को देखो ।उनके दांतो के पास gap है परन्तु तुम्हारे दांत चिपके हुए हैं।उनके दांत नुकीले है ,परन्तु तुम्हारे नहीं।यदि मांस ही मनुष्य का स्वाभाविक भोजन होता तो सभी को अच्छा लगता ।दूसरी बात यह है कि बहुत से मनुष्यो को आदमी का मांस स्वादिष्ट लगता है,तो क्या इंसान के जिस्मों को भी भोजन मान लोगे???उन नर भक्षियो पर यह युक्ति कैसे घटेगी!????

 

मांस और क्षत्रिय जाति

कल रात बड़े मज़े की बात हुई ।
क्या बात हुई

क्या आप जानते है की मैंने मांस खाना छोड़ दिया
हा उस दिन आप कह तो रहे थे
कल एक पार्टी थी। मेरे कई दोस्त इकट्ठा हुए थे।मांस और शराब सभी तो था।मैंने खाने से इंकार कर दिया ।इस पर मेरी बड़ी हंसी हुई ।सब कहने लगे यह लड़का तो पंडित हो गया।यह कैसा क्षत्रिय है।इसने क्षत्रियों का नाम डुबो दिया ।जैनियों और बौद्धों के समान हिंसा हिंसा करता है।
फिर आपने क्या किया???
मैंने मांस खाया तो नहीं,परन्तु मुझे झेपना पड़ गया।वे सब मेरा मज़ाक बनाते रहे
आपने उनको क्यो नही बनाया ।
मै क्या बनाता !वे कई थे । मै अकेला !
आप अवश्य कच्चे क्षत्रिय है।आप आर्य है ही नहीं।
आप भी ऐसा कहते हैं???
क्यो न कहूं ??एक क्षत्रिय कई क्षत्रियों को देखकर डर गया उनकी बातो का काट नहीं कर पाया और झेप भी गया!!!जब उनके व्यंग्यों से डर गया तो तलवारों से क्या हाल होता ???
भाई तुम मुझे कुछ भी कहो।लेकिन बात तो यह है कि मुझसे उत्तर नहीं बन आया।
देखिए !पहले तो देखना चाहिए कि क्षत्रिय कहते किसको है।जो प्राणियों की दुःख से रक्षा करे वह क्षत्रिय है ।क्षत्रिय को नृप भी कहते है,क्युकी वह मनुष्यो की रक्षा करता है। क्षत्रियत व और मांस भक्ष न से कोई सम्बन्ध नहीं है।जो लोग जीवन भर मांस और शराब का प्रयोग करते ,सैकड़ों प्राणियों की हिंसा करते ,उनको मारते काटते , तड़पाते है और किसी की रक्षा नहीं करते हैं, वह कैसे क्षत्रिय है??वह तो महा आक्षत्रिय है।
क्षत्रिय शेर होता है।
क्षत्रिय की तुलना शेर से करना और उसकी उपमा शेर से देना बड़ी भ्रम मूलक है।पुराने काल के भारत वर्ष के क्षत्रियों के नाम हिंसा पर नहीं होते थे।राजा दशरथ दसरथ सिंह न थे।राजा युद्धिस्टिर युद्धिस् ठिर सिंह नहीं थे । राजा दिलीप का नाम दिलीप सिंह नहीं था।जिस दिन से क्षत्रियों ने अपने नाम के साथ सिंह लगाना आरम्भ कर दिया ।वे कोरे सिंह बन गए।
इससे हानी क्या हुई,,??
हानी तो बहुत हुई । हमारा वैदिक आदर्श धर्म गिर गया गया ।हम क्षत्रिय (आर्य )जाति अपने आदर्श और उद्देश्य से भटक गए।
कैसे???
देखिए ।सिंह को वन का राजा क्यो कहते है???
बल के कारण।
कैसा बल??पाशविक बल या नैतिक बल या आत्म बल।
बल तो बल ही है।
नहीं ।पाशविक बल किसी मनुष्य को राजा नहीं बना सकता। राजा के लिए प्रजा का पालन करना आ वश्यक है। सिंह सबको खा जाता है,किसी की रक्षा नहीं करता। सिंह के राज्य में किसी को शक्ति या स्वाधीनता प्राप्त नहीं होती। सिंह किसी को अदिना : श्याम शरद: शत्म “का पाठ पढ़ने नहीं देता।मारना और खाना ही शेर का काम है।जब से भारत वर्ष के क्षत्रिय राजपूत राजा “शेर” बन गए ,उन्होंने प्रजापालन छोड़ दिया।वे “खाऊ वीर” बन गए।नीति और वैदिक धर्म की मर्यादा से इनका संपर्क छूट गया।वेद , मनु स्मृति , दर्शन , उपनिषद आदि धर्म शास्त्र की मर्यादा और आदर्श को भूल गए।इनमें पाशविक बल रह गया।आत्म बल चला गया। हमारे अधिकांश राजा इन्द्रियों के दास हो गए ।वे जीभ के गुलाम बन कर रह गए।शराब के सेवन में डूब गए ।शराब और मांस का सेवन करके अभिमान से चूर रहने लगे।द्वेष भाव बढ़ गया।
तो क्या आप राणा प्रताप जैसे क्षत्रियों की अव्हेलना करते हैं!???
नहीं महाशय !!!!क्या सभी क्षत्रिय कहलाने वाले महाराणा प्रताप नहीं है??? राणा प्रताप का नाम इसलिए प्रसिद्ध हैं कि उन्होंने सर्वस्व त्याग करके हिन्दू धर्म ,हिन्दू समाज और हिन्दू संस्कृति के उत्थान का प्रयत्न किया,परन्तु ऐसे क्षत्रिय भारत देश में कितने हुए??? आप तनिक क्षत्रियों के आंतरिक जीवन को देखें।
आचार्य चाणक्य ने रईसों के पांच लक्षण लिखे है
1) पालकी
2.)हुक्का
3.)रंडीबाजी
4).कर्ज
5). शराब

क्षत्रियों की शान इस बात में नहीं है कि उसने अपने जीवन में कितने अंडे खाए,कितने बकरे मारे,कितने खरगोशो का शिकार किया।कितने बटेरो और पक्षियों के पंख नोचे अथवा कितने भेडे और गौ ए हलाल किए।प्रश्न तो यह होना चाहिए कि उन्होंने अपने जीवन में कितने प्राणियों को विपत्ति से बचाया।राजा दिलीप ने क्या कहा था???याद कीजिए कालिदास के शब्दो को

यश : शरीरे भवमे दयालु:

अर्थात मुझे अपने शरीर की परवाह नहीं है।यश की परवाह है।देखो मेरे यश और गौरव में बट्टा न लगने पावे ।वह स्थल याद है, जहां पर राजा दिलीप ने यह आदर्श बात कही है-
हा !याद है।गाय की जान बचाने को उसने अपने
को संकट में डाल दिया था।
बस यही तो मै कहता हूं।
आपने कहा तो ठीक ,परन्तु यदि क्षत्रिय लोग मांस न खाए तो शिकार की आदत छूट जाए और शिकार न करे तो रक्षा कैसे हो???
महाशय !क्षमा कीजिए।है तो आप कलयुगी क्षत्रिय न।इसलिए आपके विचार भी कलयुगी है। मै एक बात पूछता हूं
क्या??
क्या उस समय तक कोई भी मनुष्य किसी की रक्षा करने में समर्थ हो सकता है ,जब तक दया का भाव मन में न हो।
नहीं। प्रजा पालन के लिए दया चाहिए।
दया का अभ्यास भी चाहिए।
हा ।
वह अभ्यास बचपन से ही पड़ना चाहिए
हा।
तो क्या वह क्षत्रिय लड़के ,जिनको बचपन से ही गुलेल से चिड़ियों को मारने की आदत डाली जाती हैं,वे लड़के दया का अभ्यास करते हैं या निर्दयता का।
निर्दयता का।
फिर इस निर्दयता के अभ्यास का फल दया कैसे होगी???
वह तो निर्दय ही बनेंगे। दया का जो अंकुर उनके हृदय में होता है,वह भी मुरझा जाता है।
प्रतीत तो ऐसा ही होता है।
इसीलिए तो आजकल के क्षत्रियों को अपने ऐश आराम की सूझती है ।प्रजा पालन की नही।रात उनकी नाच गाने,शराब और रण्डी बाजी में कटती है।दिन में सोना या शिकार में अपना अनमोल समय नष्ट करते।फिर प्रजा का हित कौन करे?? राज कर्मचारी और राज मंत्री राजा को देख वैसे ही निकम्मे हो जाते।प्रजा भी राजा के गलत कार्यों का अनुकरण करती ।यथा राजा तथा प्रजा ।अर्थात जैसा राजा का चरित्र होता है , प्रजा का चरित्र भी वैसा ही निर्माण होता है ।नित्य प्रति राजाओं की खुशामद और अपनी स्वार्थ सिद्धि। शान बहुत , काम कुछ भी नहीं।फिर “शेर ” भी कैसे है??? सर्कस के शेर है जिसके सिर पर बिजुली का कोड़ा चमकता रहे।आप इनको शेर कहिए या शेर का बाप ।इनमें जब तक आत्म बल नहीं आता ,उस समय तक यह क्षत्रिय नहीं कहला सकते।

हा यथा काष्ठ मयो हस्ती यथा चर्म मयों मृग:

काठ और लकड़ी के हाथी के समान हाथी आवश्य है ।ऐसे क्षत्रिय भी क्षत्रियों की संतान अवश्य है ,परन्तु सच्चे क्षत्रिय बिल्कुल नहीं है।
क्या शिकार खेलना क्षत्रिय का काम नहीं है??
नहीं
ये क्या बात हुई भला ??
राजा मनु तो क्षत्रिय थे??
हा
आपसे अच्छे क्षत्रिय थे??
हा थे ।
उन्होंने तो शिकार या मृगया को क्षत्रियों का गुण नहीं ,अपितु दोष बताया है।हा प्रजा की रक्षा करने के लिए हिंसक जानवरो का वध करना राजा का धर्म है जैसे शेर ,बाघ , चिता आदि को मारना राजा और राज सैनिक का कर्तव्य है क्युकी उनसे प्रजा की जान को खतरा बना रहता है ।परन्तु जो पालतू पशु है जिनसे मनुष्य को असंख्य उपकार होते हो ,उनको अपने तुच्छ जीभ के स्वाद के लिए मारना और काटना अधर्म है,पाप है ,जघन्य अपराध है। राजा को चाहिए की रात दिन इन्द्रियों के रोकने में यतन करे।जो जितेंद्रिय है,वहीं प्रजा को वश में कर सकता है।क्या आप मांस भक्षी ,शराबी और रण्डी बाज राजा को इस कोटि में रख सकेंगे!???क्या वे क्षत्रिय है ,जो बीसियों विवाह करते और उसके उपरांत अन्य प्रकार के बुरे व्यसनों में फंसे रहते हैं???
राजा को चाहिए कि काम वासना (सेक्स )से उत्पन्न हुए दस अत्यंत बुरे व्यसनों और आदतों को छोड़ दे।
काम से उत्पन्न हुए दस व्यसन कौन से है??
ये दस व्यसन है :
1.मृगया अर्थात पशुओं का शिकार करना
2.जुआ जिसको अक्ष भी कहते है।राजा को जुआ नहीं खेलना चाहिए।
3.राजा को दिन में नहीं सोना चाहिए।
4. राजा को शराब आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
5.राजा को वैश्या से दूर रहना चाहिए।
6. राजाको आश्लिल गाना से दूर रहना चाहिए।
7.राजा को नाचना आदि कर्म से पृथक हो जाना चाहिए।
8.राजा को व्यर्थ इधर उधर घूमना नहीं चाहिए।
9.राजा को दूसरे की बुराई नहीं करनी चाहिए।
10.राजा को लोभ ,मोह ,ईर्ष्या से दूर रहना चाहिए।

कहते है कि पका मांस खाने की परंपरा चीन से चली।पहले मांस को पकाना पाप समझा जाता था।चीनी लोग कच्चा मांस खाया करते थे।एक दिन किसी के घर में आग लग गई और एक सूअर जल गया।किसी ने उसका मांस चखा तो उसे यह मजेदार लगा।फिर क्या था???उस घर में बार बार आग लगने लगी,फिर सबके पेट में आग लगने लगी ???आखिर क्यों???पका मांस खाने की !!! यहां तक कि दूसरों ने भी उसका अनुकरण किया।
बस यही बात भारत के विर क्षत्रियों की है।इनकी रसना इन्द्रियों( जीभ ) को मांस का चस्का लग गया है और यह मांस खाने का बहाना ढूंढ लेते हैं।शिकार करने का उलजुलुल बहाना निकालते हैं। क्षट्रित्यव से और मांस भक्षन या मांस खाने से कोई संबंध नहीं है।न शिकार से!!शिकार इसलिए नहीं खेला जाता कि किसी को कष्टों से बचाना है,अपितु अपने तुच्छ रसना स्वाद
के लिए।
खरगोश का शिकार तो अच्छा है,क्युकी इससे खेतो को हानी पहुंचती हैं।
शिकार तो किसी का भी अच्छा नहीं सिवाय जंगली पशुओं के।शिकार से निर्दयता और निरंकुशता का अभ्यास बढ़ता है। इंग्लैंड में खरगोश के शिकार की बड़ी प्रथा है और हिन्दुस्तानियों ने उसी से इस दुष्ट व्यसन (बुरी आदत )को सीखा है।इंग्लैंड के रईसों में यह व्यसन इतना अधिक है कि वे पार्कों में खरघोस को सुरक्षित रखते हैं और सिवाय रईस के किसी को खरगोश मारने की आज्ञा नहीं है।यदि खेती की रक्षा ही खरगोश को मारने का उद्देश्य होता तो खरगोश की रक्षा पार्कों में क्यों की जाती और दूसरे को मारने का क्यो निषेध किया जाता??? वस्तुत: मनोविनोद ही खरगोश जैसे जीवो के शिकार का उद्देश्य है ।यह मनोविनोद निकृष्ट श्रेणी का है,क्योंकि वह मनोविनोद क्या जिससे दूसरो की जान जाए।दूसरो को कष्ट पहुंचे।
मेरा तात्पर्य यह है कि मांस खाना और शिकार खेलना क्षत्रियों का केवल और केवल व्यसन है , एक बहुत बुरी आदत है ।पशुओं का शिकार करना और जानवरो के मांस या उनकी मरी हुई लाशों का खाना :ये दो ऐसे अवगुण है ,जिन्होंने क्षत्रियों को क्षत्रिय नहीं रहने दिया।क्षत्रियों को रक्षक से भक्षक बना दिया।,इसलिए तो भारत के क्षत्रिय राजाओं द्वारा शासन विधि व्ययस्था ठीक नहीं होने पाती।शासक ही निर्दोष जीवो का भक्षक हो जाए तो रक्षा कौन करे???शराब की बोतल में दूध भी भी शराब हो जाती हैं।बहुत से वीर क्षत्रियों को दया का भाव है।अंकुर है दया का ,परंतु मांसाहार के सेवन से क्षत्रियों की दया भी दूषित हो चुकी हैं ।मांस के सेवन से उन क्षत्रियों के वीर्य आदि धातु दूषित हो चुके हैं।उनकी आत्मा दूषित , कुंठित और मलिन हो चुकी हैं।परमार्थ में स्वार्थ का मिश्रण हो गया।प्रेम ,मानवता ,करुणा के गुणों का लोप हो चुका है।

लेखक:पंडित गंगा प्रसाद उपाध्याय

।।वार्षिक राशि फल।।

।।हरि ॐ।। ।। ॐ श्री गणेशाय नमः ।।

परिधावी नाम नव संवत्सर की कोटि- कोटि शुभकामनाएं
श्रीसंवत२०७६श्रीशाके१९४१

संवत्सर नाम –परिधावी
राजा — शनि
मंत्री — सूर्य

 

इस वर्ष खण्डवृष्टि के योग हैं।
कहीं वर्षा अधिक होगी तथा कहीं सूखे की मार पड़ेगी ।बाढ़ तूफान दुर्भिक्ष आदि से प्रजा त्रस्त रहेगी। शनिदेव के राजपद पर अभिषिक्त होने से प्रजा को न्याय मिलेगा तथा राष्ट्रविरोधी व विघटनकारी ताकतों का कठोरतापूर्वक दमन होगा। प्रधानमंत्री पद सूर्य के पास होने से प्रसासन व सत्ता के मध्य टकराव की स्थिति रहेगी। सुरक्षाबलों और सेना के लिए सरकार नई सुविधाओं की घोषणा कर सकती है।देश की रक्षानीति और अधिक कारगर एवं आक्रामक बनेगी। आगामी चुनावों में पूर्ण बहुमत की सरकार बनेगी। चुनाव परिणाम पूरे विश्व के लिए आश्चर्य जनक होंगे। उत्तराखंड के उत्तरी भाग में बादल फटने एवं भूस्खलन से लोगों को अनेक कष्टों का सामना करना पड़ेगा। भगवान से प्रार्थना है कि सभी सुखी एवं आरोग्य रहें विश्व का कल्याण हो। सर्वत्र सुख व शांति का साम्राज्य स्थापित हो ।। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वेसन्तु निरामया।।

।। हरि ॐ ।।
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द्वादश राशियों का वार्षिक राशि फल।

१- मेष — घर परिवार में कुछ अशान्ति का वातावरण रहेगा।कठिन परिश्रम से सभी कार्य सिद्ध होंगे।भूमि, भवन,वाहन पर व्यय की संभावना है।संतान प्राप्ति के योग है व संतान पक्ष से ख़ुशी का समाचार मिलेगा।संतान का भाग्योदय योग है।प्रतियोगी परीक्षा में सफलता कम रहेगी।अध्ययनरत विद्यार्थियों के लिये वर्ष शुभ फलदायक रहेगा।सत्रु पराजित होंगे।जीवनसाथी का स्वास्थ प्रतिकूल रूप से प्रभावित रहेगा।स्वयं की प्रगति में संघर्ष के पश्चात सफलता मिलेगी।इस वर्ष मांगलिक कार्यों पर व्यय अधिक होगा।विशेष – हनुमान जी की आराधना करें सभी कार्यों में सफलता मिलेगी।
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२- वृष— स्वास्थ्य में कुछ परेशानी रहेगी।घर कुटुम्ब में अशान्ति एवं तनाव का वातावरण रहेगा।भूमि,भवन, वाहन के छेत्र में निवेश लाभकारी रहेगा।सन्तान की ओर से हर्ष का समाचार मिलेगा।शत्रु व प्रतिद्वंदी मुखर होंगे।शत्रुओ से सावधान रहें।जीवन साथी का अच्छा सहयोग मिलेगा।कुछ पेट व सिर संबंधी तकलीफे रहेगी।प्रतियोगी परीक्षाओ में कठिन परिश्रम के बाद सफलता मिलेगी।राजद्वार एवं पदौन्नति के लिए वर्ष अच्छा रहेगा।आय के साथ व्यय भी अधिक होगा।विशेष – भगवान शिव की आराधना करना श्रेष्टकर रहेगा।
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३-मिथुन— स्वास्थ्य के लिये वर्ष प्रतिकूल रहेगा।कुछ मानसिक तनाव भी रहेगा।घर परिवार में वर्ष की सुरूवाद में कुछ तनाव की स्थिति बनी रहेगी।बाद में ठीक रहेगा।जीवन साथी के स्वास्थ्य में कुछ परेसानी रहेगी।कुछ रुके कार्य पूरे होंगे।धर्म कर्म में विशेष रुचि रहेगी।राजद्वार व व्यवसाय के छेत्र की स्थिति सामान्य रहेगी।आय की अपेक्षा व्यय अधिक होगा।भूमि, भवन ,वाहन के छेत्र में पूजी निमेष लाभकारी रहेगा।सन्तान पक्ष से खुशी का समाचार मिलेगा।विशेष – राहु का जप दान श्रेष्ठ कर रहेगा।
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४-कर्क — इस वर्ष स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।धार्मिक यात्राओं का योग है । धार्मिक आयोजनों में काफी व्यस्तता रहेगी। राजद्वार से विशेष सफलता प्राप्त होगी। प्रतियोगी परीक्षाओं में विशेष सफलता का योग है। व्यवसाय तथा कार्यक्षेत्र में लाभ का योग है ।पदोन्नति भी हो सकती है । भूमि- भवन-वाहन के क्षेत्र में पूँजी लगाना हानिकारक रहेगा। सन्तान पक्ष से नए नए शुभ समाचारों के प्राप्त होने का योग है। सन्तान के लिए यह वर्ष विशेष शुभ फल दायक रहेगा। विशेष – शिव पूजा रुद्रभषेक से लाभ होगा।
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५-सिंह— स्वास्थ्य की दृष्टि से यह वर्ष विशेष शुभ फल दायक रहेगा।गत वर्षो से चली आ रही समस्या का समाधान होगा।आर्थिक सन साधनों में विशेष वृद्धि का योग है।घर परिवार में कुछ अशान्ति एवं तनाव का वातावरण रहेगा।भूमि ,भवन,एवं वाहन के क्षेत्र में कोई विशेष उपलब्धि के योग नही है।संतान पक्ष से चिंता बनी रहेगी।प्रतियोगी परीक्षाओं मैं कोई विशेष सफलता नही मिलेगी ।
जीवन साथी का पूर्ण सहयोग मिलेगा।वर्ष के उत्तरार्ध मैं पूर्व से चली आ रही समस्याओं का समाधान होगा।विशेष – केतु का जप व दान करना लाभदायक रहेगा ।
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६-कन्या–जनवरी २०२० तक शनि की ढैय्या का प्रभाव रहने के कारण स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा , घर परिवार मैं अशांति का वातावरण रहेगा , जीवन साथी का पूर्ण सहयोग मिलेगा। भूमि भवन व वहां के क्षेत्र मैं पूँजी निवेश सामान्य लाभदायक रहेगा। सन्तान पक्ष से शुभ समाचार मिलेंगे । प्रतियोगिता के क्षेत्र में सफलता मिलेगी । वर्ष के उत्तरार्ध मैं प्रगति के नये अवसर प्राप्त होंगे ।
विशेष-शनि का जप व दान करना श्रेयष्कर रहेगा।
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७-तुला— स्वस्थ्य के दृष्टिकोण से वर्ष प्रतिकूल रहेगा।साहस एवं उत्साह में वृद्धि होगी। भूमि भवन वाहन के क्षेत्र में नए अवसरों का श्रजन होगा।सन्तान पक्ष से हर्ष के समाचार प्राप्त होंगे। विरोधी मैत्री भाव रक्खेंगे ।
जीवन साथी का स्वास्थ्य कुछ ढीला रहेगा।धार्मिक क्षेत्रों में व्यस्तता रहेगी। यश प्रतिष्ठा में बृद्धि होगी।
जनवरी२०२० से शनि की ढैया प्रारम्भ होने से कुछ मानसिक तनाव रहेगा लेकिन प्रगति के नए मार्ग प्रसस्त होंगे। विशेष -शनि का जप दान श्रेयस्कर होगा।
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८-वृश्चिक–स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से वर्ष प्रतिकूल है। उतरती साढ़े साती के कारण अनेक रुके हुए कार्यों का सम्पादन होगा तथा प्रगति का मार्ग प्रसस्त होगा। घर परिवार में वर्ष का पूर्वार्ध कुछ तनाव पूर्ण है लेकिन उत्तरार्ध में शांति व सौहार्द पूर्ण रहेगा। भूमि भवन वाहन के क्षेत्र में पूँजी निवेश सामान्य लाभदायक रहेगा। भाग्य से सब काम सिद्ध होंगे , संतान पक्ष से शुभ समाचार मिलेंगे। जीवन साथी का स्वास्थ्य कुछ प्रभावित रहेगा।
विषय– गुण तथा ताम्र पात्र दान करें लाभ मिलेगा।
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९-धनु–स्वास्थ्य के लिए वर्ष प्रतिकूल है। साढ़ेसाती के प्रभाववश स्वास्थ्य सम्बन्धी अनेक समस्याएँ रहेंगी। घर परिवार से सम्बंधित कुछ चिंताओं से तनाव रह सकता है । भूमि भवन,वाहन के लिए वर्ष अनुकूल रहेगा। सन्तान पक्ष के लिए स्थिति सामान्य रहेगी । स्वास्थ्य में आने वाले विकार उपचार के बाद शीघ्र दूर होंगे। शत्रु एवं विरोधी शान्त रहेंगे । जीवन साथी से कुछ मतभेद रहेगा। राजद्वारीय मामलों में विशेष सफलता नही मिलेगी।
विशेष-शनि का जप दान करायें।
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१०-मकर–स्वास्थ्य के लिए वर्ष सामान्य रहेगा। साढ़ेसाती के प्रभाववश कुछ मानसिक उलझनें रहेंगी । घर परिवार में प्रेम व शांति का वातावरण रहेगा। साहस बुद्धि व पराक्रम से सभी कार्य सिद्ध होंगे । भूमि भवन वाहन के क्षेत्र में में पूंजी निवेश लाभकारी सिद्ध होगा।संतान पक्ष से खुशी का समाचार मिलेगा । व्यवसाय नौकरी के क्षेत्र में विशेष प्रगति के योग हैं । आर्थिक संसाधनों में बृद्धि होगी।
विशेष–शनि व केतु का जप दान तथा रुद्राभिषेक करना श्रेयष्कर रहेगा।
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११-कुम्भ— स्वास्थ्य की दृष्टि से वर्ष अच्छा रहेगा। घर परिवार में पूर्वार्द्ध में कुछ तनाव एवं उत्तरार्ध में शांति व शुख रहेगा। संतान पक्ष से कुछ चिंता रहेगी लेकिन संतान को सुख व प्रगति के अच्छे अवसर प्राप्त होंगे । जीवन साथी का सहयोग प्राप्त होगा।भाग्य की प्रबलता से रुके हुए सभी कार्य पूर्ण होंगे । कार्य व्यवसाय में बृद्धि एवं प्रगति के योग हैं।आर्थिक संसाधनों में बृद्धि होगी।वर्ष के उत्तरार्द्ध में साढ़ेसाती का प्रवेश कोई कष्टदायी नही होगा।
विशेष-शिव आराधना करें व भगवान शंकर को धतूरा चढायें।
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१२-मीन--वर्ष के पूर्वार्ध में स्वास्थ्य ढीला रहेगा लेकिन उत्तरार्ध में सब समस्याएँ स्वतः ही समाप्त हो जाएंगी ।घर परिवार का वातावरण सामान्य रहेगा। साहस एवं पराक्रम से प्रगति के नए अवसरों का सृजन होगा। भूमि भवन वाहन के क्षेत्र में पूंजी निवेश करते समय सावधानी वरतें।सन्तान पक्ष से हर्ष एवं सफलता का समाचार मिलेगा। भाग्य की प्रबलता से सभी रुके हुए कार्यों के मार्ग प्रसस्त होंगे।धर्म कर्म में विशेष रुचि बढ़ेगी
तीर्थाटन भी सम्भव है। मांगलिक कार्यों व्यय की संभावना है।
विशेष – विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें ।गुरूवार को गाय को गुड़ खिलाएं ।शुभ होगा।
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सभी निरोगी रहें,सुखी रहें ,प्रसन्न रहें और खुशहाल रहें।