विट्ठल के भक्त नामदेव

कन्धे पर कपड़े का थान लादे और हाट-बाजार जाने की तैयारी करते हुए नामदेव जी से पत्नी ने कहा- भगत जी! आज घर में खाने को कुछ भी नहीं है।
आटा, नमक, दाल, चावल, गुड़ और शक्कर सब खत्म हो गए हैं।
शाम को बाजार से आते हुए घर के लिए राशन का सामान लेते आइएगा।

भक्त नामदेव जी ने उत्तर दिया- देखता हूँ जैसी विठ्ठल जी की कृपा।
अगर कोई अच्छा मूल्य मिला,
तो निश्चय ही घर में आज धन-धान्य आ जायेगा।

पत्नी बोली संत जी! अगर अच्छी कीमत ना भी मिले,
तब भी इस बुने हुए थान को बेचकर कुछ राशन तो ले आना।
घर के बड़े-बूढ़े तो भूख बर्दाश्त कर लेंगे।
पर बच्चे अभी छोटे हैं,
उनके लिए तो कुछ ले ही आना।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा।
ऐसा कहकर भक्त नामदेव जी हाट-बाजार को चले गए।

बाजार में उन्हें किसी ने पुकारा- वाह सांई! कपड़ा तो बड़ा अच्छा बुना है और ठोक भी अच्छी लगाई है।
तेरा परिवार बसता रहे।
ये फकीर ठंड में कांप-कांप कर मर जाएगा।
दया के घर में आ और रब के नाम पर दो चादरे का कपड़ा इस फकीर की झोली में डाल दे।

भक्त कबीर जी- दो चादरे में कितना कपड़ा लगेगा फकीर जी?

फकीर ने जितना कपड़ा मांगा,
इतेफाक से भक्त नामदेव जी के थान में कुल कपड़ा उतना ही था।
और भक्त नामदेव जी ने पूरा थान उस फकीर को दान कर दिया।

दान करने के बाद जब भक्त नामदेव जी घर लौटने लगे तो उनके सामने परिजनो के भूखे चेहरे नजर आने लगे।
फिर पत्नी की कही बात,
कि घर में खाने की सब सामग्री खत्म है।
दाम कम भी मिले तो भी बच्चो के लिए तो कुछ ले ही आना।

अब दाम तो क्या,
थान भी दान जा चुका था।
भक्त नामदेव जी एकांत मे पीपल की छाँव मे बैठ गए।

जैसी मेरे विठ्ठल की इच्छा।
जब सारी सृष्टि की सार पूर्ति वो खुद करता है,
तो अब मेरे परिवार की सार भी वो ही करेगा।
और फिर भक्त नामदेव जी अपने हरिविठ्ठल के भजन में लीन गए।

अब भगवान कहां रुकने वाले थे।
भक्त नामदेव जी ने सारे परिवार की जिम्मेवारी अब उनके सुपुर्द जो कर दी थी।

अब भगवान जी ने भक्त जी की झोंपड़ी का दरवाजा खटखटाया।

नामदेव जी की पत्नी ने पूछा- कौन है?

नामदेव का घर यही है ना?
भगवान जी ने पूछा।

अंदर से आवाज हां जी यही आपको कुछ चाहिये
भगवान सोचने लगे कि धन्य है नामदेव जी का परिवार घर मे कुछ भी नही है फिर ह्र्दय मे देने की सहायता की जिज्ञासा हैl

भगवान बोले दरवाजा खोलिये

लेकिन आप कौन?

भगवान जी ने कहा- सेवक की क्या पहचान होती है भगतानी?
जैसे नामदेव जी विठ्ठल के सेवक,
वैसे ही मैं नामदेव जी का सेवक हूl

ये राशन का सामान रखवा लो।
पत्नी ने दरवाजा पूरा खोल दिया।
फिर इतना राशन घर में उतरना शुरू हुआ,
कि घर के जीवों की घर में रहने की जगह ही कम पड़ गई।
इतना सामान! नामदेव जी ने भेजा है?
मुझे नहीं लगता।
पत्नी ने पूछा।

भगवान जी ने कहा- हाँ भगतानी! आज नामदेव का थान सच्ची सरकार ने खरीदा है।
जो नामदेव का सामर्थ्य था उसने भुगता दिया।
और अब जो मेरी सरकार का सामर्थ्य है वो चुकता कर रही है।
जगह और बताओ।
सब कुछ आने वाला है भगत जी के घर में।

शाम ढलने लगी थी और रात का अंधेरा अपने पांव पसारने लगा था।

समान रखवाते-रखवाते पत्नी थक चुकी थीं।
बच्चे घर में अमीरी आते देख खुश थे।
वो कभी बोरे से शक्कर निकाल कर खाते और कभी गुड़।
कभी मेवे देख कर मन ललचाते और झोली भर-भर कर मेवे लेकर बैठ जाते।
उनके बालमन अभी तक तृप्त नहीं हुए थे।

भक्त नामदेव जी अभी तक घर नहीं आये थे,
पर सामान आना लगातार जारी था।

आखिर पत्नी ने हाथ जोड़ कर कहा- सेवक जी! अब बाकी का सामान संत जी के आने के बाद ही आप ले आना।
हमें उन्हें ढूंढ़ने जाना है क्योंकि वो अभी तक घर नहीं आए हैं।

भगवान जी बोले- वो तो गाँव के बाहर पीपल के नीचे बैठकर विठ्ठल सरकार का भजन-सिमरन कर रहे हैं।
अब परिजन नामदेव जी को देखने गये

सब परिवार वालों को सामने देखकर नामदेव जी सोचने लगे,
जरूर ये भूख से बेहाल होकर मुझे ढूंढ़ रहे हैं।

इससे पहले की संत नामदेव जी कुछ कहते
उनकी पत्नी बोल पड़ीं- कुछ पैसे बचा लेने थे।
अगर थान अच्छे भाव बिक गया था,
तो सारा सामान संत जी आज ही खरीद कर घर भेजना था क्या?

भक्त नामदेव जी कुछ पल के लिए विस्मित हुए।
फिर बच्चों के खिलते चेहरे देखकर उन्हें एहसास हो गया,
कि जरूर मेरे प्रभु ने कोई खेल कर दिया है।

पत्नी ने कहा अच्छी सरकार को आपने थान बेचा और वो तो समान घर मे भैजने से रुकता ही नहीं था।
पता नही कितने वर्षों तक का राशन दे गया।
उससे मिन्नत कर के रुकवाया- बस कर! बाकी संत जी के आने के बाद उनसे पूछ कर कहीं रखवाएँगे।

भक्त नामदेव जी हँसने लगे और बोले- ! वो सरकार है ही ऐसी।
जब देना शुरू करती है तो सब लेने वाले थक जाते हैं।
उसकी बख्शीश कभी भी खत्म नहीं होती।
वह सच्ची सरकार की तरह सदा कायम रहती है।

शरीर को अल्कलाइन बनाये

शरीर को कर लो Alkaline हार्ट कैंसर किडनी थाइरोइड शुगर आर्थराइटिस सोरायसिस भी पास नहीं फटकेगा।

कोई भी रोग हो चाहे के कैंसर भी Alkaline वातावरण में पनप नहीं सकता – डॉक्टर Otto Warburg, नोबेल पुरस्कार विजेता, 1931.

“No Disease including cancer, can exist in an alkaline envioronment” Dr. Otto Warburg – Noble Prize Winner 1931

हम आपको एक ऐसी चीज बताएंगे जिस से के आपके शरीर के सभी रोग स्वतः ही समाप्त हो जाए :—

जैसे : डायबिटीज, कैंसर, हार्ट, ब्लड प्रेशर, जोड़ों का दर्द, UTI – पेशाब के रोग, Osteoporosis, सोरायसिस, यूरिक एसिड का बढ़ना, गठिया – Gout, थाइरोइड, गैस, बदहजमी, दस्त, हैजा, थकान, किडनी के रोग, पेशाब सम्बंधित रोग, पत्थरी और अन्य कई प्रकार के जटिल रोग। इन सबको सही करने का सबसे सही और सस्ता उपयोग है शरीर को एल्कलाइन कर लेना।

पहले तो जानिए पी एच लेवल क्या है? :

इसको समझने के लिए सबसे पहले आपको PH को समझना होगा, हमारे शरीर में अलग अलग तरह के द्रव्य पाए जाते हैं, उन सबकी PH अलग अलग होती है,

हमारे शरीर की सामान्य PH 7.35 से 7.41 तक होती है,

PH पैमाने में PH 1 से 14 तक होती है, 7 PH न्यूट्रल मानी जाती है, यानी ना एसिडिक और ना ही एल्कलाइन। 7 से 1 की तरफ ये जाती है तो समझो एसिडिटी यानी अम्लता बढ़ रही है, और 7 से 14 की तरफ जाएगी तो Alkalinity यानी क्षारीयता बढ़ रही है।

अगर हम अपने शरीर के अन्दर पाए जाने वाले विभिन्न द्रव्यों की PH को Alkaline की तरफ लेकर जाते हैं। तो हम बहुत सारी बीमारियों के मूल कारण को हटा सकते हैं, और उनको हमेशा के लिए Cure कर सकते हैं।

Cancer and PH – कैंसर :

उदाहरण के तौर पर सभी तरह के कैंसर सिर्फ Acidic Environment में ही पनपते हैं।
क्यूंकि कैंसर की कोशिका में शुगर का ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में Fermentation होता है जिससे अंतिम उत्पाद के रूप में लैक्टिक एसिड बनता है और यही लैक्टिक एसिड Acidic Environment पैदा करता है जिस से वहां पर एसिडिटी बढती जाती है और कैंसर की ग्रोथ बढती जाती है। और ये हम सभी जानते हैं के कैंसर होने का मूल कारण यही है के कोशिकाओं में ऑक्सीजन बहुत कम मात्रा में और ना के बराबर पहुँचता है। और वहां पर मौजूद ग्लूकोस लैक्टिक एसिड में बदलना शुरू हो जाता है।

Gout and PH – गठिया :

दूसरा उदहारण है :–
Gout जिसको गठिया भी कहते हैं, इसमें रक्त में *यूरिक एसिड* की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे रक्त एसिडिक होना शुरू हो जाता है, जितना ब्लड अधिक एसिडिक होगा उतना ही यूरिक एसिड उसमे ज्यादा जमा होना शुरू हो जायेगा। अगर हम ऐसी डाइट खाएं जिससे हमारा पेशाब Alkaline हो जाए तो ये बढ़ा हुआ यूरिक एसिड Alkaline Urine में आसानी से बाहर निकल जायेगा।

UTI and PH – पेशाब का संक्रमण :

तीसरा उदहारण है : — UTI जिसको Urinary tract infection कहते हैं, इसमें मुख्य रोग कारक जो बैक्टीरिया है वो E.Coli है, ये बैक्टीरिया एसिडिक वातावरण में ही ज्यादा पनपता है। इसके अलावा Candida Albicanes नामक फंगस भी एसिडिक वातावरण में ही ज्यादा पनपता है। इसीलिए UTI तभी होते हैं जब पेशाब की PH अधिक एसिडिक हो।

Kidney and PH – किडनी :

चौथी एक और उदाहरण देते हैं :— किडनी की समस्या मुख्यतः एसिडिक वातावरण में ही होती है, अगर किडनी का PH हम एल्कलाइन कर देंगे तो किडनी से सम्बंधित कोई भी रोग नहीं होगा। मसलन क्रिएटिनिन, यूरिक एसिड, पत्थरी इत्यादि समस्याएँ जो भी किडनी से सम्बंधित हैं वो नहीं होंगी।

वर्तमान स्थिति :
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आजकल हम जो भी भोजन कर रहें हैं वो *90 प्रतिशत* तक एसिडिक ही है, और फिर हमारा सवाल होता है कि हम सही क्यों नहीं हो रहे ? या फिर कहते हैं कि हमने ढेरों इलाज करवाए मगर आराम अभी तक नहीं आया। बहुत दवा खायी मगर फिर भी आराम नहीं हो रहा। तो उन सबका मुख्यः कारण यही है के उनका PH लेवल कम हो जाना अर्थात एसिडिक हो जाना।

आज हम इसी विषय पर बात करेंगे कि कैसे हम अपना PH level बढ़ाएं और इन बीमारियों से मुक्ति पायें : –

कैसे बढ़ाएं PH level ? : —

इन सभी Alkaline क्षारीय खाद्य पदार्थो का सेवन नित्य करिये…

फल – सेब, खुबानी, ऐवोकैडो, केले, जामुन, चेरी, खजूर, अंजीर, अंगूर, अमरुद, नींबू, आम, जैतून, नारंगी, संतरा, पपीता, आड़ू, नाशपाती, अनानास, अनार, खरबूजे, किशमिश, इमली, टमाटर इत्यादि फल।

– इसके अलावा तुलसी, सेंधा नमक, अजवायन, दालचीनी, बाजरा इत्यादि।

मुख्य बात : – आज सभी घरों में कंपनियों का पैकेट वाला आयोडीन सफेद नमक प्रयोग हो रहा है, ये धीमा ज़हर है, यह अम्लीय(acidic) होता है और इसमें सामान्य से आयोडीन की अधिक मात्रा भी होती है, जो अत्यंत घातक है शरीर के लिए। इस नमक से हृदय रोग, थाइरोइड, कैंसर, लकवा, नपुंसकता, मोटापा, एसिडिटी, मधुमेह, किडनी रोग, लिवर रोग,बाल झड़ना, दृष्टि कम होना जैसे अनेको रोग काम आयु से बड़े आयु तक के सभी घर के सदस्यों को हो रहे हैं। जो पैकेट नमक के प्रयोग से पूर्व कभी नही होते थे। इसलिए आयोडीन की कमी का झूठ फैलाकर बीमारी का सामान हर घर तक पहुंचाया गया, जिसने दवाइयों के कारोबार को अरबो, खरबो का लाभ पहुंचाया है।

इसके विकल्प के रूप में आज से ही सेंधा नमक का प्रयोग शुरू कर दीजिए। यह पूरी तरह से प्राकृतिक और क्षारीय (Alkaline) होता है और आयोडीन भी सामान्य मात्रा में होता है। अन्यथा आपके सारे उपचार असफल सिद्ध होते रहेंगे, क्योंकि हर भोजन को सफेद नमक ज़हरीला बना देगा, चाहे कितनी अच्छी सब्जी क्यों न बनाएं आप।

AlkaLine Water बनाने की विधि :

रोगी हो या स्वस्थ उसको यहाँ बताया गया ये Alkaline Water ज़रूर पीना है।

इसके लिए ज़रूरी क्षारीय सामान : –―

1 निम्बू,
25 ग्राम खीरा,
5 ग्राम अदरक,
21 पोदीने की पत्तियां,
21 पत्ते तुलसी,
आधा चम्मच सेंधा नमक,
चुटकी भर मीठा सोडा।

अभी इन सभी चीजों को लेकर पहले छोटे छोटे टुकड़ों में काट लीजिये, निम्बू छिलके सहित काटने की कोशिश करें। एक कांच के बर्तन में इन सब चीजों को डाल दीजिये और इसमें डेढ़ गिलास पानी डाल दीजिये, पूरी रात इस पानी को ढक कर पड़ा रहने दें। और सुबह उठ कर शौच वगैरह जाने के बाद खाली पेट सब से पहले इसी को छान कर पीना है। छानने से पहले इन सभी चीजों को हाथों से अच्छे से मसल लीजिये और फिर इसको छान कर पीजिये। फिर चमत्कार होते देखिए।

Alkaline के लिए दूसरी विधि :

1 लौकी जिसे दूधी भी कहा जाता हैं का जूस एक गिलास इसमें 5-5 पत्ते तुलसी और पोदीने के डालिए इसमें सेंधा नमक या काला नमक डाल कर पियें।

ध्यान रहे : — कि इनको सुबह खाली पेट ही पीना है, अर्थात इनसे पहले कुछ भी खाना पीना नहीं है और इनको पीने के बाद एक घंटे तक कुछ भी खाना पीना नहीं है।

सावधानी चाय, कॉफ़ी, चीनी , पैकेट वाला सफेद नमक ये सब ज़हर के समान है, अगर आप किसी रोग से ग्रस्त हैं तो सबसे पहले आपको इनको छोड़ना होगा, और इसके साथ ऊपर बताये गए फल सब्जियां कच्चे ही सेवन करें।

 

भोग का फल

एक सेठजी बड़े कंजूस थे।

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एक दिन दुकान पर बेटे को बैठा दिया और बोले कि बिना पैसा लिए किसी को कुछ मत देना, मैं अभी आया।
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अकस्मात एक संत आये जो अलग अलग जगह से एक समय की भोजन सामग्री लेते थे,
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लड़के से कहा, बेटा जरा नमक दे दो।
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लड़के ने सन्त को डिब्बा खोल कर एक चम्मच नमक दिया।
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सेठजी आये तो देखा कि एक डिब्बा खुला पड़ा था। सेठजी ने कहा, क्या बेचा बेटा ?
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बेटा बोला, एक सन्त, जो तालाब के किनारे रहते हैं, उनको एक चम्मच नमक दिया था।
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सेठ का माथा ठनका और बोला, अरे मूर्ख ! इसमें तो जहरीला पदार्थ है।
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अब सेठजी भाग कर संतजी के पास गए, सन्तजी भगवान् के भोग लगाकर थाली लिए भोजन करने बैठे ही थे कि..
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सेठजी दूर से ही बोले, महाराज जी रुकिए, आप जो नमक लाये थे वो जहरीला पदार्थ था, आप भोजन नहीं करें।
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संतजी बोले, भाई हम तो प्रसाद लेंगे ही, क्योंकि भोग लगा दिया है और भोग लगा भोजन छोड़ नहीं सकते।
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हाँ, अगर भोग नहीं लगता तो भोजन नही करते और कहते-कहते भोजन शुरू कर दिया।
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सेठजी के होश उड़ गए, वो तो बैठ गए वहीं पर।
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रात हो गई, सेठजी वहीं सो गए कि कहीं संतजी की तबियत बिगड़ गई तो कम से कम बैद्यजी को दिखा देंगे तो बदनामी से बचेंगे।
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सोचते सोचते उन्हें नींद आ गई। सुबह जल्दी ही सन्त उठ गए और नदी में स्नान करके स्वस्थ दशा में आ रहे हैं।
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सेठजी ने कहा, महाराज तबियत तो ठीक है।
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सन्त बोले, भगवान की कृपा है..!!
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इतना कह कर मन्दिर खोला तो देखते हैं कि भगवान् के श्री विग्रह के दो भाग हो गए हैं और शरीर काला पड़ गया है।
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अब तो सेठजी सारा मामला समझ गए कि अटल विश्वास से भगवान ने भोजन का ज़हर भोग के रूप में स्वयं ने ग्रहण कर लिया और भक्त को प्रसाद का ग्रहण कराया।
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सेठजी ने घर आकर बेटे को घर दुकान सम्भला दी और स्वयं भक्ति करने सन्त शरण चले गए।

भगवान् को निवेदन करके भोग लगा करके ही भोजन करें, भोजन अमृत बन जाता है।
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तो आइये आज से ही नियम लें कि भोजन बिना भोग लगाएं नही करेंगे

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 26

यदि कोई प्रेम तथा भक्ति के साथ मुझे पत्र पुष्प फल या जल प्रदान करता है तो मैं उसे स्वीकार करता हूं

 

स्मरण शक्ति बढ़ाने के उपाय

मात्र 21 दिन तक इसका सेवन करने से स्मरणशक्ति ऐसी बढ़ेगी की सिर्फ एक बार सुनने मात्र से सब कुछ याद रह जायेगा

ब्रेन पावर और मेमोरी :

जिन व्यक्तियों के मस्तिष्क और स्नायु दुर्बल हो जाते हैं, उनकी स्मरणशक्ति कमजोर हो जाती है, कुछ याद नहीं रहता तथा स्वभाव से वे भुलक्कड़ हो जाते हैं। विद्यार्थियों की भी यह आम समस्या है कि उन्हें पढ़ा हुआ भलीभांति याद नहीं रहता और याद रहता है तो कुछ ही समय तक। ब्रेन फ़ूड जो आपके दिमाग को तेज करता है। आज के इस युग में तेज दिमाग का होना बहुत ही जरुरी है। हाल के कुछ सालो में प्रतियोगिता काफी बढ़ गयी है। अपने जीवन का हर मोड़ पर हमे प्रतियोगिताओ का सामना करना पड़ता है, जिसके लिए तेज दिमाग की आवश्यकता होती है। अच्छे भविष्य के लिए तेज बुद्धि का होना बहुत ही जरुरी है।

तेज दिमाग के लिए नियमित खान-पान और नियमित दिनचर्या की जरुरत होती है। लगभग हर घर में याददास्त कमजोरी की समस्या रहती है। रोजमर्रा की तनाव के कारन छोटी-छोटी बातें याद रखना भी मुश्किल हो जाता है। कमजोर याददास्त के कारन खुद तो परेशान होते ही है, साथ में दुसरे लोगो को भी परेशानी में डाल देते है। कुछ ऐसे आहार के बारे में बताया जायेगा, जिनका उपयोग करने से आपकी दिमाग की क्षमता बढती है और आपकी याददास्त में सुधार आने लगता है। इन आहार को “ब्रेन फ़ूड” भी कह सकते है।

वीक मेमोरी या कमजोर याददाश्त एक ऐसी बीमारी है। जिसमें इंसान कही हुई बात या याद हुई चीज को तुरंत भूल जाता है। भूलने वाले लोगों के लिए यह बहुत अधिक परेशानियों का कारण है, इसके लिए एक आयुर्वेदिक नुस्खा यहां दिया जा रहा है, जो स्मरण शक्ति बढ़ाता है।

स्मरण शक्ति बढ़ाये कल्याणवलेह :

कल्याणवलेह के 21 दिन तक नित्य सेवन से स्मरण शक्ति बहुत बढ़ जाती है। ऐसा व्यक्ति सुनकर ही बातों को याद कर लेता है। उसकी आवाज़ बादलों के समान गंभीर और कोयल के समान मधुर हो जाती है। यदि को स्वयं की या अपने बच्चों की याददाश्त को बढ़ाना है तो एक बार यह प्रयोग अवश्य करे।

बनाने की विधि : हल्दी, बच, कूठ, पीपल, सोंठ, जीरा, अजमोद, मुलेठी और सेंधा नमक सब बराबर मात्रा में मिलाकर महीन पीस कर चूर्ण तैयार कर लें।

सेवन की विधि :

8 से 16 रत्ती (1 से 2 ग्राम) तक आयु के अनुसार 21 दिनों तक प्रातः काल खाली पेट और रात को खाना खाने के 2-3 घंटे बाद सोते वक़्त नित्य प्रयोग करें।

आवश्यक सामग्री :

मुलहठी : 50 ग्रामगिलोय : 50 ग्रामशंखाहूली : 50-50 ग्राम लें।

निर्माण विधि :

सभी द्रव्यों को कूट पीसकर कपड़े से छानकर चूर्ण बना लें। फिर इसमें सोने का अर्क या भस्म 3 ग्राम मिलाकर खरल में घोटाई करें। जिससे स्वर्णभस्म अच्छी तरह मिल जाए, उसके बाद एक बोतल में सुरक्षित रख लें।

सेवन विधि :

उम्र के अनुसार इस चूर्ण को आधा ग्राम से दो ग्राम की मात्रा में लेकर घी और शहद (विषम मात्रा में) मिलाकर खाएं, घी कम और शहद ज्यादा मात्रा में लेना चाहिए। कुछ दिनों तक इसके सेवन से स्मरणशक्ति और बुद्धि तीव्र होती है तथा भूलने की आदत से छुटकारा मिल जाता है।

दाहिनी नाक को बंद कर बायीं नाक से साँस लेने छोड़ने की क्रिया 10 मिंट प्रातः करने से अदभुत परिणाम मिलते हैं।

पंचगव्य धृत या देशी गाय का घी रात को सोते समय हल्का गर्म डालने से आश्चर्यजनक परिणाम है।

ये 23 ब्रेन फूड्स आपकी मेमोरी को बूस्ट कर देंगे :

1. ब्लू बेर्री : प्रतिदिन ब्लू बेर्री फल का सेवन करे। चुकी इसमें प्रचुर मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट होता है। इसके इस्तेमाल से आपका दिमाग तेज होगा।

2. बेल : एक पका हुआ बेलफल का गूदा मिट्टी के सकोरे में डालकर पानी भर दें। ऊपर पतला कपड़ा या छलनी रख दें। सुबह पानी निथारकर मीठा मिलाकर पीएं दिमाग तरोताजा हो जाएगा। सर्दियों के दिनों में बेल का गूदा मिट्टी के पात्र के बजाय कलईदार बर्तन या स्टील के पात्र में रखें और उसी समय मसलकर गर्म पानी में शहद के साथ घोलकर पी लें। इसके नियमित प्रयोग से दिमागी शक्ति अवश्य बढ़ेगी।

3. अलसी का बीज : अलसी के बीज में प्रचुर मात्रा में फाइबर और प्रोटीन पाया जाता है इसलिए इसके इस्तेमाल से आपका दिमाग तेज होगा।

4. पालक : प्रतिदिन पालक का इस्तेमाल करने से कई तरह के रोगों से बचा जा सकता है। पालक में मैग्नीशियम की प्रचुर मात्रा होती है, जो हमारे पुरे शारीर और दिमाग के लिए फायदेमंद होता है।

5. दालचीनी : दालचीनी का पाउडर बना ले। अब लगभग 10 ग्राम दालचीनी पाउडर को शहद में मिला कर चाट ले। इससे आपकी दिमाग शार्प होगी।

6. आवला : आवला का रस निकाल ले एक चम्मच और उसमे दो चम्मच शहद मिला कर पिये। इससे आपकी दिमाग तेज होगी और याददास्त भी अच्छी होगी।

7. धनिया : सबसे पहले धनिया का पाउडर बना ले अब आधा चम्मच पाउडर में दो चम्मच शहद मिला कर खाये। आपकी स्मरण शक्ति यानी याददास्त में वृद्धि होगी।

8. अखरोट : अखरोट में ज्यादा मात्रा में प्रोटीन और एंटी ऑक्सीडेंट पाया जाता है। जिसके उपयोग से अपने दिमाग को तेज बना सकते है। इसका इस्तेमाल प्रतिदिन करे।

9. बादाम : बादाम को दिमाग के लिए अमृत के समान माना जाता है। स्मरणशक्ति के विकास के लिए 10 बादाम रात को भिगो दें और सुबह छिलका उतारकर लगभग 10-12 ग्राम मक्खन और मिश्री के साथ मिलाकर खाएं। लगातार दो माह तक यह मिश्रण खाने से दिमाग की सभी कमजोरियां दूर हो जाती हैं। यदि ऐसा संभव नहीं हो तो भीगे हुए बादाम की लुगदी बनाकर सेवन करें। दिमागी कमजोरी दूर करने के लिए दूसरा उपाय यह है कि रात्रि के समय बादाम के साथ सौंफ व मिश्री मिलाकर उसे पीस लें। इस चूर्ण को दूध के साथ पीने से स्मरणशक्ति बढ़ती है। यदि यह भी संभव न हो सके तो दस बादाम बारीक पीसकर आधा किलो दूध में मिलाएं और दूध को गर्म कर लें। इसके पश्चात दूध ठंडा होने पर उसमें चीनी मिलाकर पीएं। इस प्रकार किसी भी तरह से बादाम का सेवन करने से दिमाग में तरोताजगी आ जाती है व स्मरणशक्ति में भरपूर वृद्धि होती है।

10. तुलसी : तुलसी के इस्तेमाल से कई प्रकार की बीमारी भी दूर होती है। गुलाब की पंखुरी, काली मिर्च और तुलसी के पत्ते को चबाकर खाये आपको लाभ मिलेगा।

11. गेंहू के ज्वारे : गेंहू के ज्वारे को आयुर्वेद में अमृत कहा गया है। अगर आपको अपने दिमाग को तेज करना है, तो गेंहू के ज्वारे का रस में थोड़ी बादाम का पेस्ट और शक्कर मिलाकर इसका सेवन करे आपको लाभ मिलेगा।

12. गाजर : गाजर का सेवन प्रतिदिन करे। गाजर के सेवन से आपका दिमाग तेज होगा उसके साथ-साथ आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है।

13. अदरक, मिश्री और जीरा : इन तीनो को पीसकर रोजाना सेवन करे आपको लाभ मिलेगा।

14. दही और दूध : दही में एमिनो एसिड होता है, जो आपके दिमाग के लिए फायदेमंद होता है। आप एक गिलास दूध में शहद दो चम्मच मिला कर पिये आपको फायदा होगा।

15. तिल : तिल और गुड मिलाकर खाने से आपकी दिमाग शार्प होगी।

16. सेव : सेव के सेवन से स्मरणशक्ति बढ़ जाती है। इसके लिए एक या दो सेव बिना छिलके उतारे चबा-चबाकर भोजन से पंद्रह मिनट पहले खाना चाहिए। यह मस्तिष्क को शक्ति देने के साथ-साथ रक्त की कमी भी दूर करता है।

17. लीची : लीची का प्रयोग करते रहने से मस्तिष्क को बल मिलता है।

18. आंवला का मुरब्बा : स्मरणशक्ति में वृद्धि के लिए प्रतिदिन प्रातः आंवले का मुरब्बा खाएं।

19. गाय का दूध और गाजर खायें : गाजर के रस को गाय के दूध के साथ समान अनुपात में मिलाकर पीने से स्मरणशक्ति में वृद्धि होती है।

20. चुकंदर : चुकंदर का रस प्रतिदिन पीने से भी स्मरणशक्ति बढ़ती है।

21. आम : दिमागी कमजोरी से होनेवाली स्मरणशक्ति की कमी के लिए एक कप आम का रस, थोड़ा दूध और एक चम्मच अदरक का रस व चीनी मिलाकर पीने से दिमाग में ताजगी का संचार होता है। दूध में आम का रस मिलाकर पीने से भी दिमाग में तरावट आती है।

जय माता दी
स्वस्थ व समृद्ध भारत निर्माण हेतु
एक अपील अनुरोध आग्रह विनती

स्वथ्य शरीर से धन कमाया जा सकता है लेकिन धन से स्वथ्य शरीर नहीँ

आप से बेहतर आप के शरीर को कोई नही जान सकता

85% रोगों का इलाज आप स्वम कर सकते हैं

आपको अपने भोजन को पहचानने की जरूरत है
साथ ही ये नियम का पालन करे

1. खाना खाने के 90 मिनट बाद पानी पिये
2. फ्रीज या बर्फ (ठंडा) का पानी न पिये
3. पानी को हमेशा घुट घुट कर पिये ( गर्म दूध की तरह)
4. सुबह उठते ही बिना कुल्ला किये गुनगुना पानी पिये
5.खाना खाने से 48 मिनट पहले पानी पिये
6. सुबह में खाना खाने के तुरंत बाद पीना हो तो जूस पिये
7. दोपहर में खाना खाने के तुरंत बाद पीना हो तो मठ्ठा पिये
8. रात्रि में खाना खाने के तुरंत बाद पीना हो तो दूध पिये
9. उरद की दाल के साथ दही न खाए (उरद की दाल का दही बडा )
10.हमेशा दक्षिण या पूर्व में सर करके सोये
11. खाना हमेशा जमीन पर सुखासन में बैठ कर खाये
12. अलमुनियम के बर्तन का बना खाना न खाए(प्रेशर कुकर का )
13.कभी भी मूत्र मल जम्हाई प्यास छिक नींद इस तरह के 13 वेग को न रोकें
14. दूध को खड़े हो कर पानी को बैठ कर पिये
15. मैदा चीनी रिफाइंड तेल और सफेद नमक का प्रयोग न करे ( इसकी जगह पर गुड , काला या सेंधा नमक का प्रयोग करे)

आप से विनती है कि आप ऊपर के पांच नियम का पालन जरूर करेंगे क्योंकि स्वथ्य शरीर बहुत ही ज्यादा कीमती है

स्वथ्य शरीर से पैसा और खुशियाँ पाया जा सकता है लेकिन पैसा और समय से स्वस्थ शरीर नहीं

अब आप को स्वयं चिकसक बनने की जरूरत है

आप अपने शरीर को जितना जानते हैं उतना डॉक्टर नही

 

भक्ति का स्वरूप

भाग-2 : 【अध्याय 5】
प्रवचन : 12 :

हम ईश्वर को दोनों तरह से नहीं पहचानते। वह हमारी इन्द्रियों से नहीं दीखता, तब भी नहीं पहचानते और हज़ारों रूपों में दीख रहा है तब भी हमें उसकी पहचान नहीं, इसलिए दिखायी देने पर भी हम उसको नहीं पहचानते। इस कारण उससे न तो प्रेम हो पाता है, न भक्ति हो पाती है। अतः परमेश्वर के प्रति प्रेम और भक्ति के लिए श्रवण की आवश्यकता है। सुनो, समझो और उससे प्रेम करो। दुनिया में प्रेमभक्ति के मज़हब बहुत हैं।

यहाँ तक कि बौद्ध और जैन भी, जो एक ईश्वर को स्वीकार नहीं करते, सद्गुणसम्पन्न, पवित्र और बुद्धत्व को प्राप्त जीव को ईश्वर कहते हैं। जो सद्गुणसम्पन्न शुद्ध इकाई के रूप में होता है उसको वे तीर्थशंकर कहते हैं। उनके यहाँ चौबीस तीर्थंकर होते हैं। वे लोग भी बुद्ध की, महावीर स्वामी की, अपने तीर्थंकरों की भक्ति का वैसा ही वर्णन करते हैं जैसा हमलोग अपने एक ईश्वर की भक्ति का वर्णन करते हैं। उनके हमारे भक्ति-वर्णन में कोई अन्तर नहीं। हम बोलते हैं-  जगन्नाथस्वामी नयनपथगामी भवतु मे।’ और वे बोलते हैं-  महावीरस्वामी नयनपथगामी भवतु मे।’

तो भक्ति बौद्धों और जैनियों में भी है। ईसाई और मुस्लिम मज़हब भी भक्ति से भरपूर ही हैं। बाइबिल और कुरान-शरीफ एक ईश्वर की भक्ति का ही प्रतिपादन करते हैं। गुरुग्रन्थ साहिब और जन्दावेस्ता भी भक्ति से भरपूर हैं। परंतु हमको दिखायी न देनेवाले परोक्ष ईश्वर के प्रति भक्ति का उदय श्रवण के सिवाय और किसी साधन से नहीं हो सकता।

यदि हम किसी मूर्ति की पूजा कर रहे हैं तो वह मूर्ति पत्थर है, सोना है, चाँदी है, ताँबा है, किसकी मूर्ति है और उसमें ईश्वर है या वह स्वयं ईश्वर-यह सब भी कान से सुनना ही पड़ता है। बिना श्रवण के कोई मूर्ति का दर्शन करे तो उसमें उसका ईश्वर-भाव नहीं हो सकता। इसलिए भक्ति का मूल रूप श्रवण में ही निहित है। श्रवण क्या करता है? कि किसी-न-किसी रूप में प्रेम तो आपके हृदय में है। यदि बीज नहीं हो तो काम नहीं बने। आसक्ति सबके हृदय में रहती है। कोई बच्चे से आसक्ति करता है। कोई शरीर से आसक्ति करता है कोई अपनी योग्य वस्तु से आसक्ति करता है।

आसक्ति अन्तःकरण का सहज स्वभाव है। तो संसार में जो आसक्ति है, उसकी जगह पर ईश्वर में आसक्ति उत्पन्न करने के लिए श्रवण की आवश्यकता पड़ती है। जो ईश्वर के बारे में श्रवण नहीं करेगा, उसके हृदय में भगवान की भक्ति नहीं आयेगी। एकान्त में बैठने पर भी, जप करने पर भी, ध्यान करने पर भी जितना आपको मालूम है, वही बात आपके दिमाग में घूमेगी, उससे अधिक जानकारी नहीं प्राप्त हो सकेगी। अद्भुत बात यह है कि जहाँ बौद्ध और जैनों का एक-एक व्यक्ति ईश्वर है और वे भी दुनिया में बहुत थोडे हुए है तथा ईसाई, मुसलमान का ईश्वर निराकार है, वहाँ वैदिक धर्म के अनुसार ईश्वर को न एक व्यक्ति में सीमित रखा गया है और न उसको केवल निराकार करके छोड़ दिया गया है।

हमारी जो एक-एक व्यक्ति में, जाति में, मज़हब में आसक्ति है और जिसके कारण हम बहुत अनर्थ करते हैं, मोहवश भाई-भतीजों के प्रति, अपने मज़हबवालों के प्रति पक्षपात करते हैं और मज़हबी लड़ाइयाँ लड़ते हैं, यह सब ईश्वर का रहस्य न जानने के कारण ही है। मजहब की आसक्ति, जाति की आसक्ति, पन्थ की आसक्ति, राष्ट्र की आसक्ति, भाषा की आसक्ति मनुष्य की बुद्धि को संकीर्ण बना देती है, उदीर्ण नहीं होने देती। यहाँ तक कि भक्ति-सम्प्रदायों में भी ईश्वर और ईश्वर की पूजा को एकांगी बनाकर लड़ाई करने की प्रवृत्ति आ जाती है। किन्तु हमारे वैदिक धर्म का जो परमेश्वर है, वह बहुत उदार है। अर्थात वह सबमें है, सब जगह है और सबका संचालन कर रहा है। गीता कहती है-

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव ॥

संसार के समस्त प्राणी जिससे प्रेरित होकर अपने-अपने कर्म में प्रवृत्त हो रहे हैं, जिससे चींटी चल रही है, चिड़िया उड़ रही है, मछली तैर रही है और मनुष्य नाना प्रकार के कर्म कर रहा है, जिससे पंखा चल रहा है, बल्ब में रोशनी हो रही है, हीटर जल रहा है, रेफ्रीजेटर ठण्डा कर रहा है, अलग-अलग यन्त्र अपना-अपना काम कर रहे हैं और जिसके द्वारा सम्पूर्ण भूतों की प्रवृत्ति हो रही है, जो- ‘अन्तःप्रविष्टः शास्ता जनानां’– सबके भीतर रहकर सबका संचालन कर रहा है, वही ईश्वर है।

हमारे ईश्वर की विशेषता यह है कि ‘येन सर्वमिदं ततम्’– वह केवल सबका संचालन ही नहीं करता‚ सब रूपों में भी वही है। कुछ लोग प्रश्न करते हैं कि ईश्वर यदि सबका संचालन करता है तो बुराइयों का भी संचालन वही करता होगा। किन्तु ऐसी बात नहीं आप देखो कि बिजली का पंखा जब कभी खट-खट बोलने लगता है या उसमें-से आग निकलने लगती है तो वह पंखे का दोष है या बिजली का? निश्चय ही वह यन्त्र की त्रुटि होती है, मशीन की खराबी होती है, बिजली का दोष नहीं होता। तो सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान परमेश्वर तो सबको एकरस शक्ति देता है, ज्ञान देता है, सत्ता देता है, आनन्द देता है। किन्तु जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, उसको सद्गुण की प्रेरणा मिलती है। आप ईश्वर से क्या लेते हैं, यह आपके अन्तःकरण पर निर्भर करता है। परन्तु इसके आगे जो बात कही गयी है वह और बड़ी है- येन सर्वमिदं ततम्- येन उपादानभूतेन ईश्वरेण इदम् सर्वं वस्त्रेषु सूत्रवत् ततम् – जैसे कपड़े में सूत होता है इसी प्रकार यह जो विश्वरूपी वस्त्र है, इसमें सूत तथा ताना और बाना सब कुछ वही परमेश्वर है।

इस प्रकार की व्याख्या दुनिया के किसी भी दूसरे धर्म में स्वीकार नहीं की गयी। इसका फल यह हुआ कि उनके यहाँ न तो मूर्तिपूजा की मान्यता हुई और न अवतार की क्योंकि जब ईश्वर सर्वरूप है तब मूर्ति के रूप में भी वही है। यहाँ तक कि यह पेड़ भी ईश्वर है, ईश्वर ही पेड़ के रूप में प्रकट हुआ है, इससे भी प्यार करो। वृन्दावन में एक सज्जन थे, वे जब किसी बगीचे में जाते थे तो पेड़ के साथ लिपट जाते थे और कहते कि ‘प्रभु! तुम इस रूप में आये हो! तुम गर्मी सहते हो, सर्दी सहते हो, खड़े रहते हो किन्तु हम लोगों को सुख पहुँचाने के लिए छाया देते हो।’ इसमें न मज़हब का भेद है न जाति का, न प्रान्त का भेद है न राष्ट्र का, न भाषा का भेद है। एक ईश्वर ही सबके रूप में प्रकट हो रहा है। निमित्त कारण भी वही है माने सबका संचालक वही है और उपादान कारण भी वही है अर्थात् सब रूपों में वही बना हुआ है।

आपु अमृत आपै अमृतघट, आपहि पीवनहारि।
आपै ढूंढे आपै ढुंढावे आपै ढूँढनहारि।।

वही अमृत है, वही अमृतघट है, वही पीने वाला है। वह स्वयं ढूँढता है, स्वयं ढूँढा जा सकता और स्वयं ढूँढनेवाला है। परमेश्वर के इस रूप में न लोक-परलोक का भेद है, न मै और तू का भेद है और न शत्रु-मित्र का भेद है। ऐसा है सर्वात्मा ईश्वर का यह स्वरूप।

दर्शनपूर्वक जो ईश्वर की भक्ति है, इसी को दर्शनशास्त्र बोलते हैं। पहले ईश्वर का दर्शन करो- एक सबके संचालक रूप में, दूसरा सर्वरूप में। गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं- ‘सर्व सर्वगत सर्व उरालय।’ परमेश्वर ही सब है, सबमें है और सबके हृदय में रहता है।

यदि यह बात ध्यान में आ जाये कि ईश्वर जड़-चेतन, चर-अचर सबमें है, वही चलने वाला है और वही चलाने वाला है तो मानव-समाज का दृष्टिकोण इतना उदार हो जायेगा कि भाषा का पक्ष लेकर मानवता का, मज़हब का पक्ष लेकर धर्म का, प्रान्त का पक्ष लेकर, राष्ट्र का पक्ष लेकर विश्व का और दृश्य प्रपंच का पक्ष लेकर अदृश्य परमात्मा का तिरस्कार नहीं किया जा सकेगा। क्योंकि ये सब परमेश्वर के ही स्वरूप है।

अब भक्ति का स्वरूप क्या है इसपर विचार करें। *स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।* गीता कहती है कि हमें भक्ति में पूजा उसकी ही करनी है जो सबमें है, सबका संचालक है और सर्वरूप है। हम एक महात्मा के पास बैठे थे। हमारे एक साथी घास नोंचने लगे। वे महात्मा किसी आसन पर नहीं, धरती पर ही बैठते थे। जब हमारे साथी ने कुछ हरी-हरी दूब नोंच ली, तब वे बोल पड़े, अरे क्या करते हो? देखो यह परमेश्वर माटी में-से निकलकर कैसे हरी-हरी घास के रूप में आया है। इसको यदि गाय चरेगी तो दूध बनेगा। वह दूध मनुष्य पायेगा तो उससे वीर्य बनेगा। उस वीर्य से मनुष्य का निर्माण होगा। यह माटी मनुष्य रूप धारण करने के लिए दूब बनी है। तुम इसको नोंचकर फेंक दोगे तो फिर इसको दूब और मनुष्य बनने में वर्षों लग जायेंगे।

तुम बड़े आदर के साथ धरती पर पाँव रखो, यह सोचकर कि धरती भी परमेश्वर है। मुँह से आवाज निकालो परन्तु यह सोचकर बोलो कि जिससे हम बात कर रहे हैं उसमें भी परमेश्वर है इतना ही नहीं, तुम्हारी बात जो पास-पड़ोस में जो सुन रहे हैं, उनमें भी परमेश्वर है। महात्मा ने कहा कि हमारी जीभ से आवाज निकलती है, मीठी-मीठी या कड़वी-कड़वी, उसको यहाँ रहने वाले कीड़े, पतंगे भी सुनते हैं। उनके काम में भी हमारी आवाज कर्ण-कर्कश होकर कटु होकर नहीं जानी चाहिए; क्योंकि वे भी परमेश्वर हैं। तो, ईश्वर सबमें हैं, ईश्वर सब है, ईश्वर सबसे परे है और ईश्वर अपने-आपमें है। हम आपको श्रीमद्भागवत की बात सुनाते हैं। उसके ग्यारहवें स्कन्ध में यह प्रश्न उठा कि ईश्वर सबमें है तो अपने-आपमें है कि नहीं? उत्तर मिला कि अपने में भी है। जब सबमें है तो अपने में क्यों नहीं होगा!

श्रीराधा-तत्त्व एवं राधास्वरूपकी नितान्त दुर्गमता

सुन प्यारी मम बैन, सुने जु पिय मुख तैं सरस।
आजु भोर सुख दैन, जमुनातट सब सखिन ने।।
बोले अति सुख मानि, ‘राधा-सी’ नहिं कतहुँ कोउ।
रूप-सील-गुन-खानि, परम प्रेमिका बिस्व महँ।।’
खिले तुरंत अमान, सुनि, सखियन के मुख कमल।
निज सखि के गुन-गान, प्रियतम के मुख कमल तैं।।
धन्य-धन्य, अति धन्य, प्यारे प्रियतम के बचन।
सखी राधिका धन्य, जिनहि प्रसंसत आपु पिय।।

श्रीराधाजी विषाद ग्रस्त तो थीं ही; सखी ने जब यह बात सुनायी और उन्होंने जब प्रियतम के तथा सखियों के द्वारा अपनी प्रशंसा के वाक्य सुने, तब उनके नेत्रों से आँसू बहने लगे- वे रोकर अपने दोषों का बखान करती हुई कहने लगीं-

‘सखी! मैं तो गुणों की नहीं, अवगुणों की खान हूँ। शरीर ही गोरा है, मन की बड़ी काली हूँ। मेरे प्राण पापों से पूर्ण हैं। मेरे मन में तनिक भी त्याग नहीं है, वरं असीम अभिमान भरा है। प्रेम का लेश भी नहीं है, निरन्तर अपने सुख का ही ध्यान रहता है। जब जगत के दुःख-अभाव सताते हैं, मन में पीड़ा का अनुभव होता है, तब उस दुःख से आँखें आँसू बहाने लगती हैं। उनमें कहीं तनिक भी प्रेम नहीं है, पर मैं उन दुःख के आँसुओं को महान पवित्र प्रेम के रूप में दिखलाती हूँ। कपट करती हूँ। हृदय के भावों को छिपाकर, जान-बूझकर स्वाँग बनाती हूँ। मेरे प्रियतम श्यामसुन्दर बड़े भोले और निर्मल हृदय हैं। वे मुग्ध होकर मेरा गुण गान करने लगते हैं और मुझ को परम प्रेमिका मानकर मेरे प्रेम की अतिशय सराहना करने लगते हैं, तुम लोग भी सब मिलकर मेरी प्रशंसा करने लगती हो। तब मैं सचमुच अपने को प्रेमिका मानकर अभिमान से भर जाती हूँ और अपना प्रेम दिखाने के लिये उस क्षण मैं अनेकों छल-छद्म तथा प्रपन्चों का विस्तार करती हूँ। मेरे वे श्याम सरल हृदय हैं, उनको मैं भाँति-भाँति के विधान रचकर रात-दिन ठगती रहती हूँ। मेरे इस कलुषित जीवन को धिक्कार है और मेरे इस प्रेम के मिथ्या अभिमान को भी धिक्कार है!’

सखी री! हौं अवगुन की खान।
तन गोरी, मन कारी भारी, पातक पूरन प्रान।।
नहीं त्याग रंचक मो मन मैं, भरयौ अमित अभिमान।
नहीं प्रेम कौ लेस, रहत नित निज सुख कौ ही ध्यान।।
जग के दुःख-अभाव सतावैं, हो मन पीड़ा-भान।
तब तेहि दुख दृग स्त्रवै अश्रुजल, नहिं कछु प्रेम निदान।
तिन दुख अँसुवन कौं दिखरावौं हौं सुचि प्रेम महान।
करौ कपट, हिय भाव दुरावौं, रचैं स्वाँग सज्ञान।।