नवरात्रि मुहूर्त

भारतीय नवबर्ष 2076 चैत्र शुक्ल प्रतिपदा 6अप्रैल से शुरु होगा।अभि जित मुहूर्त मे दोपहर 12.05से 12.55 तक है मंत्र पूजा साधना के लिए जो सर्वोत्तम है इस बीच अमृत योग भी है।नवरात्र की शुरूआत रेवती नक्षत्र मे है।

सर्वोत्तम मुहूर्त प्रातः काल 6:09 से 10:20 तक है जो कलश स्थापना के लिए सर्वोत्तम है। हिंदू धर्म का नया साल चैत्र नवरात्र से शुरू होता है। इस साल चैत्र नवरात्र 6 अप्रैल से शुरू हो रहे हैं। यूं तो साल में दो बार नवरात्र आते हैं लेकिन दोनों ही नवरात्र का महत्व और पूजा विधि अलग है। नवरात्र में देवी मां की आराधना करने से मां भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं। इस दौरान भी मां की पूजा के साथ ही घट स्थापना की जाती है। घट स्थापना का मतलब है कलश की स्थापना करना। इसे सही मुहूर्त में ही करना चाहिए। इसके अलावा पूजा विधि का भी खास ख्याल रखना चाहिए

पहला नवरात्र 6 अप्रैल शनिवार को
दूसरा नवरात्र 7 अप्रैल रविवार को
तीसरा नवरात्र 8 अप्रैल सोमवार को
चौथा नवरात्र 9 अप्रैल मंगलवार को
पांचवां नवरात्र 10 अप्रैल बुधवार को
छष्ठ नवरात्र 11 अप्रैल वीरवार को
सातवां नवरात्र 12 अप्रैल शनिवार को
अष्टमी 13 अप्रैल शनिवार को
नवमी 14 अप्रैल रविवार को

इस साल 6 अप्रैल शनिवार से नवरात्र शुरू हो रहे हैं। शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि के दिन अभिजीत मुहूर्त में 6 बजकर 9 मिनट से लेकर 10 बजकर 19 मिनट के बीच घट स्थापना करना बेहद शुभ होगा।

नवरात्रों की पूजा का आरंभ घट स्थापना से शुरू होता है। इस दिन प्रात: स्नानादि से निवृत हो कर संकल्प किया जाता है।
व्रत का संकल्प लेने के पश्चात मिटटी की वेदी बनाकर जौ बौया जाता है फिर घट स्थापित किया जाता है।

घट के ऊपर मां की प्रतिमा को स्थापित किया जाता है तथा “दुर्गा सप्तशती” का पाठ किया जाता है। पाठ पूजन के समय अखंड दीप भी जलाया जाता है।

इस वर्ष घट स्थापना 06 बजकर 09 मिनट से लेकर 10 बजकर 19 मिनट तक रहेगा। इसके बाद अभिजित मुहुर्त में भी स्थापना की जा सकती है।

नवरात्र के प्रथम दिन स्नान-ध्यान करके माता दुर्गा, भगवान गणेश, नवग्रह कुबेरादि की मूर्ति के साथ कलश स्थापन करें। कलश के ऊपर रोली से ॐ और स्वास्तिक लिखें।

कलश स्थापन के समय अपने पूजा गृह में पूर्व के कोण की तरफ अथवा घर के आंगन से पूर्वोत्तर भाग में पृथ्वी पर सात प्रकार के अनाज रखें।

संभव हो, तो नदी की रेत रखें. फिर जौ भी डालें। इसके उपरांत कलश में गंगाजल, लौंग, इलायची, पान, सुपारी, रोली, कलावा, चंदन, अक्षत, हल्दी, रुपया, पुष्पादि डालें। फिर ‘ॐ भूम्यै नमः‘ कहते हुए कलश को सात अनाजों सहित रेत के ऊपर स्थापित करें।

अब कलश में थोड़ा और जल या गंगाजल डालते हुए ‘ॐ वरुणाय नमः‘ कहें और जल से भर दें. इसके बाद आम का पल्लव कलश के ऊपर रखें. तत्पश्चात् जौ अथवा कच्चा चावल कटोरे में भरकर कलश के ऊपर रखें. अब उसके ऊपर चुन्नी से लिपटा हुआ नारियल रखें,

हाथ में हल्दी, अक्षत पुष्प लेकर इच्छित संकल्प लें। इसके बाद ‘ॐ दीपो ज्योतिः परब्रह्म दीपो ज्योतिर्र जनार्दनः! दीपो हरतु मे पापं पूजा दीप नमोस्तु ते. मंत्र का जाप करते दीप पूजन करें। कलश पूजन के बाद नवार्ण मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे!’ से सभी पूजन सामग्री अर्पण करते हुए मां शैलपुत्री की पूजा करें।

2019 में चैत्र नवरात्रि रेवती नक्षत्र के साथ शुरू होगी।

नवरात्रि के दूसरे दिन यानि 7 अप्रैल को पहला सर्वार्थ सिद्धि योग (लक्ष्मी पंचमी ) होगी।

इसके बाद 9 व 10 अप्रैल यानि चतुर्थ और पंचमी तिथि को फिर से सर्वार्थ सिद्धि योग बनेगा।

इसके बाद 11 अप्रैल षष्ठी तिथि को रवि योग बनेगा।

शुक्रवार 12 अप्रैल सप्तमी तिथि को फिर से सर्वार्थ सिद्धि योग बनेगा।

13 अप्रैल को महाष्टमी रहेगी। ये दिन बिना किसी योग के भी देवी पूजा के लिए सबसे खास माना जाता है।

14 अप्रैल महानवमी पर रवि पुष्प नक्षत्र और सर्वार्थ सिद्धि योग साथ बनेंगे।

इन योगों के साथ ये चैत्र नवरात्रि बहुत ही शुभ और फलदायी होगी

बिना डरे घी खाएं

 

  • हार्ट अटैक के रोगी को बिना घी की रोटी खाने की सलाह दे कर मूर्ख बनाया जाता है, आइये जानें सच्चाई….?
    सनातन पद्धति में पांच अमृत और पंचगव्य की चर्चा है

पंच अमृत:-गाय का दूध, दही, घी, देशी खांड और शहद।
पंचगव्य:- गाय का दूध, दही, घी, गोबर और गौमूत्र।

  • हर घर से एक आवाज जरुर आती है, *मेरे लिए बिना घी की रोटी लाना* आपके घर से भी आती होगी, लेकिन घी को मना करना सीधा सेहत को मना करना है। पहले के जमाने में लोग रोजमर्रा के खानों में घी का इस्तेमाल करते थे। घी का मतलब देसी गाय का शुद्ध देशी घी। घी को अच्छा माना जाता था।
    कोलेस्ट्रोल और हार्ट अटैक जैसी बीमारियाँ कभी सुनने में भी नही आती थी।
    राजस्थान में अभी भी कई गावों में बारात का स्वागत घी पिला कर किया जाता है अथवा राजस्थानी डिश (खीच/खिचड़ी) परोस कर देशी घी से मनुहार की जाती है….*
    घी की गलत पब्लिसिटी कर करके बड़ी बड़ी विदेशी कंपनियों ने डॉक्टरों के साथ मिलकर अपने बेकार और यूजलेस प्रोडक्ट को भारत में सेल करने के लिए लोगों में घी के प्रति नेगेटिव पब्लिसिटी शुरू कर दी। ये कहा जाता रहा कि घी से मोटापा आता है, कोलेस्ट्रोल बढता है, हार्ट अटैक की सम्भावनाएं बढती है , जबकि ये सरासर गलत है। रिफाइंड और दूसरे वनस्पति तेल और अन्य प्रकार के घी इन सब रोगों के कारण है।

जब लोग बीमार होंगे तो डॉक्टरों का धंधा चलेगा..

इसी सोच के साथ इन विदेशी कंपनियों के साथ डॉक्टर भी मिल गए। इस मार्किट में कुछ स्वदेशी कंपनियां भी आ गई है। धीरे धीरे लोगों के दिमाग में यह बात घर कर गई कि – घी खाना बहुत ही नुकसानदायक है। घी न खाने में प्राउड फील करने लगे कि वो हेल्थ कॉन्शियस हैं क्योंकि जब आप एक ही झूठ को बार बार टीवी पर दिखाओगे तो वो लोगो को सच लगने लगता है।

  •  जबकि घी खाना नुकसानदायक नही बहुत ही फायदेमंद है। घी हजारों गुणों से भरपूर है, खासकर गाय का घी तो खुद में अमृत है। घी हमारे शरीर में कोलेस्ट्रोल को बढाता नही बल्कि कम करता है। घी मोटापे को बढाता नही बल्कि शरीर के बेकार फैट को कम करता है। घी एंटीवायरल है और शरीर में होने वाले किसी भी इन्फेक्शन को आने से रोकता है। घी का नियमित सेवन ब्रेन टोनिक का काम करता है। खासकर बढ़ते बच्चों की फिजिकल और मेंटल ग्रोथ के लिए ये बहुत ही जरुरी है।

 

  • ये जो उठते और बैठते शरीर की हड्डियों से चर मर की आवाज आती है इसकी वजह- हड्डियों में लुब्रिकेंट की कमी होने से है अगर घी का नियमित सेवन करते है; तो यह मसल्स और हड्डियों को मजबूत बनाता है।

 

  • घी हमारे इम्यून सिस्टम को बढाता है। बीमारियों से लड़ने में मदद करता है। घी हमारे डाइजेस्टीव सिस्टम को भी ठीक रखता है जो आजकल सबसे बड़ी प्रॉब्लम है। आज हर दूसरा व्यक्ति कब्ज का मरीज है। दिन में कई कई बार शौच जाना पड़ता है ।

घी कितना खाएं

एक नार्मल इन्सान के लिए 4 चम्मच घी काफी है. घी को पका कर या बिना पकाए दोनों तरीके से खा सकते है। चाहे तो इसमें खाना पका लें या फिर बाद में खाने के ऊपर डालकर खा लें। दोनों ही तरीके से घी बहुत ही फायदेमंद है।
सबसे जरुरी बात अगर आप सबसे ग्लोइंग, शाइनिंग और यंग दिखना चाहते हैं तो घी जरुर खाएं क्योंकि घी एंटीओक्सिडेंट है जो कि आपकी स्किन को हमेशा चमकदार और सॉफ्ट रखता है। आपके अपने और आसपास के सभी लोगों की अच्छी सेहत के लिए यह जानकारी उनके साथ अवश्य साँझा करे। जो बिना घी की रोटी खाते है उनको ये पोस्ट जरुर भेजे।

श्रीराधा-तत्त्व एवं राधास्वरूपकी नितान्त दुर्गमता

“प्यारे श्यामसुन्दर! मैंने तो तुमसे सदा लिया-ही-लिया। मैं लेती-लेती कभी थकी ही नहीं। तुम्हारे द्वारा मुझे जो प्रेम-सौभाग्य मिला, वह असीम है- उसकी कहीं कोई परिमिति ही नहीं है। परंतु मैं तो कभी कुछ भी तुम्हें दे सकी ही नहीं। तुमने मेरी त्रुटियों की ओर, मेरे दोषों की ओर कभी ताका ही नहीं, सदा देते ही रहे और देते-देते कभी थके ही नहीं, अपना सारा प्रेमामृत उँडेल दिया मुझ पर। इतने पर भी तुम यही कहते रहे कि ‘प्रिये! मैं तुमको कुछ भी नहीं दे सका। तुम-सरीखी शील गुणवती तुम्हीं हो, मैं तुम पर बलिहारी हूँ।’ मैं प्राणप्रियतम से क्या कहूँ? अपनी ओर देखकर लज्जा से गड़ी जा रही हूँ। पर तुम तो हे प्यारे नन्दकिशोर! मेरी प्रत्येक करनी में सदा प्रेम ही देखते हो।”

तुमसे सदा लिया ही मैंने, लेती-लेती थकी नहीं।
अमित प्रेम-सौभाग्य मिला, पर मैं कुछ भी दे सकी नहीं।।
मेरी त्रुटि, मेरे दोषों को तुमने देखा नहीं कभी।
दिया सदा, देते न थके तुम, दे डाला निज प्यार सभी।।
तब भी कहते- ‘दे न सका मैं तुमको कुछ भी, हे प्यारी।
तुम-सी शील-गुणवती तुम ही, मैं तुम पर हूँ बलिहारी।।
क्या मैं कहूँ प्राण प्रियतम से, देख लजाती अपनी ओर।
मेरी हर करनी में ही तुम प्रेम देखते नंदकिशोर!।।

राधा ने सुना आज कल प्रियतम सदा सर्वत्र मेरे प्रेम की बड़ी प्रशंसा कर रहे हैं, इससे वे एक दिन उदास मन एकान्त में बैठी अपने दोषों के मानसिक चित्र अंकित कर रही थीं और हाथ की अँगुली से लाज के मारे धरती कुरेद रही थीं। इतने में ही एक सखी ने आकर उमंग भरे शब्दों में कहा—

“प्यारी लाडली! अरी, मेरी बात सुनो। आज प्रातःकाल यमुना-तट पर साँवरे चले गये थे, वहाँ हम बहुत-सी सखियाँ थी। श्यामसुन्दर ने प्रेमानन्द-अश्रुओं को छलकती आँखों से, अत्यन्त सुखभरे हृदय से सभी को सुख देने वाले बड़े मधुर वचन कहे। प्रियतम के मुख से निकले उन सरस वचनों को सब सखियों ने सुना। वे वचन ये थे- ‘सखियो! राधा के समान रूप, शील और गुणों की खान मेरी परम प्रेमिका जगत् में कहीं कोई है ही नहीं।’ प्रियतम के मुख कमल से अपनी प्यारी सखी के गुणगान से भरे इन शब्दों को सुनते ही सब सखियों के मुख कमल तुरंत खिल उठे- असीम मधुर मुस्कान से भर गये और वे प्यारे प्रियतम के वचनों को धन्य-धन्य कहती हुई बोलीं- ‘हमारी प्यारी राधिका परम धन्य है, जिनकी प्रशंसा स्वयं प्रियतम करते हैं!’

सूर्य किरण से सीधे भोजन प्राप्त करे

किसी ने पूंछा कि जब आज सूर्य किरणों से खाना पकाया जा रहा है, बिजली पैदा की जा रही है, तो हम हम सूर्य किरणों से सीधे अपना भोजन प्राप्त कर पुष्ट और तंदुरुस्त नहीं रह रह सकते हैं क्या?

अहो, हमारे साधु और मुनि गण तो लाखों-करोड़ो वर्ष पहले से ही जानते थे कि सूर्य ही इस संसार में शक्ति का सबसे बड़ा स्त्रोत है और वे अपना अधिकाँश समय सूर्य की रौशनी में ही जप-तप और साधना आदि में ही करते थे. खाना भी वे मात्र एक बार ही लेते थे और लम्बी उम्र और सुखी जीवन जीते थे.

साथ ही प्राचीन काल से ही लोग सूरज की किरणों से अपने उत्तम स्वास्थ्य को हासिल करते थे. वे खुद को चुस्त और तंदुरुस्त रखने के लिए सूर्य की किरण का भोजन, उस में व्यायाम और ताजा हवा तथा सूर्य की किरणों से शुद्ध नदी में बहते पानी का ही इस्तेमाल किया करते थे.

कारण यह है कि हमारे शरीर का अपना एक अलग इको-सिस्टम होता है और अगर हम इसे प्राकृतिक तरीके से सुचारू रूप से चलाना चाहते हैं तो हमें सूर्य किरणों को अपने अंदर समाहित कर अपने आप को स्वस्थ, नीरोगी और सुखी रखना ही चाहिये.
इस बात को एक तरह से पिछले 65 साल से ब्रिटेन के सरे क्षेत्र में रहने वाले चित्र में दर्शाए श्री डेविड लेटिमर साबित कर रहे हैं. उन्होंने 1960 में ईस्टर के दौरान एक बाँटल गार्डन शुरू किया था।
बाँटल गार्डन की शुरूवात करने के लिए उन्होंने इसमें थोडी सी खाद डाली और फिर उस बाँटल को एक चौथाई पानी से भर दिया था। उन्होंने आखिरी बार उस बाँटल में 1972 में पानी डाला था।

उसके बाद बाँटल को सील बंद कर दिया था और आज तक उसमें पानी और खाद नही दिया है, फिर भी चित्र में दिखाए अनुसार यह बाँटल गार्डन आज तक हर-भरा है।

आज श्री डेविड लेटिमर 80 साल के हो चुके है। वे कहते हैं कि उन्होंने इसे हर रोज अपने कमरे की खिड़की से 6 फीट दूर सूर्य की रोशनी वाली जगह पर रखा था। वे खुद भी आश्चर्यचकित हैं कि किस तरह आज तक उनका बाँटल गार्डन बढ़ता रहा है और अभी भी चित्र में पूरी तरह हर-भरा ही दिखाई दे रहा है।

वे समझाते हैं कि इस बाँटल गार्डन का इको-सिस्टम लाजवाब है। उनके मुताबिक सूर्य की किरणों की शक्ति से खाद से निकले बैक्टीरिया ने मृत पौधों को खाकर आक्सीजन उत्सर्जित की और पौधों को कार्बन डाईआक्साइड और अन्य जरूरी पोषक तत्व दिये। इस तरह ये पौधे आज तक जीवित और हरे-भरे और स्वस्थ हैं।

श्री डेविड लेटिमर कहते हैं कि इस तरह एक बार फिर से यह सिद्ध हो जाता है कि बाँटल गार्डन पौधों का अपना भी एक अलग इको-सिस्टम होता है। यह हमारी धरती के सम्पूर्ण इको-सिस्टम का ही एक सबसे छोटा या माइक्रोवर्जन का सर्वोत्तम उदाहरण है।

इसी तरह हमारे शरीर का भी अपना एक अलग इको-सिस्टम या डॉक्टरों की भाषा में इम्युनिटी सिस्टम होता है और अगर हम अपने आपको फिट और स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो हमें भी सूर्य किरणों को अपने अंदर समाहित कर उनकी शक्ति और पोषक तत्वों का लाभ उठाना चाहिये।

सूर्य किरण भोजन लेने से आपको अपना शरीर बहुत हल्का, उत्साहवर्धक और अद्भुत लगेगा. आप यह भी महसूस करेंगे कि आपकी भूख में पहले से कमी आ रही है. इस तरह सूरज से अपनी सभी ऊर्जा पाने से अपने आप ही आपको भोजन की आवश्यकता कम होती जायेगी और दो से तीन माह सूर्य किरण भोजन करने के बाद आप अपना खाना आधा भी कर सकते हैं और आप फिर भी किसी भी तरह की कमजोरी महसूस नहीं करेंगे, क्योकि सभी तरह के पोषण तत्व आपको सूर्य किरण भोजन से मिलने लगते हैं.

इससे आप शाम या रात्रि को ले रहे भोजन को कम कर धीरे-धीरे उसका त्याग भी कर सकते हैं, इससे आपके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को भी ठीक किया जा सकेगा.

फिर आपका जीवन स्वस्थ, सुन्दर और सुखमय हो सकेगा.
साथ ही अगर आप हो रही इस बचत को गरीबों की भूंख को शांत करने में लगायेंगे, तो आपका इस जन्म में तो कल्याण होगा ही, साथ ही अगले जन्म में भी आपको उत्तम कुल, नीरोगी काया और मान-प्रतिष्ठा की प्राप्ति होगी.

भोजन कम करने से आपको व्रत-उपवास का भी पुण्य-लाभ मिलेगा और फिर आप भी जल्द ही भक्त से भगवान बनने की ओर अपने कदम बढ़ा सकेंगे.

उगते और डूबते सूरज की किरणों से भोजन प्राप्त करने का समय सूर्योदय से आधा घंटे बाद तक और सूर्यास्त से आधा घंटे पहले से सूर्यास्त तक ही है. सूर्य किरण भोजन के लिए सूर्य को टकटकी लगाकर देखने का कार्य शुरू में सिर्फ पांच मिनिट के लिए करें और फिर धीरे-धीरे उसे रोज 30 सेकंड बढ़ाते जाना चाहिये.

इसे शुरू में 3 माह तक अधिक से अधिक 15 मिनट के लिए ही करना चाहिये और उसके बाद फिर आप इसको बढाकर 30 मिनट तक कर सकते हैं. सूर्योदय और सूर्यास्त का समय आपको आपके यहाँ के समाचार पत्र में मिल सकता है.

शक संवत निर्धारण

महान् गणितज्ञ वराहमिहिरने अपने ग्रन्थ बृहत्संहिता में श्रीमन्महाराज युधिष्ठिरके समय का उल्लेख करते हुए लिखा है –

“आसन् मघासु मुनय: शासति पृथिवीं युधिष्ठिरे नृपतौ ।
षड्द्विपञ्चद्वियुत: शककालस्तस्य राज्ञया ।।”(बृ०सं०१३/३)

अर्थात् प्रस्तुत महाराज युधिष्ठिर से शक राजा का काल २५२६ वर्ष है । किन्तु विद्वानों को शकराजा के काल और शक संवत का जो भ्रम हुआ है । इसी कारण उक्त श्लोकमें उल्लखित शककाल को विक्रम संवत् के १३५ वर्ष बाद तदनुसार ७८ ई सन् में प्रारम्भ शक मानकर गणना की गई है । यदि उक्त शककाल को ७८ ई सन् का शक काल मानकर गणना करें तब महाराज युधिष्ठिर का समय कलियुग संवत् ६५३ तदनुसार २४४८ ई पूर्व निकलेगा । इसी भ्रम के कारण कल्हण ने राजतरंगिणी में महाभारत युद्ध कलि ६५३ में मान लिया है । वराहमिहिर विक्रम संवत् के प्रवर्तक शकारी विक्रमादित्यके नवरत्नों में एक थे , लेकिन इतिहासकारों ने उसके समय की सही गणना नहीं की । वराहमिहिर रचित पञ्चसिद्धान्तिका में उस ग्रन्थ का निर्माण-काल निम्नोक्त कहा है –
“सप्ताश्विवेदसंख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ ।
अर्धास्तमिते भानौ यवनपुरे सौम्यदिवसाद्य ।।

अर्थात् ‘शक ४२७ में चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सौम्यवार( सोमपुत्र बुध सौम्य कहलाता है – बुधवार) था ,भानु का अर्घ अस्तंगमन हो रहा था ,भारत में अर्धोदय हो रहा था इस ग्रंथ का निर्माण हुआ है । ‘

पंडित सुधाकर द्विवेदी ने शक शब्द से शालिवाहन शक (७८ ईसवी ) को स्वीकार कर ४२७ शक (४२७+७८= ५०५ ईसवी सन् ) की गणना करके देखा तो चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को बुधवार नही मिला , उस दिन मंगलवार था । तब उन्होंने उक्त श्लोकके सौम्य शब्द को भौम शब्द में परिवर्तित कर दिया ,जिसका अर्थ होता है भूमिपुत्र भौम-मङ्गल । और इसी ७८ ईसवी सन् के शालिवाहन शक के ४२७ वर्ष अर्थात् ५०५ ईस्वी को वराहमिहिर का जन्मकाल घोषित कर दिया ,जबकि उक्त श्लोक में न तो यह शालिवाहन शक का उल्लेख है ,न वराहमिहिर के जन्म का । उक्त उल्लेखित शक विक्रमादित्य से पूर्व की है ,जिसके ४२७ वर्ष में अपने ग्रन्थ पञ्चसिद्धान्तिका की रचना की थी ।

मद्रास के प्रसिद्ध गणितवेत्ता श्रीवेङ्कटाचार्यजी ने अपने ग्रन्थ ‘दी एंटी क्यूटी ऑफ हिन्दू एस्ट्रोनॉमी एंड दी तामिल ‘ में ईसवी सन् पूर्वभावी शक ५५० ई.पू. को ही शक शब्द से लेकर गणना करके यह घोषित किया कि ५५० ई. पू. ४२७ वर्ष व्ययकलन करने पर अर्थात् ईसा सन् के प्रारम्भ से १२३ वर्ष पूर्व ३ मार्च बुधवार को चैत्रशुक्ल प्रतिपदा थी । और उस समय यवनपुर में सूर्य का अर्धास्तगमन भी होता था । ५५० ई पू में प्रारम्भ शक से गणना करने पर सभी तिथियों में संगति बैठ जाती है । ५५० ई पू के शककाल में महाराज युधिष्ठिर के २५२६ वर्ष जोड़ने पर ३०७६ ई पूर्व की तिथि निकलती है ,जिसे प्राचीन गणितज्ञों ने सप्तर्षि संवत् और लौकिक संवत् कहा है ,कल्हण की भी इसमें उपपत्ति है । कलि २६ ,तदनुसार ३०७६ ई पू को महाराज युधिष्ठिरका महाप्रयाण हुआ था । वराहमिहिर की मृत्यु की तिथि भी प्राचीन गणितज्ञों ने ५०९ शक तदनुसार ४१ ई पू लिखी है-

‘नवाधिक पञ्चशत संख्याके शके वराहमिहिरो दिवंगत: ।’ (खण्डखाद्य की आमराज टीका ) ।

विक्रमादित्यकी सभाके नवरत्न महाकवि कालिदास ने अपने ग्रन्थ ज्योतिर्विदाभरण में विक्रमादित्यके नवरत्नों में वराहमिहिर को भी गिना है -‘

ख्यातो वराहमिहिरो नृपते: सभायां रत्नानि वै वररुचिर्नव विक्रमस्य ।’

कालिदासने अपने ग्रन्थ ज्योतिर्विदाभरण का रचनाकाल कलि ३०६८ तदनुसार ३४ ई पू में वैशाख मास में लिखा है । अब विचारिये कहाँ कलियुग संवत् ३०३४ ,विक्रम संवत् २४ में वर्तमान वराहमिहिर और कहाँ सन् ५०५ तदनुसार ३६०७ कलियुग में उनका जन्म ?

वरुण पाण्डेय

सिंधु सभ्यता का सच

आज नेट सर्फिंग करते करते प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ फतेसिंह के लिखे ग्रन्थ में पहुँच गया।

वे राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठानम् के निदेशक रहे।जोधपुर और पश्चिम राजस्थान में कार्य करने के फलस्वरूप,संस्कृत व वेद के विद्वान् एवम् तुलनात्मक भाषाविज्ञान पर गहरी समझ के साथ उन्होंने जो सिंधुलिपि को पढ़ने का दावा किया है उस तरफ विद्वानों का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ।

सम्प्रति वे इस लोक में नहीँ है।उनकी पुत्री डॉ श्र्द्धा चौहान भी जयनारायण वि वि से सेवानिवृत हो चुकी है।उनकी पुत्री की पुत्रवधू डॉ किरण राठौड़ अभी राजस्थान संस्कृत अकादमी की निदेशक है।इस परिवार की संस्कृत सेवा तो अनुकरणीय है ही,डॉ फतेसिंह जी हमारे लिए एक महान उपकारी ग्रन्थ छोड़ गए है और उसका अध्ययन भारतीय विद्वानों को अवश्य करना चाहिए विशेषकर उनको जो सिंधु घाटी में रूचि रखते हैं।

सिंधुघाटी सभ्यता की लिपि को सारस्वत लिपि भी कहते हैं।अब तक किसी ने भी इस लिपि को पढ़ा नहीँ है ऐसा दावा किया जाता है। कुछ वामपंथी और पश्चिमी विद्वानों,जिनकी नीयत भी ठीक नहीँ थी,इस विषय की न केवल उपेक्षा की बल्कि निरन्तर इन तथ्यों को विकृत करने का भी प्रयास किया है।
इतिहास में यह सबसे बड़ा धोखा और वंचना सिद्ध होगी यदि उनके कुकृत्य उद्घाटित हो गए और सच्चाई सामने आई तो।
आइये आपको इस जटिल विषय की कुछ बातें बताते हैं।
भारतीय इतिहास में ऋग्वेद के काल निर्धारण को खिसकाकरइस गड़बड़ी की पहली शुरुआत हुई।कोई भी वामपंथी इतिहासकार यह मानने को तैयार ही नहीँ कि ऋग्वेद का प्रणयन इस भारत भूमि पर हुआ।दूसरी बात सभी वामी ऋग्वेद को 1200ई पू से आगे ले जाने को तैयार नहीँ।वे मेक्समूलर की उस उक्ति को लौह लकीर मानकर उस विषय में कुछ सुन्ना ही नहीँ चाहते।

एक प्रकार से उन्होंने कुछ रेखाएं स्वयम खींची और उसके अंदर अंदर ही सबकुछ खोजने के प्रतिबन्ध लगाए।

इसका प्रथम शिकार हुए श्री सुधांशु कुमार राय।उन्होंने 1968 में ही यह सिद्ध कर लिया था कि मोहनजोदड़ो एक विशाल विश्वविद्यालय था। उसके छात्रावास हेतु ही वह स्नानागार था।

उन्होंने सिंधुलिपि को ब्राह्मी का पूर्व संस्करण सिद्ध किया।उसकी भाषा आरम्भिक संस्कृत थी और उसमेंदेवनागरी के समान 48वर्ण थे।

उपेक्षा और वामपंथी आतंक के साए में वह शोध विलुप्त हो गया और आज अनुपलब्ध है।

अनेक इतर विद्वानों ने इस दिशा में बहुत सार्थक प्रयत्न किये किन्तु उपेक्षा और पक्षपात ने उन्हें निराश किया।इनमें एक वी एन कृष्णराव भी थे।

इसके बाद क्रम आता है डॉ फ़तेह सिंह और प्रो नटवर झा का।
इन सभी ने सिंधु मुद्राओं का उद्घाटन किया और सिद्ध किया कि इनकी भाषा संस्कृत ही है और इन पर ऋग्वेद, ब्राह्मण ग्रन्थ, उपनिषद से लेकर महाभारत तक का चित्रण है।
सबसे रोचक और निकटतम शोध डॉ फतेहसिंह जी का है।
यदि उनका प्रतिपादन ठीक है तो हड़प्पा सभ्यता ऋग्वेद के बाद की और उत्तर वैदिक काल की मानी जाएगी।और संहिता काल बहुत पीछे चला जाता है और उनकी भारतीय ज्योतिष से संगति भी बैठती है।

इस दिशा में सबसे बड़ी बाधा उपस्थित की मुम्बई सेंट ज़ेवियर कॉलेज के फादर हेरास ने।

वे इसको पढ़ तो नहीँ सके पर उन्होंने कह दिया कि पशुपति मुद्रा ओर लिंग योनि पूजा के कारण सिंधुघाटी सभ्यता द्रविड़ियन है।
सामान्यतया जो दावा करता हैउसी को सिद्ध करना पड़ता है।पर यहाँ उलटा हुआ।

सभी संस्कृतज्ञो की उपेक्षा इसलिए की गई कि आप मार्क्स मुलर को झुठला रहे हो।

ये वामपंथी संस्कृत की abcd भी नही जानते थे।न इनमें इतनी योग्यता थी कि निगम ओर आगम ग्रन्थों के सम्प्रत्यय समझ पाएं।

इन्हें बस मार्क्स के अनुकूल मसाला और द्वन्द्व के बीज ढूंढने थे।
कल्पना कीजिए कि किसी गाड़ी के मिस्त्री को पुलनिर्माण का चीफ इंजीनियर बना दिया जाए तो क्या होगा?

अस्तु, ब्राह्मणग्रन्थों के उच्च दार्शनिक सूत्र बिना संस्कृत के कोई नहीँ समझ सकता। साथ ही कई लिपियों का ज्ञान, अनेक प्राचीन तुलनात्मक भाषाओं का अध्ययन, वेद और ज्योतिष की जानकारी और वर्षों का अनुभव।साथ ही इसी क्षेत्र के निवासी होने से डॉ फतेहसिंह की प्रामाणिकता बढ़ जाती है।

काल निर्णय 5
पूर्वकथित 4 भूमिकाओ के बाद अनेक विज्ञान और इतिहास के शोधों के आधार पर भारत के प्राचीन इतिहास का पुनर्विमर्श करते हैं।

वर्ष1994 में प्रकाशित navratan s.rajaram and david frawley के शोध “vedic aryans and the origins of civilization” इन दोनों महानुभावों के संयुक्त प्रयत्न का महाफल था।

श्री नवरत्न एस राजाराम महोदय बीस वर्ष तक अमरीका के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में गणित और कम्पूटर के प्राध्यापक और संशोधक रहे। विश्वविख्यात नासा संस्थान के लाकहीड तंत्र ज्ञान शाखा के परामर्शक रहे। उनका यह ग्रन्थ बाद में voice of india 1997 के नाम से पुनः छपा।उनका सारांश:-

1 आधुनिक इतिहास में कथित आर्य आक्रमण जैसी घटना कभी हुई ही नहीं। वैदिक सभ्यता भारत में ही विकसित हुई।

2 ऋग्वेद में वर्णित समुद्र आधारित सभ्यता और यान तथा विविध भौगोलिक वर्णन भारत के3500ई पू अर्थात आज से 5500वर्ष पहले की स्थिति दर्शाते हैं।वर्तमान में ये स्पष्ट हो चूका है कि ये हड़प्पा से भी पूर्व स्थापित शासन के प्रमाण हैं।

3 ऋग्वेद काल प्राय 3750 ई पू में समाप्त होता है। और यही वो समय था जब महाभारत के वेदव्यास जी द्वारा चारों संहिताओ के अलग अलग विभाजन की परम्परागत धारणा की संगति से मेल भी खाता है।

4 हडप्पा या सिन्धुघाटी संस्कृति का समय 3100 ई पू से 1900 ई पू जो कि उस सभ्यता का अंतिम चरण था। न कि आरम्भ। यही वो समय है जब वेद काल की समाप्ति और सूत्र साहित्य काल का वर्तमान था। इस अवधि में विश्व की मेसोपोटामिया, सुमेरियन, अक्केदिय्न्न साम्राज्य, ईजिप्ट राज्य का प्रभुत्व काल था।

5 वेद युग के अंतिम चरण में हडप्पा सभ्यता के विनाश का कारण 2200ई पू से 1900 ई पू के मध्य लगभग 300वर्ष तक पर्यावरण में आए बदलाव और अनावृष्टि थी। इस विश्व व्यापी लम्बे सूखे के कारण ही समकालीन अन्य सभ्यताएं भी नष्ट हो गई। न कि किसी आक्रमण के कारण।क्यों कि 5लाख वर्ग किलोमीटर लम्बी भूमि पर फैली सिन्धु सभ्यता किसी भी आक्रमण से नष्ट होने की बात असम्भव है।

सिन्धु सभ्यता के नाश का कारण पर्यावरण बदलाव ही है। यह कोई अम्रीका का इतिहास तो है नहीं जिसकी आयु मात्र कुछ सौ वर्ष है जिसमें पर्यावरणीय बदलाव दिखाई नहीं देते।

यह भारत के हजारों वर्ष पुराना इतिहास का मामला है और उस समय के बदलाव से इसे जोडकर ही देखा जा सकता है।
हडप्पा सभ्यता के विनाश के इन पर्यवार्नीय कारणों का समर्थन आधुनिक यूरोपीय पुरातत्त्ववेत्ता भी करते है। आधुनिक वैज्ञानिक शोध भी इसे ही प्रमाणित करते हैं।

कुल मिलाकर वेद कालीन भारत और ईजिप्ट की सभ्यता लगभग 10000वर्ष पहले अर्थात अंतिम पाषाण युग की समाप्ति के समय ही अस्तित्त्व में आ गई थी। इसके स्पष्ट प्रमाण हैं और यह सीमा और आगे भी जा सकती है।
(बस यह मत सोचना कि बाइबल की 4004 वर्ष ई पू वाली कहानी का क्या होगा।)
कृपया इस सारणी को कही लिख लें।
अंतिम हिम युग की समाप्ति=8000ई पू।
(यह वशिष्ठ विश्वामित्र काल था। इसे ऋग्वेद मंडल संकलन काल भी कह सकते हैं।)

दासराज युद्ध काल=3750 ई पू।
(ऋग्वेद युग का अंत। ऋग्वेद की सप्तम तृतीय मंडल रचना!)

रजत के उपयोग का काल,कुणाल=3500ई पू से भी पहले।
(वेद के अंतिम भाग ब्राह्मण ग्रन्थों के संकलन का काल!)

सरस्वती सभ्यता = 3200ई पू से भी पहले।
(समृद्ध सरस्वती नदी प्रवाह के स्पष्ट प्रमाण)

हडप्पा काल2200ई पू से 2000ई पू।
(सूत्र ग्रन्थ रचना काल-शुल्ब सूत्रों की ज्यामिति ही हरप्पा में प्राप्त होती हैं।)

सरस्वती नदी का अंत=2200ई पू से 2000ई पू तक।
(क्रमश सरस्वती नदी पूरी तरह से सूख गई।)

व्यापक अनावृष्टि=2200ई पू से 1900ई पू तक।
(यह विश्व व्यापी परिवर्तन था जिसके कारण विश्व क़ी सभी सभ्यताएं नष्ट हो गई।)
इस समय सिन्धु और सरस्वती क्षेत्रों के निवासी गंगा यमुना क्षेत्रो में बस गए और राजनीती के केंद्र भी बदल गए।
मित्रों!!
इस लेख को गम्भीरता से लेने के लिए धन्यवाद।
आने वाले समय में हम क्रमश इन तथ्यों के प्रमाणों पर विचार करेंगे। और वामपंथी कचरे की भी समीक्षा करेंगे। आरम्भ में दिए गए विवरणों को internet पर खोज कर कोई भी छान बीन कर सकता है। ऐसा करना ही चाहिए।
बात को पूरी तरह समझने के लिए थोडा और इंतजार करना पड़ेगा।

केसरी सिंह सूर्यवंशी