श्री राम तांडव स्तोत्र

राम तांडव स्तोत्र संस्कृत के राम कथानक पर आधारित महाकाव्य श्रीराघवेंद्रचरितम् से उद्धृत है। इसमें प्रमाणिका छंद के बारह श्लोकों में राम रावण युद्ध एवं इंद्रआदि देवताओं के द्वारा की गई श्रीराम स्तुति का वर्णन है। इस स्तोत्र की शैली और भाव वीर रस एवं युद्ध की विभीषिका से भरे हुए हैं।
कहा जाता है कि इतिहास में युगों युगों तक सबसे भीषण युध्द भगवान श्री राम और रावण का ही हुआ था।
ताण्डव का एक अर्थ उद्धत उग्र संहारात्मक क्रिया भी है।रामायण के अनुसार राम रावण युद्ध के समान घोर तथा उग्र युद्ध कोई नहीं है।

इसीलिये यह भी कहा जाता है
रामरावणयोर्युद्धं रामरावणयोरिव
(राम रावण के युद्ध की तुलना सिर्फ राम- रावण युद्ध से ही हो सकती है)

श्रीराम तांडव स्तोत्रम्

इंद्रादयो उवाच:
जटाकटाहयुक्तमुण्डप्रान्तविस्तृतम् हरे:
अपांगक्रुद्धदर्शनोपहार चूर्णकुन्तलः।
प्रचण्डवेगकारणेन पिंजलः प्रतिग्रहः
स क्रुद्धतांडवस्वरूपधृक् विराजते हरि: ॥१॥
अथेह व्यूहपार्ष्णिप्राग्वरूथिनी निषंगिनः
तथांजनेयऋक्षभूपसौरबालिनन्दना:।
प्रचण्डदानवानलं समुद्रतुल्यनाशका:
नमोऽस्तुते सुरारिचक्रभक्षकाय मृत्यवे ॥२॥
कलेवरे कषायवासहस्तकार्मुकं हरे:
उपासनोपसंगमार्थधृग्विशाखमंडलम्।
हृदि स्मरन् दशाकृते: कुचक्रचौर्यपातकम्
विदार्यते प्रचण्डतांडवाकृतिः स राघवः ॥३॥
प्रकाण्डकाण्डकाण्डकर्मदेहछिद्रकारणम्
कुकूटकूटकूटकौणपात्मजाभिमर्दनम्।
तथागुणंगुणंगुणंगुणंगुणेन दर्शयन्
कृपीटकेशलंघ्यमीशमेक राघवं भजे ॥४॥
सवानरान्वितः तथाप्लुतम् शरीरमसृजा
विरोधिमेदसाग्रमांसगुल्मकालखंडनैः।
महासिपाशशक्तिदण्डधारकै: निशाचरै:
परिप्लुतं कृतं शवैश्च येन भूमिमंडलम् ॥५॥
विशालदंष्ट्रकुम्भकर्णमेघरावकारकै:
तथाहिरावणाद्यकम्पनातिकायजित्वरै:।
सुरक्षिताम् मनोरमाम् सुवर्णलंकनागरीम्
निजास्त्रसंकुलैरभेद्यकोटमर्दनम् कृतः ॥६॥
प्रबुद्धबुद्धयोगिभिः महर्षिसिद्धचारणै:
विदेहजाप्रियः सदानुतो स्तुतो च स्वस्तिभिः।
पुलस्त्यनंदनात्मजस्य मुण्डरुण्डछेदनम्
सुरारियूथभेदनं विलोकयामि साम्प्रतम् ॥७॥
करालकालरूपिणं महोग्रचापधारिणम्
कुमोहग्रस्तमर्कटाच्छभल्लत्राणकारणम्।
विभीषणादिभिः सदाभिषेणनेऽभिचिन्तकम्
भजामि जित्वरम् तथोर्मिलापते: प्रियाग्रजम् ॥८॥
इतस्ततः मुहुर्मुहु: परिभ्रमन्ति कौन्तिकाः
अनुप्लवप्रवाहप्रासिकाश्च वैजयंतिका:।
मृधे प्रभाकरस्य वंशकीर्तिनोऽपदानतां
अभिक्रमेण राघवस्य तांडवाकृते: गताः ॥९॥
निराकृतिं निरामयं तथादिसृष्टिकारणम्
महोज्ज्वलं अजं विभुं पुराणपूरुषं हरिम्।
निरंकुशं निजात्मभक्तजन्ममृत्युनाशकम्
अधर्ममार्गघातकम् कपीशव्यूहनायकम् ॥१०॥
करालपालिचक्रशूलतीक्ष्णभिंदिपालकै:
कुठारसर्वलासिधेनुकेलिशल्यमुद्गरै:।
सुपुष्करेण पुष्करांच पुष्करास्त्रमारणै:
सदाप्लुतं निशाचरै: सुपुष्करंच पुष्करम् ॥११॥
प्रपन्नभक्तरक्षकम् वसुन्धरात्मजाप्रियम्
कपीशवृंदसेवितं समस्तदूषणापहम्।
सुरासुराभिवंदितं निशाचरान्तकम् विभुं
जगद्प्रशस्तिकारणम् भजेह राममीश्वरम् ॥१२॥

इति श्रीराघवेंद्रचरिते इन्द्रादि देवगणै: कृतं श्रीराम तांडव स्तोत्रम् सम्पूर्णम्।।

चपातियां बहुत जल्द ही विलुप्त होने वाले है

एक बहुत ही प्रसिद्ध हृदय-चिकित्सक समझाते है के,

गेहूं खाना बंद करने से आपकी सेहत को कितना अधिक लाभ हो सकता है।

हृदय-चिकित्सक Dr. विलियम डेविस, MD ने अपने पेशे की शुरुवात, हृदय रोग के उपचार के लिए ‘अंजीओ प्लास्टी’ और ‘बाईपास सर्जरी’ से किया था।

वे बताते है के, “मुझे वो ही सब सिखाया गया था, और शुरू शुरू में तो, मैं भी वोही सब करना चाहता था।”

लेकिन, जब उनकी अपनी माताजी का निधन साल 1995 में दिल का दौरा पड़ने से हुआ , जो उन्हें बहतरीन इलाज उपलब्ध कराने के बावाजूद हुआ, तब उनके मन में अपने ही पेशे को लेकर चिंता और परेशान कर देने वाले प्रश्न उठने लगे।

वे कहते है के,

मैं रोगीयों के हृदय का इलाज कर तो देता था, लेकिन वे कुछ ही दिनों में उसी समस्या को लेकर मेरे पास फिर लौट आते थे।

वो इलाज तो मात्र ‘बैंड-ऐड’ लगाकर छोड़ देने के समान था, जिसमें बीमारी का मूल कारण पकड़ने का तो प्रयास भी नहीं किया जाता था।”

इसलिए उन्होंने अपने अभ्यास को एक उच्च स्तर और क्वचित ही उपयोग में लाये हुए दिशा की ओर मोड़ा- जो था

बीमारी को होने ही नही देना’

फिर उन्होंने अपने जीवन के अगले 15 सालों को इस हृदय रोग के मूल कारणों को जानने, समझने में व्यतीत किया।

जिसके परिणाम स्वरूप जो आविष्कार हुए, वो उन्होंने ‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ के सबसे अधिक बिकने वाली किताब “Wheat Belly“(गेहूं की तोंद) में प्रकाशित किया है।

जिसमें हमारे बहुत से रोग, जैसे के हृदय रोग, डायबिटीज और मोटापे का संबंध गेहूं के सेवन करने के कारण बताया गया है।

गेहूं का सेवन बंद कर देना हमारे सम्पूर्ण जीवन को ही बदल सकता है।

“Wheat Belly”(गेहूं की तोंद) क्या है?

गेहूं के सेवन करने से, शरीर में चीनी की मात्रा आश्चर्यजनक पूर्वक बढ़ जाती है।

सिर्फ दो गेहूं की बनी ब्रेड स्लाइस खाने मात्र से ही हमारे शरीर में चीनी की मात्रा इतनी अधिक बढ़ जाती है जितना तो एक स्नीकर्स बार(चॉकलेट, चीनी और मूंगफली से बनी) खाने से भी नहीं होता।

उन्होंने आगे बताया कि,

जब मेरे पास आने वाले रोगियों ने गेहूं का सेवन रोक दिया था, तो उनका वजन भी काफी घटने लगा था, खास तौर पर उनकी कमर की चरबी घटने लगी थी। एक ही महीने के अंदर अंदर उनके कमर के कई इंच कम हो गए थे।

“गेहूं का हमारे कई सारे रोगों से संबंध है ऐसा जानने में आया है। मेरे पास आने वाले कई रोगियों को डायबिटीज की समस्या थी या वे डायबिटीज के करीब थे।

मैं जान गया था के गेहूं शरीर में चीनी की मात्रा को बढ़ा देता है, जो किसी भी अन्य पदार्थ के मुकाबले अधिक था, इसलिए, मैंने कहा कि,
“गेहूँ का सेवन बंद करके देखते है, के इसका असर शरीर में चीनी की मात्रा पे किस तरह होता है”

3 से 6 महीनों से अंदर अंदर ही उन सब के शरीर में से चीनी की मात्रा बहुत कम हो गई थी।

इसके साथ साथ वे मुझसे आकर यह भी कहते थे, के मेरा वजन 19 किलो घट गया है,
या
मेरी अस्थमा की समस्या से मुझे निवारण मिल गया, या
मैंने अपने दो इन्हेलर्स फेंक दिए है,
या 20 सालों से जो मुझे माइग्रेन का सिरदर्द होता रहा है, वो मात्र 3 दिनों के अंदर ही बिल्कुल बंद हो गया है,
या मेरे पेट में जो एसिड रिफ्लक्स की समस्या थी वो बंद हो गई है,
या मेरा IBS अब पहले से बेहतर हो गया है, या
मेरा उलसरेटिव कोलाइटिस,
मेरा रहेउमाटोइड आर्थराइटिस,
मेरा मूड, मेरी नींद… इत्यादि इत्यादि।

गेहूं की बनावट को देखा जाए तो इसमें,

1)अमलोपेक्टिन A, एक रसायन जो सिर्फ गेहूं में ही पाया जाता है, जो खून में LDL के कणों को काफी मात्रा में जगा देता है, जो ह्रदय रोग का सबसे मुख्य कारण पाया गया है।

गेहूं का सेवन बन्द कर देने से LDL कणों की मात्रा 80 से 90 % तक घट जाती है।

2) गेहूं में बहुत अधिक मात्रा में ग्लैडिन भी पाया जाता है, यह एक प्रोटीन है जो भूक बढ़ाने का काम करती है, इस कारण से गेहूं का सेवन करने वाला व्यक्ति एक दिन में अपनी ज़रूरत से ज़्यादा, कम से कम 400 कैलोरी अधिक सेवन कर जाता है।

ग्लैडिन में ओपीएट के जैसे गुण भी पाए गए है जिसके कारण इसका सेवन करने वाले को इसकी लत लग जाती है, नशे की तरह।

खाद्य वैज्ञानिक इस बात को 20 सालों से जानते थे।

3) क्या गेंहू का सेवन बंद कर देने से हम ग्लूटेन मुक्त हो जाते है?

ग्लूटेन तो गेहूं का सिर्फ एक भाग है। ग्लूटेन को निकाल कर भी गेंहू को देखे, तो वो फिर भी घातक ही कहलायेगा क्योंकि इसमें ग्लैडिन, अमलोपेक्टिन A के साथ साथ और भी अनेक घातक पदार्थ पाए गए है।

ग्लूटेन मुक्त पदार्थ बनाने के लिए,
मकई की मांडी,
चावल की मांडी,
टैपिओका की मांडी ओर
आलू की मांडी का उपयोग किया जाता है।

और इन चारों का जो पाउडर है, वो तो शरीर में चीनी की मात्रा को और भी अधिक बढ़ा जाते है।

मैं आप लोगों से आग्रह करता हुँ के
सच्चा आहार लेना आरंभ करें:
कच्चा आहार लेना आरम्भ करे ।

जैसे के फल,
सब्जियां,
दाने, बीज,
घर का बना पनीर, इत्यादि।

साल 1970 और 1980 के अंतर्गत, गेहूं के उपज जो बढ़ाने के लिए जिन आधुनिक विधियों को और यंत्रों को उपयोग में लाया गया था, उनसे गेंहू अंदर से बिल्कुल बदल गया है।

गेहूं की उपज छोटी और मोटी होने लगी, जिसमें ग्लैडिन(भूक बढ़ाने वाली पदार्थ) की मात्रा भी बहुत अधिक हो गई है।

50 वर्ष पूर्व जो गेहूं सेवन में लिया जाता था वो अब वैसा नही रहा।

ब्रेड, पास्ता, चपाती इत्यादि का सेवन बंद करके यदि सच्चे आहार का सेवन करना शुरू कर दिया जाए,
जैसे के चावल, फल और सब्जियां है तो भी वजन घटाने में मदद ही होगी क्योंकि चावल चीनी की मात्रा को इतना नही बढ़ता है जितना गेहूं बढ़ाता है

और चावल में अमलोपेक्टिन A और ग्लैडिन (जो भूक बढ़ता है )भी नही पाया जाता है।

चावल खाने से आप ज़रूरत से अधिक कैलोरीस का सेवन भी नहीं करेंगे, जैसे गेंहू में होता है।

इसीलिए तो वो सारे पश्चिमी देश जहाँ गेहूं का सेवन नहीं किया जाता वे ज़्यादा पतले और तंदुस्र्स्त होते है।

‘न्यू यॉर्क टाइम्स’ के सबसे अधिक बिकने वाली किताब “Wheat Belly”(गेहूं की तोंद) में से लिया गया अंश
लेखक: प्रसिद्ध हृदय-चिकित्सक Dr. विलियम डेविस, MD
पहले जौ,मक्का, बाजरा का सेवन किया जाता था मैंने स्वयं बात किया हूं पूछा हूं तो कुछ ने बताया है यहां तक की 30-40 वर्ष पूर्व तक।
और लाल गेहूँ उपयोग किया जाता था।
मेरी माँ स्वयं कहती है।
लाल गेहूँ, काला गेहूँ आज भी मिलता है देशी बीज बचाओ षडयंत्र से बचो।

मणि मोती

 

यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा |
तद्वद्वेदाङ्गशास्त्राणां ज्योतिषं मूर्ध्नि संस्थितम् ||

शैले शैले न माणिक्यं मौक्तिकं न गजे गजे |  साधवो न
हि सर्वत्र चन्दनं न वने वने ||

साहित्य में मणि मुक्ता की उपमा और इनका वर्णन प्रचुरता में उपलब्ध है । नाग मणि का भी उल्लेख आता है ।

यह नाग मणि क्या है?
इस पर मुझे गज और नाग का साम्य ही एकमात्र समाधान सूझता है । आप सब विद्वानों की राय अपेक्षित है , कृपया अपनी अमूल्य राय अवश्य प्रदान करें ।

शोणरत्नं लोहितकः पम्द्मरागो ऽथ मौक्तिकम् ।।
मुक्ताथ विद्रुमः पुंसि प्रबालं पुं-नपुंसकम् ।।
रत्नं मणिर् द्वयोर् अश्मजातौ मुक्तादिके ऽपि च ।। (अमरकोश )

गज मुक्ता { बृहत्संहिता के अनुसार }
पुष्य या श्रवण नक्षत्र में, रविवार या सोमवार के
दिन, सूर्य के उत्तरायण में, सूर्य या चंद्रमा के
ग्रहण के दिन, ऎरावत कुल में उत्पन्न जिन
हाथियों का जन्म होता है उनके दाँतों में बड़े -बड़े और
अनेक प्रकार के चमकीले मोती निकलते हैं। इनमें
छिद्र नहीं किए जाते। वराह मिहिर कहते हैं कि इन
मोतियों को धारण करने से पुत्र, आरोग्य और विजय
की प्राप्ति होती है।

नाग (सर्प) मणि

वराह मिहिर ने सर्प मणि को लेकर एक श्लोक
लिखा है-

भ्रमरशिखिकण्ठवर्णो दीपशिखासप्रभो भुजङ्गानाम्।
भवति मणि: किल मूर्धनि योऽनर्घ्येय: स विज्ञेय:।।
(वराहमिहिर) ।

भ्रमर या मयूर के कण्ठ के समान वर्ण वाली,
दीपशिखा के समान कांति वाली अमूल्य मणि सर्पो के
सिर पर होती है। सर्प
मुक्ता को मणि की संज्ञा दी गई है।
मणियों को सामान्य रत्नों से भी ज्यादा शुभ और
अमूल्य माना गया है। जो राजा या महान्
व्यक्ति मणि धारण करते हैं उनको विष संबंधी दोष
रोग नहीं होते हैं और सदा विजयी होते हैं।

“किल” का प्रयोग Kill की भाँति समझना क्या भूल होगी ।
किल का प्रयोग सम्भवत: तभी करते हैं , जब वक्ता या ग्रन्थकार स्वयं ही आश्वस्त नहीं होते हैं?
संस्कृत भाषा में नाग और गज पर्यायवाची भी हैं ।
सर्प मणि किसी ने देखी भी नहीं है .
हाथी से मुक्ता मिलने की बात सच है । यह सुन्दर नहीं होता है ।

अब एक विशेष तथ्य पर आप सबका ध्यानाकर्षित करूँगा … ( निरुक्त २.२.११ ) स्यमंतक मणि से संबंधित कथा का निर्देश यास्क के निरुक्त में प्राप्त है, जहाँ अक्रूर मणि धारण
करता है (अक्रूरो ददते मणिम्), इस वाक्य प्रयोग का निर्देश Present tense वर्तमान काल , में दिया गया है [ नि. २.२ .११ ] । इस निर्देश से स्यमंतक मणि के संबंधित
कथा की प्राचीनता एवं ऐतिहासिकता स्पष्टरूप से प्रतिपादित होती है । साथ ही यह भी सुनिश्चित होता है कि यास्क अक्रूर के समकालिक थे अर्थात् महाभारत के काल में यास्काचार्य का होना सिद्ध होता है ।

|| जयतु भारतम् ||

 

आम शब्दों के मूल

जब पत्तों की पाजेब बजी…….तुम याद आये … ।
पाज़ेब शब्द , आप कहेंगे ये तो फारसी का शब्द है !
फारस या कहें पारस देश में भी इसे पाज़ेब कहते होंगे , और यहाँ भी यही कहा जाता था .
भारत को वर्तमान राजनैतिक सीमाओं की परिधि में सोचना ही वह कारण है , जो अनेक देशज शब्दों को विदेशी बता डालता है ।
एक शब्द और ध्यान में आ रहा है ‘पाजामा‘.
एक उपनिषद् है जिसे बृहदारण्यक उपनिषद् की सञ्ज्ञा दी गई है , इसका कारण बृहत् स्वरूप और बृहत् अर्थ होना है ।
इस उपनिषद् १.१ में “पृथिवी पाजस्यं” >> पृथिवी पाजस्य>पादस्य यानी पैर रखने का स्थान है ।
पाणिनि ने लोक में प्रयुक्त बोलियों के विविध प्रकारों को दर्शाने के लिये व्याकरण के सूत्र दिये थे ।
सूत्र ‘व्यत्ययो बहुलम्’ ३.१.८५ > पादस्य के ‘द’ वर्ण का जकार के रूप में व्यत्यय होने से ‘पाजस्य’ हुआ .
पाद>चरण>पैर इसके लिये संस्कृत शब्द हुआ “पाज”
पाज से सम्बन्धित होने से नूपुर>पायल>पाजेब है ।
पाज को ढकने के लिये ‘पाजामा’ है । या जो जामा पैरो पर पहना जाये वह पाजामा !
किसी जड़ बुद्धि के लिये लोग एक वाक्य कहते देखे गये हैं , कि “तुम आदमी हो या पाजामा ” ! पता नहीं कैसे यह प्रचलित हुआ .

इस रेशमी पाजेब की झनकार के सदके ” बड़ा प्रसिद्ध और भावपूर्ण गीत है

द्विपदी : पाजामा

पाजामा जैसा पहनावा हमारे यहां उस काल से प्रचलन में था जबकि शिकार की पानीयजा जैसी तकनीक थी। इसमें नकली पानी के गर्त तैयार किये जाते और लुभाने वाले मृगों के बहाने जंगली  हिरणों को फुसलाया जाता।

लगभग एक हज़ार वर्ष पहले सोमेश्वर ने इस मृगया का जो वर्णन किया है, उसमें लुब्धकों, शिकारियों के लिए नीले रंग की छत वाले हरे कपड़ों के शिविर (तंबू) लगाने की विधि है। उसी में तत्कालीन परम्परा और शिकार की सुविधा के लिए जंगल के हरे रंग के अनुसार हरे पाजामे पहनने का निर्देश है। दोनों पांवों में पहनने के कारण इसे द्विपदी कहा जाता।

यह बहुत रोचक सन्दर्भ है और इस अर्थ में खास है कि शिकार के लिए ऐसी वेशभूषा तब से लेकर प्रतिबन्ध लगने तक प्रचलन में रही। वन में झाड़-झंखाड़ में धोती जैसे वस्त्रों के उलझकर फट जाने की समस्या के कारण द्विपदी को सुगम, निरापद माना गया।

यह तब बहुत लोकप्रिय परिधान था क्योंकि विवरण कहता है कि मित्रों, स्त्रियों के साथ की गोठ-गोष्टियों में भी द्विपदी को धारण किया जाता। साथ में भट, सुभट, तांबूल धारक, नालीदार जल पात्र के धारक भी होते। मतलब यह है कि द्विपदी जो प्रायः मोटे कपड़े का बनता, डोरी से ही कसकर बांधा जाता और जरूरत के मुताबिक एक से अधिक साथ में रखा जाता। औरतें भी इनको धारण करतीं बिलकुल आज की ही तरह। पुराने मंदिरों की मूर्तियां किस परिधान को बताती हैं? क्या वहां आगरा का घाघरा है?

यह तो हुआ नीति ग्रन्थ का संदर्भ, आदरणीय अत्रि जी ने तो बृहद आरण्यक उपनिषद के सन्दर्भ ( 1.1) पर पाणिनि सूत्र की रोशनी डालते हुए पाजामा की कालयात्रा और भी पीछे दिखाई है। बहरहाल, यह विचित्र किंतु सच है कि खास मौकों पर पाजामा प्रचलन में था, वरना धोती तो है जो है ही।

अदब का मूल वेद मन्त्र में है संस्कृत सब भाषाओं की जननी है !
हमें माता-पिता-गुरु से ==>अदब<== से बात करना चाहिए।
.
क्या ये =>अदब<= शब्द वेद का है ???
जी हाँ !!!
सूक्ष्मता से देखने पर पता चलता है की अदब वेद का ही शब्द है अर्थात् वेद से ही इसकी उत्पत्ति हुई है |
.
उर्दू भाषा के अनुसार अदब का अर्थ है => शिष्टता, सभ्यता, तमीज़, आदर, सत्कार, भद्रता, सम्मान, इज्जत, ख्याल, बडा मानना
.
सच्चाई यह है की अदब शब्द अ+दब से बना है
अदब की सन्धि-विच्छेद से पता चलता है की इसका अर्थ है :-
जिसे दबाया न जा सके/दबाया न जाये
अर्थात्
जिसका अपमान न किया जाये, आदर/सम्मान दिया जाये, शिष्टता/सभ्यता/भद्रता से बात की जाये, क्यों की किसी का अपमान करना ही हिन्सा है, शारीरिक नहीं वाणी की हिन्सा, वाचिक हिन्सा सबसे प्रधान होती है
.
आ नो॑ भ॒द्राः क्रत॑वो यन्तु वि॒श्वतोऽद॑ब्धासो॒ अप॑रीतासऽ उ॒द्भिदः॑ ।
दे॒वा नो॒ यथा॒ सद॒मिद्वृ॒धेऽअस॒न्नप्रा॑युवो रक्षि॒तारो॑ दि॒वेदि॑वे ॥
(यजुर्वेद 25/14, ऋग्वेद 1/89/1)
.
.
“अदब्धास:” = अहिन्सनीया: (अहिन्सक) – महर्षि दयानन्द ऋग्वेद भाष्य 1/89/1
.
“अदब्धास:” = अहिन्सिता: (जो विनाश को न प्राप्त हुए ) – महर्षि दयानन्द कृत यजुर्वेद 25/14 भाष्य
.
“अदब्धास:” = छलरहित, बेचूक, हिन्साशून्य, निर्विघ्न, किसी से न दबने वाला, अविकलांग (पण्डित मदनमोहन जी विद्यासागर कृत संस्कार समुच्चय में दिए अर्थ अनुसार)
.
अब आप स्वयं विचार कीजिये और बताइये !!!!
क्या अदब शब्द उर्दू का है ???
क्या अदब शब्द का मूल वेद में नहीं है ??
आगे से जब भी इस वेद मन्त्र का पाठ करें तब कम-से-कम इस पद का अर्थ चिन्तन ध्यान में रखें प्रार्थना करें कि “सब ओर से हमारे भद्र कर्म विचार आवें और वह विचार/कर्म भी अहिन्सनीय हों |”
एक बात विशेष ध्यातव्य है  कि प्रायः लोग इस मन्त्र में आये “अदब्धासो” पद का उच्चारण “दब्धासो” करते हैं | कृपया अपनी स्वयं परीक्षा कीजिए और अपने उच्चारण को भी सुधारिये |

पुराण
पुरा नवं भवति
नैरुक्त यास्क के अनुसार पुराना नया होता है वह पुराण है ।
किन्तु पुराना तो पुराना ही रहेगा , नया क्या होगा ?
जैसे गीता , रामायण पुरानी हैं, नित्य पढ़ने से नित नूतन अर्थबोध की प्राप्ति होना ही इनका नया हो जाना है । आचार्य शंकर ने पुराणों को स्मृति कहा है । स्मृतियाँ स्मरण आने से ताजा होती रहती हैं ।
“उसने जो छू लिया तो हाय, लगे कि नई हूँ मैं” नायिका गीत गा रही है, नायिका कहती है कि वह है तो पुरानी लेकिन जब नायक ने उसे स्पर्श किया तो उसे एकदम युवा हो जाने का अनुभव हो रहा है । ऐसा भी पुराने का नया हो जाना होता है ।
‘नवो नवो भवति ‘ – ऋक् १०.८५.१९
‘पुराणेन नवं’ का.सं. १९.१३
“नवो नवो भवति हि जायमानः पुनः पुनः ” -वायुपुराण पूर्वार्द्ध २७.४८
लोक के अनहद नाद का यही मूल स्रोत है।
भारतीय ज्ञानपरम्परा शिवप्रोक्त है, शिवजी सती और उमा पार्वती से ही सारा ज्ञान कहते रहे। सती और पार्वती अभिन्न हैं, ये ही जगदम्बा हैं ।
व्याकरण ज्ञाता पाणिनि को दाक्षीपुत्र कहा गया। शिशु की प्रथम गुरु उसकी माँ होती है।
दाक्षी>दक्ष की पुत्री>सती>शिवजी की अर्द्धाङ्गिनी
दाक्षी च दाक्षायणश्च दाक्षी
दक्षस्य अपत्यं स्त्री- दाक्षायणी
भाषा ज्ञान माँ से ही होता है, पाणिनि की माता दाक्षी>भाषा है।
भगवान् शंकर के डमरु से निकले शैवसूत्रों में ‘ण’ वर्ण १८वें क्रम पर है , ‘पुराण’ में पुरा और ण का समास है । पुराने १८ ग्रन्थों को ही पुराण नाम से जाना जाता है ।
गीता २.२० में आये ‘पुराण’ को भी समझना चाहिए। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणः ।

पोथी, पुुंथी, चौपड़ी, पुस्‍तक, ग्रन्‍थ

उन सभी को नमन और प्रणाम जिन्‍होंने पुस्‍तक के महत्‍व को बरकरार रखा है, जिनके घरों को दीवारें नहीं, पुस्‍तकें शोभायमान करती है और जिनके हाथों को पुस्‍तक रत्‍न की तरह आभरणमय करती हैं।
बधाई कि पुस्‍तकों के प्रति आदर अब भी हमारे कहीं न कहीं बना हुआ है। पुस्‍तक कहीं पोथी, कहीं पुंथी, कहीं चौपड़ी तो कहीं ग्रन्‍थम् नाम से जानी जाती है। नई पीढ़ी बुक कहती है…। सब शब्‍दों की अपनी अपनी परिभाषाएं हैं। असुर बेनीपाल ने तो पूरा पुस्‍तकालय ही बनवाकर दुनिया को एक परम्‍परा दे दी थी।

क्‍या ये मालूम है कि पुस्‍तक भारतीय शब्‍द नहीं है, जबकि यह हमें संस्‍कृत का शब्‍द लगता है। संस्कृत वालों ने तो वीणा च पुस्तकं कह कर इसे सरस्वती का करचिह्न भी बताया है। हमारे यहां पुस्‍तक शब्‍द बहुत काल से व्‍यवहार में आ रहा है। पुस्‍तक लेखन, पुस्‍तक दान के महत्‍व कई पुराणों में आया है। अग्निपुराण और उससे पूर्व शिवधर्मोत्तर पुराण में तो पुस्‍तक की यात्राएं आयोजित करने का भी वर्णन मिलता है। उसका पूरा विधान भी लिखा गया है कि नन्‍दी नागरी अक्षरों में लिखी गई पुस्‍तक को सिंहासन पर विराजित कर नगर में उसकी परिक्रमा करवाई जाए..।

नारदपुराण में विविध पुस्‍तकों को लिखवार दान करने के कई पुण्‍य फलों को लिखा गया है। वैसे यह प्रसंग लगभग प्रत्‍येक पुराण के अन्‍त में मिल ही जाता है।… तो पुस्‍तक शब्‍द अरब के रास्‍ते भारत में आया। पुस्‍त माने हाथ। हाथ में रखने के कारण यह पुस्‍तक है। इस स्‍वरूप ने मूर्तिकारों को बहुत प्रभावित किया और पुस्‍तक जो रेयल पर रखकर पढी जाती थी, वह हाथों की शोभा होकर ब्रह्मा, सरस्‍वती आदि की मूर्तियों के करकमल में आयुध-स्‍वरूप स्‍थान पा गई। यह शब्‍द पांचवीं सदी तक तो व्‍यवहार में आ ही चुका था क्‍योंकि बाद में हर्ष के दरबारी बाण ने इसे प्रयुक्‍त किया है।

हमारे यहां तो ग्रंथ कहा जाता था। ग्रंथ से आशय जिसको ग्रंथित या गांठ लगाकर रखा जाए। पुरानी जितनी पोथियां हैं, उन सबमें कागज अलग-अलग होते थे और उनको क्रम लगाते हुए क्रमश: रखा जाता। उनके ऊपर और नीचे लकड़ी के पट्टियों को कागज के ही आकार में जमाया जाता था। उसको लाल, पीले कपड़े या खलीते में बांधकर डोरी की गांठ लगा दी जाती थी। गांठ के कारण ही ये पोथियां ग्रंथ कही जाती… दुनियाभर के प्राचीन पुस्‍तकालयों में पांडुलिपियां इसी सूरत में मिलती हैं। ग्रंथ शब्‍द आज भी व्‍यवहार में है और बहुत सम्‍मान का स्‍थान रखता है। हर किताब को ग्रंथ नहीं कहा जाता क्‍यों…।