श्रीमद्भागवत – चौथा स्कंध – बीसवाँ अध्याय Shrimad Bhagwat – Canto Four – Chapter Twenty

श्रीमद्भागवत महापुराण: चतुर्थ स्कन्ध: विंश अध्यायः

श्लोक 1-38

महाराज पृथु की यज्ञशाला में श्रीविष्णु भगवान् का प्रादुर्भाव

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! महाराज पृथु के निन्यानबे यज्ञों से यज्ञभोक्ता यज्ञेश्वर भगवान् विष्णु को भी बड़ा सन्तोष हुआ। उन्होंने इन्द्र के सहित वहाँ उपस्थित होकर उनसे कहा। श्रीभगवान् ने कहा- राजन! (इन्द्र ने) तुम्हारे सौ अश्वमेध पूरे करने के संकल्प में विघ्न डाला है। अब ये तुमसे क्षमा चाहते हैं, तुम इन्हें क्षमा कर दो। नरदेव! जो श्रेष्ठ मानव साधु और सद्बुद्धि-सम्पन्न होते हैं, वे दूसरे जीवों से द्रोह नहीं करते; क्योंकि यह शरीर ही आत्मा नहीं है। यदि तुम-जैसे लोग भी मेरी माया से मोहित हो जायें, तो समझना चाहिये कि बहुत दिनों तक की हुई ज्ञानीजनों की सेवा से केवल श्रम ही हाथ लगा। ज्ञानवान् पुरुष इस शरीर को अविद्या, वासना और कर्मों का ही पुतला समझकर इसमें आसक्त नहीं होता। इस प्रकार जो इस शरीर में ही आसक्त नहीं है, यह विवेकी पुरुष इससे उत्पन्न हुए घर, पुत्र और धन आदि में भी किस प्रकार ममता रख सकता है। यह आत्मा एक, शुद्ध, स्वयंप्रकाश, निर्गुण, गुणों का आश्रयस्थान, सर्वव्यापक, आवरणशून्य, सबका साक्षी एवं अन्य आत्मा से रहित है; अतएव शरीर से भिन्न है। जो पुरुष इस देहस्थित आत्मा को इस प्रकार शरीर से भिन्न जानता है, वह प्रकृति से सम्बन्ध रखते हुए भी उसके गुणों से लिप्त नहीं होता; क्योंकि उसकी स्थिति मुझ परमात्मा में रहती है। राजन्! जो पुरुष किसी प्रकार की कामना न रखकर अपने वर्णाश्रम के धर्मों द्वारा नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक मेरी आराधना करता है, उसका चित्त धीरे-धीरे शुद्ध हो जाता है। चित्त शुद्ध होने पर उसका विषयों से सम्बन्ध नहीं रहता तथा उसे तत्त्वज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। फिर तो वह मेरी समतारूप स्थिति को प्राप्त हो जाता है। यही परम शान्ति, ब्रह्म अथवा कैवल्य है। जो पुरुष यह जानता है कि शरीर, ज्ञान, क्रिया और मन का साक्षी होने पर भी कूटस्थ आत्मा उनसे निर्लिप्त ही रहता है, वह कल्याणमय मोक्षपद प्राप्त कर लेता है। राजन्! गुणप्रवाहरूप आवाहन तो भूत, इन्द्रिय, इन्द्रियाभिमानी देवता और चिदाभास- इन सबकी समष्टिरूप परिच्छिन्न लिंग शरीर का ही हुआ करता है; इसका सर्वसाक्षी आत्मा से कोई सम्बन्ध नहीं है। मुझमें दृढ़ अनुराग रखने वाले बुद्धिमान् पुरुष सम्पत्ति और विपत्ति प्राप्त होने पर कभी हर्ष-शोकादि विकारों के वशीभूत नहीं होते। इसलिये वीरवर! तुम उत्तम, मध्यम और अधम पुरुषों में समान भाव रखकर सुख-दुःख को भी एक-सा समझो तथा मन और इन्द्रियों को जीतकर मेरे ही द्वारा जुटाये हुए मन्त्री आदि समस्त राजकीय पुरुषों की सहायता से सम्पूर्ण लोकों की रक्षा करो। राजा का कल्याण प्रजा पालन में ही है। इससे उसे परलोक में प्रजा के पुण्य का छठा भाग मिलता है। इसके विपरीत जो राजा प्रजा की रक्षा तो नहीं करता; किंतु उससे कर वसूल करता जाता है, उसका सारा पुण्य तो प्रजा छीन लेती है और बदले में उसे प्रजा के पाप का भागी होना पड़ता है। ऐसा विचार कर यदि तुम श्रेष्ठ ब्राह्मणों की सम्मति और पूर्वपरम्परा से प्राप्त हुए धर्म को ही मुख्यतः अपना लो और कहीं भी आसक्त न होकर इस पृथ्वी का न्यायपूर्वक पालन करते रहो तो सब लोग तुमसे प्रेम करेंगे और कुछ ही दिनों में तुम्हें घर बैठे ही सनकादि सिद्धों के दर्शन होंगे।

राजन्! तुम्हारे गुणों ने और स्वभाव ने मुझको वश में कर लिया है। अतः तुम्हे जो इच्छा हो, मुझसे वर माँग लो। उन क्षमा आदि गुणों से रहित यज्ञ, तप अथवा योग के द्वारा मुझको पाना सरल नहीं है, मैं तो उन्हीं के हृदय में रहता हूँ जिनके चित्त में समता रहती है।

श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! सर्वलोकगुरु श्रीहरि के इस प्रकार कहने पर जगद्विजयी महाराज पृथु ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की

देवराज इन्द्र अपने कर्म से लज्जित होकर उनके चरणों पर गिरना ही चाहते थे कि राजा ने उन्हें प्रेमपूर्वक हृदय से लगा लिया और मनोमालिन्य निकाल दिया। फिर महाराज पृथु ने विश्वात्मा भक्तवत्सल भगवान् का पूजन किया और क्षण-क्षण में उमड़ते हुए भक्तिभाव में निमग्न होकर प्रभु के चरणकमल पकड़ लिये। श्रीहरि वहाँ से जाना चाहते थे; किन्तु पृथु के प्रति जो उनका वात्सल्यभाव था, उसने उन्हें रोक लिया। वे अपने कमलदल के समान नेत्रों से उनकी ओर देखते ही रह गये, वहाँ से जा न सके।

आदिराज महाराज पृथु भी नेत्रों में जल भर आने के कारण न तो भगवान् का दर्शन ही कर सके और न तो कण्ठ गद्गद हो जाने से कुछ बोल ही सके। उन्हें हृदय से आलिगन कर पकड़े रहे और हाथ जोड़े ज्यों-के-त्यों खड़े रह गये। प्रभु अपने चरणकमलों से पृथ्वी को स्पर्श किये खड़े थे; उनका कराग्रभाग गरुड़ जी के ऊँचे कंधे पर रखा हुआ था। महाराज पृथु नेत्रों के आँसू पोंछकर अतृप्त दृष्टि से उनकी ओर देखते हुए इस प्रकार कहने लगे।

महाराज पृथु बोले- मोक्षपति प्रभो! आप वर देने वाले ब्रह्मादि देवताओं को भी वर देने में समर्थ हैं। कोई भी बुद्धिमान् पुरुष आपसे देहाभिमानियों के भोगने योग्य विषयों को कैसे माँग सकता है? वे तो नारकी जीवों को भी मिलते ही हैं। अतः मैं इन तुच्छ विषयों को आपसे नहीं माँगता। मुझे तो उस मोक्षपद की भी इच्छा नहीं है, जिसमें महापुरुषों के हृदय से उनके मुख द्वारा निकला हुआ आपके चरणकमलों का मकरन्द नहीं है-जहाँ आपकी कीर्ति-कथा सुनने का सुख नहीं मिलता। इसलिये मेरी तो यही प्रार्थना है कि आप मुझे दस हजार कान दे दीजिये, जिनसे मैं आपके लीलागुणों को सुनता ही रहूँ।

पुण्यकीर्ति प्रभो! आपके चरणकमल-मकरन्दरूपी अमृत-कणों को लेकर महापुरुषों के मुख से जो वायु निकलती है, उसी में इतनी शक्ति होती है कि वह तत्त्व को भूले हुए हम कुयोगियों को पुनः तत्त्वज्ञान करा देती है। अतएव हमें दूसरे वरों की कोई आवश्यकता नहीं है।

उत्तम कीर्ति वाले प्रभो! सत्संग में आपके मंगलमय सुयश को दैववश एक बार भी सुन लेने पर कोई पशुबुद्धिपुरुष भले ही तृप्त हो जाये; गुणग्राही उसे कैसे छोड़ सकता है? सब प्रकार के पुरुषार्थों की सिद्धि के लिये स्वयं लक्ष्मी जी भी आपके सुयश को सुनना चाहती हैं। अब लक्ष्मी जी के समान मैं भी अत्यन्त उत्सुकता से आप सर्वगुणधाम पुरुषोत्तम की सेवा ही करना चाहता हूँ। किन्तु ऐसा न हो कि एक ही पति की सेवा प्राप्त करने की होड़ होने के कारण आपके चरणों में ही मन को एकाग्र करने वाले हम दोनों में कलह छिड़ जाये।

जगदीश्वर! जगज्जननी लक्ष्मी जी के हृदय में मेरे प्रति विरोधभाव होने की संभावना तो है ही; क्योंकि जिस आपके सेवाकार्य में उनका अनुराग है, उसी के लिये मैं भी लालायित हूँ। किन्तु आप दीनों पर दया करते हैं, उनके तुच्छ कर्मों को भी बहुत करके मानते हैं। इसलिये मुझे आशा है कि हमारे झगड़े में भी आप मेरा ही पक्ष लेंगे। आप तो अपने स्वरूप में ही रमण करते हैं; आपको भला, लक्ष्मी जी से भी क्या लेना है। इसी से निष्काम महात्मा ज्ञान हो जाने के बाद भी आपके भजन करते हैं। आप में माया के कार्य अहंकारदि का सर्वथा अभाव है। भगवन्! मुझे तो आपके चरणकमलों का निरन्तर चिन्तन करने के सिवा सत्पुरुषों का कोई और प्रयोजन ही नहीं जान पड़ता। मैं भी बिना किसी इच्छा के आपका भजन करता हूँ, आपने जो मुझसे कहा कि ‘वर माँग’ सो आपकी इस वाणी को तो मैं संसार को मोह में डालने वाली ही मानता हूँ। यही क्या, आपकी वेदरूपा वाणी ने भी तो जगत् को बाँध रखा है। यदि उस वेदवाणीरूप रस्सी से लोग बँधे न होते, तो वे मोहवश सकाम कर्म क्यों करते? प्रभो! आपकी माया से ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप आपसे विमुख होकर अज्ञानवश अन्य स्त्री-पुत्रादि की इच्छा करता है। फिर भी जिस प्रकार पिता पुत्र की प्रार्थना कि अपेक्षा न रखकर अपने-आप ही पुत्र का कल्याण करता है, उसी प्रकार आप भी हमारी इच्छा की अपेक्षा न करके हमारे हित के लिये स्वयं ही प्रयत्न करें। श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- आदिराज पृथु के इस प्रकार स्तुति करने पर सर्वसाक्षी श्रीहरि ने उनसे कहा, ‘राजन्! तुम्हारी मुझमे भक्ति हो। बड़े सौभाग्य की बात है कि तुम्हारा चित्त इस प्रकार मुझमें लगा हुआ है। ऐसा होने पर तो पुरुष सहज में ही मेरी उस माया को पार कर लेता है, जिसको छोड़ना या जिसके बन्धन से छूटना अत्यन्त कठिन है। अब तुम सावधानी से मेरी आज्ञा का पालन करते रहो। प्रजापालक नरेश! जो पुरुष मेरी आज्ञा का पालन करता है, उसका सर्वत्र मंगल होता है’। श्रीमैत्रेय जी कहते हैं- विदुर जी! इस प्रकार भगवान् ने राजर्षि पृथु के सारगर्भित वचनों का आदर किया। फिर पृथु ने उनकी पूजा की और प्रभु उन पर सब प्रकार कृपा कर वहाँ से चलने को तैयार हुए। महाराज पृथु ने वहाँ जो देवता, ऋषि, पितर, गंधर्व, सिद्ध, चारण, नाग, किन्नर, अप्सरा, मनुष्य और पक्षी आदि अनेक प्रकार के प्राणी एवं भगवान् के पार्षद आये थे, उन सभी का भगवदबुद्धि से भक्तिपूर्वक वाणी और धन के द्वारा हाथ जोड़कर पूजन किया। इसके बाद वे सब अपने-अपने स्थानों को चले गये। भगवान् अच्युत भी राजा पृथु एवं उनके पुरोहितों का चित्त चुराते हुए अपने धाम को सिधारे। तदनन्तर अपना स्वरूप दिखाकर अन्तर्धान हुए अव्यक्तस्वरूप देवाधिदेव भगवान् को नमस्कार करके राजा पृथु भी अपनी राजधानी में चले आये।

Chapter Twenty: Lord Vishnu’s Appearance in the Sacrificial Arena

1. The great sage Maitreya continued: My dear Vidura, being very much satisfied by the performance of ninety-nine horse sacrifices, the Supreme Personality of Godhead, Lord Visnu, appeared on the scene. Accompanying Him was King Indra. Lord Vishnu then began to speak.

2. Lord Vishnu, the Supreme Personality of Godhead, said: My dear King Prthu, Indra, the King of heaven, has disturbed your execution of one hundred sacrifices. Now he has come with Me to be forgiven by you. Therefore excuse him.

3. O King, one who is advanced in intelligence and eager to perform welfare activities for others is considered best amongst human beings. An advanced human being is never malicious to others. Those with advanced intelligence are always conscious that this material body is different from the soul.

4. If a personality like you, who are so much advanced because of executing the instructions of the previous acaryas, is carred away by the influence of My material energy, then all your advancement may be considered simply a waste of time.

5. Those who are in full knowledge of the bodily conception of life, who know that this body is composed of nescience, desires and activities resulting from illusion, do not become addicted to the body.

6. How can a highly learned person who has absolutely no affinity for the bodily conception of life be affected by the bodily conception in regard to house, children, wealth and similar other bodily productions?

7. The individual soul is one, Pure, nonmaterial and self-effulgent. He is the reservoir of all good qualities, and He is all-pervading. He is without material covering, and He is the witness of all activities.He is completely distinguished from other living entities, and He is transcendental to all embodied souls.

8. Although within the material nature, one who is thus situated in full knowledge of the Paramatma and atma is never affected by the modes of material nature, for he is always situated in My transcendental loving service.

9. The Supreme Personality of Godhead, Lord Visnu, continued: My dear King Prthu, when one situated in his occupational duty engages in My loving service without motive for material gain, he gradually becomes very satisfied within.

10. When the heart is cleansed of all material contamination, the devotee’s mind becomes broader and transparent, and he can see things equally. At that stage of life there is peace, and one is situated equally with Me as sac-cid-ananda-vigraha.

11. Anyone who knows that this material body, made of the five gross elements, the sense organs, the working senses and the mind, is simply supervised by the fixed soul is eligible to be liberated from material bondage.

12. Lord Vishnu told King Prthu: My dear King, the constant change of this material world is due to the interaction of the three modes of material nature. The five elements, the senses, the demigods who control the senses, as well as the mind, which is agitated by the spirit soul–all these taken together comprise the body. Since the spirit soul is completely different from this combination of gross and subtle
material elements, My devotee who is connected with Me in intense friendship and affection, being completely in knowledge, is never agitated by material happiness and distress.

13. My dear heroic King, please keep yourself always equipoised and treat people equally, whether they are greater than you, in the intermediate stage or lower than you. Do not be disturbed by temporary distress or happiness. Fully control your mind and senses. In this transcendental position, try to execute your duty as king in whatever condition of life you may be posted by My arrangement, for your only duty here is to give protection to the citizens of your kingdom.

14. To give protection to the general mass of people who are citizens of the state is the prescribed occupational duty for a king. By acting in that way, the king in his next life shares one sixth of the result of the pious activities of the citizens. But a king or executive head of state who simply collects taxes from the citizens but does not give them proper protection as human beings has the results of his own pious activities taken away by the citizens, and in exchange for his not giving protection he becomes liable to punishment for the impious activities of his subjects.

15. Lord Vishnu continued: My dear King Prthu, if you continue to protect the citizens according to the instructions of the learned brahmana authorities, as they are received by the disciplic succession–by hearing–from master to disciple, and if you follow the religious principles laid down by them, without attachment to ideas manufactured by mental concoction, then every one of your citizens will be happy
and will love you, and very soon you will be able to see such already liberated personalities as the four Kumaras [Sanaka, Sanatana, Sanandana and Sanat-kumara].

16. My dear King, I am very captivated by your elevated qualities and excellent behavior, and thus I am very favorably inclined toward you. You may therefore ask from Me any benediction you like. One who does not possess elevated qualities and behavior cannot possibly achieve My favor simply by performance of sacrifices, severe austerities or mystic yoga. But I always remain equipoised in the heart of one who is also equipoised in all circumstances.

17. The great saint Maitreya continued: My dear Vidura, in this way Maharaja Prthu, the conqueror of the entire world, accepted the instructions of the Supreme Personality of Godhead on his head.

18. As King Indra was standing by, he became ashamed of his own activities and fell down before King Prthu to touch his lotus feet. But Prthu Maharaja immediately embraced him in great ecstasy and gave up all envy against him for his having stolen the horse meant for the sacrifice.

19. King Prthu abundantly worshiped the lotus feet of the Supreme Personality of Godhead, who was so merciful to him. While worshiping the lotus feet of the Lord, Prthu Maharaja gradually increased his ecstasy in devotional service.

20. The Lord was just about to leave, but because He was so greatly inclined toward the behavior of King Prthu, He did not depart. Seeing the behavior of Maharaja Prthu with His lotus eyes, He was detained because He is always the well-wisher of His devotees.

21. The original king, Maharaja Prthu, his eyes full of tears and his voice faltering and choked up, could neither see the Lord very distinctly nor speak to address the Lord in any way. He simply embraced the Lord within his heart and remained standing in that way with folded hands.

22. The Supreme Personality of Godhead stood with His lotus feet almost touching the ground while He rested the front of His hand on the raised shoulder of Garuda, the enemy of the snakes. Maharaja Prthu, wiping the tears from his eyes, tried to look upon the Lord, but it appeared that the King was not fully satisfied by looking at Him. Thus the King offered the following prayers.

23. My dear Lord, You are the best of the demigods who can offer benedictions. Why, therefore, should any learned person ask You for benedictions meant for living entities bewildered by the modes of nature? Such benedictions are available automatically, even in the lives of living entities suffering in
hellish conditions. My dear Lord, You can certainly bestow merging into Your existence, but I do not wish to have such a benediction.

24. My dear Lord, I therefore do not wish to have the benediction of merging into Your existence, a benediction in which there is no existence of the nectarean beverage of Your lotus feet. I want the benediction of at least one million ears, for thus I may be able to hear about the glories of Your lotus feet from the mouths of Your pure devotees.

25. My dear Lord, You are glorified by the selected verses uttered by great personalities. Such glorification of Your lotus feet is just like saffron particles. When the transcendental vibration from the mouths of great devotees carries the aroma of the saffron dust of Your lotus feet, the forgetful living entity gradually remembers his eternal relationship with You. Devotees thus gradually come to the right
conclusion about the value of life. My dear Lord, I therefore do not need any other benediction but the opportunity to hear from the mouth of Your pure devotee.

26. My dear highly glorified Lord, if one, in the association of pure devotees, hears even once the glories of Your activities, he does not, unless he is nothing but an animal, give up the association of devotees, for no intelligent person would be so careless as to leave their association. The perfection of chanting and hearing about Your glories was accepted even by the goddess of fortune, who desired to
hear of Your unlimited activities and transcendental glories.

27. Now I wish to engage in the service of the lotus feet of the Supreme Personality of Godhead and to serve just like the goddess of fortune, who carries a lotus flower in her hand, because His Lordship, the Supreme Personality of Godhead, is the reservoir of all transcendental qualities. I am afraid that the
goddess of fortune and I would quarrel because both of us would be attentively engaged in the same service.

28. My dear Lord of the universe, the goddess of fortune, Laksmi, is the mother of the universe, and yet I think that she may be angry with me because of my intruding upon her service and acting on that very platform to which she is so much attached. Yet I am hopeful that even though there is some misunderstanding, You will take my part, for You are very much inclined to the poor and You always magnify even insignificant service unto You. Therefore even though she becomes angry, I think that there is no harm for You, because You are so self-sufficient that You can do without her.

29. Great saintly persons who are always liberated take to Your devotional service because only by devotional service can one be relieved from the illusions of material existence. O my Lord, there is no reason for the liberated souls to take shelter at Your lotus feet except that such souls are constantly thinking of Your feet.

30. My dear Lord, what You have said to Your unalloyed devotee is certainly very much bewildering. The allurements You offer in the Vedas are certainly not suitable for pure devotees. People in general, bound by the sweet words of the Vedas, engage themselves again and again in fruitive activities, enamored by the results of their actions.

31. My Lord, due to Your illusory energy, all living beings in this material world have forgotten their real constitutional position, and out of ignorance they are always desirous of material happiness in the form of society, friendship and love. Therefore, please do not ask me to take some material benefits from
You, but as a father, not waiting for the son’s demand, does everything for the benefit of the son, please bestow upon me whatever You think best for me.

32. The great sage Maitreya continued by saying that the Lord, the seer of the universe, after hearing Prthu Maharaja’s prayer, addressed the King: My dear King, may you always be blessed by engaging in My devotional service. Only by such purity of purpose, as you yourself very intelligently express, can one cross over the insurmountable illusory energy of maya.

33. My dear King, O protector of the citizens, henceforward be very careful to execute My orders and not be misled by anything. Anyone who lives in that way, simply carrying out My orders faithfully, will always find good fortune all over the world.

34. The great saint Maitreya told Vidura: The Supreme Personality of Godhead amply appreciated the meaningful prayers of Maharaja Prthu. Thus, after being properly worshiped by the King, the Lord blessed him and decided to depart.

35-36. King Prthu worshiped the demigods, the great sages, the inhabitants of Pitrloka, the inhabitants of Gandharvaloka and those of Siddhaloka, Caranaloka, Pannagaloka, Kinnaraloka, Apsaroloka, the earthly planets and the planets of the birds. He also worshiped many other living entities who presented
themselves in the sacrificial arena. With folded hands he worshiped all these, as well as the Supreme Personality of Godhead and the personal associates of the Lord, by offering sweet words and as much wealth as possible. After this function, they all went back to their respective abodes, following in the footsteps of Lord Vishnu.

37. The infallible Supreme Personality of Godhead, having captivated the minds of the King and the priests who were present, returned to His abode in the spiritual sky.

38. King Prthu then offered his respectful obeisances unto the Supreme Personality of Godhead, who is the Supreme Lord of all demigods. Although not an object of material vision, the Lord revealed Himself to the sight of Maharaja Prthu. After offering obeisances to the Lord, the King returned to his home.

After the death of King Vena there was no king, and the thieves and rogues increased their crooked activities. All the citizens suffered. At that time to fulfill the desires of the great sages, Lord Vishnu in His partial representation appeared from the body of Vena as King Prthu.
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